विश्व नाटक :-(26)ईश्वर ने जगत क्यों बनाया?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“यह संसार का नाटक कैसे बना? 26वा विषय है —
ईश्वर ने जगत क्यों बनाया?
ईश्वर ने जगत क्यों बनाया?
[संगीत]
सृष्टि का उद्देश्य क्या था?
क्या सोच के भगवान ने संसार बनाया?
क्या सोचा होगा भगवान ने?
क्यों संसार बना दिया?
भगवान को क्या सूझी?
आराम से पड़ा रहता…
और जैसे पड़ा रहता है 4900 साल तक, 100 साल और भी गुज़ार लेता।
खुद भी आराम से रहता और हमें भी आराम से रखता—नहीं!
बाबा खुद ही कह रहा है कि ये ड्रामा संसार मेरा पार्ट यही है।
यदि ईश्वर निर्माता है तो उद्देश्य क्या था उसका?
उसने क्यों बनाया यह संसार?
जब-जब भी हम किसी वस्तु को देखते हैं—कुर्सी, घड़ी, कार, मोबाइल—उनके पीछे एक उद्देश्य होता है।
कुर्सी क्यों बनाई? बैठने के लिए।
घड़ी क्यों बनाई? समय देखने के लिए।
मोबाइल क्यों बनाया? काम करने के लिए।
हो सकता है परमात्मा भी खेल देखने के लिए भेजा हो?
हम पूछ रहे हैं, जवाब देवे हमें।
अब हमारा तो सवाल है—क्यों बनाया तूने?
तेरे मन में क्या समाई? (गाने की लाइन)
क्यों, काहे को ये दुनिया बनाई?
हाँ जी, बाबा ने हम लोगों को ख़ुशी देने के लिए बनाया है जगत।
आप भी तो बने हो—आपको क्यों बनाया? यही प्रश्न है।
कुर्सी बनी है तो किसी मकसद से बनी है।
फिर आपको किसलिए बनाया भगवान ने?
क्या ज़रूरत पड़ी थी आपको बनाने की?
हाँ जी — बनाया नहीं बाबा ने, हम स्वयंभू हैं।
ये अलग दुनिया में रहते… हम अपना प्रश्न कर रहे हैं, जवाब दो उसका।
हम हैं तभी तो प्रकृति का आनंद लेंगे, संसार का…
इसलिए प्रश्न उठता है:
यदि ईश्वर ने जगत बनाया है, तो किस उद्देश्य से बनाया?
सीधी बात—या तो कह दो ईश्वर ने नहीं बनाया।
और यदि बनाया है तो क्यों बनाया? हमारा प्रश्न उससे होगा।
ईश्वर ने नहीं बनाया?
तो बता दो—फिर किसने बनाया?
हम उसी से पूछेंगे—क्यों बनाया तूने?
किसी ने नहीं बनाया—अगर बनाते तो उसकी तारीख देनी पड़ती।
यहीं से तर्क, विज्ञान और आध्यात्मिकता—तीनों गहन विश्लेषण मांगते हैं।
यदि ईश्वर ने उद्देश्य सहित जगत बनाया है—
तो वो पूर्ण (Perfect God) नहीं है।
क्योंकि उद्देश्य तब होता है जब कोई चीज़ अधूरी हो।
यदि ईश्वर को कोई लक्ष्य पूरा करना है—तो वह स्वयं पूर्ण नहीं।
पूर्ण ईश्वर को किसी लक्ष्य की आवश्यकता क्यों पड़ी?
यदि परमात्मा पूर्ण है—तो उसे कोई इच्छा नहीं हो सकती।
यदि परमात्मा ने संसार बनाया—तो वह अधूरा हुआ।
इसलिए उद्देश्यपूर्ण सृष्टि और पूर्ण ईश्वर—दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं।
यदि कहा जाए—ईश्वर ने बिना उद्देश्य के सृष्टि की—
तो यह ईश्वर का अपमान है।
फिर तो ईश्वर व्यर्थ के काम करने वाला हुआ!
बिना उद्देश्य का कार्य या तो अज्ञान होता है
या बालक जैसी मानसिकता।
और ईश्वर ना अज्ञानी है ना बालक।
यदि ईश्वर को कोई स्वार्थ नहीं—तो जगत बनाने के झंझट में क्यों पड़ा?
ईश्वर निश्चिंत, पूर्ण और निस्वार्थ है।
तो फिर सृष्टि रचने की जिम्मेदारी क्यों ली?
क्या पहले दुखी था?
क्या उसे मनोरंजन की आवश्यकता थी?
कुछ लोग कहते हैं—ईश्वर ने विनोद लीला के लिए जगत बनाया।
लेकिन मनोरंजन या तो लक्ष्यहीन बालक करता है
या कोई अधूरा व्यक्ति।
क्या परमात्मा को मनोरंजन चाहिए?
यदि सृष्टि दया से बनाई—तो जगत दयालु क्यों नहीं?
इतना कष्ट क्यों?
इतनी हिंसा, बीमारी, मृत्यु, त्रासदी क्यों?
क्या एक प्रेममय ईश्वर ऐसी दुनिया बनाएगा?
इसलिए यह जगत ईश्वर की रचना नहीं—
यह जीवों के कर्मों का परिणाम है।
बीके ज्ञान अनुसार—
ईश्वर ने जगत नहीं बनाया। व्यवस्था बनाई है। जगत नहीं।
साकार मुरली 28 मई 2024:
“बाप सृष्टि का निर्माण नहीं करते।
सृष्टि अनादि है।
बाप केवल नई सृष्टि का क्रम स्थापित करते हैं।”
अव्यक्त मुरली 21 फरवरी 1985:
“शिव बाबा कोई वस्तु नहीं बनाते।
बाप आने का कारण है—पुरानी दुनिया को नया बनाना।”
प्रकृति अनादि है।
बाप केवल 12 कलाएं पूरी कर पुनः सतयुग का राज्य स्थापित करते हैं।
पहले भी सतयुग था, फिर पुराना हुआ, फिर बाबा आकर उसे नया बनाते हैं।

