(40)13-10-1969/“BapDada’s expectations – Become and make others become people of quality rather than quantity.”

AW.(40)13-10-1969/“बापदादा की उम्मीदें – क्वान्टिटी के बजाए क्वालिटी वाले बनो और बनाओ”

“बापदादा की उम्मीदें – क्वान्टिटी के बजाए क्वालिटी वाले बनो और बनाओ”

अशरीरी होकर फिर शरीर में आने का अभ्यास पक्का होता जाता है। जैसे बापदादा अशरीरी से शरीर में आते हैं वैसे ही तुम सभी बच्चों को भी अशरीरी होकर के शरीर में आना है। अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर फिर व्यक्त में आना है। ऐसा अभ्यास दिन-प्रतिदिन बढ़ाते चलते हो? बापदादा जब आते हैं तो किससे मिलने आते हैं? (आत्माओं से) आत्माएं कौन सी? जो सारे विश्व में श्रेष्ठ आत्माएं हैं। उन श्रेष्ठ आत्माओं से बापदादा का मिलन होता है। इतना नशा रहता है – हम ही सारे विश्व में श्रेष्ठ आत्मायें हैं? श्रेष्ठ आत्माओं को ही सर्वशक्तिमान के मिलन का सौभाग्य प्राप्त होता है। तो बापदादा भृकुटी के बीच में चमकते हुए सितारे को ही देखते हैं। तुम सितारों को किस-किस नाम से बुलाया जाता है? एक तो लक्की सितारे भी हो और नयनों के सितारे भी, और कौनसे सितारे हो? जो कार्य अब बच्चों का रहा हुआ है उस नाम के सितारे को भूल गये हो। जो मेहनत का कार्य है वह भूल गये हो। याद करो अपने कर्तव्य को। बापदादा के उम्मीदें के सितारे। बापदादा के जो गाये हुए हैं वही कार्य अब रहा हुआ है। बापदादा जो उम्मीदें बच्चों से रखते हैं वह कार्य पूरा किया हुआ है? बापदादा एक-एक सितारे में यही उम्मीद रखते हैं कि एक-एक अनेकों को परिचय देकर लायक बनायें। एक से ही अनेक बनने हैं। यह चेक करो कि हम ऐसे बने हैं। अनेकों को बनाया है? उसमें भी क्वान्टिटी तो बन रहे हैं, क्वालिटी बनाना है। क्वान्टिटी बनाना सहज है लेकिन क्वालिटी वाले बनाना – यह उम्मींद बापदादा सितारों में रखते हैं। अभी यह कार्य रहा हुआ है। क्वालिटी बनाना – यह तो चल रहा है। लेकिन अभी ऐसी क्वालिटी वाली आत्मायें बनाने की सर्विस रही हुई है। क्वालिटी वाली एक आत्मा क्वान्टिटी को आपेही लायेगी। एक क्वालिटी वाला अनेकों को ला सकते हैं। क्वालिटी, क्वान्टिटी को ला सकती हैं। अभी यही कार्य जो रहा हुआ है उसको पूरा करना है। अपनी सर्विस की क्वालिटी से आप खुद सन्तुष्ट रहते हो? क्वान्टिटी को देख खुश तो होते हो लेकिन क्वालिटी को देख सर्विस से सन्तुष्ट होना है। क्वालिटी कैसे लायेंगे? जितनी-जितनी जिसमें डिवाइन क्वालिटी होगी, उतना ही क्वालिटी वालों को लायेंगे। कई बच्चों को सभी प्रकार की मेहनत बहुत करनी पड़ती है – अपने पुरुषार्थ में भी तो सर्विस में भी। कोई को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है कोई को कम। इसका कारण क्या है? कभी उसी को ही मेहनत लगती है कभी फिर उसी को ही सहज लगता है। यह क्यों? धारणा की कमी के कारण मेहनत लगती है? कई कर्तव्यों में तो लोग कह देते हैं कि इनके भाग्य में ही नहीं है। यहाँ तो ऐसे नहीं कहेंगे। किस विशेष कमी के कारण मेहनत लगती है? श्रीमत पर चलना है। फिर भी क्यों नहीं चल पाते? कोई भी कार्य में – चाहे पुरुषार्थ, चाहे सर्विस में मेहनत लगने का कारण यह है कि बातें तो सभी बुद्धि में हैं लेकिन इन बातों की महीनता में नहीं जाते। महीन बुद्धि को कभी मेहनत नहीं लगती। मोटी बुद्धि कारण बहुत मेहनत लगती है। श्रीमत पर चलने के लिए भी महीन बुद्धि चाहिए। महीनता में जाने का अभ्यास करना है। दूसरे शब्दों में यह कहेंगे कि जो सुना है वह करना है अर्थात् उसकी महीनता में जाना है। जैसे दही को बिलोकर महीन करते हैं तब उसमें मक्खन निकलता है। तो यह भी महीनता में जाने की बात है। महीनता की कमी के कारण मेहनत होती है। महीनता में जाने की बजाए उस बात को मोटे रूप में देखते हैं। सर्विस के समय भी महीन बुद्धि हो, ज्ञान की महीनता में जाकर उनको सुनायें और उस ज्ञान की महीनता में ले जायें तो उनको भी मेहनत कम लगे। और अपने को भी कम लगे। इस महीनता की ही कमी है। अब यही पुरुषार्थ करना है।

