(04)09-01-1985 “Spiritual Personality of the Most Fortunate Souls”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

14-01-1985 “शुभ चिन्तक बनने का आधार स्वचिन्तन और शुभ चिन्तन”

आज बापदादा चारों ओर के विशेष बच्चों को देख रहे हैं। कौन से विशेष बच्चे हैं जो सदा स्वचिन्तन, शुभ चिन्तन में रहने के कारण सर्व के शुभ चिन्तक हैं। जो सदा शुभ चिन्तन में रहता है वह स्वत: ही शुभचिन्तक बन जाता है। शुभ चिन्तन आधार है – शुभ चिन्तक बनने का। पहला कदम है स्वचिन्तन। स्वचिन्तन अर्थात् जो बापदादा ने ‘मैं कौन’ की पहेली बताई है उसको सदा स्मृति स्वरूप में रखना। जैसे बाप और दादा जो है जैसा है वैसा उसको जानना ही यथार्थ जानना है और दोनों को जानना ही जानना है। ऐसे स्व को भी जो हूँ जैसा हूँ अर्थात् जो आदि अनादि श्रेष्ठ स्वरूप हूँ, उस रूप से अपने आपको जानना और उसी स्वचिन्तन में रहना इसको कहा जाता है स्वचिन्तन। मैं कमजोर हूँ, पुरुषार्थी हूँ लेकिन सफलता स्वरूप नहीं हूँ, मायाजीत नहीं हूँ, यह सोचना स्वचिन्तन नहीं क्योंकि संगमयुगी पुरुषोत्तम ब्राह्मण आत्मा अर्थात् शक्तिशाली आत्मा। यह कमजोरी वा पुरुषार्थहीन वा ढीला पुरुषार्थ देह-अभिमान की रचना है। स्व अर्थात् आत्म-अभिमानी, इस स्थिति में यह कमजोरी की बातें आ नहीं सकतीं। तो यह देह-अभिमान की रचना का चिन्तन करना, यह भी स्वचिन्तन नहीं। स्वचिन्तन अर्थात् जैसा बाप वैसे मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ। ऐसा स्वचिन्तन वाला शुभ चिन्तन कर सकता है। शुभ चिन्तन अर्थात् ज्ञान रत्नों का मनन करना। रचता और रचना के गुह्य रमणीक राजों में रमण करना। एक है सिर्फ रिपीट करना, दूसरा है ज्ञान सागर की लहरों में लहराना अर्थात् ज्ञान खजाने के मालिकपन के नशे में रह सदा ज्ञान रत्नों से खेलते रहना। ज्ञान के एक-एक अमूल्य बोल को अनुभव में लाना अर्थात् स्वयं को अमूल्य रत्नों से सदा महान बनाना। ऐसा ज्ञान में रमण करने वाला ही शुभ चिन्तन करने वाला है। ऐसा शुभ चिन्तन वाला स्वत: ही व्यर्थ चिन्तन परचिन्तन से दूर रहता है। स्वचिन्तन, शुभ चिन्तन करने वाली आत्मा हर सेकेण्ड अपने शुभ चिन्तन में इतना बिजी रहती है जो और चिन्तन करने के लिए सेकेण्ड वा श्वांस भी फुर्सत का नहीं। इसलिए सदा परचिन्तन और व्यर्थ चिन्तन से सहज ही सेफ रहता है। न बुद्धि में स्थान है, न समय है। समय भी शुभ चिन्तन में लगा हुआ है, बुद्धि सदा ज्ञान रतनों से अर्थात् शुभ संकल्पों से सम्पन्न अर्थात् भरपूर है। दूसरा कोई संकल्प आने की मार्जिन ही नहीं, इसको कहा जाता है शुभ चिन्तन करने वाला। हर ज्ञान के बोल के राज़ में जाने वाला। सिर्फ साज़ के मज़े में रहने वाला नहीं। साज़ अर्थात् बोल के राज़ में जाने वाला। जैसे स्थूल साज़ भी सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं ना। ऐसे ज्ञान मुरली का साज़ अच्छा बहुत लगता है लेकिन साज़ के साथ राज़ समझने