अव्यक्त मुरली-(41)23-12-1985 “कामजीत – सर्व हद की कामनाओं से परे”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
23-12-1985 “कामजीत – सर्व हद की कामनाओं से परे”
बापदादा अपने छोटे से श्रेष्ठ सुखी संसार को देख रहे हैं। एक तरफ है बहुत बड़ा असार संसार। दूसरे तरफ है छोटा-सा सुखी संसार। इस सुखी संसार में सदा सुख-शान्ति सम्पन्न ब्राह्मण आत्मायें हैं क्योंकि पवित्रता, स्वच्छता के आधार पर यह सुख-शान्तिमय जीवन है। जहाँ पवित्रता वा स्वच्छता है वहाँ कोई भी दु:ख अशान्ति का नाम निशान नहीं। पवित्रता के किले के अन्दर यह छोटा-सा सुखी संसार है। अगर पवित्रता के किले के संकल्प द्वारा भी बाहर जाते हो तब दु:ख और अशान्ति का प्रभाव अनुभव करते हो। यह बुद्धि रूपी पांव किले के अन्दर रहें तो संकल्प तो क्या स्वप्न में भी दु:ख अशान्ति की लहर नहीं आ सकती है। दु:ख और अशान्ति का ज़रा भी अनुभव होता है तो अवश्य कोई न कोई अपवित्रता का प्रभाव है। पवित्रता, सिर्फ कामजीत जगतजीत बनना यह नहीं है। लेकिन काम विकार का वंश सर्व हद की कामनायें हैं। कामजीत अर्थात् सर्व कामनायें जीत क्योंकि कामनायें अनेक विस्तार पूर्वक हैं। कामना एक है वस्तुओं की, दूसरी – व्यक्ति द्वारा हद के प्राप्ति की कामना है। तीसरी – सम्बन्ध निभाने में भी हद की कामनायें अनेक प्रकार की उत्पन्न होती हैं। चौथी – सेवा भावना में भी हद की कामना का भाव उत्पन्न हो जाता है। इन चार ही प्रकार की कामनाओं को समाप्त करना अर्थात् सदा के लिए दु:ख अशान्ति को जीतना। अब अपने आप से पूछो इन चार ही प्रकार की कामनाओं को समाप्त किया है? कोई भी विनाशी वस्तु अगर बुद्धि को अपनी तरफ आकर्षित करती है तो जरूर कामना का रूप लगाव हुआ। रॉयल रूप में शब्द को परिवर्तन करके कहते हो – इच्छा नहीं है लेकिन अच्छा लगता है। चाहे वस्तु हो वा व्यक्ति हो लेकिन किसी के प्रति भी विशेष आकर्षण है, वो ही वस्तु वा वो व्यक्ति ही अच्छा लगता है अर्थात् कामना है। इच्छा है। सब अच्छा लगता है यह है यथार्थ। लेकिन यही अच्छा लगता है यह है अयथार्थ।
यह इच्छा का रॉयल रूप है। चाहे किसकी सेवा अच्छी लगती, किसकी पालना अच्छी लगती, किसके गुण अच्छे लगते, किसकी मेहनत अच्छी लगती, किसका त्याग अच्छा लगता, किसका स्वभाव अच्छा लगता लेकिन अच्छाई की खुशबू लेना वा अच्छाई को स्वयं भी धारण करना अलग बात है। लेकिन इस अच्छाई के कारण यही अच्छी है – यह अच्छा कहना इच्छा में बदल जाता है। यह कामना है। जो दु:ख और अशान्ति का सामना नहीं कर सकते। एक है अच्छाई के पीछे अपने को अच्छा बनने से वंचित करना। दूसरी दुश्मनी की कामना भी नीचे ले आती है। एक है प्रभावित होने की कामना। दूसरी है किसी से वैर व ईर्ष्या के भावना की कामना। वह भी सुख और शान्ति को समाप्त कर देती है। सदा ही मन हलचल में आ जाता है। प्रभावित होने के लक्षण लगाव और झुकाव है। ऐसे ईर्ष्या वा दुश्मनी का भाव, उसकी निशानी है – जिद करना और सिद्ध करना। दोनों ही भाव में कितनी एनर्जी, कितना समय खत्म कर देते हैं, यह मालूम नहीं पड़ता है। दोनों ही बहुत नुकसान देने वाले हैं। स्वयं भी परेशान और दूसरों को भी परेशान करने वाले हैं। ऐसी स्थिति के समय ऐसी आत्माओं का यही नारा होता है – दु:ख लेना और दु:ख देना ही है। कुछ भी हो जाए लेकिन करना ही है। यह कामना उस समय बोलती है। ब्राह्मण आत्मा नहीं बोलती। इसलिए क्या होता है सुख और शान्ति के संसार से बुद्धि रूपी पाँव बाहर निकल जाता है। इसलिए इन रॉयल कामनाओं के ऊपर भी विजयी बनो। इन इच्छाओं से भी इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति में आओ।
