(33)27-11-1985 “A way to forget the old world and old traditions”

अव्यक्त मुरली-(33)27-11-1985 “पुराना संसार और पुराना संस्कार भुलाने का उपाय”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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25-11-1985 “निश्चय बुद्धि विजयी रत्नों की निशानियाँ”

आज बापदादा अपने निश्चय बुद्धि विजयी रत्नों की माला को देख रहे थे। सभी बच्चे अपने को समझते हैं कि मैं निश्चय में पक्का हूँ। ऐसा कोई विरला होगा जो अपने को निश्चयबुद्धि नहीं मानता हो। किसी से भी पूछेंगे निश्चय है? तो यही कहेंगे कि निश्चय न होता तो ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारी कैसे बनते। निश्चय के प्रश्न पर सब हाँ कहते हैं। सभी निश्चयबुद्धि बैठे हैं, ऐसे कहेंगे ना? नहीं तो जो समझते हैं कि निश्चय हो रहा है, वह हाथ उठावें। सब निश्चयबुद्धि हैं। अच्छा जब सभी को पक्का निश्चय है फिर विजय माला में नम्बर क्यों है? निश्चय में सभी का एक ही उत्तर है ना! फिर नम्बर क्यों? कहाँ अष्ट रत्न, कहाँ 100 रत्न और कहाँ 16 हजार! इसका कारण क्या? अष्ट देव का पूजन गायन और 16 हजार की माला के गायन और पूजन में कितना अन्तर है? बाप एक है और एक के ही हैं, यह निश्चय है फिर अन्तर क्यों? निश्चयबुद्धि में परसेन्टेज होती है क्या? निश्चय में अगर परसेन्टेज हो तो उसको निश्चय कहेंगे? 8 रत्न भी निश्चय बुद्धि, 16 हजार वाले भी निश्चयबुद्धि कहेंगे ना!

निश्चयबुद्धि की निशानी विजय है। इसलिए गायन है निश्चयबुद्धि विजयन्ती। तो निश्चय अर्थात् विजयी हैं ही हैं। कभी विजय हो, कभी न हो। यह हो नहीं सकता। सरकमस्टांस भले कैसे भी हों लेकिन निश्चयबुद्धि बच्चे सरकमस्टांस में अपनी स्वस्थिति की शक्ति द्वारा सदा विजय अनुभव करेंगे जो विजयी रत्न अर्थात् विजय माला का मणका बन गया, गले का हार बन गया उसकी माया से हार कभी हो नहीं सकती। चाहे दुनिया वाले लोग वा ब्राह्मण परिवार के सम्बन्ध सम्पर्क में दूसरा समझे वा कहे कि यह हार गया – लेकिन वह हार नहीं है, जीत है क्योंकि कहाँ-कहाँ देखने वा करने वालों की मिसअन्डरस्टैडिंग भी हो जाती है। नम्रचित, निर्मान वा हाँ जी का पाठ पढ़ने वाली आत्माओं के प्रति कभी मिसअन्डरस्टैडिंग से उसकी हार हो सकती है, दूसरों को रूप हार का दिखाई देता है लेकिन वास्तविक विजय है। सिर्फ उस समय दूसरों के कहने वा वायुमण्डल में स्वयं निश्चयबुद्धि से बदल शक्य का रूप न बने। पता नहीं हार है या जीत है। यह शक्य न रख अपने निश्चय में पक्का रहे। तो जिसको आज दूसरे लोग हार कहते हैं, कल वाह! वाह! के पुष्प चढ़ायेंगे।

