3-1: Is every soul responsible for its own actions?

J.D.BK ज्ञान 3-1 क्या हर आत्मा अपने कर्मों की जिम्मेदार है?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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“जैन दर्शन

और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान

 

के तीसरे दिन का पहला पाठ

 

आज का विषय है —

क्या हर आत्मा अपने कर्मों की जिम्मेदार है?

 

आज हम तीसरे दिन के कोर्स में कर्मों के बारे में जानेंगे कि जैन दर्शन कर्म का अर्थ किस प्रकार से व्याख्या करता है और ब्रह्मा कुमारीज कर्मों की गति को किस प्रकार से समझाती है।

 

तो क्या हर आत्मा अपने कर्मों की जिम्मेदार है?

 

डिस्क्लेमर

 

यह प्रवचन ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा सिखाए गए आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है, जो श्रीमद्भागवत गीता एवं साकार व अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन से प्रस्तुत किया गया है।

इसका उद्देश्य किसी भी धर्म ग्रंथ या मान्यता का खंडन करना नहीं, बल्कि कर्म के नियम को आध्यात्मिक दृष्टि से स्पष्ट करना है।

 

यह ज्ञान आध्यात्मिक शांति, आत्म-उन्नति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए है।

 

क्या हर आत्मा अपने कर्मों की जिम्मेदार है —

इस विषय पर आज हम चर्चा या मंथन करेंगे।

 

भाग्य, कर्म और ईश्वर की भूमिका का सच्चा रहस्य

एक भाग्य

दूसरा कर्म

तीसरा ईश्वर

 

क्या संबंध है इनका?

भाग्य कैसे लिखा जाता है?

कर्म कैसे बनते हैं?

ईश्वर क्या करता है?

 

जीवन का सबसे सामान्य लेकिन सबसे गहरा प्रश्न —

हर इंसान कभी न कभी यह प्रश्न करता है —

मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?

मैंने तो किसी का बुरा नहीं किया, फिर दुख क्यों?

क्या यह सब भाग्य है?

क्या ईश्वर किसी को दंड देता है?

 

इन सभी प्रश्नों की जड़ में एक ही विषय है —

कर्म की जिम्मेदारी।

 

कर्म करने के लिए हर आत्मा स्वतंत्र है,

परंतु कर्म का फल भोगने के लिए हर आत्मा परतंत्र।

 

साकार मुरली 12 अक्टूबर 1966

बाबा कहते हैं —

जब तक कर्म का हिसाब स्पष्ट नहीं होगा, मनुष्य ईश्वर को दोष देता रहेगा।

 

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कर्म कौन करता है?

 

साकार मुरली 18 जनवरी 1965

बाबा कहते हैं —

तुम आत्मा हो।

यह शरीर तुम्हारा रथ है।

 

आत्मा की भूमिका

 

आत्मा सोचती है

आत्मा निर्णय करती है

आत्मा कर्म कराती है

 

आत्मा की तीन सूक्ष्म शक्तियाँ हैं —

मन, बुद्धि, संस्कार

 

मन का काम है सोचना

बुद्धि का काम है निर्णय करना

संस्कार कर्मों का रिकॉर्ड बनते हैं

 

जैसे एटम के अंदर इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन होते हैं,

वैसे आत्मा के अंदर मन, बुद्धि और संस्कार होते हैं।

 

आत्मा ऑपरेटर की तरह शरीर को चलाती है।

 

जैसे ड्राइवर गाड़ी चलाता है —

दुर्घटना के लिए गाड़ी जिम्मेदार है या ड्राइवर?

ड्राइवर।

 

वैसे ही कर्म के लिए शरीर नहीं, आत्मा जिम्मेदार है।

 

साकार मुरली 5 अगस्त 1966

बाबा कहते हैं —

आत्मा ही कर्ता है।

 

परमात्मा अकर्ता है —

वह ज्ञान देते हैं,

कर्म आत्मा ही करती है।

 

कर्म क्या है?

 

कर्म केवल शारीरिक क्रिया नहीं है।

 

कर्म के तीन स्तर हैं —

 

विचार

 

वाणी

 

एक्शन

 

साकार मुरली 2 नवंबर 1966

पहले विचार बनता है

फिर वाणी बनती है

फिर कर्म होता है

 

इसलिए विचार भी कर्म है।

 

साकार मुरली 23 सितंबर 1967

हर आत्मा अपने कर्मों का फल स्वयं भोगती है।

 

जैसा बीज बोओगे वैसी फसल काटोगे।

यह नियम अटल है।

 

ईश्वर की भूमिका

 

ईश्वर दंड नहीं देते।

 

साकार मुरली 10 जुलाई 1966

बाबा कहते हैं —

मैं दंड नहीं देता,

मैं कर्म का हिसाब समझाता हूँ।

 

राजयोग सिखाकर कर्म काटने की विधि बताते हैं।

 

भाग्य और कर्म का संबंध

 

आज का भाग्य कल के कर्मों से बनता है।

वर्तमान कर्म भविष्य का भाग्य बनाते हैं।

वर्तमान भाग्य भूतकाल का कर्म है।

 

जैसे खेत में कांटे बोओगे तो फूल नहीं उगेंगे।

 

कर्म के प्रकार

 

ब्रह्मा कुमारी ज्ञान के अनुसार —

 

सतो प्रधान कर्म — जिनसे स्वयं सहित सबको सुख मिले

 

रजो प्रधान कर्म — जिनसे केवल स्वयं को सुख चाहिए

 

तमो प्रधान कर्म — जिनमें दूसरों के नुकसान की भावना हो

 

जैसा कर्म वैसा फल — यह अटल नियम है।

 

क्या पिछले जन्मों के कर्म भी जिम्मेदारी हैं?

 

साकार मुरली 27 मार्च 1967

यह जन्म भी पिछले जन्मों के कर्मों का परिणाम है।

 

किसी का जन्म सुख में, किसी का दुख में —

यह ईश्वर का पक्षपात नहीं, कर्म का हिसाब है।

 

क्या कर्म कट सकते हैं?

 

सबसे शुभ समाचार यही है —

कर्म कट सकते हैं।

 

साकार मुरली 10 जुलाई 1966

योग की अग्नि से पाप कर्म भस्म होते हैं।

 

जैसे सोना अग्नि में तपकर शुद्ध होता है,

वैसे आत्मा योग से शुद्ध होती है।

 

निष्कर्ष — सच्ची स्वतंत्रता का मार्ग

 

हर आत्मा अपने कर्मों की स्वयं जिम्मेदार है।

ईश्वर न्यायाधीश नहीं, शिक्षक हैं।

कर्म का नियम अटल है।

योग से कर्म कट सकते हैं।

 

साकार मुरली 30 मार्च 1968

पहले कर्म का हिसाब समझो,

फिर जीवन सरल हो जाएगा।

 

समापन

 

जब आत्मा यह स्वीकार कर ले —

“मैं अपने कर्मों की जिम्मेदार हूँ”

 

तो शिकायत समाप्त होती है

दोष समाप्त होता है

और शांति आरंभ होती है।

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