शारीरिक शक्ति भी कब आती है? जब भोजन महीन रूप से खाओ, तो उस भोजन की शक्ति बनती है। भोजन का महीन रूप क्या बनता है? खून। जब खून बन जाता है तब शक्ति आ जाती है। तो अब सिर्फ बाहर के, ऊपर के रूप को न देखते हुए अन्दर जाने की कोशिश करो। जितना हर बात में अन्दर जायेंगे, तब रत्न देखने में आयेंगे। और हर एक बात की वैल्यू का पता पड़ेगा। जितना ज्ञान की वैल्यू, सर्विस की वैल्यू का मालूम होगा उतना आप वैल्युएबुल रत्न बनेंगे। ज्ञान रत्नों की वैल्यू कम करते हो तो खुद भी वैल्युएबुल नहीं बन सकते। एक-एक रत्न की वैल्यू को परखने की कोशिश करो। आप बापदादा के वैल्युएबुल रत्न हो ना! वैल्युएबुल रत्न को क्या किया जाता है? (छिपाकर रखना होता है) बापदादा के जो वैल्युएबुल रत्न हैं उन्हों को बापदादा छिपाकर रखते हैं। माया से छिपाते हैं। माया से छिपाकर फिर कहाँ रखते हैं? जितना-जितना जो अमूल्य रत्न होंगे उतना-उतना बापदादा के दिल तख्त पर निवास करेंगे। जब दिल तख्तनशीन बनेंगे तब राज्य के तख्तनशीन बनेंगे। तो संगमयुग का कौनसा तख्त है? तख्त है वा बेगर हो? संगमयुग पर कौनसा तख्त मिलता है। बापदादा के दिल का तख्त। यह सारे जहान के तख्तों से श्रेष्ठ है। कितना भी बड़ा तख्त सतयुग में मिले लेकिन इस तख्त के आगे वह क्या है? इस तख्त पर रहने से माया कुछ नहीं कर सकती। इस पर उतरना चढ़ना नहीं पड़ेगा। इस पर रहने से माया के सर्व बन्धनों से मुक्त रहेंगे।

बापदादा की उम्मीदें – क्वान्टिटी के बजाय क्वालिटी वाले बनो और बनाओ

1.  अशरीरी होकर शरीर में आने का अभ्यास

बापदादा बच्चों को एक विशेष अभ्यास की ओर ध्यान दिलाते हैं—
पहले अशरीरी स्थिति में स्थित होना और फिर शरीर में आकर कर्म करना।

जिस प्रकार बापदादा अशरीरी स्थिति से व्यक्त रूप में आते हैं, उसी प्रकार बच्चों को भी अपनी आत्मिक स्थिति को मजबूत करना है।

उदाहरण:

