(43)03-12-1984 “Become the best student of the Almighty Teacher”

अव्यक्त मुरली-(43)03-12-1984 “सर्व समर्थ शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो”

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03-12-1984 “सर्व समर्थ शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो”

आज सर्व शक्तिवान बाप अपने चारों ओर की शक्ति सेना को देख रहे हैं। कौन-कौन सदा सर्व शक्तियों के शस्त्रधारी महावीर विजयी विशेष आत्मायें हैं। कौन-कौन सदा नहीं लेकिन समय पर समय प्रमाण शस्त्रधारी बनते हैं। कौन-कौन समय पर शस्त्रधारी बनने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए कब वार कर सकते, कब हार खा लेते। कब वार कब हार के चक्र में चलते रहते हैं। ऐसे तीनों प्रकार की सेना के अधिकारी बच्चे देखे। लेकिन विजयी श्रेष्ठ आत्मायें सदा पहले से ही एवररेडी रहती हैं। समय प्रमाण शस्त्रधारी बनने में समय शिक्षक बन जाता है। समय रूपी शिक्षक के आधार पर चलने वाले सर्व शक्तिवान शिक्षक की शिक्षा से एवररेडी न बनने के कारण कभी समय पर धोखा भी खा लेते हैं। धोखा खाने से स्मृति के होश में आते हैं। इसलिए सर्वशक्तिवान शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो। समय रूपी शिक्षक के शिक्षाधारी नहीं।

कई बच्चे बापदादा से रूह-रूहान करते वा आपस में भी रूह-रूहान करते, साधारण रूप से यह बोलते रहते कि समय आने पर सब ठीक हो जायेगा। समय पर दिखा देंगे वा समय पर कर लेंगे। लेकिन आप विश्व परिवर्तक बच्चों को सम्पन्न श्रेष्ठ समय का आह्वान करने का कार्य मिला हुआ है। आप निमित्त हो सुनहरे सवेरे का समय लाने लिए। आप समय रूपी रचना के मास्टर रचता, समय अर्थात् युग परिवर्तक हो। डबल काल पर विजयी हो। एक काल अर्थात् ‘समय’। दूसरा काल ‘मृत्यु’ के वशीभूत नहीं हो। विजयी हो। अमर भव के वरदानी स्वरूप हो। इसलिए समय प्रमाण करने वाले नहीं लेकिन बाप के फरमान प्रमाण चलने वाले। समय तो अज्ञानी आत्माओं का भी शिक्षक बनता है। आपका शिक्षक समर्थ बाप है। कोई भी तैयारी समय के पहले की जाती है न कि उस समय। एवररेडी सर्व शस्त्र शक्तिधारी सेना के हो। तो सदा अपने को चेक करो कि सर्व शक्तियों के शस्त्र धारण किये हुए हैं? कोई भी शक्ति अर्थात् शस्त्र की कमी होगी तो माया उसी कमजोरी के विधि द्वारा ही वार करेगी। इसलिए इसमें भी अलबेले नहीं बनना और सब तो ठीक है, थोड़ी सी सिर्फ एक बात में कमजोरी है, लेकिन एक कमजोरी माया के वार का रास्ता बन जायेगी। जैसे बाप का बच्चों से वायदा है कि जहाँ बाप की याद है वहाँ सदा मैं साथ हूँ ऐसे माया की भी चैलेन्ज है जहाँ कमजोरी है वहाँ मैं व्यापक हूँ। इसलिए कमजोरी अंश मात्र भी माया के वंश का आह्वान कर देगी। सर्व शक्तिवान के बच्चे तो सबमें सम्पन्न होना है। बाप बच्चों को जो वर्से का अधिकार देते हैं, वा शिक्षक रूप में ईश्वरीय पढ़ाई की प्रालब्ध वा डिग्री देते हैं, वह क्या वर्णन करते हो? सर्वगुण सम्पन्न कहते हो वा गुण सम्पन्न कहते हो? सम्पूर्ण निर्विकारी, 16 कला सम्पन्न कहते हो, 14 कला नहीं कहते हो। 100 प्रतिशत सम्पूर्ण सुख शान्ति का वर्सा कहते हो। तो बनना भी ऐसा पड़ेगा या एक आधी कमजोरी चल जायेगी, ऐसे समझते हो? हिसाब किताब भी गहन है। भोलानाथ भी है लेकिन कर्मों की गति का ज्ञाता भी है। देता भी कणे का घणा करके है और हिसाब भी कणे कणे का करता है। अगर एक आधी कमजोरी रह जाती है तो प्राप्ति में भी आधा जन्म, एक जन्म पीछे आना पड़ता है। श्रीकृष्ण के साथ-साथ वा विश्व महाराजन् पहले लक्ष्मी-नारायण की रॉयल फैमिली वा समीप के सम्बन्ध में आ नहीं सकेंगे। जैसे संवत एक एक एक से शुरू होगा। ऐसे नया सम्बन्ध, नई प्रकृति, नम्बरवन नई आत्मायें, नई अर्थात् ऊपर से उतरी हुई नई आत्मायें, नया राज्य, यह नवीनता के समय का सुख, सतोप्रधान नम्बरवन प्रकृति का सुख नम्बरवन आत्मायें ही पा सकेंगी। नम्बरवन अर्थात् माया पर विन करने वाले। तो हिसाब पूरा होगा। बाप से वरदान वा वर्सा प्राप्त करने का वायदा यही किया है कि साथ रहेंगे, साथ जायेंगे और फिर वापिस ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में आयेंगे। यह वायदा नहीं किया है कि पीछे-पीछे आयेंगे। समान बनना ही है, साथ रहना है। सम्पन्नता, समानता सदा साथ के प्रालब्ध के अधिकारी बनाती है। इसलिए सम्पन्न और समान बनने का समय अलबेलेपन में गँवाकर अन्त समय होश में आये तो क्या पायेंगे!

