MURLI 27-03-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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27-03-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – ज्ञान सागर बाप द्वारा तुम मास्टर ज्ञान सागर बने हो, तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, इसलिए तुम हो त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ”
प्रश्नः- विश्व की रूहानी सेवा तुम बच्चों के सिवाए कोई नहीं कर सकता है – क्यों?
उत्तर:- क्योंकि तुम्हें ही सुप्रीम रूह (शिवबाबा) की शक्ति मिलती है। पहले तुम आत्माओं को सुप्रीम रूह द्वारा ज्ञान का इन्जेक्शन लगता है, जिससे तुम 5 विकारों पर स्वयं भी विजय प्राप्त करते और दूसरों को भी कराते हो। ऐसी सेवा और कोई कर न सके। कल्प-कल्प तुम बच्चे ही यह रूहानी सेवा करते हो।

ओम् शान्ति। बाप की याद में बैठना है और कोई भी देहधारी की याद में नहीं बैठना है। नये-नये जो आते हैं बाप को तो जानते ही नहीं हैं। उनका नाम तो बड़ा सहज है शिवबाबा। बाप को बच्चे नहीं जानते, कितना वण्डर है। शिवबाबा ऊंच ते ऊंच, सर्व का सद्गति दाता है। सर्व पतितों का पावन कर्ता, सर्व का दु:ख हर्ता भी कहते हैं परन्तु वह कौन है, यह कोई नहीं जानते, सिवाए तुम बी.के. के। तुम हो उनके पोत्रे पोत्रियाँ। सो तो जरूर अपने बाप और उनकी रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानेंगे। बाप द्वारा बच्चे ही सब कुछ जान जाते हैं। यह है ही पतित दुनिया। सर्व कलियुगी पतितों को सतयुगी पावन कैसे बनाते हैं सो तो बी.के. के सिवाए दुनिया में कोई नहीं जानते। कलियुगी दुर्गति से निकालने वाला सतयुगी सद्गति दाता बाप ही है। शिव जयन्ती भी भारत में ही होती है। जरूर वह आते हैं परन्तु भारत को क्या आकर देते हैं, यह भारतवासी नहीं जानते। हर वर्ष शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं है इसलिए बाप को नहीं जानते।

गीत:- नयनहीन को राह दिखाओ…

यह मनुष्यों का ही बनाया हुआ गीत है कि हम सब नयनहीन हैं। यह स्थूल नयन तो सबको हैं परन्तु अपने को नयनहीन क्यों कहते हैं? वह बाप बैठ समझाते हैं कि ज्ञान का तीसरा नेत्र कोई को है नहीं। बाप को नहीं जानना यह हुआ अज्ञान। बाप को बाप द्वारा जानना इसको कहा जाता है ज्ञान। बाप ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं, जिससे तुम सारी रचना के आदि मध्य अन्त को जानते हो। ज्ञान सागर के बच्चे तुम मास्टर ज्ञान सागर बन जाते हो। तीसरा नेत्र माना ही त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ बन जाते हो। भारतवासी यह नहीं जानते कि यह लक्ष्मी-नारायण जो सतयुग के मालिक थे, इनको यह वर्सा कैसे मिला? वह कब आये? फिर कहाँ गये? फिर कैसे राज्य लिया? कुछ भी नही जानते हैं। यह देवतायें पावन हैं ना। पावन तो जरूर बाप ही बनायेंगे।

