(09)26-06-1969/“The nature of teaching – teaching through your nature.”

AW.(09)26-06-1969/“शिक्षा देने का स्वरूप – अपने स्वरूप से शिक्षा देना”

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अध्याय 1 — बापदादा हमें किस रूप में देखते हैं?

बापदादा केवल बच्चों को नहीं देखते, बल्कि तीनों सम्बन्धों और तीनों रूपों से देखते हैं—

  • बाप के रूप में — बच्चे
  • टीचर के रूप में — नम्बरवार विद्यार्थी
  • गुरु के रूप में — नम्बरवार फॉलो करने वाले

यहाँ एक बहुत गहरी बात है।

बच्चा होना केवल सम्बन्ध है, लेकिन गुरु रूप से फॉलो करना जीवन में परिवर्तन लाने वाला पुरुषार्थ है।

 उदाहरण

जैसे कोई विद्यार्थी रोज़ शिक्षक की बात सुनता है, लेकिन परीक्षा में शिक्षक द्वारा बताई बातों को जीवन में लागू नहीं करता, तो केवल सुनने से उसका परिणाम नहीं आएगा।

इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी—

सुनना → समझना → फॉलो करना → स्वरूप बनना

यह यात्रा आवश्यक है।


 अध्याय 2 — गुरु रूप में मुख्य फॉलो क्या करना है?

अक्सर याद की यात्रा को ही मुख्य पुरुषार्थ समझ लिया जाता है।

लेकिन गहराई में देखें तो याद की यात्रा साधन है।

मुख्य लक्ष्य है—

अशरीरी + निराकारी + न्यारा

साकार में रहते हुए भी बुद्धि को निराकार और न्यारी अवस्था में रखना।

जब मनुष्य अशरीरी अवस्था का अभ्यास करता है, तभी वह बाप के साथ जाने योग्य बनता है।

 याद का वास्तविक उद्देश्य

याद केवल यह नहीं कि—

“मुझे बाबा को याद करना है।”

बल्कि याद का परिणाम यह हो—

“मैं अशरीरी हूँ, निराकारी हूँ और कर्म करते हुए भी न्यारा हूँ।”

यही याद को शक्ति देती है।


अध्याय 3 — टीचर का पार्ट और रिवाइज़ कोर्स

एक समय था जब टीचर साथ रहकर पढ़ाते थे।

लेकिन अब स्थिति रिवाइज़ कोर्स की है।

जैसे स्कूल में परीक्षा से पहले विद्यार्थी को घर पर जाकर अपना होमवर्क और रिवीजन करना होता है, वैसे ही अब स्वयं को जाँचना है।

टीचर हर समय साथ बैठकर नहीं पढ़ाते, लेकिन कनेक्शन बना रहता है।

 मुख्य बात

अभी प्रश्न यह नहीं है कि—

“बाबा ने कितना पढ़ाया?”

प्रश्न यह है—

“मैंने कितनी पढ़ाई को अपने जीवन में उतारा?”


 अध्याय 4 — ऊपर से देखने का अनुभव

मुरली में एक सुंदर उदाहरण आता है।

जैसे हम किसी ऊँचे स्थान से नीचे का दृश्य देखते हैं, तो नीचे बैठकर देखने की तुलना में पूरा दृश्य अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

उसी प्रकार बापदादा ऊपर से बच्चों के रिवाइज़ कोर्स को देखते हैं।

कौन—

  • समय सफल कर रहा है?
  • समय गँवा रहा है?
  • उमंग-उत्साह से पुरुषार्थ कर रहा है?
  • अलौकिक जीवन को धारण कर रहा है?
  • अव्यक्त मदद का लाभ ले रहा है?

