बिल्कुल। नीचे सभी टाइमलाइन नंबर हटाकर टेक्स्ट को उसी क्रम में रखा गया है।

ब्रह्मा कुमारी

जीवन की

सच्चाई

आज हम 37वा विषय करने जा रहे हैं।

बीके लाइफ में इतनी मर्यादाएं क्यों है?

इतनी रोक क्यों है

या आत्मिक शक्ति

यह रोग है या आत्मिक शक्ति है?

समय की मर्यादा,
वाणी की मर्यादा,

व्यवहार की मर्यादा,
संबंधों की मर्यादा, ब्रह्मचर्य,

सरलता,
सेवा, दबाव, सीमाएं,

कठिन।
इतनी मुसीबत

एक रोग, दो रोग, तीन रोग, चार रोग। इतनी सारी रोक हमारे जीवन में लगी हुई।

इसको ब्रह्मा कुमारीज में हम कहते हैं डिसिप्लिन क्रिएट

इंटर फ्रीडम।
यह हमारी अंत स्वतंत्रता को जन्म देती है।

आत्म सम्मान बनता है। मानसिक शक्ति बढ़ती है। पवित्रता आती है। शांति आती है।

स्वतंत्रता आती है। उच्च चरित्र बनता है। सफल जीवन बनता है। किससे?

इन मर्यादाओं से
आज हम इस सच्चाई को समझने का प्रयास

करेंगे।

क्या बीके की मर्यादाएं हमारी स्वतंत्रता

छीनती है?

ब्रह्मा कुमारी जीवन में जो यह मर्यादाएं

हैं, क्या वह हमारी स्वतंत्रता छीनती है?

या असली आजादी देती है

बी के लाइफ रूल्स वर्सेस फ्रीडम

मर्यादा या बंधन बी के जीवन में

स्वतंत्रता का असली रहस्य क्या है? क्या

नियम इंसान को बांधते हैं? बी के मर्यादा

और आत्मिक स्वतंत्रता

बी के लाइफ में इतनी मर्यादाएं क्यों

रोक या आत्मिक शक्ति

फ्रीडम वर्सेस डिसिप्लिन बी के ज्ञान में

मर्यादाओं का गहरा रहस्य

मर्यादा

बंधन या असली आजादी

बी बी के लाइफ का बड़ा रहस्य

डिस्क्लेमर है बीके मर्यादा एंड फ्रीडम डिस्क्लेमर्स

यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी

ईश्वरीय विश्वविद्यालय की साकार मुरलियों

अव्यक्त महावाक्यों तथा बी के आध्यात्मिक

दृष्टिकोण के अध्ययन पर आधारित है। इसका

उद्देश्य मर्यादा और स्वतंत्रता के बीच

संबंध को बी के ज्ञान के संदर्भ में

समझाना है। इसमें

प्रस्तुत

उदाहरण व्याख्या और आत्मचिंतन के लिए है।

यह किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या जीवन

शैली पर कोई नियम लागू करने का निर्देश

नहीं। अलग-अलग विद्यार्थियों के अनुभव और

परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। दर्शक इसे

आध्यात्मिक अध्ययन और चिंतन के रूप में

देखें। आध्यात्मिक अध्ययन और चिंतन के रूप

में देखें।

क्या मर्यादा स्वतंत्रता की दुश्मन है? यह

जो मर्यादा है वह हमारी स्वतंत्रता की

दुश्मन है।

आज हम एक बहुत ही रोचक और गहरे प्रश्न पर

विचार करने वाले हैं।

मर्यादाएं स्वतंत्रता को सीमित करती हैं

या बढ़ाती है। मर्यादाएं स्वतंत्रता को

सीमित करती हैं या बढ़ाती हैं।

सामान्य दुनिया में स्वतंत्रता का अर्थ

अक्सर लिया जाता है। स्वतंत्रता का अर्थ

अक्सर लिया जाता है।

मैं जो चाहूं जब चाहूं जैसे चाहूं करूं।

सभी समझते हैं कि बस हम स्वतंत्र हैं और

स्वतंत्रता का अर्थ क्या समझते हैं? जो

चाहूं जब चाहूं जैसे चाहूं करूं

लेकिन

आध्यात्मिक जीवन

एक दूसरा प्रश्न पूछता है।

एक दूसरा प्रश्न पूछता है। क्या अपनी हर

इच्छा के अनुसार चलना ही वास्तविक

स्वतंत्रता है?