विजयी आत्मा को अपने मन में, अपने कर्म प्रति कभी दुविधा नहीं होगी। राइट हूँ वा रांग हूँ। दूसरे का कहना अलग चीज है। दूसरे कोई राइट कहेंगे कोई रांग कहेंगे लेकिन अपना मन निश्चयबुद्धि हो कि मैं विजयी हूँ। बाप में निश्चय के साथ-साथ स्वयं का भी निश्चय चाहिए। निश्चयबुद्धि अर्थात् विजयी का मन अर्थात् संकल्प शक्ति सदा स्वच्छ होने के कारण हाँ और ना का स्वयं प्रति वा दूसरों के प्रति निर्णय सहज और सत्य, स्पष्ट होगा। इसलिए पता नहीं की दुविधा नहीं होगी। निश्चयबुद्धि विजयी रत्न की निशानी – सत्य निर्णय होने के कारण मन में जरा भी मूँझ नहीं होगी, सदैव मौज होगी। खुशी की लहर होगी। चाहे सरकमस्टांस आग के समान हो लेकिन उसके लिए वह अग्नि-परीक्षा विजय की खुशी अनुभव करायेगी क्योंकि परीक्षा में विजयी हो जायेंगे ना। अब भी लौकिक रीति किसी भी बात में विजय होती है तो खुशी मनाने के लिए हँसते नाचते ताली बजाते हैं। यह खुशी की निशानी है। निश्चयबुद्धि कभी भी किसी भी कार्य में अपने को अकेला अनुभव नहीं करेंगे। सभी एक तरफ हैं, मैं अकेला दूसरी तरफ हूँ, चाहे मैजॉरिटी दूसरे तरफ हों और विजयी रत्न सिर्फ एक हो फिर भी वह अपने को एक नहीं लेकिन बाप मेरे साथ है इसलिए बाप के आगे अक्षोणी भी कुछ नहीं है। जहाँ बाप है वहाँ सारा संसार बाप में है। बीज है तो झाड़ उसमें है ही। विजयी निश्चयबुद्धि आत्मा सदा अपने को सहारे के नीचे समझेंगे। सहारा देने वाला दाता मेरे साथ है, यह नेचुरल अनुभव करता है। ऐसे नहीं कि जब समस्या आवे उस समय बाप के आगे कहेंगे – बाबा आप तो मेरे साथ हो ना। आप ही मददगार हो ना। बस अब आप ही हो। मतलब का सहारा नहीं लेंगे। आप हो ना, यह हो ना का अर्थ क्या हुआ? निश्चय हुआ? बाप को भी याद दिलाते हैं कि आप सहारा हो। निश्चयबुद्धि कभी भी ऐसा संकल्प नहीं कर सकते। उनके मन में जरा भी बेसहारे वा अकेलेपन का संकल्प मात्र भी अनुभव नहीं होगा। निश्चयबुद्धि विजयी होने के कारण सदा खुशी में नाचता रहेगा। कभी उदासी वा अल्पकाल का हद का वैराग्य, इसी लहर में भी नहीं आयेंगे। कई बार जब माया का तेज वार होता है, अल्पकाल का वैराग्य भी आता है लेकिन वह हद का अल्पकाल का वैराग्य होता है। बेहद का सदा का नहीं होता। मजबूरी से वैराग्य-वृत्ति उत्पन्न होती है। इसलिए उस समय कह देते हैं कि इससे तो इसको छोड़ दें। मुझे वैराग्य आ गया है। सेवा भी छोड़ दें यह भी छोड़ दें। वैराग्य आता है लेकिन वह बेहद का नहीं होता। विजयी रत्न सदा हार में भी जीत, जीत में भी जीत अनुभव करेंगे। हद के वैराग्य को कहते हैं किनारा करना। नाम वैराग्य कहते लेकिन होता किनारा है। तो विजयी रतन किसी कार्य से, समस्या से, व्यक्ति से किनारा नहीं करेंगे। लेकिन सब कर्म करते हए, सामना करते हुए, सहयोगी बनते हुए बेहद के वैराग्य-वृत्ति में होंगे। जो सदाकाल का है। निश्चयबुद्धि विजयी कभी अपने विजय का वर्णन नहीं करेंगे। दूसरे को उल्हना नहीं देंगे। देखा मैं राइट था ना। यह उल्हना देना या वर्णन करना, यह खालीपन की निशानी है। खाली चीज ज्यादा उछलती है ना। जितना भरपूर होंगे उतना उछलेंगे नहीं। विजयी सदा दूसरे की भी हिम्मत बढ़ायेगा। नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करेगा क्योंकि विजयी रत्न बाप समान मास्टर सहारे दाता है। नीचे से ऊंचा उठाने वाला है। निश्चयबुद्धि व्यर्थ से सदा दूर रहता है। चाहे व्यर्थ संकल्प हो, बोल हो वा कर्म हो। व्यर्थ से किनारा अर्थात् विजयी है। व्यर्थ के कारण ही कभी हार, कभी जीत होती है। व्यर्थ समाप्त हो तो हार समाप्त। व्यर्थ समाप्त होना, यह विजयी रत्न की निशानी है। अब यह चेक करो कि निश्चयबुद्धि विजयी रत्न की निशानियाँ अनुभव होती हैं? सुनाया ना – निश्चयबुद्धि तो हैं, सच बोलते हैं। लेकिन निश्चयबुद्धि एक हैं जानने तक, मानने तक और एक हैं चलने तक। मानते तो सभी हो कि हाँ भगवान मिल गया। भगवान के बन गये। मानना वा जानना, एक ही बात है। लेकिन चलने में नम्बरवार हो जाते। तो जानते भी हैं, मानते भी इसमें ठीक हैं लेकिन तीसरी स्टेज है मान कर, जानकर चलना। हर कदम में निश्चय की वा विजय की प्रत्यक्ष निशानियाँ दिखाई दें। इसमें अन्तर है इसलिए नम्बरवार बन गये। समझा, नम्बर क्यों बने हैं!