वाले ज्ञान खजाने के रत्नों के मालिक बन मनन करने में मगन रहते हैं। मगन स्थिति वाले के आगे कोई विघ्न आ नहीं सकता। ऐसा शुभ चिन्तन करने वाले स्वत: ही सर्व के सम्पर्क में शुभ चिन्तक बन जाता है। स्वचिन्तन फिर शुभ चिन्तन, ऐसी आत्मायें शुभचिन्तक बन जाती हैं क्योंकि जो स्वयं दिन रात शुभ चिन्तन में रहते वह औरों के प्रति कभी भी न अशुभ सोचते, न अशुभ देखते। उनका निजी संस्कार वा स्वभाव शुभ होने के कारण वृत्ति, दृष्टि सर्व में शुभ देखने और सोचने की स्वत: ही आदत बन जाती है इसलिए हरेक के प्रति शुभ चिन्तक रहता है। किसी भी आत्मा का कमजोर संस्कार देखते हुए भी उस आत्मा के प्रति अशुभ वा व्यर्थ नहीं सोचेंगे कि यह तो ऐसा ही है। लेकिन ऐसी कमजोर आत्मा को सदा उमंग उल्हास के पंख दे शक्तिशाली बनाए ऊंचा उड़ायेंगे। सदा उस आत्मा के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा सहयोगी बनेंगे। शुभ चिन्तक अर्थात् नाउम्मीदवार को उम्मीदवार बनाने वाले। शुभ चिन्तन के खजाने से कमजोर को भी भरपूर कर आगे बढ़ायेगा। यह नहीं सोचेगा इसमें तो ज्ञान है ही नहीं। यह ज्ञान के पात्र नहीं, यह ज्ञान में चल नहीं सकते। शुभचिन्तक बापदादा द्वारा ली हुई शक्तियों के सहारे की टांग दे लंगड़े को भी चलाने के निमित्त बन जायेंगे। शुभ चिन्तक आत्मा अपनी शुभचिन्तक स्थिति द्वारा दिलशिकस्त आत्मा को दिलखुश मिठाई द्वारा उनको भी तन्दरूस्त बनायेगी। दिलखुश मिठाई खाते हो ना। तो दूसरे को खिलाने भी आती है ना। शुभचिन्तक आत्मा किसी की कमजोरी जानते हुए भी उस आत्मा की कमजोरी भुलाकर अपनी विशेषता के शक्ति की समर्थी दिलाते हुए उसको भी समर्थ बना देंगे। किसी के प्रति घृणा दृष्टि नहीं। सदा गिरी हुई आत्मा को ऊंचा उड़ाने की दृष्टि होगी। सिर्फ स्वयं शुभ चिन्तन में रहना वा शक्तिशाली आत्मा बनना यह भी फर्स्ट स्टेज नहीं। इसको भी शुभचिन्तक नहीं कहेंगे। शुभचिन्तक अर्थात् अपने खजानों को मन्सा द्वारा, वाचा द्वारा, अपने रूहानी सम्बन्ध सम्पर्क द्वारा अन्य आत्माओं प्रति सेवा में लगाना। शुभ चिंतक आत्मायें नम्बरवन सेवाधारी, सच्चे सेवाधारी हैं, ऐसे शुभ चिन्तक बने हो? सदा वृत्ति शुभ, दृष्टि शुभ। तो सृष्टि भी श्रेष्ठ ब्राह्मणों की शुभ दिखाई देगी। वैसे भी साधारण रूप में कहा जाता है शुभ बोलो। ब्राह्मण आत्मायें तो हैं ही शुभ जन्म वाली। शुभ समय पर जन्मे हो। ब्राह्मणों के जन्म की घड़ी अर्थात् वेला शुभ है ना। भाग्य की दशा भी शुभ है। सम्बन्ध भी शुभ है। संकल्प, कर्म भी शुभ है। इसलिए ब्राह्मण आत्माओं के साकार में तो क्या लेकिन स्वप्न में भी अशुभ का नाम निशान नहीं – ऐसी शुभचिन्तक आत्मायें हो ना। स्मृति दिवस पर विशेष आये हो – स्मृति दिवस अर्थात् समर्थ दिवस। तो विशेष समर्थ आत्मायें हो ना। बापदादा भी कहते हैं सदा समर्थ आत्मायें समर्थ दिन मनाने भले पधारे। समर्थ बापदादा समर्थ बच्चों की सदा स्वागत करते हैं समझा। अच्छा।