यदि मुझे क्रोध आया और मैंने क्रोध कर

दिया, क्या मैं स्वतंत्र हूं?

यदि मुझे क्रोध आया और मैंने क्रोध कर

दिया, क्या मैं स्वतंत्र हूं?

यदि मुझे किसी चीज की इच्छा हुई और मैं

उसे रोक नहीं पाया। क्या मैं स्वतंत्र

हूं?

फिर से देखिए इनको। यदि मुझे क्रोध आया,

मैंने क्रोध कर दिया, क्या मैं स्वतंत्र

हूं? क्या कहेंगे?

कि मैं स्वतंत्र हूं या नहीं हूं?

क्रोध करना मेरा अधिकार है। मैं आजाद हूं।

यदि मुझे किसी चीज की इच्छा हुई और मैं

उसे रोक नहीं पाया। क्या मैं स्वतंत्र

हूं?

यदि मोबाइल ने मुझे बुलाया

और मैं तुरंत उसे खोलने लगा। क्या मैं

स्वतंत्र हूं?

यदि कोई व्यक्ति मेरी प्रशंसा करे तो मैं

खुश हो जाऊं।

और आलोचना करे तो मैं दुखी हो जाऊं। तो

क्या मेरी खुशी मेरे नियंत्रण में है?

मैं गुलाम हूं।

मैं गुलाम हूं। यहीं से आज का विषय शुरू

होता है।

भाग एक

विषय है। स्वतंत्रता का सामान्य अर्थ

स्वतंत्रता किसे कहा जाता है?

मान लीजिए एक व्यक्ति कहता है मेरी जिंदगी

है। मैं जो चाहूंगा करूंगा।

सुनने में यह स्वतंत्रता लगती है। सुनने

में यह स्वतंत्रता

लगती है।

लेकिन सोचिए यदि वे व्यक्ति क्रोध को

नियंत्रित नहीं कर सकता,

मोबाइल को नियंत्रित नहीं कर सकता, स्वाद

को नियंत्रित नहीं कर सकता।

नकारात्मक विचारों को नियंत्रित नहीं कर

सकता

तो वास्तव में नियंत्रण किसके पास है?

वास्तव में नियंत्रण किसके पास है?

व्यक्ति के पास या उसकी इच्छाओं के पास?

उदाहरण मोबाइल एक व्यक्ति कहता है

मैं मोबाइल का मालिक हूं।

लेकिन हर पांच मिनट में नोटिफिकेशन चेक

करता है।

अब प्रश्न है मोबाइल उसके हाथ में है या

उसका मन मोबाइल के हाथ में है।

यहीं से हमें बाहरी और आंतरिक स्वतंत्रता

का अंतर समझना शुरू करना होगा।

यहीं से हमें बाहरी और आंतरिक स्वतंत्रता

का अंतर समझना शुरू करना होगा।

भाग दो मर्यादा क्या है?

मर्यादा का अर्थ है केवल रोक नहीं। अर्थ

केवल रोक नहीं है।

मर्यादा का अर्थ हो सकता है

एक ऐसी सीमा जिसे मैं स्वयं स्वीकार करता

हूं ताकि मेरी शक्ति सही दिशा में रहे।

जैसे सड़क पर स्पीड लिमिट।

जैसे सड़क पर स्पीड लिमिट। क्या स्पीड

लिमिट आपकी स्वतंत्रता छीनती है?

