8)/क्यों हुआ? किसकी वजह से हुआ? क्या इसे रोका जा सकता था?
“अपना सच्चा चार्ट रखो, अवस्था श्रेष्ठ बनाओ!” | 26-09-2026 प्रातः-मुरली | बापदादा | मधुबन
वैकल्पिक आकर्षक शीर्षक
“क्या आप रोज़ अपना चार्ट रखते हैं? | याद, सेवा और श्रेष्ठ अवस्था का रहस्य | प्रातः-मुरली 26-09-2026”
अध्याय
अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखो — अवस्था अच्छी रहेगी
प्रातः-मुरली | 26-09-2026 | ओम् शान्ति | बापदादा | मधुबन
मुख्य महावाक्य
“मीठे बच्चे – अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखो तो अवस्था अच्छी रहेगी, चार्ट रखने से कल्याण होता रहेगा।”
अध्याय 1 — पुरानी दुनिया से सहज किनारा कैसे हो?
मुरली में प्रश्न किया गया है कि कौन-सी स्मृति पुरानी दुनिया से सहज ही किनारा करा देती है?
उत्तर में बताया गया है कि जब बुद्धि में यह स्मृति रहती है कि हम कल्प-कल्प बाप से बेहद का वर्सा लेते हैं, हमने फिर से शिवबाबा की गोद ली है और हम सच्चे ब्राह्मण बने हैं—तो यह स्मृति पुरानी दुनिया से सहज ही किनारा कराने में मदद करती है।
उदाहरण
जैसे कोई विद्यार्थी अपने लक्ष्य को लगातार याद रखता है तो उसका ध्यान अनावश्यक बातों से हटकर पढ़ाई की ओर रहने लगता है, वैसे ही आत्मा जब अपने आध्यात्मिक लक्ष्य और बाप से मिलने वाले वर्से की स्मृति में रहती है तो संसार की आकर्षणों से दूरी बनाने का अभ्यास होता है।
Murli Note
स्मृति → खुशी → नशा → पुरुषार्थ → श्रेष्ठ अवस्था
अध्याय 2 — “हम सुखधाम के मालिक बन रहे हैं”
मुरली में बताया गया है कि बच्चे शिवबाबा की याद में बैठते हैं और जानते हैं कि बाबा उन्हें फिर से सुखधाम का मालिक बना रहे हैं।
इसलिए बुद्धि में खुशी रहनी चाहिए कि हमें बाप से सुख और शान्ति का वर्सा मिल रहा है।
उदाहरण
यदि किसी व्यक्ति को कोई बहुत मूल्यवान अवसर प्राप्त हो और उसे उसका महत्व समझ में आ जाए, तो उसके चेहरे और व्यवहार में खुशी दिखाई देती है। इसी प्रकार आध्यात्मिक प्राप्तियों की स्मृति आत्मा में खुशी का अनुभव करा सकती है।
Murli Note
“हम सुखधाम के मालिक बन रहे हैं” — इस स्मृति को बुद्धि में रखना है।
अध्याय 3 — बाप, टीचर और सतगुरु
मुरली में बाप की महिमा को बाप, टीचर और सतगुरु के रूप में समझाया गया है। शिवबाबा को पतितों को पावन बनाने वाला बताया गया है।
समझने का उदाहरण
एक ही व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में अलग भूमिका निभा सकता है—जैसे घर में मार्गदर्शक, विद्यालय में शिक्षक और किसी विशेष परिस्थिति में सहयोगी। उसी प्रकार मुरली में बाप की विभिन्न भूमिकाओं को समझाया गया है।
अध्याय 4 — सतोप्रधान से तमोप्रधान और फिर पावन बनने का पुरुषार्थ
मुरली में बताया गया है कि आत्माएँ सतोप्रधान से तमोप्रधान अवस्था की ओर आती हैं और संगम के समय बाप से ज्ञान और योग द्वारा फिर पावन बनने का पुरुषार्थ करती हैं।
Murli Note
सतोप्रधान → तमोप्रधान → ज्ञान और योग का पुरुषार्थ → पावन बनने की दिशा
यह मुरली के आध्यात्मिक दृष्टिकोण में आत्मा की अवस्था को समझाने वाला विषय है।
अध्याय 5 — बाप से पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ
बच्चों को बाप से पूरा वर्सा लेने के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी गई है।
मुरली में लक्ष्मी-नारायण के चित्र, पढ़ाई, राजयोग और भविष्य में डबल सिरताज बनने की स्मृति का उल्लेख आता है।
उदाहरण
जैसे विद्यार्थी परीक्षा में अच्छे परिणाम के लिए नियमित पढ़ाई करता है, वैसे ही आध्यात्मिक विद्यार्थी अपने पुरुषार्थ, याद और धारणा को नियमित रखने का प्रयास करता है।
अध्याय 6 — संगदोष से अपनी सम्भाल
मुरली में विशेष रूप से संगदोष से बचने और स्टूडेन्ट लाइफ के नशे को बनाए रखने की बात कही गई है। बाहर के वातावरण और मित्र-सम्बन्धियों के प्रभाव से बुद्धि दूसरी ओर जा सकती है, इसलिए अपनी अवस्था की सम्भाल आवश्यक बताई गई है।
उदाहरण
यदि कोई विद्यार्थी पढ़ाई के समय बार-बार अपना ध्यान मनोरंजन या अन्य गतिविधियों में लगाए, तो पढ़ाई में एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। इसी तरह आध्यात्मिक अभ्यास में भी संग और वातावरण का प्रभाव महसूस किया जा सकता है।
Murli Note
संग की सम्भाल = अपनी अवस्था की सम्भाल।
अध्याय 7 — चार्ट रखना: आत्म-निरीक्षण का अभ्यास
इस मुरली का एक प्रमुख संदेश है—अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखना।
चार्ट के माध्यम से स्वयं को देख सकते हैं कि दिनभर में:
- बाप की याद कितनी रही?
