J.D.BK ज्ञान 3-4 राजयोग और सच्चा सिमरन कैसे आत्मा को पाप कर्मों से मुक्त करता है।
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
जैन दर्शन और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान
तीसरा दिन – चौथा पाठ
कर्मों की गति में विषय : राजयोग और सच्चा सिमरन कैसे आत्मा को पाप कर्मों से मुक्त करता है
भूमिका : पाप विनाश का वास्तविक आध्यात्मिक विज्ञान
हर आत्मा के भीतर एक मौन प्रश्न है —
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मन अशांत क्यों है?
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जानते हुए भी गलतियाँ क्यों हो जाती हैं?
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बार-बार वही पाप कर्म क्यों दोहराए जाते हैं?
क्योंकि आत्मा पर जन्म-जन्मांतर के पाप कर्मों का बोझ जमा है।
और तभी यह प्रश्न उठता है —
क्या कोई ऐसा दिव्य मार्ग है जिससे आत्मा पाप कर्मों से मुक्त हो सके?
पाप कर्म क्या है?
आमतौर पर लोग पाप को अपराध समझ लेते हैं।
लेकिन अपराध और पाप कर्म में अंतर है।
अपराध — जो कानून से जुड़ा है
पाप कर्म — जो आत्मा को भारी बनाता है
साकार मुरली – 9 दिसंबर 1966
“जो कर्म आत्मा को भारी बनाते हैं, वही पाप कर्म कहलाते हैं।”
पाप कर्म वह है —
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जिससे किसी आत्मा, जीव-जंतु, पशु-पक्षी को दुख पहुँचे
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जिससे आत्मा की शांति नष्ट हो
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जिससे आत्मा की शक्ति क्षीण हो
उदाहरण:
जैसे मोबाइल में वायरस आ जाए तो वह दिखाई नहीं देता,
लेकिन सिस्टम को स्लो कर देता है —
वैसे ही पाप कर्म आत्मा को भीतर से कमजोर कर देते हैं।
पाप कर्म आत्मा से कैसे जुड़ते हैं?
कर्म आत्मा करती है।
शरीर बिना आत्मा कुछ नहीं कर सकता।
कर्म बनने की प्रक्रिया:
संकल्प → भावना → कर्म → संस्कार
बार-बार के गलत संकल्प स्थायी पाप संस्कार बन जाते हैं।
क्या सजा भोगने से पाप कट जाते हैं?
अक्सर लोग सोचते हैं —
“हमने दुख भोग लिया, अब पाप कट गया।”
साकार मुरली – 23 सितंबर 1967
“भोगने से कर्म का हिसाब पूरा होता है, लेकिन आत्मा शुद्ध नहीं बनती।”
भोगना शुद्धि नहीं है।
शुद्धि केवल योग से होती है।
तपस्या, दान-पुण्य के बाद भी शांति क्यों नहीं?
बहुत लोग व्रत रखते हैं, दान करते हैं, तपस्या करते हैं —
फिर भी मन अशांत रहता है।
साकार मुरली – 10 जुलाई 1966
“तप से कर्म दबते हैं, कटते नहीं।”
क्योंकि पाप आत्मा से जुड़े हैं
और दुनिया के उपाय शरीर आधारित हैं।
निर्णायक सत्य — राजयोग
साकार मुरली का महावाक्य:
“मुझे याद करो — मामेकं याद करो — तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे।”
राजयोग क्या है?
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आत्मा और परमात्मा का सीधा संबंध
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देह-अभिमान से ऊपर उठना
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परमात्मा को पिता के रूप में याद करना
राजयोग एक दिव्य अग्नि है
जिससे पाप भस्म होते हैं।
सच्चा सिमरन क्या है?
सिमरन केवल नाम जप नहीं है।
सच्चा सिमरन है —
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भावपूर्वक बाप को याद करना
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उनके निर्देश अनुसार जीवन जीना
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निरंतर स्मृति में रहना
सच्चे सिमरन की पहचान:
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आत्म-अभिमानी स्थिति
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प्रेम और विश्वास
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निरंतरता
उदाहरण:
जैसे माँ अपने बच्चे को भाव से याद करती है,
वैसे आत्मा अपने बाप को याद करती है।
राजयोग पाप कर्म कैसे नष्ट करता है?
योग की अग्नि से पाप कर्म भस्म होते हैं।
उदाहरण:
जैसे लोहे को आग में डालने से वह जलता नहीं
लेकिन उसकी मैल निकल जाती है —
वैसे ही परमात्मा के स्मरण से आत्मा की मैल जल जाती है।
क्योंकि परमात्मा ही पतित-पावन है।
कितना समय लगता है?
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जितना योग, उतना पाप विनाश
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जितनी निरंतर स्मृति, उतनी शुद्धि
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प्रेमपूर्ण योग और पवित्र जीवन आवश्यक है
राजयोग के दिव्य परिणाम
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मन हल्का हो जाता है
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डर समाप्त हो जाता है
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दोषभाव खत्म हो जाता है
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चेहरे पर शांति आ जाती है
अव्यक्त मुरली – 15 फरवरी 1973
“योगी आत्मा के चेहरे से शांति स्वतः दिखाई देती है।”
निष्कर्ष
पाप मुक्ति का एकमात्र मार्ग है —
राजयोग और सच्चा स्मरण
योग के बिना कर्म नष्ट नहीं हो सकते।
जब आत्मा यह समझ ले —
मेरा उद्धार मेरे और मेरे बाप के संबंध में है,
तभी पाप की जड़ कटती है
और आत्मा सच्ची शांति का अनुभव करती है।
प्रश्न 1: मन अशांत क्यों रहता है जबकि हम सही-गलत को जानते हैं?