या आपको सुरक्षित रखती है।

उदाहरण पुल पुल के दोनों तरफ रेलिंग होती

है। जैसे पुल है। पुल के दोनों तरफ रेलिंग

किस लिए रखी होती है? यह एक मर्यादा है।

नहीं तो आप गिर जाएंगे।

चाहे वह नदी है,

चाहे वह कोई भी प्रकार का पुल बनाया है।

रेल के ऊपर पुल बना है, रोड के ऊपर पुल

बना है, नदी के ऊपर पुल बना है। उसको

रेलिंग जरूर लगाई जाती है। मर्यादा ना दी

जाए तो वह गिरेगा कोई भी तो उसको नुकसान

होगा ना।

रेलिंग रास्ते को छोटा नहीं करती।

वे आपको गिरने से बचाती है।

उसी प्रकार आध्यात्मिक मर्यादाएं आत्मा की

सुरक्षा के लिए समझी जा सकती है।

भाग तीन बी के जीवन में मर्यादा क्यों

महत्वपूर्ण है?

बी के जीवन में कुछ प्रमुख आध्यात्मिक

अनुशासन दिखाई देते हैं।

जीवन में कुछ प्रमुख आध्यात्मिक अनुशासन

दिखाई देते हैं।

आत्म स्मृति नंबर एक क्या है? आत्म

स्मृति।

आत्मा की स्मृति में रहना। परमात्म स्मृति

में रहना, पवित्रता को धारण करना, सात्विक

भोजन खाना यह क्या है? मर्यादाएं

हैं।

क्योंकि स्मृति आत्म स्मृति एक मर्यादा

देती है कि देह को याद नहीं करना। परमात्म

स्मृति और किसी को याद नहीं करना।

पवित्रता कुछ भी मन मत, परम मत मिक्स नहीं

करना। सात्विक भोजन हमने गंदी चीजें नहीं

खानी है। सीमाएं लग गई इसमें तो यह

मर्यादा है।

नशा मुक्त जीवन मर्यादा है कि नशा

हानिकारक है। नशा कोई लाभदायक चीज नहीं

है। उसे मैंने सेवन नहीं करना।

नियमित अध्ययन रोजाना मुझे बाबा की श्रीमत

का अध्ययन करना है। आत्म निरीक्षण

मुझे स्वयं को परीक्षण करना है। मरदित

व्यवहार मेरा व्यवहार जो है वो कैसा होना

चाहिए? मर्यादा।

अब प्रश्न है क्या यह सभी बंधन है

या

इनका कोई उद्देश्य है? क्या यह सभी बंधन

है या इनका कोई उद्देश्य है?

आत्म अभिमान पहली स्वतंत्रता। आत्म अभिमान

क्या है? पहली स्वतंत्रता है।

बी के ज्ञान की बुनियाद है। मैं आत्मा

बी के ज्ञान की नीव बुनियाद क्या है? मैं

आत्मा हूं।

मुरली नोट 9 मार्च 1970 को बाबा ने कहा इस

तिथि की साकार मुरली में आत्मा की पहचान

और आत्म अभिमान पर जोर मिलता है। जोर

मिलता है।

अब इसे स्वतंत्रता से जोड़िए। अब इसे

किसके साथ जोड़ना है? स्वतंत्रता से

जोड़िए।

यदि मैं स्वयं को केवल शरीर मानता हूं तो

मेरा सुख शरीर की प्रशंसा से जुड़ सकता

है।

मेरी पहचान पद से जुड़ सकती है। मेरा

सम्मान दूसरों की राय से जुड़ सकता है।

लेकिन आत्म अभिमान में मेरी पहचान भीतर से

आती है।

यही एक प्रकार की आंतरिक स्वतंत्रता है।

भाग पांच क्या जो मन करे वही करना

स्वतंत्रता है? जो मन करे वही करना

स्वतंत्रता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति को

गुस्सा आता है। वो कहता है मैं स्वतंत्र

हूं। इसलिए गुस्सा करूंगा। क्या यह

स्वतंत्रता है या यह क्रोध का गुलाम है?