- संकल्प किस दिशा में रहे?
- कर्म कैसे रहे?
- सेवा में कितना समय लगाया?
- क्या कोई विकारी या व्यर्थ प्रभाव आया?
मुरली में बताया गया है कि जितना बाप को याद करेंगे, उतना लाभ होगा।
दैनिक उदाहरण
रात को सोने से पहले कुछ मिनट स्वयं से पूछें:
“आज मैंने क्या अच्छा किया?”
“कहाँ अपनी अवस्था कमजोर हुई?”
“कितना समय बाप की याद में रहा?”
“क्या मेरे किसी बोल या कर्म से किसी आत्मा को दुःख हुआ?”
यही आत्म-निरीक्षण अगले दिन के पुरुषार्थ को अधिक स्पष्ट बना सकता है।
अध्याय 8 — सेवा और अनेक आत्माओं का कल्याण
मुरली में बच्चों को सेवा के प्रति उमंग रखने और बहुतों के कल्याण की भावना रखने की प्रेरणा दी गई है।
बाप कहते हैं कि केवल स्वयं पढ़ना ही नहीं, बल्कि दूसरों को भी ज्ञान और बाप का परिचय देना है।
Murli Note
याद + पढ़ाई + सेवा = पुरुषार्थ की दिशा
सेवा करते समय अहंकार से बचना भी आवश्यक बताया गया है।
अध्याय 9 — रहमदिल बनो, दु:ख हर्ता सुख कर्ता बनो
मुरली की धारणा में बच्चों को बाप समान रहमदिल, दु:ख हर्ता और सुख कर्ता बनने की प्रेरणा दी गई है।
उदाहरण
यदि कोई आत्मा परेशान है, तो उसे दोष देने के बजाय उसकी बात शांत मन से सुनना, शुभ भावना रखना और यथासम्भव सकारात्मक सहयोग करना—रहमदिल बनने के अभ्यास का एक व्यावहारिक उदाहरण हो सकता है।
अध्याय 10 — अन्तर्मुखी बनो और समय बचाओ
मुरली के वरदान में अन्तर्मुखी बन अपने समय और संकल्पों की बचत करने वाले विघ्न जीत भव बनने की प्रेरणा दी गई है।
अन्तर्मुखी रहने से मनन शक्ति बढ़ाने और बाहरी प्रभावों से स्वयं को बचाने की बात कही गई है।
उदाहरण
दिन में कुछ समय मोबाइल, अनावश्यक बातचीत और बाहरी गतिविधियों से अलग होकर अपने विचारों को देखना—अन्तर्मुखी अभ्यास का एक सरल उदाहरण हो सकता है।
अध्याय 11 — दाता स्वरूप बनो
अव्यक्त इशारे में कहा गया है कि एक बाप से लेना है और जो लिया है वह सबको देना है।
अर्थात् ज्ञान, शक्तियाँ, गुण और प्राप्तियों को दूसरों के कल्याण में लगाना है, लेकिन किसी आत्मा से लेने की इच्छा नहीं रखनी है।
Murli Note
एक से लेना → सबको देना → दाता स्वरूप बनना
आज की मुख्य धारणाएँ
1️⃣ चार्ट रखो
प्रतिदिन अपनी अवस्था का सच्चा निरीक्षण करो।
2️⃣ एक बाप को याद करो
बुद्धि को बार-बार एकाग्र करने का अभ्यास करो।
3️⃣ संग की सम्भाल करो
जिस संग से अवस्था प्रभावित होती है, उसके प्रति सजग रहो।
4️⃣ सेवा में रहो
अपने ज्ञान और प्राप्तियों को दूसरों के कल्याण में लगाओ।
5️⃣ अन्तर्मुखी बनो
व्यर्थ संकल्पों और समय की बचत करो।
6️⃣ रहमदिल बनो
दूसरों के प्रति शुभ भावना और सुख देने की वृत्ति रखो।
7️⃣ दाता बनो
लेने की इच्छा से ऊपर उठकर देने का अभ्यास करो।
आज का स्व-चिंतन
क्या मेरा चार्ट सच्चा है?