यह सब देखा जाता है।

 सीख

जब हम समय व्यर्थ करते हैं तो सम्बन्ध होने के कारण बापदादा को तरस भी आता है और मदद करने की भावना भी आती है।

लेकिन अब साकार रूप का पार्ट पूरा हो चुका है।

इसलिए अव्यक्त सकाश और अव्यक्त मदद को पहचानना और ग्रहण करना है।


 अध्याय 5 — विघ्नों को पार करने की शक्ति

प्रश्न आता है—

विघ्नों को पार करने के लिए कौन-सी शक्ति चाहिए?

उत्तर है—

सहन शक्ति।

लेकिन सहन शक्ति से भी पहले दो शक्तियाँ आवश्यक हैं—

1. परखने की शक्ति
2. निर्णय करने की शक्ति

पहले परखना है—

यह माया है या यथार्थ?

फिर निर्णय करना है—

इसमें फायदा है या नुकसान?

यह अल्पकाल की प्राप्ति है या सदा काल की?

निर्णय स्पष्ट होगा तो उसके बाद सहन शक्ति धारण करना आसान होगा।


 अध्याय 6 — परखने की शक्ति क्यों जरूरी है?

जीवन में हर चमकती हुई चीज़ लाभदायक नहीं होती।

कई बार माया बहुत सुंदर रूप में आती है।

वह हमें तुरंत सुख, सुविधा या उपलब्धि का आकर्षण दिखाती है।

लेकिन समझदार विद्यार्थी पूछता है—

“इसका परिणाम क्या होगा?”

यही परखने की शक्ति है।

 दैनिक जीवन का उदाहरण

मान लीजिए किसी परिस्थिति में हमें तुरंत क्रोध करके जवाब देने का मन करता है।

दो विकल्प हैं—

  • तुरंत प्रतिक्रिया देना
  • एक सेकण्ड रुककर परिणाम को देखना

परखने की शक्ति कहेगी—

“क्या मेरा उत्तर परिस्थिति सुधार देगा या बिगाड़ देगा?”

निर्णय शक्ति कहेगी—

“मुझे शान्त रहकर उत्तर देना है।”

फिर सहन शक्ति उस निर्णय को कार्य में लाएगी।


 अध्याय 7 — निर्णय शक्ति की खुराक: विचार सागर मंथन

निर्णय शक्ति को शक्तिशाली बनाने के लिए केवल याद पर्याप्त नहीं।

इसके लिए आवश्यक है—

विचार सागर मंथन।

लेकिन यहाँ भी सावधानी चाहिए।

विचार सागर मंथन करते-करते स्वयं विचारों की लहरों में बह न जाएँ।

मंथन ऐसा हो कि—

विचार → सार → निर्णय → धारणा

बन जाए।

 उदाहरण

जैसे दूध से मक्खन निकालने के लिए मंथन किया जाता है, वैसे ही ज्ञान का मंथन करके उसमें से सार रूपी रत्न निकालना है।

सिर्फ विचारों में घूमते रहना मंथन नहीं है।

सही मंथन वह है जिससे जीवन में निर्णय और परिवर्तन आए।


 अध्याय 8 — तीन अवस्थाएँ: अशरीरी, निराकारी और न्यारा

मुरली की एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा है—

 अशरीरी

देह और देह के आकर्षण से स्वयं को अलग अनुभव करना।

 निराकारी

स्वयं को आत्मा, निराकार ज्योति-बिन्दु स्वरूप में अनुभव करना।

 न्यारा

कर्म करते हुए भी कर्म और परिस्थितियों से प्रभावित न होना।

तीसरी अवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

केवल बुद्धि में निराकारी होना पर्याप्त नहीं।

कर्म में भी न्यारा दिखाई देना चाहिए।


 अध्याय 9 — अपने स्वरूप से शिक्षा देना

यही इस पूरी मुरली का सबसे शक्तिशाली संदेश है।

शिक्षा केवल सुनानी नहीं है।

शिक्षा का स्वरूप बनना है।

जब हमारा अपना स्वरूप ही शिक्षा बन जाता है, तब बिना बोले भी शिक्षा मिलती है।

 उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति हमें सहनशीलता पर रोज़ भाषण दे, लेकिन छोटी-सी बात पर क्रोधित हो जाए, तो उसकी बात का प्रभाव कम हो जाएगा।