दूसरा व्यक्ति क्रोध आने पर रुकता है,

सोचता है, स्थिति को देखता है। फिर उत्तर

देता है कौन अधिक स्वतंत्र है। पहला

व्यक्ति भावना ने निर्णय लिया। दूसरा

व्यक्ति चेतना ने निर्णय लिया यही अंतर

बहुत महत्वपूर्ण है।

भाग छ मुरली मंथन पहले अपने को बदलो पहले

अपने को बदलो मुरली नोट्स

23 अक्टूबर को 1969 23 अक्टूबर 1969 की

मुरली है।

इस दिन की साकार मुरली के भाव में

स्वयं को बदलने और फिर दूसरों को रास्ता

बताने

पर जोर मिलता है। यहां एक बड़ा सूत्र

निकलता है।

मर्यादा दूसरों को नियंत्रित करने के लिए

नहीं स्वयं को बदलने के लिए है। उदाहरण

यदि मैं घर में सबको कहता रहूं

तुम गुस्सा मत करो। लेकिन स्वयं ही गुस्सा

करता हूं। तो

मेरी मर्यादा केवल दूसरों के लिए है।

वास्तविक मर्यादा है। पहले स्वयं को देखना

भाग सात ब्रह्मचर्य

बंधन या स्वतंत्रता ब्रह्मचर्य

बंधन या स्वतंत्रता

यह सबसे संवेदनशील

उदाहरण है। समाज में ब्रह्मचर्य को देखकर

कई लोग कहते हैं यह तो स्वतंत्रता सीमित

करना है।

बी के दृष्टिकोण इसे पवित्रता और आत्म

संयम से जोड़ता है। मुरली नोट 5 नवंबर

1969

पवित्रता की शक्ति से जोड़ने वाला मुरली

भाव मिलता है।

अब सोचिए यदि व्यक्ति अपनी दृष्टि विचार

और इच्छाओं का गुलाम है

तो क्या यह वास्तव में स्वतंत्र है?

और यदि वे अपनी चेतना को दिशा दे सकता है

तो क्या उसमें अधिक आत्म नियंत्रण नहीं

है?

भाग आठ दमन और संयम में अंतर दमन और संयम

में अंतर

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। यह अंतर बहुत

महत्वपूर्ण है।

दमन मुझे इच्छा नहीं होनी चाहिए।

संयम इच्छा को पहचानकर

मैं अपनी दिशा स्वयं चुनूंगा।

उदाहरण आपको मिठाई बहुत पसंद है।

डॉक्टर ने कहा है कि आपको इसे सीमित करना

चाहिए।

आपको इसे सीमित करना चाहिए।

यदि आप हर बार कहते हैं मैं खुद को रोक ही

नहीं सकता

तो आप स्वाद के अधीन है तो आप स्वाद के

अधीन है

लेकिन यदि आप कहते हैं मैं चुन सकता हूं

कि कब और कितना लेना है। मैं चुन सकता हूं

कि कब और कितना लेना है।

तो नियंत्रण आपके हाथ में है। नियंत्रण

आपके हाथ में है।

भाग नौ भोजन की मर्यादा स्वतंत्रता कम या

स्वस्थ अधिक। स्वतंत्रता

कम या स्वास्थ्य अधिक

बी के जीवन में सात्विक भोजन को महत्व

दिया जाता है।

महत्व दिया जाता है।

अब सामान्य व्यक्ति कह सकता है मुझे जो

खाना है मैं खाऊंगा।

आजाद है वो।

लेकिन क्या हर इच्छा पूरी करना आवश्यक है?