यह जो संकल्प करते हो दोनों ही भाव में कि मैं यह बात करके ही दिखाऊंगा, किसको दिखायेंगे? बाप को वा ब्राह्मण परिवार को? किसको दिखायेंगे? ऐसे समझो यह करके दिखायेंगे नहीं, लेकिन गिरके दिखायेंगे। यह कमाल है क्या जो दिखायेंगे! गिरना दिखाने की बात है क्या! यह हद के प्राप्ति का नशा – मैं सेवा करके दिखाऊंगा। मैं नाम बाला करके दिखाऊंगा, यह शब्द चेक करो रॉयल है? कहते हो शेर की भाषा लेकिन बनते हो बकरी। जैसे आजकल कोई शेर का, कोई हाथी का, कोई रावण का, कोई राम का फेस डाल देते हैं ना। तो यह माया शेर का फेस लगा देती है। मैं यह करके दिखाऊंगा, यह करूँगा, लेकिन माया अपने वश कर बकरी बना देती है। मैं-पन आना अर्थात् कोई न कोई हद की कामना के वशीभूत होना। यह भाषा युक्तियुक्त बोलो और भावना भी युक्तियुक्त रखो। यह होशियारी नहीं है लेकिन हर कल्प में सूर्यवंशी से चन्द्रवंशी बनने की हार खाना है। कल्प-कल्प चन्द्रवंशी बनना ही पड़ेगा। तो यह हार हुई या होशियारी हुई? तो ऐसी होशियारी नहीं दिखाओ। न अभिमान में आओ, न अपमान करने में आओ। दोनों ही भावनायें शुभ भावना शुभ कामना से दूर कर लेती है। तो चेक करो – जरा भी संकल्प मात्र भी अभिमान वा अपमान की भावना रह तो नहीं गई है? जहाँ अभिमान और अपमान की भावना है वहाँ कभी कोई भी स्वमान की स्थिति में स्थित हो नहीं सकता। स्वमान सर्व कामनाओं से किनारा कर देगा और सदा सुख के संसार में, सुख के शान्ति के झूले में झूलते रहेंगे। इसको ही कहा जाता है – सर्व कामनाजीत, जगतजीत। तो बापदादा देख रहे थे छोटे से सुखी संसार को। सुख के संसार से, अपने स्वदेश से पराये देश में बुद्धि रूपी पाँव द्वारा क्यों चले जाते हो। परधर्म, परदेश दु:ख देने वाला है। स्वधर्म, स्वदेश सुख देने वाला है। तो सुख के सागर बाप के बच्चे हो, सुख के संसार के अनुभवी आत्मायें हो। अधिकारी आत्मायें हो तो सदा सुखी रहो, शान्त रहो। समझा।
देश-विदेश के दोनों स्नेही बच्चे अपने घर वा बाप के घर में अपना अधिकार लेने के लिए पहुँच गये हो। तो अधिकारी बच्चों को देख बापदादा भी हर्षित होते हैं। जैसे खुशी में आये हो ऐसे ही सदा खुश रहने की विधि, इन दोनों बातों का संकल्प से भी त्यागकर सदा के लिए भाग्यवान बन करके जाना। भाग्य लेने आये हो लेकिन भाग्य लेने के साथ, मन से कोई भी कमजोरी जो उड़ती कला में विघ्न रूप बनती है वह छोड़ के जाना। यह छोड़ना ही लेना है। अच्छा।
सदा सुख के संसार में रहने वाले सर्व कामना जीत, सदा सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा स्वमान की सीट पर स्थित रहने वाली विशेष आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
टीचर्स के साथ:- सभी स्वयं को कौन-सी मणी समझते हो? (सन्तुष्टमणी) आज के समय में विशेष सन्तुष्टता की ही आवश्यकता है। पूजा भी ज्यादा किस देवी की होती है? सन्तोषी की। और सन्तोषी को राज़ी करना भी सहज होता है। संतोषी सन्तुष्ट जल्दी हो जाती है। संतोषी की पूजा क्यों होती है? क्योंकि आज के समय में टेन्शन बहुत है, परेशानियाँ बहुत हैं इस कारण असन्तुष्टता बढ़ती जा रही है। इसलिए सन्तुष्ट रहने का साधन सभी सोचते हैं, लेकिन कर नहीं सकते। तो ऐसे समय पर आप सभी सन्तुष्ट मणियाँ बन सन्तुष्टता की रोशनी दो। अपने सन्तुष्टता