इसी को ही कहा जाता है नष्टोमोहा। नष्टोमोहा की परिभाषा बड़ी गुह्य है। वह फिर कब सुनायेंगे। निश्चयबुद्धि नष्टोमोहा की सीढ़ी है। अच्छा, आज दूसरा ग्रुप आया है। घर के बालक ही मालिक हैं तो घर के मालिक अपने घर में आये हैं, ऐसे कहेंगे ना। घर में आये हो, या घर से आये हो? अगर उसको घर समझेंगे तो ममत्व जायेगा। लेकिन वह टेप्रेरी सेवा स्थान है। घर तो सभी का मधुबन है ना। आत्मा के नाते परमधाम है। ब्राह्मण के नाते मधुबन है। जब कहते ही हो कि हेड आफिस माउण्ट आबू है तो जहाँ रहते हो वह क्या हुई? आफिस हुई ना, तब तो हेड आफिस कहते। तो घर से नहीं आये हो लेकिन घर में आये हो। आफिस से कभी भी किसको चेन्ज कर सकते हैं। घर से निकाल नहीं सकते। आफिस तो बदली कर सकते। घर समझेंगे तो मेरापन रहेगा। सेन्टर को भी घर बना देते तब मेरापन आता है। सेन्टर समझें तो मेरापन नहीं रहे। घर बन जाता, आराम का स्थान बन जाता तब मेरापन रहता है। तो अपने घर से आये हो। यह जो कहावत है – अपना घर दाता का दर। यह कौन से स्थान के लिए गायन है? वास्तविक दाता का दर अपना घर तो मधुबन है ना। अपने घर में अर्थात् दाता के घर में आये हो। घर अथवा दर कहो बात एक ही है। अपने घर में आने से आराम मिलता है ना। मन का आराम। तन का भी आराम, धन का भी आराम। कमाने के लिए जाना थोड़ेही पड़ता। खाना बनाओ तब खाओ इससे भी आराम मिल जाता, थाली में बना बनाया भोजन मिलता है। यहाँ तो ठाकुर बन जाते हो। जैसे ठाकुरों के मंदिर में घण्टी बजाते हैं ना। ठाकुर को उठाना होगा, सुलाना होगा तो घण्टी बजाते। भोग लगायेंगे तो भी घण्टी बजायेंगे। आपकी भी घण्टी बजती है ना। आजकल फैशनेबुल हैं तो रिकार्ड बजता है। रिकार्ड से सोते हो, फिर रिकार्ड से उठते हो तो ठाकुर हो गये ना। यहाँ का ही फिर भक्तिमार्ग में कॉपी करते हैं। यहाँ भी 3-4 बार भोग लगता है। चैतन्य ठाकुरों को 4 बजे से भोग लगाना शुरू हो जाता है। अमृतवेले से भोग शुरू होता। चैतन्य स्वरूप में भगवान सेवा कर रहा है बच्चों की। भगवान की सेवा तो सब करते हैं, लेकिन यहाँ भगवान सेवा करता। किसकी? चैतन्य ठाकुरों की। यह निश्चय सदा ही खुशी में झुलाता रहेगा। समझा, सभी जोन लाडले हैं। जब जो ज़ोन आता है वह लाडला है। लाडले तो हो लेकिन सिर्फ बाप के लाडले बनो। माया के लाडले नहीं बन जाओ। माया के लाडले बनते हो तो फिर बहुत लाड कोड करते हो। जो भी आये हैं, भाग्यवान आये हो भगवान के पास। अच्छा।