उदाहरण मान लीजिए बच्चे को हर दिन केवल

मिठाई खाने की स्वतंत्रता दे दी जाए। क्या

यह उसके हित में होगी? स्वतंत्रता और

विवेक दोनों आवश्यक है। आध्यात्मिक जीवन

में भी प्रश्न है क्या मैं स्वाद चुन रहा

हूं या स्वाद मुझे चला रहा है?

भाग 10 नशा मुक्ति सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति कहता है मैं शराब

पीने के लिए स्वतंत्र हूं।

लेकिन यदि वे एक दिन ना पी सके तो बेचैन

हो जाए।

तो यह कैसी स्वतंत्रता है? तो यह कैसी

स्वतंत्रता है? वास्तविक स्वतंत्रता शायद

यह है। मैं बिना नशे के भी सहज हूं। इसलिए

अनुशासन कभी बाहर से सीमा जैसा दिखाई देता

है। लेकिन भीतर से वे निर्भरता को काम कर

सकता है।

भाग

11 अमृतवेला

समय की मर्यादा

अमृतवेला

समय की मर्यादा

अब अमृतवेले

का उदाहरण ले सुबह जल्दी उठना किसी

व्यक्ति को यह कठिन लग सकता है। वे कहता

है मेरी स्वतंत्रता है कि मैं 9:00 बजे

उठूं। उठो भी 9:00 बजे। कोई किसी को मना

कर रहा है कि 9 बजे मत उठो।

परंतु तुम मर्यादा में रहना चाहते हो। समय

पर उठकर परमात्मा को याद करते हो तो अपनी

कमाई करते हो।

लेकिन यदि उसका लक्ष्य आध्यात्मिक अभ्यास

है तो वे स्वयं एक समय चुनता है।

यहां एक सुंदर सिद्धांत है सेल्फ इंपोज

डिसिप्लिन कैन क्रिएट ग्रेटर ग्रेटर

फ्रीडम

मैं स्वयं को एक दिशा देता हूं।

ताकि दिन भर मेरा मन अधिक व्यवस्थित रहे।

भाग 12 योग मन को स्वतंत्र बनाना मन को

स्वतंत्र बनाना

मुरली नोट 20 मई 1970

इस दिन की साकार मुरली के भाव में योग

द्वारा शक्ति प्राप्त करने पर जोर मिलता

है।

योग का एक प्रैक्टिकल प्रश्न है। क्या मैं

अपने विचारों को रोक सकता हूं?

क्या मैं अपने विचारों को रोक सकता हूं?

यदि मन लगातार अतीत में घूमता है। यदि मन

लगातार

अतीत में घूमता है।

भविष्य की चिंता करता है।

दूसरों की तुलना करता है तो शरीर भले

स्वतंत्र हो मन स्वतंत्र नहीं है।

उदाहरण आप ऑफिस में बैठे हैं

लेकिन

मन 10 साल पुरानी घटना में ही

लेकिन मन 10 साल पुरानी घटना में है। ऑफिस

में बैठा है। परंतु मन कहां है? 10 साल

पुरानी कोई बातें उनको याद कर रहा है।

कहां गए थे? क्या किया था? कैसे किया था।

शरीर वर्तमान में और मन अतीत में।

राज योग का अभ्यास मन को वर्तमान में लाने

का निर्देश

की दिशा देता है।

भाग 13 सोशल मीडिया और नई गुलामी।

सोशल मीडिया और नई गुलामी।

आज की दुनिया में यह उदाहरण बहुत

महत्वपूर्ण है। हमारे पास पहले से ही अधिक

स्वतंत्रता है।

लेकिन क्या हमारा ध्यान भी उतना स्वतंत्र

है?

एक नोटिफिकेशन आया हमने मोबाइल खोला।

एक वीडियो देखा फिर दूसरा फिर तीसरा। आधा

घंटा चला गया। आप स्वयं से पूछिए क्या

मैंने मोबाइल चुना या मोबाइल ने मुझे

चुना?