तो आज सभी के सर्व शक्तियों के शस्त्रों की चेकिंग कर रहे थे। रिजल्ट सुनाई – तीन प्रकार के बच्चे देखे। आप सोचते हैं कि आगे चल यह अलबेलेपन के नाज़, इतना थोड़ा सा तो चल ही जायेगा, इतनी मदद तो बाप कर ही देगा, लेकिन यह नाज़ नाजुक समय पर धोखा न देवे। और बच्चे नाज़ से उल्हना न दें कि इतना तो सोचा नहीं था। इसलिए नाजुक समय सामने आता जा रहा है। भिन्न-भिन्न प्रकार की हलचल बढ़ती ही जायेगी। यह निशानियाँ हैं समय आने की। यह ड्रामा में इशारे हैं तीव्रगति से सम्पन्न बनने के। समझा!

आजकल मधुबन में तीन तरफ की नदियों का मेला है। त्रिवेणी नदी का मेला है ना! तीनों तरफ के आये हुए, लगन से पहुँचने वाले बच्चों को विशेष देख, बच्चों के स्नेह पर बाप दादा हर्षित होते हैं। मुख की भाषा नहीं जानते लेकिन स्नेह की भाषा जानते हैं। कर्नाटक वाले स्नेह की भाषा को जानने वाले हैं। और पंजाब वाले क्या जानते हैं? पंजाब वाले ललकार करने में होशियार हैं। तो दैवी राजस्थान की ललकार हाहाकार की जगह जयजयकार करने वाली है। गुजरात वाले क्या करते हैं? गुजरात वाले सदा झूले में झूलते हैं। अपने संगमयुगी समीप स्थान के भाग्य के भी झूले में झूलते। खुशी में झूलते हैं कि हम तो सबसे नजदीक हैं। तो गुजरात भिन्न-भिन्न झूलों में झूलने वाले हैं। वैराइटी ग्रुप भी है। वैराइटी सभी को पसन्द आती है। गुलदस्ते में भी वैराइटी रंग, रूप, खुशबू वाले फूल प्रिय लगते हैं। अच्छा।