तुम भारतवासियों को बाप बैठ समझाते हैं। जो देवताओं को, शिव को मानते हैं। शिव का जन्म भी भारत में हुआ है। ऊंच ते ऊंच है भगवान। शिव जयन्ती भी यहाँ मनाते हैं। जगत अम्बा, जगत पिता ब्रह्मा और सरस्वती का भी जन्म यहाँ ही है। लक्ष्मी-नारायण का जन्म भी यहाँ ही होता है, वही राधे-कृष्ण हैं, यह भी भारतवासी नहीं जानते। कहते हैं पतित-पावन आओ तो जरूर सब पतित हैं। साधू सन्त ऋषि मुनि आदि सब पुकारते हैं कि हमको पावन बनाने आओ। दूसरे तरफ कुम्भ के मेले आदि में जाते हैं पाप धोने। समझते हैं गंगा पतित-पावनी है। पुकारते हैं कि पतित-पावन आओ तो मनुष्य किसको कैसे पावन बना सकते? बाप समझाते हैं तुम पहले देवी-देवता धर्म के थे तो सब पावन थे। अभी पतित हैं। कहते हैं कि राह बताओ प्रभू। तो कहाँ की राह? कहते हैं बाबा जीवनमुक्ति की राह बताओ। हमारे में 5 विकार हैं। बाबा हम सब स्वर्ग में थे तो निर्विकारी थे। अभी विकारी पतित बन पड़े हैं, इसका कुछ राज़ तो समझाओ। यह कोई दन्त कथायें नहीं हैं। बाप समझाते हैं – श्रीमत भगवत गीता अथवा परमात्मा की सुनाई हुई गीता है। पतितों को पावन बनाने वाला है निराकार भगवान। मनुष्य को भगवान नहीं कह सकते। बाप कहते – इतने बड़े-बड़े गुरू होते भी भारत इतना पतित कौड़ी जैसा क्यों बना है। कल की बात है कि भारत खण्ड स्वर्ग था। बाबा ने भारतवर्ष को स्वर्ग की सौगात दी थी। भारतवासी पतितों को आकर राजयोग सिखलाए पावन बनाया था। अब फिर बाप बच्चों के पास आया है सेवाधारी बन। बाप है रूहानी सेवाधारी। बाकी तो सब मनुष्यमात्र हैं जिस्मानी सेवाधारी। संन्यासी भी जिस्मानी सेवाधारी हैं। वह पुस्तक आदि बैठ सुनाते हैं। बाप कहते हैं कि मैं निराकार साकार साधारण बूढ़े तन में प्रवेश कर बच्चों को आकर समझाता हूँ। हे भारतवासी बच्चों, देखो रूहानी बाप रूहों को बैठ समझाते हैं। यह ब्रह्मा नहीं सुनाते हैं लेकिन वह निराकार बाप इस तन का आधार लेते हैं। शिव को तो अपना शरीर नहीं है। सालिग्राम आत्माओं को तो अपना-अपना शरीर है। पुनर्जन्म में आते-आते पतित बन जाते हैं। अब तो सारी दुनिया पतित है। पावन एक भी नहीं। तुम सतोप्रधान थे फिर खाद पड़ने से सतो से रजो तमो में आये हो। तुम भारतवासियों के पास शिवबाबा आकर शरीर धारण करते हैं जिसको भागीरथ भी कहते हैं। मन्दिरों में शंकर का चित्र दिखाते हैं क्योंकि वह शिव शंकर इकट्ठा समझ लेते हैं। यह समझते नहीं कि शिव तो निराकार है, शंकर तो आकारी है। शिव शंकर इकट्ठा कैसे कहते हैं। अच्छा फिर बैल पर सवारी कौन करते हैं। शिव वा शंकर? सूक्ष्मवतन में बैल कहाँ से आया? शिव रहता है मूलवतन में, शंकर सूक्ष्मवतन में। मूलवतन में सब आत्मायें हैं। सूक्ष्मवतन में सिर्फ ब्रह्मा विष्णु शंकर हैं, वहाँ जानवर होते नहीं। बाप कहते हैं मैं साधारण बूढ़े तन में प्रवेश कर तुमको समझाता हूँ। तुम बच्चे अपने जन्मों को नहीं जानते हो। सतयुग से लेकर तुमने कितने जन्म लिए हैं? 