मैंने मोबाइल चुना या मोबाइल ने मुझे

चुना।

ये आधुनिक स्वतंत्रता के लिए

भाग 14 मुरली अध्ययन ज्ञान की मर्यादा

विद्यार्थियों के लिए मुरली अध्ययन एक

महत्वपूर्ण अभ्यास है। मुरली नोट 12 जनवरी

1970

मुरली में इसे पढ़ाई के रूप में समझने का

भाव मिलता है।

उदाहरण एक विद्यार्थी कहता है मैं पढ़ाई

के लिए स्वतंत्र हूं। इसलिए जब मन होगा तब

पढूंगा पढ़ लेकिन परीक्षा के दिन क्या

होगा?

अनुशासन

उसकी स्वतंत्रता को काम नहीं करता।

वे उसे लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता देता

है।

भाग 15 क्या मर्यादा डर से अपनानी चाहिए?

बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि कोई

व्यक्ति केवल बच्चों के

डर के कारण नियम निभाता है तो अंदर से

संघर्ष बना रह सकता है।

श्रेष्ठ मर्यादा है समझ से मर्यादा।

श्रेष्ठ मर्यादा कैसी होती है? समझ से

मर्यादा।

पहले मुझे यह नहीं करना चाहिए।

फिर मैं समझता हूं कि क्यों नहीं करना

चाहिए।

और अंत में मैं स्वयं सही चुनाव करना

चाहता हूं।

यहां बाहरी नियम धीरे-धीरे आंतरिक संस्कार

बन जाता है। भाग 16 मर्यादा और आत्म

सम्मान। जब व्यक्ति बार-बार अपने निर्णय

स्वयं लेने लगता है। बस जो भी है मैं जो

करता हूं वही फाइनल है। वह अपना निर्णय

खुद लेने लगता है तो आत्म सम्मान बढ़ सकता

है। तो आत्म सम्मान बढ़ सकता है। उदाहरण

आज मैंने क्रोध को रोक लिया। उदाहरण के

लिए आज मैंने क्रोध को रोक लिया। आज मैंने

अनावश्यक आलोचना नहीं की। आज मैंने

नकारात्मक

वीडियो नहीं देखा।

आज मैंने किसी को सम्मान दिया।

यह छोटीछोटी जीते आत्म शक्ति को मजबूत

करती है।

क्या हर मर्यादा हर व्यक्ति के लिए समान

होनी चाहिए?

यहां संतुलन बहुत जरूरी है। आध्यात्मिक

जीवन में भी व्यक्ति की परिस्थिति अलग हो

सकती है। किसी के लिए एक अभ्यास सहज हो

सकता है। दूसरे के लिए कठिन इसलिए

आध्यात्मिक अनुशासन को समझना चाहिए।

लेकिन उसे दूसरों पर थोपना नहीं चाहिए।

भाग 18 मर्यादा को गलत उपयोग कब हो सकता

है? मर्यादा का भी गलत उपयोग कब हो सकता

है?

एक महत्वपूर्ण आत्म परीक्षण।

एक महत्वपूर्ण आत्म परीक्षण मर्यादा यदि

अहंकार बन जाए दूसरों को नीचे दिखाने का

साधन बन जाए

भय पैदा करे

परिवार में

भय पैदा करें, परिवार में तनाव बढ़ाए तो

हम स्वयं को चेक करना चाहिए। फिर चेंज भी

करना चाहिए। मुरली नोट 21 अप्रैल 1970

इस दिन की मुरली भाव में स्वयं को चेक

करने आत्म परीक्षण की दिशा मिलती है।

ब्रह्मा कुमारी जीवन की सच्चाई

प्रश्न क्या मेरी मर्यादा मुझे विनम्र बना

रही है?

तो वे शक्ति है।

यदि वे अहंकार बढ़ा रही है तो पुनः आत्म

परीक्षण आवश्यक है।

भाग 19 सबसे बड़ा उदाहरण है कार और ब्रेक

का। क्या कोई ऐसी कार चला सकता है जिसमें

ब्रेक ना हो?