सदा हर संकल्प में निश्चयबुद्धि विजयी रतन, सदा भगवान और भाग्य के स्मृति स्वरूप आत्माओं को, सदा हार और जीत दोनों में विजय अनुभव करने वालों को, सदा सहारा अर्थात् सहयोग देने वाले मास्टर सहारे दाता आत्माओं को, सदा स्वयं को बाप के साथ अनुभव करने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात :-

1. सभी एक लगन में मगन रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो? साधारण तो नहीं। सदा श्रेष्ठ आत्मायें जो भी कर्म करेंगी वह श्रेष्ठ होगा। जब जन्म ही श्रेष्ठ है तो कर्म साधारण कैसे होगा। जब जन्म बदलता है तो कर्म भी बदलता है। नाम, रूप, देश, कर्म सब बदल जाता है। तो सदा नया जन्म, नये जन्म की नवीनता के उमंग-उत्साह में रहते हो। जो कभी-कभी रहने वाले हैं उन्हें राज्य भी कभी-कभी मिलेगा।

जो निमित्त बनी हुई आत्मायें हैं, उन्हें निमित्त बनने का फल मिलता रहता है। और फल खाने वाली आत्मायें शक्तिशाली होती हैं। यह प्रत्यक्षफल है, श्रेष्ठ युग का फल है। इसका फल खाने वाले सदा शक्तिशाली होंगे। ऐसी शक्तिशाली आत्मायें परिस्थितियों के ऊपर सहज ही विजय पा लेती हैं। परिस्थिति नीचे और वह ऊपर। जैसे श्रीकृष्ण के लिए दिखाते हैं कि उसने सांप को भी जीता। उसके सिर पर पांव रखकर नाचा। तो यह आपका चित्र है। कितने भी जहरीले साँप हों लेकिन आप उन पर भी विजय प्राप्त कर नाच करने वाले हो। यही श्रेष्ठ शक्तिशाली स्मृति सबको समर्थ बना देगी। और जहाँ समर्थता है वहाँ व्यर्थ समाप्त हो जाता है। समर्थ बाप के साथ हैं, इसी स्मृति के वरदान से सदा आगे बढ़ते चलो।

2. सभी अमर बाप की अमर आत्मायें हो ना। अमर हो गई ना? शरीर छोड़ते हो तो भी अमर हो, क्यों? क्योंकि भाग्य बना करके जाते हो। हाथ खाली नहीं जाते। इसलिए मरना नहीं है। भरपूर होकर जाना है। मरना अर्थात् हाथ खाली जाना। भरपूर होकर जाना माना चोला बदली करना। तो अमर हो गये ना। अमर भव का वरदान मिल गया, इसमें मृत्यु के वशीभूत नहीं होते। जानते हो जाना भी है फिर आना भी है। इसलिए अमर हैं। अमरकथा सुनते-सुनते अमर बन गये। रोज़-रोज़ प्यार से कथा सुनते हो ना। बाप अमरकथा सुनाकर अमरभव का वरदान दे देता है। बस सदा इसी खुशी में रहो कि अमर बन गये। मालामाल बन गये। खाली थे भरपूर हो गये। ऐसे भरपूर हो गये जो अनेक जन्म खाली नहीं हो सकते।

3. सभी याद की यात्रा में आगे बढ़ते जा रहे हो ना। यह रूहानी यात्रा सदा ही सुखदाई अनुभव करायेगी। इस यात्रा से सदा के लिए सर्व यात्रायें पूर्ण हो जाती हैं। रूहानी यात्रा की तो सभी यात्रायें हो गई और कोई यात्रा करने की आवश्यकता ही नहीं रहती क्योंकि महान यात्रा है ना। महान यात्रा में सब यात्रायें समाई हुई है। पहले यात्राओं में भटकते थे अभी इस रूहानी यात्रा से ठिकाने पर पहुँच गये। अभी मन को भी ठिकाना मिला तो तन को भी ठिकाना मिला। एक ही यात्रा से अनेक प्रकार का भटकना बन्द हो गया। तो सदा रूहानी यात्री हैं इस स्मृति में रहो, इससे सदा उपराम रहेंगे, न्यारे रहेंगे, निर्मोही रहेंगे। किसी में भी मोह नहीं जायेगा। यात्री का किसी में भी मोह नहीं जाता। ऐसी स्थिति सदा रहे।

विदाई के समय:- बापदादा सभी देश-विदेश के बच्चों को देख खुश होते हैं क्योंकि सभी सहयोगी बच्चे हैं। सहयोगी बच्चों को बापदादा सदा दिलतख्तनशीन समझ याद कर रहे हैं। सभी निश्चयबुद्धि आत्मायें बाप की प्यारी हैं क्योंकि सभी गले का हार बन गई। अच्छा, सभी बच्चे सर्विस अच्छी वृद्धि को प्राप्त करा रहे हैं।

अध्याय : निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों की निशानियाँ

(Avyakt Murli – 25-11-1985)


1️⃣ सभी निश्चयबुद्धि हैं, फिर नम्बर क्यों?