सब तरफ से आये हुए सभी शक्तिशाली, सदा अलर्ट रहने वाले, सदा सर्व शक्तियों के शस्त्रधारी, सर्व आत्माओं को सम्पूर्ण सम्पन्न बन शक्तियों का सहयोग देने वाले, श्रेष्ठ काल, श्रेष्ठ युग लाने वाले, युग परिवर्तक नम्बरवन बन नम्बरवन सम्पन्न राज्य-भाग्य के अधिकारी, ऐसे सर्व श्रेष्ठ बच्चों को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।

पंजाब पार्टी से:- सदा हर कदम में याद की शक्ति द्वारा पदमों की कमाई जमा करते हुए आगे बढ़ रहे हो ना! हर कदम में पदम भरे हुए हैं – यह चेक करते रहते हो? याद का कदम भरपूर है, बिना याद के कदम भरपूर नहीं, कमाई नहीं। तो हर कदम में कमाई जमा करने वाले कमाऊ बच्चे हो ना! कमाने वाले कमाऊ बच्चे होते। एक हैं सिर्फ खाया पिया और उड़ाया और एक हैं कमाई जमा करने वाले। आप कौन से बच्चे हैं? वहाँ बच्चा कमाता है अपने लिए भी और बाप के लिए भी। यहाँ बाप को तो चाहिए नहीं। अपने लिए ही कमाते। सदा हर कदम में जमा करने वाले, कमाई करने वाले बच्चे हैं, यह चेक करो क्योंकि समय नाजुक होता जा रहा है। तो जितनी कमाई जमा होगी उतना आराम से श्रेष्ठ प्रालब्ध का अनुभव करते रहेंगे। भविष्य में तो प्राप्ति है ही। तो इस कमाई की प्राप्ति अभी संगम पर भी होगी और भविष्य में भी होगी। तो सभी कमाने वाले हो या कमाया और खाया!

जैसे बाप वैसे बच्चे। जैसे बाप सम्पन्न है, सम्पूर्ण है वैसे बच्चे भी सदा सम्पन्न रहने वाले। सभी बहादुर हो ना? डरने वाले तो नहीं हो? डरे तो नहीं? थोड़ा-सा डर की मात्रा संकल्प मात्र भी आई या नहीं? यह नथिंग न्यू है ना। कितने बार यह हुआ है, अनेक बार रिपीट हो चुका है। अभी हो रहा है इसलिए घबराने की बात नहीं। शक्तियाँ भी निर्भय हैं ना। शक्तियाँ सदा विजयी सदा निर्भय। जब बाप की छत्रछाया के नीचे रहने वाले हैं तो निर्भय ही होंगे। जब अपने को अकेला समझते हो तो भय होता। छत्रछाया के अन्दर भय नहीं होता। सदा निर्भय। शक्तियों की विजय सदा गाई हुई है। सभी विजयी शेर हो ना! शिव शक्तियों की, पाण्डवों की विजय नहीं होगी तो किसकी होगी! पाण्डव और शक्तियाँ कल्प-कल्प के विजयी हैं। बच्चों से बाप का स्नेह है ना। बाप के स्नेही बच्चों को याद में रहने वाले बच्चों को कुछ भी हो नहीं सकता। याद की कमजोरी होगी तो थोड़ा सा सेक आ भी सकता है। याद की छत्रछाया है तो कुछ भी हो नहीं सकता। बापदादा किसी न किसी साधन से बचा देते हैं। जब भक्त आत्माओं का भी सहारा है तो बच्चों का सहारा सदा ही है।

