J.D.BK 5-2क्या केवल उपवास और संयम से आत्मा मुक्त हो सकती है?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
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और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान
आज पाँचवें दिन का दूसरा पार्ट है –
क्या केवल उपवास और संयम से आत्मा मुक्त हो सकती है?
उपवास और संयम से आत्मा मुक्त हो सकती है?
जैन तप और बी.के. का राजयोग
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य जैन धर्म या किसी भी धर्म, दर्शन अथवा वैज्ञानिक मत की आलोचना करना नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल आत्म-चिंतन, आध्यात्मिक अध्ययन और जीवन को समझने के उद्देश्य से है।
दर्शक इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।
क्या केवल उपवास और संयम से आत्मा मुक्त हो सकती है?
जैन तप और बी.के. राजयोग का गूढ़ रहस्य
जैन धर्म में उपवास, संयम और तपस्या को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है।
लाखों जैन आत्माएँ आज भी यह प्रश्न अपने मन में रखती हैं।
जैन भाई-बहनों के मन में भी यह प्रश्न रहता है कि क्या उपवास, संयम और तपस्या से ऊँचा स्थान प्राप्त किया जा सकता है?
क्या केवल उपवास करने से,
क्या केवल संयम रखने से,
क्या केवल तप करने से आत्मा सचमुच मुक्त हो सकती है?
क्योंकि सुनाने वाले सुना रहे हैं, बताने वाले बता रहे हैं,
पर सुनने वालों के मन में यह प्रश्न आता है –
क्या ऐसा वास्तव में हो सकता है?
यह प्रश्न किसी तपस्वी या तपस्या के विरुद्ध नहीं है।
यह प्रश्न केवल समझने के लिए है,
आत्मा के अंतिम लक्ष्य को समझने के लिए है –
कि वह लक्ष्य कैसे प्राप्त होता है।
मुरली – 12 अगस्त 2024
बच्चे, लक्ष्य को स्पष्ट किए बिना किया गया पुरुषार्थ अधूरा रह जाता है।
जब लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता कि मुझे क्या बनना है,
तो चाहे कितना भी पुरुषार्थ कर लो,
वह अधूरा ही रह जाता है।
जैन दर्शन में उपवास और संयम का उद्देश्य
जैन दर्शन कहता है –
हम उपवास इसलिए करते हैं ताकि हमारी इन्द्रियाँ हमारे वश में रहें।
हम कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकें।
आँखों का भी उपवास होता है –
इस नश्वर संसार को भोग की दृष्टि से न देखना।
यह उनका सबसे कठोर उपवास माना जाता है।
संयम का अर्थ है इच्छाओं पर नियंत्रण।
तप का अर्थ है कर्मों की निर्जरा –
कर्मों को समाप्त करना,
आत्मा को हल्का बनाना,
राग-द्वेष को कम करना।
किसी से अधिक प्रेम भी बंधन बन जाता है
और किसी से द्वेष, नफ़रत या ईर्ष्या भी बंधन बन जाती है।
इसलिए आत्मा को राग-द्वेष से मुक्त रखना आवश्यक है।
कर्म बंधन कहाँ बंधते हैं?
कर्म शरीर से बंधते हैं
या मन और आत्मा की भावना से?
जैन दर्शन भी कहता है –
कर्म का बंधन भावों से होता है।
ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान इसे और स्पष्ट करता है –
कर्म शरीर से नहीं,
आत्मा के भाव और संकल्प से बंधते हैं।
यदि शरीर उपवास में है
लेकिन मन में क्रोध, अहंकार या अपेक्षा है
तो कर्म सूक्ष्म रूप से बंधते रहते हैं।
उपवास शरीर को शुद्ध कर सकता है,
लेकिन कर्म बंधनों से मुक्त नहीं कर सकता।
संस्कार परिवर्तन का प्रश्न
क्या केवल उपवास से संस्कार बदलते हैं?
उदाहरण –
कोई व्यक्ति आठ दिन का उपवास करता है,
लेकिन उपवास टूटते ही
क्रोध, अहंकार और कठोर वाणी फिर लौट आती है।
अर्थात उपवास ने संयम सिखाया,
पर संस्कार परिवर्तन अधूरा रह गया।
मुरली – 8 सितंबर 2024
सच्ची तपस्या है –
मन को विकारों से मुक्त करना।
संयम आवश्यक है,
पर पर्याप्त नहीं।
संयम आत्मा को स्थिर बनाता है,
पर शक्ति नहीं देता।
संयम बिना शक्ति के
कभी-कभी दबाव बन जाता है
और दबाव से प्रतिक्रिया जन्म लेती है।
मुरली – 30 जून 2024
केवल रोकने से विकार समाप्त नहीं होते,
शक्ति से ही परिवर्तन होता है।
ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान क्या जोड़ता है?
बी.के. ज्ञान कहता है –
आत्मा को परमात्मा से शक्ति लेनी होगी।
राजयोग आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है
और विकारों की जड़ पर कार्य करता है।
मुरली – 14 जुलाई 2024
राजयोग आत्मा को शक्ति देता है,
जिससे विकार स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
उदाहरण –
मोबाइल बिना चार्ज किए
कितना भी कंट्रोल रखो,
बैटरी खत्म हो ही जाएगी।
चार्ज = राजयोग
उपवास + राजयोग = पूर्ण साधना
बी.के. ज्ञान उपवास को नकारता नहीं,
लेकिन कहता है –
उपवास शरीर को हल्का बनाए,
राजयोग आत्मा को शक्तिशाली बनाए।
जब आत्मा शक्तिशाली होती है
तो संयम स्वभाव बन जाता है,
तप बोझ नहीं लगता।
मुरली – 2 जून 2024
जब आत्मा शक्तिशाली होती है
तो संयम स्वभाव बन जाता है।
निष्कर्ष
केवल उपवास और संयम
आत्मा को तैयार तो करते हैं,
पर पूर्ण मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं।
पूर्ण मुक्ति के लिए चाहिए –
संयम + तप + राजयोग = आत्मिक शक्ति
जब आत्मा संयमी भी हो
और शक्तिशाली भी हो,
तभी वह सचमुच मुक्त कहलाती है।
मुरली – 22 सितंबर 2024
योग से ही आत्मा
सच्चे अर्थ में स्वतंत्र बनती है।