मुरली संकेत | 25-11-1985
बापदादा कहते हैं —

“निश्चय के प्रश्न पर सभी हाँ कहते हैं, फिर विजय माला में नम्बर क्यों?”

हर ब्राह्मण आत्मा कहती है —
✔ हमें निश्चय है
✔ बाप एक है
✔ हम बाप के हैं

लेकिन प्रश्न यह है —
अगर निश्चय सबका एक-सा है,
तो
अष्ट रत्न अलग क्यों?
108, 1008, 16000 अलग क्यों?

 इसका उत्तर है —
निश्चय में नहीं, निश्चय के चलन में अन्तर।


2️⃣ निश्चयबुद्धि की असली परिभाषा

निश्चय = केवल जानना या मानना नहीं

मुरली स्पष्ट करती है —

“निश्चयबुद्धि की निशानी विजय है।”

अर्थात्
 कभी विजय
 कभी हार

ऐसा निश्चयबुद्धि में हो ही नहीं सकता।

✔ परिस्थिति कैसी भी हो
✔ लोग कुछ भी समझें
✔ वातावरण विपरीत हो

निश्चयबुद्धि आत्मा अपनी स्व-स्थिति से विजयी रहती है।


3️⃣ विजयी रत्न और माया का सम्बन्ध

मुरली संकेत | 25-11-1985

“जो गले का हार बन गया, उसकी माया से हार हो ही नहीं सकती।”

 दुनिया या ब्राह्मण परिवार भले कहे —
“यह हार गया”
लेकिन
✔ अगर आत्मा निश्चय में पक्की है
✔ अगर ‘हाँ जी’ और नम्रता है

तो वह हार दिखने में हार,
लेकिन वास्तविकता में जीत होती है।

उदाहरण

बीज मिट्टी में दबा होता है —
बाहर से लगता है खत्म हो गया
लेकिन वही दबना
भविष्य की विजय का कारण बनता है।


4️⃣ विजयी आत्मा की आन्तरिक स्थिति

निश्चयबुद्धि विजयी रत्न की निशानियाँ

✔ मन में दुविधा नहीं
✔ “मैं राइट हूँ या रॉन्ग?” — यह उलझन नहीं
✔ निर्णय स्पष्ट और सत्य
✔ मन सदा मौज में
✔ खुशी की लहर

मुरली लाइन | 25-11-1985

“अग्नि परीक्षा भी उसके लिए विजय की खुशी बन जाती है।”

 परिस्थिति आग जैसी
 लेकिन अनुभव खुशी का


5️⃣ अकेलापन नहीं, सहारे का अनुभव

विजयी निश्चयबुद्धि आत्मा कभी नहीं कहेगी —
 “मैं अकेला हूँ”
 “सब मेरे खिलाफ हैं”

क्यों?

 क्योंकि उसकी स्मृति है —
“बाप मेरे साथ है”

मुरली संकेत

“जहाँ बाप है, वहाँ सारा संसार है।”

ऐसी आत्मा
 बाप को याद नहीं दिलाती
 बाप पर शंका नहीं करती
 सहारे को नेचुरल अनुभव करती है


6️⃣ हद का वैराग्य और बेहद का वैराग्य

मुरली स्पष्टता | 25-11-1985

 हद का वैराग्य =
समस्या से किनारा करना
सेवा छोड़ देना
संबंधों से भागना

 बेहद का वैराग्य =
सब करते हुए
निर्मोही रहना
सहयोगी बनना

विजयी रत्न कभी किनारा नहीं करता।


7️⃣ विजयी रत्न की एक गुप्त पहचान

“निश्चयबुद्धि विजयी कभी अपने विजय का वर्णन नहीं करेगा।”