84 जन्म लिए। अभी यह है पिछाड़ी का जन्म। भारत जो अमरलोक पावन था, वह अब मृत्युलोक पतित है। सर्व का सद्गतिदाता तो एक है ना। रूद्र माला है ही परमपिता परमात्मा निराकार शिव की। श्री श्री 108 रूद्र माला कही जाती है। सब शिव के गले का हार हैं। बाप तो है पतित-पावन सर्व का सद्गति दाता, सर्व को वर्सा देने वाला। लौकिक बाप से हद का वर्सा मिलता है जिसको संन्यासी काग विष्टा समान सुख समझते हैं। बाप कहते हैं कि बरोबर यह तुम्हारा सुख काग विष्टा समान है। बाप ही आकर पतितों को पावन अथवा कांटों को फूल बनाते हैं नॉलेज से। यह गीता की नॉलेज है। यह ज्ञान कोई मनुष्य नहीं समझा सकते हैं। ज्ञान का सागर पतित-पावन बाप ही समझा सकते हैं। बाप से ही वर्सा मिलता है जो तुम ले रहे हो। तुम ही सिर्फ सद्गति तरफ जा रहे हो। अभी तो संगम पर हो, वह तो कलियुग में हैं। अभी है कलियुग का अन्त। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। 5 हजार वर्ष पहले भी जब तुम राजयोग सीखते थे तो भंभोर को आग लगी थी। अभी तुम राजयोग सीख रहे हो, यह लक्ष्मी-नारायण बनने के लिए। बाकी तो है भक्ति मार्ग। बाप जब आते हैं तो आकर स्वर्ग के द्वार खोलते हैं। बाप कहते हैं कि यह शिव शक्ति भारत मातायें तो भारत को स्वर्ग बनाती हैं श्रीमत पर। तुम हो शिव शक्ति भारत मातायें, जो पूरे विश्व को स्वर्ग बना रही हो। तुम हो ही शिव की औलाद, उसको ही याद करते हो। शिव से शक्ति लेकर 5 विकारों रूपी शत्रुओं पर जीत पाते हो। तुम बच्चों ने 5 हजार वर्ष पहले भी भारत की रूहानी सेवा की थी। वो सोशल वर्कर्स करते हैं जिस्मानी सेवा। यह है रूहानी सेवा। सुप्रीम रूह आकर आत्मा को इन्जेक्शन लगाते हैं, पढ़ाते हैं। आत्मा ही सुनती है। तुम आत्मायें हो। तुम ही 84 जन्म लेते हो। एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हो। 84 जन्म ले 84 माँ बाप बनाये हैं। सतयुग त्रेता में तुमने स्वर्ग के सुख पाये, अब फिर बेहद के बाप द्वारा सुख का वर्सा ले रहे हो। बरोबर भारत खण्ड में यह लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वहाँ दैत्य आदि कोई नहीं थे। तुम जानते हो अभी इस पुरानी दुनिया को आग लगनी है। मैं आकर ज्ञान यज्ञ रचता हूँ। तुम सब पवित्र देवता बनते हो। हजारों हैं जो देवता बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। बाप आया है बच्चों की सद्गति करने। तुम बच्चों को कांटों से फूल बना रहे हैं। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र दे रहे हैं जिससे तुम सारे ड्रामा को, शिवबाबा का क्या पार्ट बजता है, सब जानते हो। ब्रह्मा और विष्णु का कनेक्शन क्या है, वह भी जानते हो। वे दिखाते हैं कि विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। ब्रह्मा ही जाकर विष्णु बनते हैं। ब्राह्मण सो फिर देवता। विष्णु से ब्रह्मा बनने में 5 हजार वर्ष लगा। यह तुमको ज्ञान है। तुम ब्राह्मणों के नाभी कमल से विष्णुपुरी प्रगट हो रही है। उन्होंने तो चित्र बनाया है कि विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। फिर सभी वेदों शास्त्रों का सार सुनाया। अब तुम ब्रह्मा द्वारा सारा सार समझते हो। बाप कहते हैं मुख्य धर्म-शास्त्र हैं 4, पहले दैवी धर्म का शास्त्र है गीता। गीता किसने गाई? शिवबाबा ने। ज्ञान सागर पतित-पावन, सुख का सागर शिवबाबा है। उसने बैठ भारतखण्ड को स्वर्ग बनाया, न कि श्रीकृष्ण ने। श्रीकृष्ण तो मेरे द्वारा ज्ञान सुनकर फिर श्रीकृष्ण बना। तो यह गुप्त बात हुई ना। नये-नये बच्चे इन बातों को समझ न सकें।