(2) सदा हिम्मत और हुल्लास के पंखों से उड़ने वाले हो ना! उमंग-उत्साह के पंख सदा स्वयं को भी उड़ाते और दूसरों को भी उड़ाने का मार्ग बताते हैं। यह दोनों ही पंख सदा ही साथ रहें। एक पंख भी ढीला होगा तो ऊंचा उड़ नहीं सकेंगे। इसलिए यह दोनों ही आवश्यक हैं। हिम्मत भी, उमंग हुल्लास भी। हिम्मत ऐसी चीज है जो असम्भव को सम्भव कर सकती है हिम्मत मुश्किल को सहज बनाने वाली है। नीचे से ऊंचा उड़ाने वाली है। तो सदा ऐसे उड़ने वाले अनुभवी आत्मायें हो ना! नीचे आने से तो देख लिया क्या प्राप्ति हुई! नीचे ही गिरते रहे लेकिन अब उड़ती कला का समय है। हाई जम्प का भी समय नहीं। सेकेण्ड में संकल्प किया और उड़ा। ऐसी शक्ति बाप द्वारा सदा मिलती रहेगी।

(3) स्वयं को सदा मास्टर ज्ञान सूर्य समझते हो? ज्ञान सूर्य का कार्य है सर्व से अज्ञान अंधेरे का नाश करना। सूर्य अपने प्रकाश से रात को दिन बना देता है, तो ऐसे मास्टर ज्ञान सूर्य विश्व से अंधकार मिटाने वाले, भटकती आत्माओं को रास्ता दिखाने वाले, रात को दिन बनाने वाले हो ना! अपना यह कार्य सदा याद रहता है? जैसे लौकिक ऑक्यूपेशन भुलाने से भी नहीं भूलता। वह तो है एक जन्म का विनाशी कार्य, विनाशी आक्यूपेशन, यह है सदा का आक्यूपेशन कि हम मास्टर ज्ञान सूर्य हैं। तो सदा अपना यह अविनाशी आक्यूपेशन या ड्यूटी समझ अंधकार मिटाकर रोशनी लानी है। इससे स्वयं से भी अंधकार समाप्त हो प्रकाश होगा। क्योंकि रोशनी देने वाला स्वयं तो प्रकाशमय हो ही जाता है। तो यह कार्य सदा याद रखो और अपने आपको रोज़ चेक करो कि मैं मास्टर ज्ञान सूर्य प्रकाशमय हूँ! जैसे आग बुझाने वाले स्वयं आग के सेक में नहीं आते, ऐसे सदा अंधकार दूर करने वाले अंधकार में स्वयं नहीं आ सकते। तो मैं मास्टर ज्ञान सूर्य हूँ, यह नशा व खुशी सदा रहे।

कुमारों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-

कुमार जीवन श्रेष्ठ जीवन है, कुमार जीवन में बाप के बन गये ऐसी अपनी श्रेष्ठ तकदीर देख सदा हर्षित रहो और औरों को भी हर्षित रहने की विधि सुनाते रहो। सबसे निर्बन्धन कुमार और कुमारियाँ हैं। कुमार जो चाहें वह अपना भाग्य बना सकते हैं। हिम्मत वाले कुमार हो ना! कमजोर कुमार तो नहीं। कितना भी कोई अपने तरफ आकर्षित करे लेकिन महावीर आत्मायें एक बाप के सिवाए कहाँ भी आकर्षित नहीं हो सकती। ऐसे बहादुर हो। कई रूप से माया अपना बनाने का प्रयत्न तो करेगी लेकिन निश्चय बुद्धि विजयी। घबराने वाले नहीं। अच्छा है। वाह मेरी श्रेष्ठ तकदीर! बस यही सदा स्मृति रखना। हमारे जैसा कोई हो नहीं सकता – यह नशा रखो। जहाँ ईश्वरीय नशा होगा वहाँ माया से परे रहेंगे। सेवा में तो सदा बिजी रहते हो ना! यह भी जरूरी है। जितना सेवा में बिजी रहेंगे उतना सहजयोगी रहेंगे लेकिन याद सहित सेवा हो तो सेफ्टी है। याद नहीं तो सेफ्टी नहीं।