सदा स्वचिन्तन के रूहानी नशे में रहने वाले, शुभ चिन्तन के खजाने से सम्पन्न रहने वाले शुभचिन्तक बन सर्व आत्माओं को उड़कर उड़ाने वाले, सदा बाप समान दाता वरदाता बन सभी को शक्तिशाली बनाने वाले, ऐसे समर्थ समान बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ – माताओं के ग्रुप से:-

1. मातायें सदा अपना श्रेष्ठ भाग्य देख हर्षित रहती हो ना। चरणों की दासी से सिर के ताज बन गई यह खुशी सदा रहती है? कभी खुशी का खजाना चोरी तो नहीं हो जाता? माया चोरी करने में होशियार है। अगर सदा बहादुर हैं, होशियार हैं तो माया कुछ नहीं कर सकती और ही दासी बन जायेगी, दुश्मन से सेवाधारी बन जायेगी। तो ऐसे मायाजीत हो? बाप की याद है अर्थात् सदा संग में रहने वाले हैं। रूहानी रंग लगा हुआ है। बाप का संग नहीं तो रूहानी रंग नहीं। तो सभी बाप के संग के रंग में रंगे हुए नष्टोमोहा हो? या थोड़ा-थोड़ा मोह है? बच्चों में नहीं होगा लेकिन पोत्रों धोत्रों में होगा। बच्चों की सेवा पूरी हुई दूसरों की सेवा शुरू हुई। कम नहीं होती। एक के पीछे एक लाइन लग जाती है। तो इससे बन्धन मुक्त हो? माताओं की कितनी श्रेष्ठ प्राप्ति हो गई। जो बिल्कुल हाथ खाली बन गई थीं वह अभी मालामाल हो गई। सब कुछ गंवाया अभी फिर से बाप द्वारा सर्व खजाने प्राप्त कर लिए, तो मातायें क्या से क्या बन गई? चार दीवारों में रहने वाली विश्व का मालिक बन गई। यह नशा रहता है ना कि बाप ने हमको अपना बनाया तो कितना भाग्य है? भगवान आकर अपना बनाये, ऐसा श्रेष्ठ भाग्य तो कभी नहीं हो सकता। तो अपने भाग्य को देख सदा खुश रहती हो ना। कभी यह खजाना माया चोरी न करे।

2. सभी पुण्य आत्मायें बने हो? सबसे बड़ा पुण्य है दूसरों को शक्ति देना। तो सदा सर्व आत्माओं के प्रति पुण्य आत्मा अर्थात् अपने मिले हुए खजाने के महादानी बनो। ऐसे दान करने वाले जितना दूसरों को देते हैं उतना पदमगुणा बढ़ता है। तो यह देना अर्थात् लेना हो जाता है। ऐसे उमंग रहता है? इस उमंग का प्रैक्टिकल स्वरूप है सेवा में सदा आगे बढ़ते रहो। जितना भी तन-मन-धन सेवा में लगाते उतना वर्तमान भी महादानी पुण्य आत्मा बनते और भविष्य भी सदाकाल का जमा करते। यह भी ड्रामा में भाग्य है जो चांस मिलता है अपना सब कुछ जमा करने का। तो यह गोल्डन चांस लेने वाले हो ना। सोचकर किया तो सिल्वर चांस, फ़राखदिल होकर किया तो गोल्डन चांस तो सब नम्बरवन चांसलर बनो।

शुभ चिन्तक बनने का आधार – स्वचिन्तन और शुभ चिन्तन

(अव्यक्त मुरली – 14 जनवरी 1985)


🔹 भूमिका : बापदादा किन बच्चों को “विशेष” कहते हैं?