✔ “मैंने कहा था ना” — नहीं
✔ दूसरों को नीचा दिखाना — नहीं

क्योंकि
भरपूर आत्मा उछलती नहीं।

वह
दूसरों की हिम्मत बढ़ाता है
 नीचे से ऊपर उठाता है
 मास्टर सहारे दाता बनता है


8️⃣ व्यर्थ से दूरी = विजय की गारंटी

मुरली सूत्र | 25-11-1985

“व्यर्थ समाप्त, तो हार समाप्त।”

✔ व्यर्थ संकल्प नहीं
✔ व्यर्थ बोल नहीं
✔ व्यर्थ कर्म नहीं

यही निश्चयबुद्धि विजयी रत्न की पक्की निशानी है।


9️⃣ जानना, मानना और चलना — तीन स्टेज

मुरली का गहरा सूत्र

1️⃣ जानना — भगवान मिल गया
2️⃣ मानना — हाँ, यह सत्य है
3️⃣ चलना — हर कदम में निश्चय को जीना

तीसरी स्टेज में ही नम्बर बनता है।

इसीलिए

“निश्चयबुद्धि तो सभी हैं,
लेकिन निश्चयबुद्धि चलन में नम्बरवार हैं।”


🔟 नष्टोमोहा की सीढ़ी

मुरली संकेत | 25-11-1985

“निश्चयबुद्धि — नष्टोमोहा की सीढ़ी है।”

जहाँ
✔ मोह समाप्त
✔ मेरापन समाप्त
✔ बाप और कार्य में संतुलन

वहाँ
अचल विजय सुनिश्चित है।


अंतिम मुरली संदेश (सार)

🔹 निश्चय = विजय
🔹 विजय = स्थिति
🔹 स्थिति = हर कर्म में प्रत्यक्ष

अनुभव नहीं,
वर्णन नहीं,
बल्कि जीवन में विजय — यही निश्चयबुद्धि विजयी रत्न है।

प्रश्न 1: जब सभी कहते हैं कि हमें निश्चय है, तो फिर विजय माला में नम्बर क्यों है?

मुरली संकेत | 25-11-1985
बापदादा कहते हैं —

“निश्चय के प्रश्न पर सभी हाँ कहते हैं, फिर विजय माला में नम्बर क्यों?”

उत्तर:
निश्चय सभी के पास है —
✔ बाप एक है
✔ हम बाप के हैं

लेकिन अन्तर निश्चय में नहीं,
निश्चय के चलन में है।

निश्चय को

  • जानना अलग है

  • मानना अलग है

  • चलन में लाना अलग है

इसीलिए
🔹 अष्ट रत्न
🔹 108
🔹 1008
🔹 16000
— नम्बरवार बनते हैं।


प्रश्न 2: निश्चयबुद्धि की असली परिभाषा क्या है?

मुरली लाइन | 25-11-1985

“निश्चयबुद्धि की निशानी विजय है।”

उत्तर:
निश्चयबुद्धि का अर्थ केवल यह नहीं कि —
✔ हमने जान लिया
✔ हमने मान लिया

निश्चयबुद्धि वह है जो —
🔹 हर परिस्थिति में
🔹 हर वातावरण में
🔹 हर विरोध में

स्व-स्थिति से विजयी रहे।

निश्चयबुद्धि आत्मा के जीवन में
“कभी जीत, कभी हार” — यह हो ही नहीं सकता।


प्रश्न 3: विजयी रत्न और माया का आपस में क्या सम्बन्ध है?

मुरली संकेत | 25-11-1985

“जो गले का हार बन गया, उसकी माया से हार हो ही नहीं सकती।”

उत्तर:
दुनिया या ब्राह्मण परिवार भले कह दे —
“यह हार गया”

लेकिन यदि आत्मा —
✔ निश्चय में पक्की है
✔ नम्र और ‘हाँ जी’ है

तो वह हार दिखने में हार,
परन्तु वास्तव में विजय होती है।

उदाहरण:  दबता है,
तो लगता है खत्म हो गया,
लेकिन वही दबना
आने वाली विजय का कारण बनता है।


प्रश्न 4: विजयी आत्मा की आन्तरिक स्थिति कैसी होती है?