(2) कुमार सदा निर्विघ्न हो ना? माया आकर्षित तो नहीं करती? कुमारों को माया अपना बनाने की कोशिश बहुत करती है। माया को कुमार बहुत पसन्द आते हैं। वह समझती है मेरे बन जायें। लेकिन आप सब तो बहादुर हो ना! माया के मुरीद नहीं, माया को चैलेन्ज करने वाले। आधा कल्प माया के मुरीद रहे, मिला क्या? सब कुछ गँवा दिया। इसलिए अभी प्रभू के बन गये। प्रभू का बनना अर्थात् स्वर्ग के अधिकार को पाना। तो सभी कुमार विजयी कुमार हैं। देखना, कच्चे नहीं होना। माया को कुमारों से एकस्ट्रा प्यार है इसलिए चारों ओर से कोशिश करती है मेरे बन जायें। लेकिन आप सबने संकल्प कर लिया। जब बाप के हो गये तो निस्फुरने (निश्चिन्त) हो गये। सदा निर्विघ्न भव, उड़ती कला भव।

(3) कुमार – सदा समर्थ। जहाँ समर्थी है वहाँ प्राप्ति है। सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप। नॉलेजफुल होने के कारण माया के भिन्न-भिन्न रूपों को जानने वाले। इसलिए अपने भाग्य को आगे बढ़ाते रहो। सदा एक ही बात पक्की करो कि कुमार जीवन अर्थात् मुक्त जीवन। जो जीवनमुक्त है वह संगमयुग की प्राप्ति युक्त होगा। सदा आगे बढ़ते रहो और बढ़ाते रहो। कुमारों को तो सदा खुशी में नाचना चाहिए – वाह कुमार जीवन! वाह भाग्य! वाह ड्रामा! वाह बाबा!… यही गीत गाते रहो। खुशी में रहो तो कमजोरी आ नहीं सकती। सेवा और याद दोनों से शक्ति भरते रहो। कुमार जीवन हल्की जीवन है। इस जीवन में अपनी तकदीर बनाना यह सबसे बड़ा भाग्य है। कितने बन्धनों में बंधने से बच गये। सदा अपने को ऐसे डबल लाइट समझते हुए उड़ती कला में चलते रहो तो आगे नम्बर ले लेंगे।

“सर्व समर्थ शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो”

03 दिसंबर 1984 – अव्यक्त मुरली से प्रेरित अध्याय



 अध्याय 1: बापदादा की शक्ति-सेना की परख

सबसे पहले बाबा अपनी “शक्ति सेना” को देख रहे हैं—
कौन बच्चे सदा शस्त्रधारी, एवररेडी और महावीर हैं?

तीन प्रकार की आत्माएँ

  1. सदा शस्त्रधारी – हर समय तैयार

  2. समय पर शस्त्र उठाने वाले – तैयार होने में समय लगता है

  3. कोशिश करने वाले – कभी वार, कभी हार

बाबा की शिक्षा:
“समय शिक्षक के आधार पर नहीं;
सर्वशक्तिमान शिक्षक की शिक्षा प्रमाण चलो।”

Murli Note (03-12-1984):

“समय रूपी शिक्षक के आधार पर चलने वाले समय पर धोखा खा लेते हैं।”

उदाहरण

जैसे परीक्षा के दिन पढ़ना शुरू करो, तो घबराहट बढ़ती है।
लेकिन जो पहले से तैयार है — वह हर स्थिति में पास।


 अध्याय 2: “समय पर ठीक हो जाएगा” — यह कमजोर संकल्प

कई बच्चे कहते हैं —
“समय आने पर दिखा देंगे… समय आने पर हो जाएगा।”

