विश्व नाटक :-(24)क्या पूरा संसार गॉड का बनाया हुआ है?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
विश्व नाटक
आज हम इसका 24वा पाठ करेंगे।
क्या पूरा संसार गॉड का बनाया हुआ है?
बनाया है। भाई, हम अक्सर सुनते हैं— ईश्वर जगत का निर्माता है। भक्ति मार्ग में यह कहा जाता है कि ईश्वर जगत का निर्माता है। बहुत सारे भाई बहन आपको मिलेंगे। भगवान ने बनाया संसार तो किससे पूछेंगे? कब बनाया? कैसे बनाया? यहां वो चुप हो जाते।
लेकिन क्या वास्तव में पूरा जगत यूनिवर्स एक प्रोडक्ट है? कोई चीज तैयार की गई है जिसे किसी एक ईश्वर ने बनाया हो। इतना बड़ा संसार यह कोई प्रोडक्ट है जिसे किसी एक ईश्वर ने बनाया है या ये कई उत्पादों का संग्रह है?
कई चीजें बनाई गई हैं— कुर्सी है, ये इन सब का संग्रह है या एक ने ये सारा कुछ बनाया है? ये क्वेश्चन है कि एक ने ही सारा संसार बनाया है या किसी ने कुर्सी बनाई है, किसी ने टेबल बनाई है, किसी ने लैपटॉप बनाया है, किसी ने वो बनाया है, किसी ने वो बनाया।
ये उन सब का कलेक्शन है। कोई चीज कहीं से बना के ला के रख दी, जो अनेक प्राकृतिक शक्तियों, जीवों और प्रक्रियाओं द्वारा बने। मतलब हर एक अलग-अलग तरीके से अपने-अप जगह बन के आए।
आज हम इसे उदाहरणों, वैज्ञानिक तर्क, और मुरली प्रमाण के साथ स्पष्ट करेंगे। जगत एक उत्पाद नहीं, उत्पादों का संग्रह है। यह एक उत्पाद नहीं, अनेक उत्पादों का संग्रह है। आप एक फुटबॉल मैदान की कल्पना करें।
फुटबॉल मैदान का उदाहरण लें। फुटबॉल का निर्माता अलग है। जूते का निर्माता अलग है। गोल पोस्ट का निर्माता अलग है। जाल का निर्माता अलग है। लेकिन क्या पूरा मैदान हवा, मिट्टी, तापमान, वातावरण किसी एक बुद्धिमान निर्माता द्वारा बनाया गया है?
नहीं, यह प्राकृतिक शक्तियों का संयोजन है। उनको सबको इकट्ठा किया गया है। ठीक इसी प्रकार विश्व यूनिवर्स अनेक वस्तुओं, जीवों, जीवों में सब—जीव, जंतु, पशु, पक्षी, मनुष्य सब आ जाएंगे—प्रक्रियाओं और प्राकृतिक शक्तियों का समग्र रूप है। यह किसी एक कुमार की बनाई हुई मिट्टी की हांडी जैसा उत्पाद नहीं है। जैसे कुमार एक मिट्टी की हांडी बना देता है। इस प्रकार यह एक व्यक्ति के द्वारा बनाया गया सारा संसार नहीं है।
नंबर दो:
प्रकृति स्वयं निर्माता है। प्रकृति स्वयं निर्माता है। निर्माता की तरह कार्य करती है। उदाहरण: प्रकृति की शक्तियां—हवा, वर्षा, बर्फ, बादल, ऋतुएं, ज्वालामुखी, बाढ़—और ये जितने भी हमारे चट्टाने हैं, प्लेट्स हैं, इन्हें टेक्टोनिक प्लेट्स कहते हैं। जिनसे यह धरती के ऊपर भूकंप आता है।
तो प्लेटें हिलती हैं तो भूकंप आता है। यह सारी, जो प्रकृति है, इनसे ही सारा संसार बना है। प्रकृति की शक्तियां, ये सभी प्राकृतिक प्रक्रियाएं लगातार आकार बनाती, बिगाड़ती और पुनः बनाती रहती हैं। अपने आप ही करती रहती हैं। उदाहरण: हिमालय किसी कारीगर ने नहीं बनाया। वह अपने आप ही परिवर्तन होता रहता है। यह पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट के टक्कर से बना है। हिमालय पर जो प्लेटें हैं, उनसे बना है।
इंद्रधनुष प्रकाश विचलन (लाइट रिफ्रेक्शन) से बनता है। ये प्रकाश आता है, वो पानी की बूंदों से क्रॉस करता है और बन जाता है। पेड़ पौधे बीज, सूर्य, मिट्टी, पानी से पैदा होते हैं। बीज चाहिए, सूरज चाहिए, मिट्टी चाहिए, पानी चाहिए। बस ये तैयार हो जाएगा। यह बीज मिट्टी में डालेंगे, पानी देंगे, मिट्टी और सूरज की रोशनी मिलेगी और ये पेड़ पौधे बन जाते हैं। किसी ईश्वर ने हाथ से नहीं बनाए।
यह सब प्राकृतिक नियमों के अनुसार होता है। बीज जैसा बोया जाएगा, पानी, मिट्टी, सूरज की रोशनी मिलेगी, वैसा पेड़ तैयार हो जाएगा।
नंबर तीन:
जीव जगत किसी ईश्वर की सीधी रचना नहीं। जीव और जगत—मतलब यह संसार के जितने भी पशु, पक्षी, प्राणी, मनुष्य हैं—अब ये सीधा ईश्वर की रचना नहीं हैं। पक्षी अपना घोंसला स्वयं बनाते हैं। उन्हें कोई बनाने वाला नहीं होता। स्वयं बनाते हैं, हर एक अपने लिए। जीव अपने माता-पिता से जन्म लेते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी सब अपने माता-पिता से जन्म लेते हैं। पौधे बीजों से उत्पन्न होते हैं।
अनुवांशिकी (जेनेटिक्स) तय करती है कि कौन सा जीव कैसा होगा। जो उनका बीज है, बीज के अंदर जो गुण हैं, उनके आधार से तय हो जाता है कि क्या बनेगा, कैसा बीज बनेगा, कैसा पौधा बनेगा। म्यूटेशन से नई जातियां बनती हैं। म्यूटेशन मतलब जो है, आपस में मिलाने से नई जाति बन जाती है। गुण मिला दिए जाते हैं, इधर से उधर। इनमें कहीं कोई ईश्वर द्वारा हाथ से बनाना नहीं दिखता।
कहीं भगवान ने किसी मनुष्य को बनाया हो, पशु को बनाया हो, पक्षी को बनाया हो, पेड़ पौधों को बनाया हो—दिखता ही नहीं है। नेचुरल लॉज कार्य करते हैं।
बहुत सारे लोग कहते हैं, सब कुछ अपने आप हो रहा है। भगवान का क्या रोल है? मुझे बताओ ना। वो पूछते हैं, क्यों भगवान के पीछे पड़े हुए हो? भगवान तो कोई है ही नहीं। भगवान की जरूरत क्या है? अब स्त्री-पुरुष मिलेंगे, बच्चा पैदा होगा, पशु पैदा होगा। खत्म, बात इसी प्रकार से बनी चली। जितने समय तक चलना था, उसके बाद खत्म हो गया। इसमें आत्मा का क्या रोल है?