की रोशनी से औरों को भी सन्तुष्ट बनाओ। पहले स्वं से स्वयं सन्तुष्ट रहो फिर सेवा में सन्तुष्ट रहो, फिर सम्बन्ध में सन्तुष्ट रहो तब ही सन्तुष्टमणी कहलायेंगे। सन्तुष्टता के भी तीन सर्टीफिकेट चाहिए। अपने आप से, सेवा से, फिर साथियों से। यह तीनों सर्टीफिकेट लिए हैं ना। अच्छा है फिर भी दुनिया की हलचल से निकल अचलघर में पहुँच गई। यह बाप के स्थान अचलघर हैं। तो अचलघर में पहुँचना यह भी बड़े भाग्य की निशानी है। त्याग किया तो अचलघर पहुँची। भाग्यवान बन गई लेकिन भाग्य की लकीर और भी जितनी लम्बी खींचने चाहो उतनी खींच सकते हो। लिस्ट में तो आ गई भाग्यवान की क्योंकि भगवान की बन गई तो भाग्यवान हो गई। और सबसे किनारा कर एक को अपना बनाया तो भाग्यवान हो गई। बापदादा बच्चों की इस हिम्मत को देख खुश हैं। कुछ भी हो फिर भी त्याग और सेवा की हिम्मत में श्रेष्ठ हो। छोटे हो या नये हो लेकिन बापदादा त्याग और हिम्मत की मुबारक देते हैं। उसी रिगार्ड से बापदादा देखते हैं। निमित्त बनने का भी महत्व है। इसी महत्व से सदा आगे बढ़ते हुए विश्व में महान आत्मायें बन प्रसिद्ध हो जायेंगे। तो अपनी महानता को तो जानते हो ना! जितने महान उतने निर्मान। जैसे फलदायक वृक्ष की निशानी है झुकना। ऐसे जो निर्मान हैं वही प्रत्यक्ष फल खाने वाले हैं। संगमयुग की विशेषता ही यह है।
कामजीत — सर्व हद की कामनाओं से परे | 23-12-1985 Avyakt Murli Insights
परिचय
बापदादा अपने छोटे से श्रेष्ठ सुखी संसार और बहुत बड़े असार संसार का अवलोकन कर रहे हैं।
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सुखी संसार: पवित्र, स्वच्छ, सदा सुख-शान्ति में रहने वाले ब्राह्मण आत्माओं का है।
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असार संसार: दुख, अशान्ति और विकारों का भंडार।
मुख्य विचार:
पवित्रता और स्वच्छता के किले में रहने वाली आत्माएँ दुख और अशान्ति से सुरक्षित रहती हैं।
बुद्धि रूपी पाँव किले के अन्दर रहे तो संकल्प में भी दुख नहीं आ सकता।
पवित्रता और सुख-शान्ति का संसार
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यदि पवित्रता के किले से बाहर निकलो, तो दुख-अशान्ति का प्रभाव महसूस होता है।
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दुख और अशान्ति का अनुभव = कहीं न कहीं अपवित्रता का प्रभाव।
उदाहरण:
जैसे घर के भीतर सुरक्षित रहने पर बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता,
वैसे ही पवित्रता के किले में आत्मा सुरक्षित रहती है।
कामजीत — सर्व हद की कामनाओं पर विजय
कामना के चार प्रकार:
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वस्तुओं की कामना
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व्यक्ति से हद की प्राप्ति की कामना
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संबंध निभाने में हद की कामना
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सेवा भावना में हद की कामना
सार: इन चारों कामनाओं को समाप्त करना = सदा के लिए दुःख-अशान्ति को जीतना।
उदाहरण:
अगर किसी वस्तु, व्यक्ति, या सेवा में अत्यधिक झुकाव है, तो यह कामना का रूप है।
इच्छा और रॉयल कामना
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इच्छा का रॉयल रूप: “इच्छा नहीं है, लेकिन अच्छा लगता है।”
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वास्तविकता: सब अच्छा लगता है = यथार्थ