जैसे कोई व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण कार्य से पहले स्वयं को मानसिक रूप से स्थिर करता है, वैसे ही आत्मा को भी कर्म में आने से पहले अपने वास्तविक स्वरूप—“मैं आत्मा हूँ”—में स्थित होना है।

मुख्य अभ्यास:

अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर व्यक्त कर्म में आना।


2.  श्रेष्ठ आत्माओं का नशा

बापदादा जब बच्चों से मिलने आते हैं तो शरीर को नहीं, बल्कि भृकुटि के बीच चमकते हुए आत्मिक सितारे को देखते हैं।

बच्चों को याद रखना है:

  • हम आत्माएं हैं।
  • हम श्रेष्ठ आत्माएं हैं।
  • हमें सर्वशक्तिमान परमात्मा के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

बच्चों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है—
लक्की सितारे, नयनों के सितारे और बापदादा की उम्मीदों के सितारे।

लेकिन तीसरी पहचान केवल नाम नहीं है—इसके पीछे कर्तव्य भी है।


3.  बापदादा की सबसे बड़ी उम्मीद क्या है?

बापदादा हर एक बच्चे से यह उम्मीद रखते हैं कि:

एक आत्मा अनेक आत्माओं को परमात्मा का परिचय देकर योग्य बनाए।

यही संगमयुग की विशेष सेवा है।

सिर्फ स्वयं आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं है।
दूसरों को भी आगे बढ़ाना है।

उदाहरण:

एक दीपक स्वयं प्रकाशमान होता है और दूसरे दीपकों को भी जला सकता है।

इसी प्रकार एक श्रेष्ठ आत्मा अनेक आत्माओं के जीवन में परिवर्तन ला सकती है।


4.  क्वान्टिटी नहीं, क्वालिटी जरूरी

आज सेवा में क्वान्टिटी तो बढ़ रही है, लेकिन बापदादा बच्चों को क्वालिटी पर विशेष ध्यान देने की प्रेरणा देते हैं।

क्वान्टिटी क्या है?

कितने लोगों तक संदेश पहुँचा, कितने लोगों ने ज्ञान सुना, कितने लोग सेवा में जुड़े।

क्वालिटी क्या है?

कितने लोग वास्तव में:

  • ज्ञान को जीवन में धारण करते हैं।
  • श्रीमत पर चलते हैं।
  • दिव्य गुणों को अपनाते हैं।
  • अपने जीवन में परिवर्तन लाते हैं।
  • दूसरों को भी योग्य बनाते हैं।

 मुख्य सूत्र:

क्वालिटी → क्वान्टिटी को जन्म देती है।

एक क्वालिटी वाली आत्मा अपने साथ अनेक आत्माओं को जोड़ सकती है।


5.  क्वालिटी आत्मा कैसे बनायें?

बापदादा बताते हैं कि जितनी-जितनी हमारे अंदर डिवाइन क्वालिटीज होंगी, उतना ही हम क्वालिटी वाली आत्माओं का निर्माण कर पाएंगे।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है:

“मैंने कितनों की सेवा की?”

बल्कि प्रश्न यह भी है:

“मेरी सेवा से कितनों में वास्तविक परिवर्तन आया?”

Self-Check:

  • क्या मेरी सेवा से आत्माओं में शक्ति आती है?
  • क्या मेरे संपर्क से किसी को परमात्मा की याद आती है?
  • क्या मेरे जीवन के गुण दूसरों को प्रेरित करते हैं?
  • क्या मैं स्वयं श्रीमत का पालन करके उदाहरण बन रहा हूँ?

6.  मेहनत क्यों लगती है?

कई बार पुरुषार्थ और सेवा दोनों में बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

प्रश्न है—क्यों?