क्या मेरी याद केवल कुछ समय की है या दिनभर कर्म करते हुए भी बाप की स्मृति रहती है?
क्या मैं दूसरों की कमियाँ देखने के बजाय स्वयं की अवस्था को देखता हूँ?
क्या मेरी सेवा में अहंकार है या कल्याण की भावना?
क्या मैं दाता स्वरूप हूँ या किसी आत्मा से प्राप्ति की अपेक्षा रखता हूँ?
मुरली का सार
सच्ची स्मृति रखो, सच्चा चार्ट रखो, अन्तर्मुखी बनो, संगदोष से बचो, सेवा में रहो और बाप समान रहमदिल बनो।
जब आत्मा अपनी अवस्था को ईमानदारी से देखती है और निरन्तर पुरुषार्थ करती है, तो आध्यात्मिक अध्ययन केवल सुनने तक सीमित न रहकर जीवन में धारणा और अभ्यास का माध्यम बन सकता है।
Disclaimer: यह वीडियो 26-09-2026 की प्रातः-मुरली एवं उसमें दिए गए ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर आधारित अध्ययन, चिंतन और समझ के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
वीडियो में प्रस्तुत राजयोग, आत्मा, सुखधाम, वर्सा, सतोप्रधान-तमोप्रधान अवस्था, संगदोष, चार्ट तथा अन्य आध्यात्मिक अवधारणाएँ मुरली की शिक्षाओं के संदर्भ में समझाई गई हैं। इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों या किसी चिकित्सा, कानूनी अथवा पेशेवर सलाह के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
दर्शक इन विषयों को अपनी आध्यात्मिक समझ, अध्ययन और व्यक्तिगत चिंतन के संदर्भ में ग्रहण करें। अलग-अलग आध्यात्मिक परम्पराओं में इन विषयों की व्याख्या अलग हो सकती है।
प्रश्न 1: कौन-सी स्मृति पुरानी दुनिया से सहज ही किनारा करा देती है?
उत्तर: यह स्मृति कि हम कल्प-कल्प बाप से बेहद का वर्सा लेते हैं। अभी फिर से शिवबाबा की गोद ली है वर्सा लेने के लिए। बाबा ने हमें एडाप्ट किया है, हम सच्चे ब्राह्मण बने हैं और शिवबाबा हमें गीता सुना रहे हैं।
प्रश्न 2: बैठते समय बुद्धि में कौन-सा नशा और खुशी रहनी चाहिए?
उत्तर: बुद्धि में यह खुशी और नशा रहना चाहिए कि हम सुखधाम के मालिक बन रहे हैं और कल्प-कल्प बाप से सुख और शान्ति का वर्सा लेते हैं।
प्रश्न 3: बाप की मुख्य महिमा क्या है?
उत्तर: बाप, टीचर और सतगुरू के रूप में शिवबाबा आत्माओं को ज्ञान देते हैं और पतितों को पावन बनाकर सुख और शान्ति का वर्सा देते हैं।
प्रश्न 4: सतयुग को किस रूप में याद किया जाता है?
उत्तर: सतयुग को सुखधाम कहा जाता है। वहाँ दैवी सम्प्रदाय के राज्य का वर्णन किया गया है, जहाँ आत्माएँ सुखी और पावन अवस्था में रहती हैं।
प्रश्न 5: बाप से पूरा वर्सा लेने के लिए क्या पुरुषार्थ करना है?
उत्तर: राजयोग का अभ्यास करते हुए बाप की याद में रहना है, श्रीमत पर चलना है और अपनी अवस्था को श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ करना है।
प्रश्न 6: रावणराज्य और नई सृष्टि के परिवर्तन का क्या आध्यात्मिक वर्णन किया गया है?
उत्तर: रावणराज्य के अन्त और नई सृष्टि की स्थापना का वर्णन ज्ञान यज्ञ तथा विनाश ज्वाला के संदर्भ में किया गया है। आत्माओं को विजय और स्वराज्य की स्मृति दिलाई जाती है।
प्रश्न 7: श्रीमत पर चलने से क्या प्राप्ति बताई गई है?