लेकिन बाबा कहते हैं—

आप समय बदलने वाले “युग-परिवर्तक” हो।

समय तुम्हारे अनुसार चलेगा, तुम समय पर नहीं।

 Murli Note (03-12-1984):

“आप समय रूपी रचना के मास्टर रचता हो। समय प्रमाण नहीं—फरमान प्रमाण चलो।”


 अध्याय 3: कमजोरी = माया का प्रवेशद्वार

बाबा चेताते हैं—
“एक भी कमजोरी माया के लिए द्वार बन जाएगी।”

दो शाश्वत चुनौतियाँ

जहाँ बाबा की याद है वहाँ मैं साथ हूँ।
जहाँ कमजोरी है वहाँ माया व्यापक है।

उदाहरण

जैसे दीवार में छोटा सा छेद भी हो—
तो चूहे अंदर घुस ही जाते हैं।


 अध्याय 4: सर्वगुण सम्पन्नता का लक्ष्य

बाबा पूछते हैं:
“जब डिग्री 16-कला सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी, 100% सुख-शांति का वर्सा है—
तो कमजोरी एक भी क्यों?”

हिसाब-किताब बहुत बारीक

कण-कण का हिसाब है—
एक कमजोरी भी जन्मों को पीछे ले जा सकती है।

उदाहरण

जैसे 100 में 99 नंबर भी कम पड़ जाएँ—
तो फर्स्ट पोज़िशन हाथ से निकल जाती है।


 अध्याय 5: तीन प्रकार की सेना — रिजल्ट

बाबा ने आज सभी बच्चों की “शस्त्र चेकिंग” की और कहा—

  1. कुछ सदा अलर्ट, एवररेडी

  2. कुछ “थोड़ा सा चल जाएगा” वाले

  3. कुछ समय पर नाज़ुक पड़ने वाले

चेतावनी

“नाजुक समय सामने आ रहा है… हलचल बढ़ेगी।
अलबेलेपन में समय मत गंवाओ।”


 अध्याय 6: त्रिवेणी संगम – स्नेह की भाषा

मधुबन में तीन दिशाओं से बच्चों का आगमन—
त्रिवेणी मेले जैसा दृश्य।

बाबा का तेज़, स्नेही निरीक्षण:

  • कर्नाटक: स्नेह की भाषा जानने वाले

  • पंजाब: ललकार वाले

  • गुजरात: खुशी के झूलों में झूलने वाले

  • राजस्थान: जय-जयकार वाले

उदाहरण

जैसे गुलदस्ते में विभिन्न फूल सुन्दर लगते हैं—
वैसे ईश्वरीय परिवार में वैराइटी भी शोभा बढ़ाती है।


 अध्याय 7: पद्मों की कमाई कैसे बढ़े?

बाबा पूछते हैं—
“हर कदम में पद्म भरते जाते हो?”

क्योंकि:

बिना याद के कदम = बिना कमाई की चाल

याद सहारा है, सेफ्टी है, सुरक्षा है।


 अध्याय 8: निर्भयता – विजयी आत्माओं की पहचान

बाबा का नशा:

  • “शिवशक्तियाँ कभी डरती नहीं।”

  • “पाण्डव और शक्तियाँ कल्प-कल्प विजयी हैं।”

  • “याद की छत्रछाया हो तो कुछ भी नहीं हो सकता।”

उदाहरण

जैसे सैनिक कमांडर की छाया में निर्भय चलता है—
वैसे ही बाबा की छत्रछाया में बच्चे।


 अध्याय 9: हिम्मत और हुल्लास — उड़ती कला के दो पंख

दो पंख जरूरी हैं:

  1. हिम्मत – असम्भव को सम्भव बनाती है

  2. उमंग-उत्साह – ऊँचाई तक ले जाती है

उदाहरण

एक पंख ढीला हो तो उड़ान कम—
दोनों मजबूत हों तो “उड़ती कला”।


 अध्याय 10: मास्टर ज्ञान-सूर्य – अपनी ड्यूटी याद

बाबा पूछते हैं—
“क्या मैं मास्टर ज्ञान सूर्य हूँ?”