बापदादा इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण बताते हैं:

 ज्ञान है, लेकिन ज्ञान की महीनता में जाना बाकी है।

बातें बुद्धि में होना अलग बात है और उनकी महीनता को समझकर जीवन में उतारना अलग बात है।


7.  महीन बुद्धि की आवश्यकता

महीन बुद्धि हर बात के अंदर की गहराई और वैल्यू को समझती है।

मोटी बुद्धि केवल बाहरी रूप देखती है।

उदाहरण – दही और मक्खन

दही को केवल ऊपर से देखने पर मक्खन दिखाई नहीं देता।

जब दही को बिलोया जाता है, तब उसके अंदर से मक्खन निकलता है।

उसी प्रकार ज्ञान को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है।

ज्ञान को मनन → चिंतन → अनुभव → धारणा में लाना है।

तभी ज्ञान का “मक्खन” अर्थात् उसकी वास्तविक शक्ति प्राप्त होती है।


8.  श्रीमत पर चलने के लिए भी महीन बुद्धि

कई बार हम कहते हैं:

“हमें पता है कि श्रीमत पर चलना है।”

लेकिन फिर भी पालन करने में कठिनाई होती है।

क्यों?

क्योंकि श्रीमत को केवल सुनना नहीं है, बल्कि उसकी महीनता को समझना है।

उदाहरण:

एक ही परिस्थिति में दो व्यक्ति एक ही ज्ञान सुन सकते हैं, लेकिन एक व्यक्ति उसकी गहराई को समझकर तुरंत सही निर्णय लेता है और दूसरा बाहरी रूप देखकर उलझ जाता है।

इसलिए—

जो सुना है, उसे करना है; और जो करना है, उसकी महीनता में जाना है।


9.  बाहर नहीं, अंदर जाने का अभ्यास

बापदादा का संकेत है कि केवल बाहरी रूप को देखने के बजाय हर बात की गहराई में जाने का अभ्यास करो।

जैसे भोजन शरीर में जाकर पचता है और उसका सार शक्ति बनाता है, वैसे ही ज्ञान भी बुद्धि में केवल जमा नहीं होना चाहिए।

ज्ञान की वास्तविक शक्ति तब दिखाई देती है जब वह:

ज्ञान → मनन → धारणा → शक्ति → कर्म

बन जाए।


10.  ज्ञान और सेवा की वैल्यू पहचानो

जितना हमें ज्ञान की वैल्यू और सेवा की वैल्यू समझ में आएगी, उतना ही हम स्वयं वैल्युएबुल रत्न बनेंगे।

अगर हम ज्ञान रत्नों की वैल्यू को कम समझेंगे, तो स्वयं भी अपनी वैल्यू को कम कर देंगे।

अभ्यास:

हर दिन एक ज्ञान-रत्न चुनें और स्वयं से पूछें:

“इस एक बात की मेरे जीवन में कितनी वैल्यू है?”

फिर उसे व्यवहार में लाने का पुरुषार्थ करें।


11.  बापदादा के अमूल्य रत्न

बच्चों को याद दिलाया जाता है कि वे बापदादा के वैल्युएबुल रत्न हैं।

अमूल्य रत्न को संभालकर रखा जाता है।

आध्यात्मिक अर्थ में इसका संकेत है—
अपने आत्मिक मूल्य को पहचानो और स्वयं को माया के प्रभाव से सुरक्षित रखो।


12.  दिल तख्त से राज्य तख्त तक

बापदादा के दिल में स्थान पाने के बाद ही भविष्य के राज्य तख्त की पात्रता बनती है।

संगमयुग का सबसे श्रेष्ठ तख्त कौन सा है?

बापदादा के दिल का तख्त।

यह संसार के किसी भी भौतिक तख्त से श्रेष्ठ है।

जब आत्मा दिल-तख्तनशीन बनती है तो माया के प्रभाव से सुरक्षित रहने की शक्ति बढ़ती है।

मुख्य सूत्र:

दिल तख्तनशीन → माया से मुक्त → राज्य तख्त की पात्रता


13.  माया से सुरक्षा का रहस्य

बापदादा के दिल-तख्त पर रहने का अर्थ है:

  • आत्मिक स्मृति में रहना।
  • श्रीमत को जीवन में उतारना।
  • दिव्य गुणों को धारण करना।
  • ज्ञान की महीनता में जाना।
  • सेवा में क्वालिटी लाना।
  • स्वयं भी शक्तिशाली बनना और दूसरों को भी शक्तिशाली बनाना।