शिवबाबा ने स्वर्ग की स्थापना की, उसमें यह लक्ष्मी-नारायण राज्य करते थे। अब तुम मनुष्य से देवता बन रहे हो। बाप कहते हैं इस मृत्युलोक, दु:खधाम में तुम्हारा अन्तिम जन्म है। भारत अमरलोक था। वहाँ दु:ख का नाम नहीं था। भारत परिस्तान था, अब कब्रिस्तान बना है, फिर परिस्तान होगा। यह सब समझने की बातें हैं। यह है मनुष्य से देवता बनने की पाठशाला। यह कोई संन्यासियों का सतसंग नहीं है, जहाँ शास्त्र बैठ सुनाते हैं। इन बातों को नया कोई समझ न सके जब तक 7 दिन का कोर्स नहीं किया है। इस समय भक्त तो सब मनुष्यमात्र हैं, उन्हों की आत्मा भी याद करती है। परमात्मा एक माशूक के सब आशिक हैं।

बाप आकर सचखण्ड बनाते हैं। आधाकल्प के बाद फिर रावण आकर झूठ खण्ड बनाते हैं। अभी है संगम। यह सब समझने की बातें हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप की श्रीमत पर चलकर सच्ची-सच्ची रूहानी सेवा करनी है। सर्वशक्तिमान बाप से शक्ति ले 5 विकारों रूपी शत्रुओं पर विजय पानी है।

2) मनुष्य से देवता बनने के लिए पवित्र जरूर बनना है। नॉलेज को धारण कर कांटे से फूल बनना और बनाना है।

वरदान:- विनाश के समय पेपर में पास होने वाले आकारी लाइट रूपधारी भव
विनाश के समय पेपर में पास होने वा सर्व परिस्थितियों का सामना करने के लिए आकारी लाइट रूपधारी बनो। जब चलते फिरते लाइट हाउस हो जायेंगे तो आपका यह रूप (शरीर) दिखाई नहीं देगा। जैसे पार्ट बजाने समय चोला धारण करते हो, कार्य समाप्त हुआ चोला उतारा। एक सेकण्ड में धारण करो और एक सेकण्ड में न्यारे हो जाओ – जब यह अभ्यास होगा तो देखने वाले अनुभव करेंगे कि यह लाइट के वस्त्रधारी हैं, लाइट ही इन्हों का श्रंगार है।
स्लोगन:- उमंग-उत्साह के पंख सदा साथ हों तो हर कार्य में सफलता सहज मिलती है।

 

ये अव्यक्त इशारे – “निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो”

बाप सर्वशक्तिवान है तो उसका हाथ पकड़ने वाले पहुँचे कि पहुँचे – यह फेथ रखो। चाहे खुद भले कमजोर भी हो लेकिन साथी तो मजबूत है ना! इसलिए पार हो ही जायेंगे। सदा ऐसे निश्चयबुद्धि विजयी रत्न हैं, इसी स्मृति में रहो। बीती सो बीती, बिन्दी लगाकर आगे बढ़ो।

विशेष नोट:- आज प्यारे बापदादा की अति लाडली, देश विदेश के सर्व ब्राहमण परिवार की जान, हम सबके दिलों पर राज्य करने वाली मीठी दादी जानकी जी का पुण्य स्मृति दिवस है। दादी जी ने 104 वर्ष की आयु तक विदेही व जीवनमुक्त स्थिति में रह, ज्ञान दान के साथ-साथ गुणों का दान करते पूरे परिवार की अलौकिक पालना की है। उनकी सार गर्भित अनेक ज्ञान के गुह्य रहस्यों से भरपूर क्लासेज़ सभी का मार्गदर्शन करती रही हैं। आज भी उनकी छत्रछाया और उनके द्वारा मिली हुई अनमोल शिक्षायें अनेक ब्रह्मा वत्सों के कानों में गूंजती रहती हैं। दादी जी सच्चाई, सफाई और सादगी की प्रतिमूर्ति थी। दादी जी द्वारा मिली हुई अनेक अनमोल शिक्षाओं में से कुछ शिक्षायें लिख रहे हैं, सभी इन्हें आत्मसात करना ही।