उत्तर:
क्योंकि आत्मा पर जन्म-जन्मांतर के पाप कर्मों का बोझ जमा है।
यह बोझ ही मन को अशांत, कमजोर और अस्थिर बना देता है।
प्रश्न 2: पाप कर्म वास्तव में क्या है?
उत्तर:
पाप कर्म वह है जो आत्मा को भारी बना दे।
जो किसी आत्मा को दुख पहुँचाए, शांति नष्ट करे और आत्मिक शक्ति को कमजोर कर दे — वही पाप कर्म है।
साकार मुरली (9 दिसंबर 1966):
“जो कर्म आत्मा को भारी बनाते हैं, वही पाप कर्म कहलाते हैं।”
प्रश्न 3: क्या अपराध और पाप कर्म एक ही हैं?
उत्तर:
नहीं।
अपराध कानून से जुड़ा होता है,
जबकि पाप कर्म आत्मा की स्थिति से जुड़ा होता है।
प्रश्न 4: पाप कर्म आत्मा से कैसे जुड़ते हैं?
उत्तर:
कर्म आत्मा करती है, शरीर केवल साधन है।
कर्म बनने की प्रक्रिया:
संकल्प → भावना → कर्म → संस्कार
बार-बार के गलत संकल्प स्थायी पाप संस्कार बन जाते हैं।
प्रश्न 5: क्या सजा भोगने से पाप कट जाते हैं?
उत्तर:
नहीं।
सजा भोगने से कर्म का हिसाब पूरा होता है, लेकिन आत्मा शुद्ध नहीं बनती।
साकार मुरली (23 सितंबर 1967):
“भोगने से कर्म का हिसाब पूरा होता है, लेकिन आत्मा शुद्ध नहीं बनती।”
प्रश्न 6: तपस्या, व्रत और दान करने के बाद भी मन अशांत क्यों रहता है?
उत्तर:
क्योंकि तप से कर्म दबते हैं, कटते नहीं।
साकार मुरली (10 जुलाई 1966):
“तप से कर्म दबते हैं, कटते नहीं।”
दुनिया के उपाय शरीर आधारित हैं,
जबकि पाप आत्मा से जुड़े हैं।
प्रश्न 7: पाप विनाश का वास्तविक मार्ग क्या है?
उत्तर:
राजयोग।
साकार मुरली का महावाक्य:
“मुझे याद करो — मामेकं याद करो — तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे।”
प्रश्न 8: राजयोग क्या है?
उत्तर:
राजयोग आत्मा और परमात्मा का सीधा संबंध है।
राजयोग का अर्थ है:
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देह-अभिमान से ऊपर उठना
-
परमात्मा को पिता के रूप में याद करना
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आत्मिक स्थिति में स्थित होना
राजयोग एक दिव्य अग्नि है जिससे पाप भस्म होते हैं।
प्रश्न 9: सच्चा सिमरन क्या है?
उत्तर:
सच्चा सिमरन केवल नाम जप नहीं है।
सच्चा सिमरन है —
-
भावपूर्वक बाप को याद करना
-
उनके निर्देश अनुसार जीवन जीना
-
निरंतर स्मृति में रहना
प्रश्न 10: सच्चे सिमरन की पहचान क्या है?
उत्तर:
-
आत्म-अभिमानी स्थिति
-
प्रेम और विश्वास
-
निरंतर स्मृति
जैसे माँ अपने बच्चे को भाव से याद करती है,
वैसे आत्मा अपने परमपिता को याद करती है।
प्रश्न 11: राजयोग पाप कर्म कैसे नष्ट करता है?
उत्तर:
योग की अग्नि से पाप कर्म भस्म होते हैं।
जैसे आग में डाले गए लोहे की मैल जल जाती है,
वैसे ही परमात्मा के स्मरण से आत्मा की मैल नष्ट हो जाती है।
प्रश्न 12: पाप विनाश में कितना समय लगता है?
उत्तर:
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जितना योग, उतना पाप विनाश
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जितनी स्मृति, उतनी शुद्धि
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प्रेमपूर्ण योग और पवित्र जीवन आवश्यक है
प्रश्न 13: राजयोग के क्या दिव्य परिणाम होते हैं?
उत्तर:
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मन हल्का हो जाता है
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डर समाप्त हो जाता है
-
दोषभाव खत्म हो जाता है
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चेहरे पर शांति आ जाती है
अव्यक्त मुरली (15 फरवरी 1973):
“योगी आत्मा के चेहरे से शांति स्वतः दिखाई देती है।”
निष्कर्ष प्रश्न
प्रश्न 14: पाप मुक्ति का एकमात्र सच्चा मार्ग क्या है?
उत्तर:
राजयोग और सच्चा सिमरन।
योग के बिना कर्म नष्ट नहीं होते।
जब आत्मा समझ ले कि
मेरा उद्धार मेरे और मेरे बाप के संबंध में है,
तभी पाप की जड़ कटती है
और आत्मा सच्ची शांति का अनुभव करती है।
डिस्क्लेमर:
यह प्रवचन ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा सिखाए गए आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है,
जो श्रीमद्भगवद्गीता एवं साकार व अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन से प्रस्तुत किया गया है।
इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, साधना या मान्यता का खंडन करना नहीं है,
बल्कि राजयोग और ईश्वर स्मरण द्वारा आध्यात्मिक शुद्धि के सिद्धांत को स्पष्ट करना है।
यह ज्ञान आत्मिक शांति, आत्म उन्नति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए है।