14.  आज का विशेष पुरुषार्थ

आज स्वयं से ये पाँच प्रश्न करें:

  1. क्या मैं अशरीरी स्थिति का अभ्यास करता हूँ?
  2. क्या मेरी सेवा में क्वान्टिटी के साथ क्वालिटी भी है?
  3. क्या मैं ज्ञान की महीनता में जाता हूँ?
  4. क्या मेरे अंदर डिवाइन क्वालिटीज बढ़ रही हैं?
  5. क्या मैं बापदादा के दिल-तख्त का अधिकारी बन रहा हूँ?

प्रश्न 1. बापदादा बच्चों को किस प्रकार का अभ्यास करने की प्रेरणा देते हैं?

उत्तर: अशरीरी स्थिति में स्थित होकर फिर शरीर में आने का अभ्यास करने की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 2. बापदादा बच्चों से मिलने के लिए किसे देखते हैं?

उत्तर: बापदादा शरीर को नहीं, बल्कि भृकुटी के बीच चमकते हुए आत्मिक सितारे को देखते हैं।

प्रश्न 3. बच्चों को किन-किन सितारों के नाम से याद किया गया है?

उत्तर: लक्की सितारे, नयनों के सितारे और बापदादा की उम्मीदों के सितारे।

प्रश्न 4. बापदादा की बच्चों से मुख्य उम्मीद क्या है?

उत्तर: प्रत्येक बच्चा स्वयं योग्य बने और अनेकों को परमात्मा का परिचय देकर लायक बनाए।

प्रश्न 5. “एक से अनेक” का क्या अर्थ है?

उत्तर: एक श्रेष्ठ आत्मा स्वयं आगे बढ़ने के साथ अनेकों आत्माओं को ज्ञान, योग और श्रेष्ठ पुरुषार्थ में आगे बढ़ाए।

प्रश्न 6. अभी सेवा में किस बात की विशेष आवश्यकता है?

उत्तर: केवल क्वान्टिटी बढ़ाने की नहीं, बल्कि क्वालिटी वाली आत्माओं को बनाने की आवश्यकता है।

प्रश्न 7. क्वान्टिटी और क्वालिटी में क्या अंतर है?

उत्तर: क्वान्टिटी का अर्थ संख्या बढ़ाना है, जबकि क्वालिटी का अर्थ ऐसी श्रेष्ठ आत्माएं तैयार करना है जो स्वयं ज्ञान और गुणों को धारण करके दूसरों को भी आगे बढ़ा सकें।

प्रश्न 8. एक क्वालिटी वाली आत्मा की विशेषता क्या है?

उत्तर: एक क्वालिटी वाली आत्मा स्वयं श्रेष्ठ बनती है और अपने प्रभाव से अनेकों को श्रेष्ठ बनने के लिए प्रेरित कर सकती है।

प्रश्न 9. क्वालिटी वाली आत्माएं कैसे तैयार होंगी?

उत्तर: जितनी-जितनी स्वयं में डिवाइन क्वालिटीज़ की धारणा होगी, उतना ही क्वालिटी वाली आत्माओं को तैयार करने की शक्ति आएगी।

प्रश्न 10. सेवा में केवल क्वान्टिटी देखकर क्यों संतुष्ट नहीं होना चाहिए?

उत्तर: क्योंकि वास्तविक सफलता केवल संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि ऐसी आत्माएं तैयार करने में है जो स्वयं भी श्रेष्ठ पुरुषार्थ करें और दूसरों को भी आगे बढ़ाएं।

प्रश्न 11. पुरुषार्थ और सेवा में मेहनत क्यों लगती है?

उत्तर: ज्ञान और श्रीमत की बातों को केवल ऊपर-ऊपर से समझने और उनकी महीनता में न जाने के कारण मेहनत अधिक लगती है।

प्रश्न 12. महीन बुद्धि की क्या विशेषता है?