आज बापदादा चारों ओर के विशेष बच्चों को देख रहे हैं।
विशेष कौन?जो सदा स्वचिन्तन और शुभ चिन्तन में रहने के कारण सर्व के शुभ चिन्तक बन जाते हैं।

मुरली सूत्र:

“जो सदा शुभ चिन्तन में रहता है, वह स्वतः ही शुभ चिन्तक बन जाता है।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


 1️⃣ शुभ चिन्तक बनने की पहली सीढ़ी – स्वचिन्तन

स्वचिन्तन का अर्थ है —
‘मैं कौन हूँ’ इस पहेली को स्मृति स्वरूप में रखना।

 स्वचिन्तन क्या है?

  • मैं आत्मा हूँ

  • मैं संगमयुगी पुरुषोत्तम ब्राह्मण आत्मा हूँ

  • मैं शक्तिशाली हूँ, श्रेष्ठ स्वरूप हूँ

 स्वचिन्तन क्या नहीं है?

  • “मैं कमजोर हूँ”

  • “मैं सफल नहीं हो सकता”

  • “मुझमें शक्ति नहीं है”

यह सब देह-अभिमान की रचना है, स्वचिन्तन नहीं।

मुरली नोट:

“स्व अर्थात् आत्म-अभिमानी। आत्म-अभिमान में कमजोरी की बातें आ ही नहीं सकतीं।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)

 उदाहरण:

जैसे शेर का बच्चा अपने को भेड़ समझ ले तो वह डरपोक बनेगा।
लेकिन जैसे ही उसे अपनी पहचान याद आती है — वह निर्भय बन जाता है।
 यही स्वचिन्तन है।


 2️⃣ शुभ चिन्तन क्या है?

स्वचिन्तन के बाद अगला कदम है — शुभ चिन्तन

शुभ चिन्तन का अर्थ:

  • ज्ञान रत्नों का मनन

  • रचता और रचना के गुह्य राज़ों में रमण

  • ज्ञान सागर की लहरों में लहराना

 सिर्फ ज्ञान को रिपीट करना नहीं,
 बल्कि ज्ञान खजाने के मालिकपन के नशे में रहना।

मुरली सूत्र:

“ज्ञान के एक-एक अमूल्य बोल को अनुभव में लाना ही शुभ चिन्तन है।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


🔹 3️⃣ साज़ और राज़ का अन्तर

  • साज़ – ज्ञान मुरली सुनना अच्छा लगता है

  • राज़ – ज्ञान के गहरे अर्थ में जाना

 जो साज़ और राज़ दोनों को समझता है, वही
मगन स्थिति में रहता है।

 परिणाम:

  • मगन आत्मा के सामने विघ्न आ नहीं सकता

  • व्यर्थ चिन्तन के लिए
     न बुद्धि में स्थान
     न समय में फुर्सत


 4️⃣ शुभ चिन्तन का स्वाभाविक फल – व्यर्थ से सुरक्षा

जो आत्मा हर सेकण्ड शुभ चिन्तन में बिज़ी है —

  • वह परचिन्तन से स्वतः सेफ रहती है

  • व्यर्थ संकल्पों के लिए मार्जिन ही नहीं

मुरली नोट:

“बुद्धि सदा ज्ञान रत्नों से भरपूर हो, तो दूसरा कोई संकल्प आ ही नहीं सकता।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


 5️⃣ शुभ चिन्तक आत्मा की पहचान

शुभ चिन्तक आत्मा —

  • कभी किसी के लिए अशुभ नहीं सोचती

  • कमजोर को देखकर भी
     दोष नहीं
     बल्कि उमंग-उल्हास के पंख देती है

 उदाहरण:

  • निराश आत्मा को उम्मीदवार बनाना

  • दिलशिकस्त आत्मा को दिलखुश मिठाई खिलाना

  • लंगड़े को सहारे की टांग देकर चलाना

 यही सच्ची सेवा है।


 6️⃣ शुभ चिन्तक = नम्बर वन सेवाधारी

सिर्फ स्वयं शक्तिशाली बनना फर्स्ट स्टेज नहीं है।

शुभ चिन्तक कौन?