आपका कार्य:

  • अज्ञान अंधकार मिटाना

  • दूसरों की रात को दिन बनाना

  • स्वयं प्रकाशमय बनना

उदाहरण

जैसे आग बुझाने वाला आग में नहीं जलता—
वैसे ज्ञान-सूर्य अंधकार में नहीं आता।


 अध्याय 11: कुमारों के लिए विशेष वरदान

कुमार = सर्वाधिक शुभ भाग्य

क्योंकि:

  • सबसे निर्बन्धन

  • भाग्य बनाने की सबसे अधिक शक्ति

  • माया आकर्षित जरूर करती है, पर महावीर कुमार विजयी होते हैं

बाबा का वरदान

“कुमार जीवन = मुक्त जीवन।
डबल लाइट बनो, उड़ती कला में चलो।”


अध्याय सार

  • समय प्रमाण नहीं—फरमान प्रमाण चलना है

  • एक कमजोरी भी माया का रास्ता बनती है

  • आप युग परिवर्तनकर्ता, मास्टर रचता हो

  • याद = सुरक्षा, कमाई, शक्ति

  • निर्भयता और उड़ती कला दो wings से सफलता

  • मास्टर ज्ञान सूर्य बनकर अंधकार मिटाना

  • कुमार जीवन = भाग्य निर्माण का श्रेष्ठ समय

  • Q1. बाबा शक्ति-सेना को देखकर तीन प्रकार की आत्माएँ क्यों बताते हैं?

    A: ताकि हर बच्चा स्वयं चेक कर सके कि वह सदा शस्त्रधारी है, या समय-समय पर शस्त्र उठाता है, या प्रयास करता हुआ कभी वार-कभी हार वाली सूची में आता है।


    Q2. सदा शस्त्रधारी आत्मा किसे कहा जाता है?

    A: जो हर परिस्थिति में एवररेडी हो, समय पर निर्भर न रहे, और माया के सामने तुरंत शक्ति का प्रयोग कर सके।


    Q3. समय पर शस्त्र उठाने वाले बच्चे कौन हैं?

    A: वे जो तैयारी पहले नहीं करते, और जब परिस्थिति आती है तब संभलते हैं—इसलिए कभी सफल, कभी असफल होते हैं।


    Q4. “समय शिक्षक पर निर्भर न रहो” — बाबा इसका क्या अर्थ बताते हैं?

    A: समय तो अज्ञानी दुनिया का शिक्षक है। ज्ञानयोगी बच्चों को सर्वशक्तिमान शिक्षक—बाप—की आज्ञा प्रमाण चलना है।


    Q5. “समय आने पर ठीक हो जाएगा” यह संकल्प कमजोरी क्यों माना गया?

    A: क्योंकि यह संकल्प बच्चे को वर्तमान प्रयास से दूर ले जाता है। युग-परिवर्तक बच्चों को समय बनाना है, समय के अनुसार चलना नहीं।


    Q6. माया आत्मा में प्रवेश कैसे करती है?

    A: एक भी कमजोरी माया के लिए द्वार बन जाती है। जहाँ कमजोरी है वहाँ माया व्यापक है।


    Q7. अगर कमजोरी बहुत छोटी भी हो तो क्या फर्क पड़ता है?

    A: बाबा कहते हैं—छोटी कमजोरी भी जन्मों की प्राप्ति को पीछे ले जा सकती है, जैसे 100 में 99 नंबर आने से प्रथम स्थान छूट जाता है।


    Q8. 16 कला सम्पन्न का लक्ष्य क्यों दिया गया है?