1) अपने सूक्ष्म अभिमान को परखकर उसे जल्दी से खत्म करना ही अपने ऊपर आशीर्वाद करना है।

2) अधिक सोचने, बोलने और चिंता करने से शक्ति खर्च होती है, साइलेन्स में रहो तो शक्ति जमा हो।

3) किसी की गलती चित्त पर न हो, चित्त साफ रखो तो चैन से रह सकेंगे।

4) समझ से व्यर्थ व निगेटिव को खत्म कर दो तो शान्ति प्रिय बन जायेंगे।

5) बाबा से प्राइज़ लेनी है तो नियमों पर चलो, थोड़ा भी कहाँ लगाव झुकाव न हो।

6) कर्म और संबंध का पता गुणों से चलता है इसलिए कर्म में रूहानियत और संबंध में सच्चाई हो।

7) नम्रता और सत्यता को अपना साथी बना लो तो हर बात एक्यूरेट होगी।

8) प्यार मांगने के बजाए स्वमान में रहो और सबको मान दो तो प्यार के पात्र बन जायेंगे।

9) जो सच्चे, स्वच्छ और सर्विसएबुल हैं, वही परमात्म प्यार के पात्र हैं।

10) सेवा करते डबल लाइट रहना, यही सबसे बड़ी सेवा है।

11) बड़ी बात को छोटा कर दो तो सूली भी कांटा हो जायेगी।

12) चिंतन साधना में इन्टरफियर करता है और सिमरण साधना द्वारा सिद्धि दिलाता है।

13) खुशी का खजाना सदा कायम रखना है तो पॉजिटिव सोचने का तरीका सीख लो।

14) अब की स्थिति ही अन्त में काम आयेगी इसलिए अपनी स्थिति बनाने पर ध्यान दो।

15) मनोबल ऐसा बढ़ा लो जो कांटों के जंगल में खुद भी सेफ रहो और दूसरों को भी सहयोग दे सको।

16) अपवित्रता से मुक्त होना है तो आन्तरिक वैराग्य वृत्ति धारण करो।

प्रश्न 1:

विश्व की रूहानी सेवा तुम बच्चों के सिवाए कोई नहीं कर सकता है – क्यों?

उत्तर:

क्योंकि तुम्हें ही सुप्रीम रूह शिवबाबा की सीधी शक्ति मिलती है।
पहले तुम आत्माएँ स्वयं ज्ञान का “इन्जेक्शन” लेकर 5 विकारों पर विजय प्राप्त करती हो, फिर दूसरों को भी यह शक्ति देकर उन्हें बदलती हो।
 यह दिव्य सेवा केवल तुम ही करते हो, कल्प-कल्प।


प्रश्न 2:

ज्ञान का तीसरा नेत्र क्या है?

उत्तर:

ज्ञान का तीसरा नेत्र वह दिव्य दृष्टि है जिससे:

  • आत्मा, परमात्मा और सृष्टि के आदि-मध्य-अंत का ज्ञान होता है
  • अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है

 यही तीसरा नेत्र हमें त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बनाता है।


 प्रश्न 3:

मनुष्य अपने आप को ‘नयनहीन’ क्यों कहते हैं जबकि उनके पास आँखें हैं?

उत्तर:

क्योंकि उनके पास स्थूल आँखें तो हैं, लेकिन ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं है।
 परमात्मा को न जानना ही असली अंधापन है।


 प्रश्न 4:

परमात्मा को सही रूप में कौन जान सकता है?

उत्तर:

केवल वही आत्माएँ जो परमात्मा से ज्ञान प्राप्त करती हैं — अर्थात ब्रह्माकुमारीज़।
 क्योंकि परमात्मा स्वयं आकर अपना परिचय देते हैं।


 प्रश्न 5:

शिवबाबा को “ज्ञान सागर” क्यों कहा जाता है?