  • जो अपने खजानों को

    • मन्सा से

    • वाचा से

    • सम्बन्ध-सम्पर्क से
       दूसरों की सेवा में लगाये

मुरली सूत्र:

“शुभ चिन्तक आत्मायें ही सच्चे और नम्बरवन सेवाधारी हैं।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


 7️⃣ ब्राह्मण आत्माओं की शुभ स्थिति

  • जन्म ही शुभ

  • समय शुभ

  • भाग्य शुभ

  • सम्बन्ध शुभ

 इसलिए ब्राह्मण आत्मा के
स्वप्न में भी अशुभ का नाम-निशान नहीं होना चाहिए।


🔹 8️⃣ स्मृति दिवस = समर्थ दिवस

बापदादा कहते हैं —

“समर्थ बापदादा समर्थ बच्चों का स्वागत करते हैं।”

 आज विशेष आये हो
 तो विशेष समर्थ आत्मायें हो।


🔹 अंतिम वरदान (मुरली भाव)

सदा स्वचिन्तन के रूहानी नशे में रहने वाले,
शुभ चिन्तन के खजाने से सम्पन्न,
सर्व आत्माओं को उड़ाने वाले,
बाप समान दाता-वरदाता बनने वाले
ऐसे समर्थ बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

प्रश्न 1: बापदादा किन बच्चों को “विशेष” कहते हैं?

उत्तर:
बापदादा उन बच्चों को “विशेष” कहते हैं जो सदा स्वचिन्तन और शुभ चिन्तन में रहने के कारण स्वतः ही सर्व के शुभ चिन्तक बन जाते हैं।

मुरली सूत्र:

“जो सदा शुभ चिन्तन में रहता है, वह स्वतः ही शुभ चिन्तक बन जाता है।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


🔹 प्रश्न 2: शुभ चिन्तक बनने की पहली सीढ़ी कौन-सी है?

उत्तर:
शुभ चिन्तक बनने की पहली सीढ़ी है — स्वचिन्तन


🔹 प्रश्न 3: स्वचिन्तन का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
स्वचिन्तन का अर्थ है —
‘मैं कौन हूँ’ इस सत्य को सदा स्मृति स्वरूप में रखना।

अर्थात्:

  • मैं आत्मा हूँ

  • मैं संगमयुगी पुरुषोत्तम ब्राह्मण आत्मा हूँ

  • मैं शक्तिशाली और श्रेष्ठ स्वरूप हूँ


🔹 प्रश्न 4: कौन-से विचार स्वचिन्तन नहीं कहलाते?

उत्तर:
निम्न विचार स्वचिन्तन नहीं, बल्कि देह-अभिमान की रचना हैं:

  • “मैं कमजोर हूँ”

  • “मैं सफल नहीं हो सकता”

  • “मुझमें शक्ति नहीं है”

मुरली नोट:

“स्व अर्थात् आत्म-अभिमानी। आत्म-अभिमान में कमजोरी की बातें आ ही नहीं सकतीं।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


🔹 प्रश्न 5: स्वचिन्तन को समझने के लिए कौन-सा उदाहरण दिया जा सकता है?

उत्तर:
जैसे शेर का बच्चा यदि स्वयं को भेड़ समझ ले तो डरपोक बन जाता है,
लेकिन जैसे ही उसे अपनी असली पहचान याद आती है — वह निर्भय बन जाता है।
 यही आत्म-पहचान में रहना स्वचिन्तन है।


🔹 प्रश्न 6: स्वचिन्तन के बाद अगला कदम क्या है?

उत्तर:
स्वचिन्तन के बाद अगला और अनिवार्य कदम है — शुभ चिन्तन


🔹 प्रश्न 7: शुभ चिन्तन का सही अर्थ क्या है?

उत्तर:
शुभ चिन्तन का अर्थ है:

  • ज्ञान रत्नों का मनन करना

  • रचता और रचना के गुह्य राज़ों में रमण करना

  • ज्ञान सागर की लहरों में लहराना

 केवल ज्ञान को दोहराना नहीं,
 बल्कि ज्ञान खजाने के मालिकपन के नशे में रहना

मुरली सूत्र:

“ज्ञान के एक-एक अमूल्य बोल को अनुभव में लाना ही शुभ चिन्तन है।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


🔹 प्रश्न 8: मुरली में ‘साज़’ और ‘राज़’ से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:

  • साज़ – ज्ञान मुरली सुनने का आनंद

  • राज़ – ज्ञान के गहरे अर्थों में प्रवेश करना

जो आत्मा साज़ और राज़ दोनों को समझती है, वही मगन स्थिति में रहती है।


🔹 प्रश्न 9: मगन स्थिति में रहने वाली आत्मा का परिणाम क्या होता है?