आत्मा को ही नहीं मानते, परमात्मा को ही मानते हैं। क्या ईश्वर जीवों का सीधा रचयिता है? क्वेश्चन: क्या ईश्वर जीवों का सीधा रचयिता है? विज्ञान स्पष्ट कहता है—जीवन (लाइफ) जैव रसायन (बायोकेमिस्ट्री) के नियमों से चलता है। नई प्रजातियां अनुवांशिकता (जेनेटिक्स) से विकसित होती हैं।
जैसे मौसम है, भूकंप है, बिजली है, वर्षा है—भूविज्ञान और भौतिकी से समझे जाते हैं। उनको कोई भगवान नहीं चलाता।
इसलिए यह कहना कि ईश्वर सब प्राणियों का निर्माता है, वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं।
ईश्वर जगत का ओनर है, मालिक है। कारपेंटर नहीं।
कारपेंटर को देखो—लकड़ी काटेगा, लकड़ी लाएगा, रास्ता बताएगा। वैसे परमात्मा नहीं करता। मालिक जरूर है, पर तैयार करने का काम नहीं करता।
बी.के. ज्ञान कहता है जगत अनादि है। संसार अनादि है, हमेशा था, है और रहेगा। इसका सृजन नहीं हुआ। यह हमेशा था, है और रहेगा। किसी ने इसे नहीं बनाया।
परमात्मा इसका संचालक है। कंट्रोलर है, निर्माता नहीं। मुरली 18 मई 2024 के अनुसार, बाप कहते हैं—मैं प्रकृति का निर्माता नहीं हूं। पांचों तत्वों का बनाने वाला मैं नहीं। प्रकृति अनादि है। आत्मा अनादि है। मैंने आत्माओं को भी नहीं बनाया। मैं केवल ज्ञान देता हूं, जिससे सृष्टि का नवीनीकरण होता है।
मुरली 6 फरवरी 1985 के अनुसार, शिव बाबा कोई मिट्टी का कार्य नहीं करते। प्रकृति अपना कार्य स्वयं करती है। बाप केवल डायरेक्शन देते हैं।
मुरली 30 सितंबर 2023 के अनुसार, बाप जगत का कारीगर नहीं, मालिक है। ड्रामा अनादि चलता है।
जगत बराबर प्रकृति, प्राकृतिक शक्तियों, जीवों और पदार्थों के इंटरेक्शन से बना है। प्राकृतिक शक्तियां, जीव और पदार्थ—इनके जुड़ने से यह जगत बना है। हवा, वर्षा, पहाड़, नदी, मौसम, जीव, पेड़-बीज—हर वस्तु का अपना निर्माता है।
यूनिवर्स एक अंतिम उत्पाद नहीं है। इसका लगातार लिविंग इंटरेक्शन का कलेक्शन है। यह जीवित परिवर्तन लगातार चलते रहते हैं।
पहले अंडा या मुर्गी? यह प्रश्न क्रिएटर को गलत साबित करता है। अंडा भी कारण है, मुर्गी भी कारण है। दोनों एक दूसरे के बिना नहीं हो सकते। सृष्टि का कोई आदि नहीं।
परमात्मा कारपेंटर, इंजीनियर या डिजाइनर की तरह रचना नहीं करते। प्रकृति अपना कार्य अपने नियमों से करती है। मनुष्य अपने उत्पाद स्वयं बनाता है। जानवर अपने घर, घोंसले स्वयं बनाते हैं। पौधे प्रकृति से जन्म लेते हैं।
जगत किसी एक कारीगर का उत्पाद नहीं, बल्कि अनादि, विशाल, परिवर्तनशील प्रणाली है।
मुरली के अनुसार, ईश्वर नाटक का मालिक है, निर्देशक है, पर बिल्डर नहीं। जगत अनेक उत्पादों, प्राकृतिक शक्तियों, जीवों और नियमों का समग्र रूप है। परमात्मा जगत का मेकर नहीं है। मास्टर, डायरेक्टर और प्यूरिफायर है। ज्ञान देकर जगत का पुनरुद्धार करता है। निर्माण नहीं।

