The real meaning of the Bhil woman’s plums | Is Ram or Shiva Baba the Garib Niwaj? | God looks at the feelings, not the food.

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भीलनी के बेर

का असली अर्थ

राम या शिव बाबा
गरीब निवाज

परमात्मा का रहस्य

आपकी सोच बदल देगा।
यह सत्य।

ढीलनी और राम की कथा का असली आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

डिस्क्लेमर: यह वीडियो ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय ज्ञान और मुरली में वर्णित आध्यात्मिक दृष्टिकोण के आधार पर बनाया गया है। इसका उद्देश्य किसी भी धार्मिक कथा, परंपरा, देवी-देवता या किसी व्यक्ति की भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। भक्ति मार्ग में कथाओं का अपना श्रद्धापूर्ण महत्व है और ज्ञान मार्ग में उनके आध्यात्मिक रहस्यों की व्याख्या की जाती है। सभी दर्शक इसे आत्मचिंतन और आध्यात्मिक अध्ययन के रूप में ग्रहण करें।

आज हम एक ऐसी प्रसिद्ध कथा का आध्यात्मिक रहस्य समझेंगे जिसे बचपन से लाखों लोग सुनते आए हैं।

कथा है—राम ने भीलनी के बेर खाए।

राम ने भीलनी के बेर खाए।

जानते हैं, इसको सुनाने की मैं समझता हूँ कि जरूरत नहीं है।

और झूठे बेर चख-चख करके खिलाए।

तो विचार उठता है कि भगवान किस प्रकार से गरीब निवाज बनते हैं।

लेकिन इसका गहरा अर्थ क्या है? क्या परमात्मा को सचमुच भोजन की आवश्यकता होती है?

क्या कहेंगे?

भगवान को क्या भोजन की जरूरत होती है?

नहीं होती भाई जी।

नहीं होती। क्योंकि वह अभोक्ता है, अजन्मा है, अयोनि है, अशरीरी है। शरीर ही नहीं तो भोजन कौन खाएगा?

आत्मा तो कभी भोजन नहीं खाती।

परमात्मा भोजन नहीं खाते।

इसके पीछे आत्मा और परमात्मा के संबंध का कोई गहरा संदेश छिपा हुआ है।

मुरली में बाबा समझाते हैं कि परमात्मा अभोक्ता है।

वह संसार की किसी भी वस्तु को भोग नहीं सकता।

संसार की किसी भी वस्तु को भोगने के लिए शरीर चाहिए।

और उसके पास शरीर ही नहीं है।

अर्थात परमात्मा जन्म-मरण के चक्कर में आने वाले मनुष्य की तरह भोजन का अनुभव नहीं करते।

परमात्मा कहते हैं—मैं तो अभोक्ता हूँ।

मैं तो अभोक्ता हूँ।

तो फिर भीलनी के बेर खाने की यादगार क्यों बनी?

इसका आध्यात्मिक भाव यह है कि परमात्मा किसी आत्मा को ऊँच-नीच, अमीर-गरीब या बाहरी स्थिति से नहीं देखते।

परमात्मा आत्मा की भावना, प्रेम और परिवर्तन को देखते हैं।

दुनिया में कई बार गरीब, साधारण और पीछे रह गई आत्माओं को कम महत्व दिया जाता है।

लेकिन मुरली कहती है—गरीब निवाज बाबा, गरीब निवाज है।

अर्थात परमात्मा उन आत्माओं को भी ऊपर उठाते हैं जिन्हें दुनिया ने कमजोर समझा।

जैसे एक पिता अपने सभी बच्चों को समान दृष्टि से देखता है, वैसे ही परमात्मा सभी आत्माओं के कल्याणकारी हैं।

मुरली में कहा गया—पहले गरीबों की बारी है।

पहले किसकी बारी है? गरीबों की। क्यों?

क्योंकि कई बार जिसके पास बाहरी साधन कम होते हैं, उसका हृदय सरल और स्वीकार करने वाला होता है।

जिसके पास साधन ज्यादा होते हैं, वह अहंकार में आ जाता है।

और जिसके पास साधन कम होते हैं, वह सहजता से, सरलता से स्वीकार कर लेता है।

परमात्मा को धन, पद, प्रसिद्धि या बाहरी दिखावा नहीं चाहिए।

उन्हें चाहिए सच्चाई और याद।

बाबा कहते हैं—सिर्फ मुझे याद करो तो तुम्हारा बेड़ा पार हो जाएगा।

यही है सेकंड में जीवनमुक्ति का रहस्य।

क्या है जीवनमुक्ति का रहस्य?

सिर्फ मुझको याद करो।

अर्थात मेरी श्रीमत पर चलो।

याद करने का मतलब नाम रटना नहीं।

कभी बच्चा अपने बाप का नाम नहीं रटता।

परमात्मा हम आत्माओं का पिता है।

परमात्मा का नाम रटने से हमारा चरित्र श्रेष्ठ नहीं होगा।

चरित्र श्रेष्ठ होगा परमात्मा की डायरेक्शन पर सोचना, बोलना और करना।

यही है सेकंड में जीवनमुक्ति का रहस्य।

यही है सेकंड में जीवनमुक्ति का रहस्य।

जैसे बच्चा जन्म लेते ही पिता को बाबा कहता है और वर्से का अधिकारी बन जाता है, वैसे ही आत्मा परमात्मा को पहचानकर ईश्वरीय वर्से की अधिकारी बन जाती है।

भीलनी की कहानी हमें यही संदेश देती है—

परमात्मा के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं।

एक साधारण आत्मा भी परमात्मा की याद और ज्ञान से श्रेष्ठ बन सकती है।

परमात्मा भोजन के भूखे नहीं।

परमात्मा भाव, परिवर्तन और आत्मिक प्रेम को महत्व देते हैं।

यदि भीलनी के बेर की यादगार का गहरा आध्यात्मिक रहस्य समझ लिया जाए, तो यही भीलनी के बेर की कहानी का वास्तविक आध्यात्मिक रहस्य है।

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