    A: क्योंकि बाबा का वर्सा पूर्ण और सम्पूर्ण है—सम्पूर्ण निर्विकारी, सर्वगुण सम्पन्न, 100% सुख-शांति वाला। इसलिए कमी अंश मात्र भी नहीं होनी चाहिए।


    Q9. बाबा बच्चों की “शस्त्र चेकिंग” में कौन-कौन दिखाई देते हैं?

    A:

    1. सदा अलर्ट, एवररेडी।

    2. “थोड़ा सा चल जाएगा” वाले।

    3. नाजुक समय में डगमग होने वाले।


    Q10. “नाजुक समय सामने आ रहा है” — इसका क्या संकेत है?

    A: हलचल बढ़ेगी, परिस्थितियाँ तीव्र होंगी। इसलिए अलबेलेपन में समय गंवाना नुकसानदायक होगा।


    Q11. मधुबन के त्रिवेणी मेले की बाबासे क्या सीख मिलती है?

    A: ईश्वरीय परिवार विविधता से सुशोभित होता है। हर क्षेत्र की आत्मा का अपना विशेष गुण है—कर्नाटक, पंजाब, गुजरात, राजस्थान—सब अलग, पर बाबा के संग स्नेही।


    Q12. “हर कदम में पद्म भरना” क्या अर्थ है?

    A: हर कर्म, हर कदम, याद की शक्ति से सम्पन्न हो तो वह सैकड़ों पद्मों की कमाई बन जाता है।


    Q13. बिना याद के कदम भरना क्यों व्यर्थ कहा गया?

    A: बिना याद के कर्म सिर्फ चलना है, जमा नहीं है। कमाई वही जमा होती है जिसमें योग का सहारा है।


    Q14. निर्भयता विजयी आत्माओं की पहचान क्यों है?

    A: क्योंकि याद की छत्रछाया में रहने वाला बच्चा अकेला नहीं महसूस करता। भय वहीं उत्पन्न होता है जहाँ याद कमजोर होती है।


    Q15. दो पंख कौन से हैं जो उड़ती कला संभव बनाते हैं?

    A:

    1. हिम्मत

    2. उमंग-उत्साह
      एक भी पंख कमजोर हो तो उड़ती कला नहीं होती।


    Q16. मास्टर ज्ञान-सूर्य बनने का मुख्य कार्य क्या है?

    A: स्वयं को प्रकाशमय बनाकर अज्ञान अंधकार मिटाना, और दूसरों की रात को दिन बनाना।


    Q17. ज्ञान-सूर्य स्वयं अंधकार में क्यों नहीं आता?

    A: जैसे आग बुझाने वाला आग से सुरक्षित रहता है, वैसे प्रकाश देने वाला स्वयं पहले प्रकाशमय होता है—इसलिए अंधकार उस तक पहुँच नहीं पाता।


    Q18. कुमार जीवन को “श्रेष्ठ जीवन” क्यों कहा गया है?

    A: क्योंकि कुमार सबसे निर्बन्धन होते हैं, भाग्य बनाने की स्वतंत्रता सबसे अधिक होती है, और उड़ती कला में चलने का अवसर अधिक मिलता है।


    Q19. बाबा कुमारों को कौन सा विशेष वरदान देते हैं?

    A:
    “कुमार जीवन = मुक्त जीवन।
    डबल लाइट बनो, उड़ती कला में चलो, निश्चिन्त रहो।”


    Q20. इस मुरली का मुख्य सार क्या है?

    A:

    • समय प्रमाण नहीं—फरमान प्रमाण चलना है।

    • एक कमजोरी भी माया का मार्ग बनती है।

    • आप युग-परिवर्तक, मास्टर रचता हो।

    • याद सुरक्षा और कमाई है।

    • निर्भयता और उड़ती कला सफलता का आधार हैं।

    • मास्टर ज्ञान-सूर्य बनकर अंधकार मिटाना ही मुख्य कर्तव्य है।

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