लेकिन दूसरा व्यक्ति बिना कुछ कहे कठिन परिस्थिति में भी शांत रहे—

तो उसका स्वरूप ही शिक्षा बन जाएगा।

इसलिए—

वाणी से दी गई शिक्षा सीमित हो सकती है, लेकिन स्वरूप से दी गई शिक्षा गहरी छाप छोड़ती है।


 अध्याय 10 — स्वयं को साकार पार्ट से मिलाओ

अब एक विशेष अभ्यास बताया गया है।

साकार रूप के हर कर्म और हर स्थिति को अपने सामने रखकर स्वयं को देखना है।

प्रश्न करें—

  • क्या मैं वैसी स्थिति में स्थिर रह सकता हूँ?
  • क्या मेरी याद उतनी शक्तिशाली है?
  • क्या मैं कर्म करते हुए न्यारा रह सकता हूँ?
  • क्या मेरी सहन शक्ति बढ़ी है?
  • क्या मेरी निर्णय शक्ति स्पष्ट है?
  • क्या मेरा जीवन दूसरों को शिक्षा दे रहा है?

 असली परीक्षा

दूसरों को देखकर यह नहीं देखना कि—

“वह कहाँ तक पहुँचा?”

बल्कि स्वयं से पूछना है—

“मैं कहाँ तक पहुँचा?”


 अध्याय 11 — अब बापदादा उसी प्रकार मुरली क्यों नहीं चलाते?

एक गहरा प्रश्न सामने आता है—

जब बापदादा अन्य तन में आते हैं, तो पहले की तरह उसी प्रकार मुरली क्यों नहीं चलाते?

उत्तर यह है कि जिस साकार तन द्वारा पढ़ाई का पार्ट था, वह कोर्स पूरा हो चुका है।

अब मुख्य उद्देश्य केवल पढ़ाई के पॉइंट्स दोहराना नहीं है।

अब उद्देश्य है—

मिलना + अव्यक्त शिक्षा देना + बहलाना + उड़ाना

अर्थात् अब विद्यार्थी को स्वयं रिवाइज करके अपने स्वरूप को तैयार करना है।


 अध्याय 12 — “एक सेकण्ड में पंछी बन उड़ गया”

यहाँक बहुत शक्तिशाली संकेत मिलता है।

अशरीरी और कर्मातीत बनने की अवस्था ऐसी हो कि—

एक सेकण्ड में पंछी बन उड़ जाएँ।

इसका भाव यह है कि देह, देह-अभिमान और कर्म के बन्धनों से बुद्धि को सहज रूप से अलग कर सकें।

अब मुख्य प्रश्न है—

क्या हमारा रिवाइज़ कोर्स पूरा हुआ?

इसका उत्तर किसी दूसरे को नहीं देना है।

हर आत्मा को स्वयं निर्णय करना है।


 अध्याय 13 — “सागर में नहाना नहीं, तले में जाना है”

दूसरा गहरा संकेत है—

गुह्य रहस्यों की गहराई में जाना।

केवल ज्ञान की लहरों में खेलना नहीं।

जैसे समुद्र की सतह पर रहने से मोती नहीं मिलते, वैसे ही केवल शब्दों और विचारों तक रहने से ज्ञान का रत्न नहीं मिलता।

 अभ्यास

किसी भी मुरली पॉइंट को लेकर पूछें—

  1. इसका गहरा अर्थ क्या है?
  2. यह मेरे जीवन से कैसे जुड़ा है?
  3. इसे मैं आज कहाँ प्रयोग कर सकता हूँ?
  4. इसका स्वरूप बनने पर मेरा व्यवहार कैसा होगा?