उत्तर:
निश्चयबुद्धि विजयी रत्न की निशानियाँ —
✔ मन में दुविधा नहीं
✔ “मैं सही हूँ या गलत?” की उलझन नहीं
✔ निर्णय स्पष्ट और सत्य
✔ मन सदा मौज में
✔ खुशी की लहर बनी रहती है

मुरली लाइन | 25-11-1985

“अग्नि परीक्षा भी उसके लिए विजय की खुशी बन जाती है।”

अर्थात्
 परिस्थिति आग जैसी
 लेकिन अनुभव खुशी का


प्रश्न 5: क्या विजयी निश्चयबुद्धि आत्मा कभी अकेलापन अनुभव करती है?

उत्तर:
नहीं।

विजयी आत्मा कभी नहीं कहेगी —
 “मैं अकेला हूँ”
 “सब मेरे खिलाफ हैं”

क्योंकि उसकी स्मृति है —
“बाप मेरे साथ है।”

मुरली संकेत | 25-11-1985

“जहाँ बाप है, वहाँ सारा संसार है।”

वह
✔ बाप को याद नहीं दिलाती
✔ बाप पर शंका नहीं करती
✔ सहारे को सहज अनुभव करती है


प्रश्न 6: हद का वैराग्य और बेहद का वैराग्य क्या है?

मुरली स्पष्टता | 25-11-1985

उत्तर:

हद का वैराग्य
– समस्या से भागना
– सेवा छोड़ देना
– सम्बन्धों से किनारा करना

बेहद का वैराग्य
– सब कर्म करते हुए
– निर्मोही रहना
– सहयोगी बनना

विजयी रत्न कभी किनारा नहीं करता।


प्रश्न 7: विजयी रत्न की एक गुप्त पहचान क्या है?

मुरली संकेत

“निश्चयबुद्धि विजयी कभी अपने विजय का वर्णन नहीं करेगा।”

उत्तर:
✔ “मैंने कहा था ना” — नहीं
✔ दूसरों को नीचा दिखाना — नहीं

क्योंकि
भरपूर आत्मा उछलती नहीं।

वह —
 दूसरों की हिम्मत बढ़ाता है
 नीचे से ऊपर उठाता है
 मास्टर सहारे दाता बनता है


प्रश्न 8: व्यर्थ और विजय का क्या सम्बन्ध है?

मुरली सूत्र | 25-11-1985

“व्यर्थ समाप्त, तो हार समाप्त।”

उत्तर:
जहाँ —
✔ व्यर्थ संकल्प समाप्त
✔ व्यर्थ बोल समाप्त
✔ व्यर्थ कर्म समाप्त

वहाँ —
विजय निश्चित है।


प्रश्न 9: जानना, मानना और चलना — इनमें अन्तर क्यों है?

उत्तर:

जानना — भगवान मिल गया
 मानना — हाँ, यह सत्य है
चलना — हर कदम में निश्चय को जीना

तीसरी स्टेज में ही नम्बर बनता है।

इसीलिए मुरली कहती है —

“निश्चयबुद्धि तो सभी हैं,
पर निश्चयबुद्धि चलन में नम्बरवार हैं।”


प्रश्न 10: नष्टोमोहा किसे कहते हैं?

मुरली संकेत | 25-11-1985

“निश्चयबुद्धि — नष्टोमोहा की सीढ़ी है।”

उत्तर:
जहाँ —
✔मोह समाप्त
✔मेरापन समाप्त
✔बाप और कार्य में संतुलन

वहाँ —
अचल विजय सुनिश्चित है।


अंतिम मुरली संदेश (सार)

 निश्चय = विजय
 विजय = स्थिति
 स्थिति = हर कर्म में प्रत्यक्ष

अनुभव नहीं,
वर्णन नहीं,
बल्कि जीवन में विजय — यही निश्चयबुद्धि विजयी रत्न है।

Disclaimer (डिस्क्लेमर)

यह वीडियो 25-11-1985 की अव्यक्त मुरली पर आधारित है और
ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के आध्यात्मिक ज्ञान, राजयोग और मुरली शिक्षाओं की व्याख्या हेतु प्रस्तुत किया गया है।
इसका उद्देश्य आत्म-चिंतन, निश्चय की गहराई और जीवन में आध्यात्मिक विजय की पहचान कराना है।
यह किसी प्रकार का चमत्कार, भविष्यवाणी या व्यक्तिगत श्रेष्ठता का दावा नहीं करता।
अनुभव और स्थिति आत्मा के पुरुषार्थ, अभ्यास और श्रीमत पर चलने पर निर्भर है।

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