उत्तर: महीन बुद्धि किसी भी ज्ञान-बिन्दु की गहराई और वैल्यू को समझती है, इसलिए पुरुषार्थ और सेवा सहज अनुभव होते हैं।

प्रश्न 13. श्रीमत पर चलने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर: श्रीमत को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है। उसकी महीनता को समझकर उसे जीवन और सेवा में प्रयोग करना आवश्यक है।

प्रश्न 14. दही को बिलोने का उदाहरण किस बात को समझाने के लिए दिया गया है?

उत्तर: जिस प्रकार दही को बिलोने से उसमें से मक्खन निकलता है, उसी प्रकार ज्ञान की बातों की महीनता में जाने से उसकी वास्तविक वैल्यू और सार समझ में आता है।

प्रश्न 15. ज्ञान की महीनता में जाने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: ज्ञान और सेवा की वास्तविक वैल्यू समझ में आती है और व्यक्ति स्वयं अधिक वैल्युएबुल रत्न बनता जाता है।

प्रश्न 16. बापदादा के वैल्युएबुल रत्नों को क्या करना चाहिए?

उत्तर: उन्हें माया से स्वयं को सुरक्षित रखते हुए बापदादा की याद और श्रेष्ठ पुरुषार्थ में स्थित रहना चाहिए।

प्रश्न 17. अमूल्य रत्न बनने पर कौन-सा तख्त प्राप्त होता है?

उत्तर: संगमयुग में बापदादा के दिल-तख्त पर स्थान प्राप्त होता है।

प्रश्न 18. संगमयुग का सबसे श्रेष्ठ तख्त कौन-सा है?

उत्तर: बापदादा के दिल का तख्त।

प्रश्न 19. दिल-तख्तनशीन बनने का भविष्य के राज्य-तख्त से क्या संबंध है?

उत्तर: जो संगमयुग में बापदादा के दिल-तख्त का अधिकारी बनता है, वही भविष्य में राज्य-तख्त का अधिकारी बनने की पात्रता प्राप्त करता है।

प्रश्न 20. दिल-तख्त पर रहने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: आत्मा माया के बन्धनों से मुक्त और सुरक्षित रहने का अनुभव करती है तथा बापदादा की समीपता का अनुभव करती है।

प्रश्न 21. स्वयं को क्वालिटी वाला बनाने के लिए क्या चेक करना चाहिए?

उत्तर: यह चेक करना चाहिए कि मेरे अंदर कितनी डिवाइन क्वालिटीज़ हैं और मेरी सेवा से कितनी क्वालिटी वाली आत्माएं तैयार हो रही हैं।

प्रश्न 22. सच्ची सेवा की सफलता क्या है?

उत्तर: सच्ची सेवा की सफलता यह है कि जिनकी सेवा करते हैं वे स्वयं श्रेष्ठ बनें और आगे चलकर अनेकों की सेवा करने योग्य बनें।

प्रश्न 23. आज के पुरुषार्थ का मुख्य लक्ष्य क्या होना चाहिए?

उत्तर: स्वयं क्वालिटी वाला बनना, क्वालिटी वाली आत्माओं को तैयार करना और बापदादा की उम्मीदों को पूरा करना।

प्रश्न 24. इस पूरे महावाक्य का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: क्वान्टिटी के पीछे नहीं, क्वालिटी के पीछे चलो। स्वयं श्रेष्ठ बनो और अनेकों को श्रेष्ठ बनाओ।

प्रश्न 25. आत्म-चेक के लिए तीन मुख्य प्रश्न कौन-से हैं?

उत्तर:

  1. क्या मैं स्वयं क्वालिटी वाला बना हूँ?
  2. क्या मेरी सेवा से क्वालिटी वाली आत्माएं तैयार हो रही हैं?
  3. क्या मेरी बुद्धि ज्ञान और श्रीमत की महीनता में जाती है?

 मुख्य स्मृति-वाक्य

“एक क्वालिटी वाली आत्मा अनेकों को क्वालिटी वाला बना सकती है।”

“ज्ञान की महीनता में जाओ, सेवा की वैल्यू समझो और बापदादा के दिल-तख्त के अधिकारी बनो।”

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