यही वास्तविक विचार सागर मंथन है।


 मुरली का सार — 7 Golden Points

  1. बाप, टीचर और सद्गुरु — तीनों सम्बन्धों को पहचानो।
  2. गुरु रूप में मुख्य फॉलो है — अशरीरी, निराकारी और न्यारा बनना।
  3. याद की यात्रा साधन है; अवस्था बनना लक्ष्य है।
  4. विघ्नों से पहले परखने और निर्णय करने की शक्ति बढ़ाओ।
  5. निर्णय शक्ति की खुराक है — विचार सागर मंथन।
  6. केवल शिक्षा सुननी नहीं; शिक्षा-स्वरूप बनना है।
  7. ऐसा जीवन बनाओ कि तुम्हारा स्वरूप ही दूसरों के लिए शिक्षा बन जाए।

 आज का मुरली होमवर्क

आज स्वयं से केवल ये तीन प्रश्न पूछें—

1. मैं कहाँ तक अशरीरी बना हूँ?

2. मेरी परखने और निर्णय करने की शक्ति कितनी तेज है?

3. क्या मेरे स्वरूप से किसी को शिक्षा मिलती है?

और अंत में स्वयं से कहें—

“मुझे शिक्षा देने वाला नहीं, शिक्षा का स्वरूप बनना है।”


 Disclaimer

यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन, चिंतन एवं मुरली के मुख्य बिंदुओं को सरल रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें दिए गए विचार व्यक्तिगत आध्यात्मिक समझ एवं अध्ययन के लिए हैं। मूल मुरली का आधिकारिक पाठ/संदर्भ ही प्राथमिक स्रोत माना जाए। वीडियो का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, सम्प्रदाय या धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। अंतिम संदेश

शिक्षा बहुत मिल चुकी… अब शिक्षा को जीवन में धारण करने का समय है।
वाणी से कम, अपने स्वरूप से अधिक शिक्षा दें।
अशरीरी बनें, निराकारी बनें, न्यारे बनें — और अपने जीवन को ही शिक्षा का माध्यम बनायें।

प्रश्न 1: बापदादा बच्चों को किन तीन रूपों से देखते हैं?

उत्तर: बापदादा बच्चों को तीन सम्बन्धों से देखते हैं—

  • बाप के रूप में — बच्चों को
  • टीचर के रूप में — नम्बरवार विद्यार्थियों को
  • गुरु के रूप में — नम्बरवार फॉलो करने वालों को।

प्रश्न 2: गुरु रूप में मुख्य रूप से किसे फॉलो करना है?

उत्तर: गुरु रूप में मुख्य फॉलो है—अशरीरी, निराकारी और न्यारा बनना।

प्रश्न 3: याद की यात्रा क्यों कराई जाती है?

उत्तर: याद की यात्रा एक साधन है। इसके द्वारा साकार में रहते हुए निराकारी, न्यारी और अशरीरी अवस्था का अभ्यास करना है, ताकि बाप के साथ जाने योग्य बन सकें।

प्रश्न 4: अभी टीचर का पार्ट किस प्रकार चल रहा है?

उत्तर: अभी टीचर दूर से देख-रेख कर रहे हैं। जैसे रिवाइज़ कोर्स में विद्यार्थी स्वयं पढ़ाई करता है और टीचर से कनेक्शन बना रहता है, वैसे ही अभी स्वयं रिवाइज करना है।

प्रश्न 5: बापदादा रिवाइज़ कोर्स में क्या देखते हैं?

उत्तर: बापदादा देखते हैं कि कौन कितनी शक्ति, मेहनत, उमंग और उत्साह से रिवाइज़ कोर्स पूरा कर रहा है और कौन समय सफल कर रहा है तथा कौन समय गँवा रहा है।

प्रश्न 6: विघ्नों को पार करने के लिए पहले कौन-सी शक्तियाँ चाहिए?

उत्तर: पहले परखने की शक्ति, फिर निर्णय करने की शक्ति और उसके बाद सहन शक्ति की आवश्यकता है।

प्रश्न 7: परखने की शक्ति से क्या पहचानना है?