उसमें बहुत हॉर्स पावर है लेकिन ब्रेक

नहीं है। क्या वे स्वतंत्र है?

ब्रेक गति को समाप्त नहीं करता।

नियंत्रित करता है।

ब्रेक गति को नियंत्रित करता है। उसी

प्रकार मर्यादा जीवन का ब्रेक

योग जीवन की दिशा

ज्ञान जीवन को नय का नेविगेशन

और पुरुषार्थ

केवल प्यासे

सेट करके जाना

ज्ञान

जीवन का नेविगेशन पुरुषार्थ यात्रा

भाग 20 बी के जीवन में वास्तविक

स्वतंत्रता क्या है? आप पूरे विषय को एक

सूत्र में रखें। बाहरी स्वतंत्रता मैं जो

चाहूं करूं।

आंतरिक स्वतंत्रता मैं अपनी चेतना से चुन

सकता हूं कि क्या करना है। क्या करना है।

पहली स्वतंत्रता में इच्छा

राजा हो सकता है।

पहली स्वतंत्रता में इच्छा क्या है? कि

राजा हो सकता है। इच्छा राजा हो सकती है।

भाग 21 एक छोटी कहानी एक राजा के पास बहुत

बड़ा राज्य था। उसने अपने मंत्री से पूछा

मेरे पास सब कुछ है। क्या मैं सबसे

स्वतंत्र व्यक्ति हूं? मंत्री ने पूछा यदि

कोई आपका अपमान करे तो क्या आप क्रोध को

रोक सकते हैं?

राजा चुप हो गया। मंत्री ने पूछा यदि आपको

कोई इच्छा परेशान करे तो क्या आप उसे छोड़

सकते हैं?

राजा फिर चुप हो गया। मंत्री ने कहा

महाराज राज्य जीतना आसान है। स्वयं पर

राज्य करना कठिन है। यही आज के विषय की का

सार है।

भाग 22 एक बीके विद्यार्थी के लिए

प्रैक्टिकल फार्मूला

क्या है?

आज से एक छोटा अभ्यास करें।

जब भी कोई इच्छा या प्रतिक्रिया आए

स्टॉप

चेक चूस।

स्टॉप करो, चेक करो और चुनो।

स्टॉप

तुरंत प्रतिक्रिया मत दो। तुरंत

प्रतिक्रिया

मत दो।

मैं किस चेतना में हूं? चूज चुनो। क्या

करो उसको? चुनो।

मैं श्रेष्ठ स्वरूप के अनुसार सही विकल्प

क्या है? मेरे श्रेष्ठ स्वरूप के अनुसार

यही विकल्प क्या सही विकल्प क्या है?

उदाहरण कोई आपको गुस्सा दिलाता है। स्टॉप

एक गहरी सांस चेक मैं देह अभिमान में हूं।

चूज़ शांत और सम्मान पूर्वक पूर्ण उत्तर।

यही मर्यादा है। यही स्वतंत्रता भी है।

भाग 23 मुरली मंथन चार मुख्य सूत्र 9

मार्च 1970

आत्म अभिमान मैं आत्मा हूं।

मंथन मेरी पहचान बाहरी चीजों पर कितनी

निर्भर है।

पांच नंबर को पवित्रता की शक्ति से जोड़ने

वाला मुरली भाव मेरी ऊर्जा किस दिशा में

जा रही है। मतलब इसमें यह बताया कि मेरी

ऊर्जा काम में आ रही है या व्यर्थ जा रही

है। मर्यादा होगी तो वो सफल काम करेगी और

यदि मर्यादा नहीं है तो सफलता उस दिशा में

जा नहीं रही है। 20 मई 1970 में देखा हमने

कि योग द्वारा शक्ति प्राप्त करने का भाव

मंथन क्या मेरा मन मेरी परिस्थितियों से

शक्तिशाली है?