उत्तर: श्रीमत पर चलकर श्रेष्ठाचारी बनना, सतयुगी स्वराज्य प्राप्त करना और डबल सिरताज बनने की दिशा में पुरुषार्थ करना बताया गया है।
प्रश्न 8: बाहर जाने पर विद्यार्थियों को किस बात की सम्भाल रखनी चाहिए?
उत्तर: बाहर जाने पर पढ़ाई और बाप की याद की स्मृति गुम नहीं होनी चाहिए। संगदोष से स्वयं को सम्भालना चाहिए और अपनी बुद्धि को व्यर्थ प्रभावों से बचाना चाहिए।
प्रश्न 9: अपना चार्ट रखने का क्या लाभ है?
उत्तर: अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखने से अपनी अवस्था का निरीक्षण होता रहता है और यह पता चलता है कि बाप की याद में कितना समय रहा। इससे अवस्था को अच्छी बनाने का पुरुषार्थ होता है।
प्रश्न 10: बाप की याद के अभ्यास के लिए क्या करना है?
उत्तर: निरन्तर बाप को याद करने का अभ्यास करना है और धीरे-धीरे याद की अवस्था को बढ़ाने का पुरुषार्थ करना है। मुरली में 8 घंटे याद की दिशा में पहुँचने का उल्लेख है।
प्रश्न 11: सेवा करते समय किन बातों से बचना चाहिए?
उत्तर: सेवा में विघ्न नहीं डालना चाहिए और देह-अभिमान तथा अहंकार से बचना चाहिए। सेवा का उद्देश्य आत्माओं का कल्याण करना है।
प्रश्न 12: सेवा के कौन-कौन से साधन बताए गए हैं?
उत्तर: प्रदर्शनी, चित्रों के माध्यम से ज्ञान देना और बच्चों को सिखाना आदि सेवा के साधन बताए गए हैं।
प्रश्न 13: राजयोग से क्या बनने की शिक्षा दी गई है?
उत्तर: राजयोग के अभ्यास से नर से नारायण और साधारण जीवन से श्रेष्ठ, दैवी जीवन की ओर बढ़ने की शिक्षा दी गई है।
प्रश्न 14: बाप समान बनने के लिए कौन-सी धारणा करनी है?
उत्तर: बाप समान रहमदिल बनना है तथा दु:ख हर्ता और सुख कर्ता बनने की धारणा करनी है।
प्रश्न 15: संगदोष से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: स्वयं की सम्भाल रखनी चाहिए, एक बाप को फॉलो करना चाहिए, अनेक आत्माओं के कल्याण की सेवा करनी चाहिए और सेवा में अहंकार नहीं आने देना चाहिए।
प्रश्न 16: अन्तर्मुखी बनने का क्या लाभ बताया गया है?
उत्तर: अन्तर्मुखी बनने से समय और संकल्पों की बचत होती है। मनन शक्ति बढ़ती है और बाहरी वातावरण के प्रभाव से स्वयं को बचाते हुए हर्षितमुख और आकर्षणमूर्त रहने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 17: “बीमारी से घबराओ नहीं…” स्लोगन का भाव क्या है?
उत्तर: बीमारी या किसी परिस्थिति से घबराने के बजाय उसे दवाई रूपी फ्रूट देकर विदाई देने की भावना रखनी है।
प्रश्न 18: अव्यक्त इशारे में लेने के विषय में क्या शिक्षा दी गई है?
उत्तर: किसी आत्मा से कुछ लेने की इच्छा नहीं रखनी है। केवल एक बाप से लेना है और जो प्राप्त किया है उसे दूसरों को देना है।
प्रश्न 19: अल्पकालिक प्राप्ति की इच्छा का क्या प्रभाव बताया गया है?
उत्तर: लेने की इच्छा अल्पकालिक प्राप्ति तक सीमित रहती है और ऐसी इच्छा आत्मा को अपने स्वमान से गिरा सकती है। इसके बजाय बाप से सदाकाल की प्राप्ति लेने पर ध्यान देना है।
प्रश्न 20: आज की मुख्य धारणा क्या हो सकती है?
उत्तर: अपना सच्चा चार्ट रखना, बाप की याद में रहना, संगदोष से बचना, अहंकार से दूर रहना, सेवा द्वारा आत्माओं का कल्याण करना और अन्तर्मुखी बनकर अपने समय-संकल्पों की बचत करना।
मुरली का मुख्य संदेश:
“अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखो तो अवस्था अच्छी रहेगी, चार्ट रखने से कल्याण होता रहेगा।”
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