उत्तर: यह पहचानना है कि सामने वाली बात माया है या यथार्थ, उसमें फायदा है या नुकसान, और वह अल्पकाल की प्राप्ति है या सदा काल की प्राप्ति।

प्रश्न 8: निर्णय शक्ति को बढ़ाने के लिए मुख्य पुरुषार्थ क्या है?

उत्तर: विचार सागर मंथन करना। ज्ञान का गहराई से मंथन करके सही सार और सही निर्णय निकालना है।

प्रश्न 9: निर्णय शक्ति को बल देने वाली मुख्य अवस्था कौन-सी है?

उत्तर: अशरीरी, निराकारी और कर्म में न्यारा रहने की अवस्था निर्णय शक्ति को बल देती है।

प्रश्न 10: “न्यारा” रहने का क्या अर्थ है?

उत्तर: कर्म करते हुए भी कर्म और परिस्थितियों से प्रभावित न होना। ऐसा अलौकिक व्यवहार करना कि दूसरे भी अनुभव करें कि यह व्यक्ति लौकिक होते हुए भी अलौकिक है।

प्रश्न 11: शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य क्या है?

उत्तर: केवल शिक्षा सुनना या सुनाना नहीं, बल्कि शिक्षा स्वरूप बनना है।

प्रश्न 12: अपने स्वरूप से शिक्षा देने का क्या अर्थ है?

उत्तर: जब हमारे कर्म, व्यवहार और स्थिति स्वयं शिक्षा देने लगें, तब बिना वाणी के भी दूसरों को शिक्षा मिलती है। इसलिए वाणी से कम और अपने स्वरूप से अधिक शिक्षा देनी है।

प्रश्न 13: बापदादा अब पहले की तरह साकार रूप में मुरली क्यों नहीं चलाते?

उत्तर: जिस साकार तन द्वारा पढ़ाई का पार्ट था, उस तन द्वारा पढ़ाई का कोर्स पूरा हो चुका है। अब मुख्य कार्य मिलने, अव्यक्त शिक्षाओं द्वारा बहलाने और आत्माओं को उड़ाने का है।

प्रश्न 14: अब मुख्य रूप से कौन-सा कार्य बाकी है?

उत्तर: साथ ले जाने का कार्य बाकी है। इसलिए स्वयं को अशरीरी और कर्मातीत बनाने का पुरुषार्थ करना है।

प्रश्न 15: अपने रिवाइज़ कोर्स की प्रगति कैसे जाँचें?

उत्तर: साकार रूप के हर कर्म और हर स्थिति को सामने रखकर स्वयं को देखें और जाँचें कि हम कहाँ तक उस स्थिति को धारण कर पाए हैं।

प्रश्न 16: गुह्य रहस्यों को समझने के लिए क्या करना है?

उत्तर: केवल ज्ञान की लहरों में नहीं रहना है, बल्कि सागर के तले में जाना है—अर्थात् गहराई से विचार सागर मंथन करके ज्ञान के रत्न निकालने हैं।

प्रश्न 17: इस मुरली का सबसे मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: “शिक्षा देने वाला नहीं, शिक्षा का स्वरूप बनना है।” हमारा स्वरूप, व्यवहार और कर्म ही दूसरों के लिए शिक्षा बन जाएँ।

प्रश्न 18: आज का मुख्य पुरुषार्थ क्या होना चाहिए?

उत्तर: स्वयं को अशरीरी, निराकारी और न्यारा बनाना, परखने और निर्णय करने की शक्ति बढ़ाना तथा अपने स्वरूप से दूसरों को शिक्षा देना।

 अंतिम प्रश्न: हमें स्वयं से क्या पूछना चाहिए?

उत्तर:
क्या मैं अशरीरी बना हूँ?
क्या मेरी निर्णय शक्ति स्पष्ट है?
क्या मेरे स्वरूप से दूसरों को शिक्षा मिलती है?

सार:
“शिक्षा बहुत मिली, अब शिक्षा स्वरूप बनना है।”

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