उत्तर:

क्योंकि:

  • वे सम्पूर्ण ज्ञान के सागर हैं
  • वही आत्माओं को सृष्टि का सच्चा ज्ञान देते हैं
  • वही पतितों को पावन बनाते हैं

 प्रश्न 6:

हम “मास्टर ज्ञान सागर” कैसे बनते हैं?

उत्तर:

जब हम शिवबाबा से ज्ञान लेकर:

  • उसे धारण करते हैं
  • जीवन में लागू करते हैं
  • और दूसरों को भी सिखाते हैं

 तब हम “मास्टर ज्ञान सागर” बन जाते हैं।


 प्रश्न 7:

त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने का अर्थ क्या है?

उत्तर:

  • त्रिनेत्री → ज्ञान का तीसरा नेत्र प्राप्त करना
  • त्रिकालदर्शी → भूत, वर्तमान, भविष्य को जानना
  • त्रिलोकीनाथ → तीनों लोक (मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूल दुनिया) का ज्ञान होना

 प्रश्न 8:

दुनिया शिवबाबा को क्यों नहीं जानती जबकि शिवरात्रि मनाती है?

उत्तर:

क्योंकि:

  • उनके पास ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं है
  • वे केवल भक्ति करते हैं, ज्ञान नहीं

 इसलिए जन्मदिन मनाते हैं, लेकिन पहचान नहीं पाते।


 प्रश्न 9:

रूहानी सेवा और जिस्मानी सेवा में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • रूहानी सेवा: आत्मा को शुद्ध और शक्तिशाली बनाना
  • जिस्मानी सेवा: शरीर की सहायता करना

 रूहानी सेवा स्थायी है, जो आत्मा को बदल देती है।


 प्रश्न 10:

आत्मा पतित कैसे बनती है?

उत्तर:

84 जन्मों के चक्र में:

  • आत्मा सतोप्रधान से रजो और फिर तमो में आती है
  • 5 विकारों के कारण पतित बन जाती है

 प्रश्न 11:

शिवबाबा आत्माओं को पावन कैसे बनाते हैं?

उत्तर:

  • ज्ञान देकर
  • योग सिखाकर
  • आत्मा को उसकी असली पहचान दिलाकर

 इस प्रक्रिया से आत्मा कांटे से फूल बन जाती है।


 प्रश्न 12:

संगमयुग का विशेष महत्व क्या है?

उत्तर:

  • यह पुरानी दुनिया के अंत और नई दुनिया की शुरुआत का समय है
  • इसी समय शिवबाबा आकर आत्माओं को बदलते हैं

 यही समय है “मनुष्य से देवता बनने का”


 प्रश्न 13:

हमारी मुख्य धारणा क्या होनी चाहिए?

उत्तर:

  1. श्रीमत पर चलकर रूहानी सेवा करना
  2. पवित्र बनकर दूसरों को भी पवित्र बनाना

 प्रश्न 14:

“आकारी लाइट रूपधारी” बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर:

  • देह से न्यारे होकर स्वयं को प्रकाश स्वरूप अनुभव करना
  • एक सेकंड में शरीर से अलग होने का अभ्यास

 यह स्थिति विनाश के समय काम आती है।


 प्रश्न 15:

जीवन में सफलता का मुख्य सूत्र क्या है?

उत्तर:

“उमंग-उत्साह के पंख सदा साथ हों तो हर कार्य में सफलता सहज मिलती है।”


 समापन संदेश

 आप साधारण आत्मा नहीं हैं
 आप हैं मास्टर ज्ञान सागर

 अब समय है:

  • तीसरा नेत्र खोलने का
  • स्वयं को बदलने का
  • और विश्व को प्रकाश देने का
  • Disclaimer (डिस्क्लेमर) यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक मुरली ज्ञान पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागरूकता, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक उन्नति को बढ़ावा देना है। यह किसी भी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं है। दर्शक इसे अपने विवेक और समझ के अनुसार ग्रहण करें।
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