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अयथार्थ: “यही अच्छा लगता है” = लगाव और झुकाव = कामना
उदाहरण:
किसी की सेवा या त्याग अच्छा लगना = सहज ज्ञान
लेकिन “यही सबसे अच्छा है” कहना = लगाव = इच्छाएँ = दुख
ईर्ष्या और दुश्मनी की कामना
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लक्षण: जिद करना, सिद्ध करना
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परिणाम: समय, ऊर्जा और शान्ति नष्ट होना
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विशेष: स्वयं और दूसरों दोनों को परेशान करना
उदाहरण:
साथी की उपलब्धि देखकर ईर्ष्या करना = सुख-शान्ति का नाश
“मैं करके दिखाऊँगा” की मानसिकता
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यह अहंकार और हद की कामना है।
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माया का खेल: शेर का मुख लगाकर बकरी बना देती है।
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सिखावन: हद की कामनाओं में न फँसें।
स्वमान और सर्व कामनाजीत आत्मा
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स्वमान: अभिमान और अपमान से ऊपर उठना
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सर्व कामनाजीत आत्मा:
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शुभ भावना और शुभ कामना रखती है
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सदा सुख-शान्ति के संसार में रहती है
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स्वमान की सीट पर स्थित रहती है
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उदाहरण:
फलदार वृक्ष की तरह झुकना = निर्मान = प्रत्यक्ष फल
सन्तुष्टमणी बनने की कला
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तीन सर्टिफिकेट:
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स्वयं से सन्तुष्ट
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सेवा में सन्तुष्ट
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सम्बन्ध में सन्तुष्ट
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सन्तुष्ट मणियाँ बनकर अपनी और दूसरों की रोशनी बढ़ाएँ।
मुरली नोट्स
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23-12-1985 – “कामजीत — सर्व हद की कामनाओं से परे”
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“जहाँ अभिमान और अपमान हैं, वहाँ स्वमान नहीं टिक सकता।”
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“सर्व कामनाजीत, जगतजीत आत्माएँ सदा सुख-शान्ति में रहती हैं।”
अंतिम संदेश
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जहाँ इच्छा और लगाव है वहाँ दुःख है
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जहाँ स्वमान और सर्व कामनाजीतता है वहाँ शक्ति है
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संकल्प: सर्व हद की कामनाओं से मुक्त होकर सुख-शान्ति के संसार में सदा रहूँ
“कामजीत बनें — सर्व हद की कामनाओं से परे | 23-12-1985 Avyakt Murli Explained”
प्रश्न 1: बापदादा किस संसार को देख रहे हैं?
उत्तर:
बापदादा दो संसार देख रहे हैं —
एक बहुत बड़ा असार संसार और दूसरा छोटा-सा श्रेष्ठ सुखी संसार।
यह छोटा संसार ब्राह्मण आत्माओं का है, जो पवित्रता और स्वच्छता के आधार पर सदा सुख-शान्ति में रहते हैं।
प्रश्न 2: सुखी संसार की विशेषता क्या है?