शक्तिशाली है।

क्या मेरा मन पर मेरी परिस्थितियों में

शक्तिशाली है। 21 अप्रैल 1970

सिर्फ सेल्फ चेकिंग आत्म परीक्षण का भाव।

सेल्फ चेकिंग क्या है? आत्म परीक्षण का

भाव है। मंथन मेरी मर्यादा मुझे वास्तव

में कितना बदल रही है?

अंतिम निष्कर्ष तो आज का प्रश्न था

मर्यादाएं स्वतंत्रता को सीमित करती हैं

या बढ़ाती है

उत्तर परिस्थिति पर निर्भर करता है यदि

मर्यादा केवल बाहरी दबाव उत्तर परिस्थिति

पर निर्भर करता है यदि मर्यादा केवल बाहरी

दबाव है

तो फिर परिस्थिति जो है ना का उत्तर क्या

देंगे वो निर्भर करेगा परिस्थिति पर

परिस्थिति पर तो यह बंधन जैसी महसूस हो

सकती है

लेकिन यदि मर्यादा समझ

विवेक और आत्म जागरूकता से अपनाई जाए

मर्यादा को कैसे अपनाया जाए

समझ

विवेक

और आत्म जागरूकता से

अपनाई जाए। आत्मा जागृत हो।

जागृत होने का मतलब है बाबा की श्रीमत पर

हो।

तो वे व्यक्ति को अपनी कमजोरियों से मुक्त

कर सकती है। इसलिए याद रखें क्रोध से

स्वतंत्र होना, नशे से स्वतंत्र होना, अति

आसक्ति से स्वतंत्र होना, नकारात्मक

विचारों से स्वतंत्र होना, दूसरों की राय

पर निर्भरता से स्वतंत्र होना, इंद्रियों

की गुलामी से स्वतंत्र होना।

यही वास्तविक

आंतरिक स्वतंत्रता है।

पावरफुल क्लोजिंग हमें अक्सर कहते हैं

मुझे पूरी आजादी चाहिए।

लेकिन राज योग हमें एक प्रश्न देता है।

क्या तुम अपने मन के मालिक हो?

क्या तुम अपने मन के मालिक हो?

मन के मालिक होना माना

मन को बाबा की डायरेक्शन के अनुसार चलाना।

यदि कोई आपकी प्रशंसा करे आप खुश हो क्या

आप स्वतंत्र हैं? नहीं।

कोई आपकी आलोचना करे आप दुखी हो तो क्या

आप स्वतंत्र है? नहीं।

यदि इच्छा आए और आप उसे रोक ना सके।

क्या आप स्वतंत्र हैं?

लेकिन यदि परिस्थिति वही हो, लोग वही हो,

इच्छाएं सामने हो,

और फिर भी आप शांत होकर सही चुनाव कर सके।

सही चुनाव कर सके।

तो शायद यही है सच्ची स्वतंत्रता।

यही है सच्ची स्वतंत्रता।

इसलिए बी के दृष्टिकोण से मर्यादा केवल यह

नहीं कहती यह मत करो।

वे आत्मा को सिखाती है। मर्यादा आत्मा को

सिखाती है तुम इतने शक्तिशाली बनो कि गलत

चीज तुम्हें चला ना सके।

गलत चीज तुम्हें चला ना सके।

कोई भी कितनी भी गलत चीज हो वे तुम्हें

चला ना सके।

मर्यादा तब बंधन नहीं रहती।

मर्यादा तब बंदर नहीं रहती है।

वे आत्म शक्ति की सीमा बन जाती है।

मर्यादा तब बंधन नहीं रहती। आत्मिक शक्ति

की सीमा बन जाती है और सीमा में नदी बाढ़

नदी जो है बाढ़ में नहीं जाती बाढ़ नहीं

आती उसमें खराबी नहीं होती कोई नुकसान

नहीं

तो बाहरी दुनिया के बीच रहते हुए भीतर

से स्वतंत्र रह सकती है।

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