(26)Karma Bhagya and Soul Consciousness, Purushartha and the cycle of the soul

AAT.(26)कर्म भाग्य और सोल कॉन्शियस पुरुषार्थ और आत्मा का चक्र

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

YouTube player

आत्मा का रहस्य

कर्म
भाग्य
और सोल कॉन्शियस

पुरुषार्थ
और आत्मा का चक्र

आत्मा
कर्मातीत होती है केवल परमधाम में।

और जब आत्मा इस संसार में आती है, इस कर्म-क्षेत्र पर आती है,
तो उसे कर्म करना ही करना है।

जब वह आत्म-स्मृति में कर्म करती है और जब आत्म-विस्मृति में कर्म करती है।
कर्म तो करना ही है — चाहे स्मृति में करे, चाहे विस्मृति में करे।

जो कर्म कर दिया, बीज बोया गया —
वह भविष्य में मिलेगा, उससे भाग्य बनता है।

और सोल कॉन्शियसनेस —
आत्म चेतना, आत्मिक स्मृति की स्थिति —
अर्थात आत्म-स्मृति की अवस्था।

पुरुषार्थ —
पुरुषार्थ का फल है प्रालब्ध।
पुरुषार्थ और प्रालब्ध —
यह आत्मा का एक चक्र है,
और यह चक्र अनादि काल से चल रहा है, चलता रहेगा।

पुरुषार्थ और परिणाम —
परिणाम को प्रालब्ध भी कह सकते हैं और परिणाम भी।
इनका परस्पर संबंध क्या है?
पुरुषार्थ और उसके परिणाम का क्या संबंध है?

कर्म और फल का क्या नियम है?

एक उदाहरण:
किसी ने सारा साल मेहनत की, पर परीक्षा के समय बीमार हो गया और फेल हो गया।
क्या उसका पुरुषार्थ व्यर्थ हो गया?

दूसरा उदाहरण:
एक बच्चे ने कभी पढ़ाई नहीं की, न स्कूल गया, न किताब खोली।
पैसे दिए और सर्टिफिकेट ले लिया।
उसका पुरुषार्थ क्या हुआ?
क्या उसे भी परिणाम मिला?

दोनों परिणाम कैसे हैं?
दोनों सही हैं या गलत?

क्या यहाँ पुरुषार्थ और परिणाम का नियम लागू हुआ या नहीं?
क्या कर्म-फल का नियम लागू हुआ?

भाई जी कहते हैं — जो पैसे देकर पास हुआ, वह प्रैक्टिकल में फेल हो जाएगा।
सही बात।
पर समझने वाली बात है—
दोनों ने पुरुषार्थ किया, दोनों को परिणाम मिला, लेकिन अलग-अलग परिणाम।

एकने पढ़ाई नहीं की, फिर भी पास हो गया।
क्यों?
क्योंकि उसके पिछले कर्म का फल अब सामने आया।
दूसरे ने मेहनत की, पर किसी पिछले कर्म के कारण परीक्षा नहीं दे पाया।
यह भी उसका कर्म-फल है।

एक ड्राइंग टीचर का उदाहरण:
छोटा भाई, जिसने कोर्स किया था, मर गया।
बड़ा भाई उसकी सर्टिफिकेट से नौकरी करता रहा, 70 तक सेवा करता रहा।
कोर्स उसने नहीं किया था—पर नौकरी का लाभ उसने पाया।
यह किसका फल था?
किसी पिछले कर्म का।

इसी प्रकार —
जिसने मेहनत की और फेल हुआ,
शायद उसका पार्ट दोबारा पढ़ने का हो,
या किसी और कर्म का फल अभी सामने आया हो।

यह सारा संबंध आत्मा के जीवन-काल से है, शरीर के जीवन-काल से नहीं।

आत्मा का जीवन-काल शुरू होता है परमधाम से निकलकर धरती पर आने से,
और पूरा होता है वापस परमधाम जाने पर।

शरीर का जीवन-काल अलग है—
आत्मा शरीर में प्रवेश करती है, पार्ट बजाती है, फिर शरीर छोड़ देती है।

आत्मा अनेक जन्म लेती रहती है—
84 तक, या अपने रोल अनुसार जितने हों।

पुरुषार्थ और कर्म-फल आत्मा के जीवन-काल से जुड़े हैं, शरीर से नहीं।

कभी कर्म का फल तुरंत मिलता है,
कभी देर से,
कभी बहुत काल बाद।

इसलिए —
जिसने पढ़ाई नहीं की, फिर भी पास हुआ—
वह उसके किसी पूर्व जन्म या पूर्व कर्म का फल है।

जिसने मेहनत की लेकिन फेल हुआ—
उसका भी कोई कुछ समय पूर्व किया हुआ कर्म अब प्रकट हुआ है।

आत्मा ने जो कर्म किया है —
उसका फल उसे अवश्य मिलेगा।
कब मिलेगा — यह ड्रामा में निश्चय है।

कर्म, भाग्य और पुरुषार्थ का गहरा संबंध है।
पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता।
परिणाम तुरंत न दिखे,
पर फल निश्चित है।

प्रयास हमेशा फल देता है —
चाहे वह आज दिखे या समय आने पर।