उत्तर:
जहाँ पवित्रता है वहाँ दुःख और अशान्ति का नाम-निशान नहीं।
यह संसार पवित्रता के किले के अन्दर है।
अगर बुद्धि रूपी पाँव किले से बाहर गये, तो दुःख-अशान्ति का प्रभाव अनुभव होता है।
प्रश्न 3: कामजीत बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
कामजीत का अर्थ केवल काम-विकार जीतना नहीं,
बल्कि सर्व हद की कामनाओं को जीतना है।
कामनाएँ चार प्रकार की होती हैं:
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वस्तुओं की कामना
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व्यक्ति से हद की प्राप्ति की कामना
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सम्बन्धों में हद की कामना
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सेवा भावना में भी हद की कामना
इन चारों को समाप्त करना ही सच्चा कामजीत बनना है।
प्रश्न 4: इच्छा और कामना में क्या अंतर है?
उत्तर:
कामना का रॉयल रूप है —
“इच्छा नहीं है, लेकिन अच्छा लगता है।”
लेकिन किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति विशेष आकर्षण ही कामना है।
“सब अच्छा लगता है” — यह यथार्थ है।
“यही अच्छा लगता है” — यह अयथार्थ है।
प्रश्न 5: अच्छाई से प्रभावित होना क्यों नुकसानदायक है?
उत्तर:
किसी की अच्छाई को अपनाना अच्छी बात है,
लेकिन “यही ही अच्छा है” कहना लगाव और झुकाव बन जाता है।
यही कामना बनकर दुःख और अशान्ति को जन्म देती है।
प्रश्न 6: ईर्ष्या और दुश्मनी की कामना का परिणाम क्या होता है?
उत्तर:
ईर्ष्या और वैर का परिणाम है —
जिद करना और सिद्ध करना।
इससे बहुत एनर्जी और समय नष्ट होता है।
स्वयं भी परेशान होते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं।
प्रश्न 7: “मैं करके दिखाऊँगा” यह भावना क्यों खतरनाक है?
उत्तर:
यह अहंकार और हद की कामना का रूप है।
माया शेर का फेस लगाकर बकरी बना देती है।
यह हार है, होशियारी नहीं।
प्रश्न 8: स्वमान की स्थिति क्या है?
उत्तर:
जहाँ स्वमान है, वहाँ अभिमान और अपमान नहीं।
जहाँ अभिमान और अपमान हैं, वहाँ स्वमान नहीं टिक सकता।
स्वमान ही सर्व कामनाओं से किनारा कराता है।
प्रश्न 9: सर्व कामनाजीत आत्मा कौन होती है?
उत्तर:
जो आत्मा —
✔ सदा शुभ भावना रखती है
✔ शुभ कामना करती है
✔ स्वमान की सीट पर स्थित रहती है
✔ सुख के संसार में सदा रहती है
वही कहलाती है — सर्व कामनाजीत, जगतजीत आत्मा।
प्रश्न 10: सन्तुष्टमणी बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
सन्तुष्टमणी वह आत्मा है जो —
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स्वयं से सन्तुष्ट
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सेवा में सन्तुष्ट
-
सम्बन्धों में सन्तुष्ट
इन तीनों के सर्टिफिकेट ले लेती है।
प्रश्न 11: अचलघर पहुँचने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
अचलघर बाप का स्थान है।
त्याग और हिम्मत से ही आत्मा अचलघर पहुँचती है।
यह भाग्य की निशानी है।
प्रश्न 12: महान आत्मा की पहचान क्या है?
उत्तर:
महान आत्मा सदा निर्मान होती है।
फलदार वृक्ष की तरह झुकी हुई होती है।
वही प्रत्यक्ष फल खाने योग्य बनती है।
अंतिम संदेश
सदा सुख के संसार में रहने वाले,
सर्व कामनाजीत बनने वाले,
स्वमान की सीट पर स्थित रहने वाले
श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
आज का संकल्प
मैं सर्व हद की कामनाओं से मुक्त होकर
सदा सुख-शान्ति के संसार में रहने वाली
कामजीत आत्मा बनूँ।
Disclaimer
यह वीडियो केवल आध्यात्मिक शिक्षा के उद्देश्य से बनाया गया है।
यह ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली 23-12-1985 पर आधारित है।
कृपया इसे व्यक्तिगत विचार और अनुभव के लिए उपयोग करें।
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