उत्तर:

  • मगन आत्मा के सामने विघ्न टिक नहीं सकते

  • व्यर्थ चिन्तन के लिए

    • न बुद्धि में स्थान होता है

    • न समय में फुर्सत


🔹 प्रश्न 10: शुभ चिन्तन का स्वाभाविक फल क्या है?

उत्तर:
शुभ चिन्तन का स्वाभाविक फल है —
व्यर्थ और परचिन्तन से स्वतः सुरक्षा।

मुरली नोट:

“बुद्धि सदा ज्ञान रत्नों से भरपूर हो, तो दूसरा कोई संकल्प आ ही नहीं सकता।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


🔹 प्रश्न 11: शुभ चिन्तक आत्मा की पहचान क्या है?

उत्तर:
शुभ चिन्तक आत्मा:

  • किसी के लिए भी अशुभ नहीं सोचती

  • कमजोर को देखकर दोष नहीं देखती

  • बल्कि उसे उमंग–उल्हास के पंख देती है


🔹 प्रश्न 12: शुभ चिन्तक आत्मा किस प्रकार सेवा करती है?

उत्तर:

  • निराश आत्मा को उम्मीदवार बनाकर

  • दिलशिकस्त आत्मा को दिलखुश मिठाई देकर

  • लंगड़े को सहारे की टांग देकर चलाकर

 यही सच्ची सेवा है।


🔹 प्रश्न 13: क्या केवल स्वयं शक्तिशाली बनना ही शुभ चिन्तक होना है?

उत्तर:
नहीं।
केवल स्वयं शक्तिशाली बनना फर्स्ट स्टेज है,
लेकिन शुभ चिन्तक वह है जो अपने खजानों को दूसरों की सेवा में लगाये।


🔹 प्रश्न 14: शुभ चिन्तक आत्मा किन साधनों से सेवा करती है?

उत्तर:
शुभ चिन्तक आत्मा सेवा करती है:

  • मन्सा द्वारा

  • वाचा द्वारा

  • सम्बन्ध और सम्पर्क द्वारा

मुरली सूत्र:

“शुभ चिन्तक आत्मायें ही सच्चे और नम्बरवन सेवाधारी हैं।”
(अव्यक्त मुरली 14-01-1985)


🔹 प्रश्न 15: ब्राह्मण आत्माओं की शुभ स्थिति क्या है?

उत्तर:
ब्राह्मण आत्माओं का:

  • जन्म शुभ

  • समय शुभ

  • भाग्य शुभ

  • सम्बन्ध शुभ

 इसलिए ब्राह्मण आत्मा के स्वप्न में भी अशुभ का नाम-निशान नहीं होना चाहिए।


🔹 प्रश्न 16: स्मृति दिवस को समर्थ दिवस क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि बापदादा कहते हैं:

“समर्थ बापदादा समर्थ बच्चों का स्वागत करते हैं।”

 जो स्मृति में स्थित हैं, वही समर्थ आत्मायें हैं।


🔹 प्रश्न 17: इस मुरली का अंतिम संदेश क्या है?

उत्तर:
सदा स्वचिन्तन के रूहानी नशे में रहने वाले,
शुभ चिन्तन के खजाने से सम्पन्न,
सर्व आत्माओं को उड़ाने वाले,
बाप समान दाता-वरदाता बनने वाले —
ऐसे समर्थ बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

Disclaimer (YouTube के लिए)

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के अव्यक्त मुरली (14-01-1985) पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, स्वचिन्तन और शुभ भावना को बढ़ाना है।
यह किसी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा की आलोचना नहीं है।
सभी विचार ईश्वरीय ज्ञान के अध्ययन और व्यक्तिगत अनुभूति पर आधारित हैं।

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