AV-(12)22-02-1986 “रूहानी सेवा – निस्वार्थ सेवा”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
22-02-1986 “रूहानी सेवा – निस्वार्थ सेवा”
आज सर्व आत्माओं के विश्व कल्याणकारी बाप अपने सेवाधारी सेवा के साथी बच्चों को देख रहे हैं। आदि से बापदादा के साथ-साथ सेवाधारी बच्चे साथी बने और अन्त तक बापदादा ने गुप्त रूप में और प्रत्यक्ष रूप में बच्चों को विश्व सेवा के निमित्त बनाया। आदि में ब्रह्मा बाप और ब्राह्मण बच्चे गुप्त रूप में सेवा के निमित्त बनें। अभी सेवाधारी बच्चे शक्ति सेना और पाण्डव सेना विश्व के आगे प्रत्यक्ष रूप में कार्य कर रहे हैं। सेवा का उमंग-उत्साह मैजारिटी बच्चों में अच्छा दिखाई देता है। सेवा की लगन आदि से रही है और अन्त तक रहेगी। ब्राह्मण जीवन ही सेवा का जीवन है। ब्राह्मण आत्मायें सेवा के बिना जी नहीं सकती। माया से जिन्दा रखने का श्रेष्ठ साधन सेवा ही है। सेवा योगयुक्त भी बनाती है। लेकिन कौन सी सेवा? एक है सिर्फ मुख की सेवा, सुना हुआ सुनाने की सेवा। दूसरी है मन से मुख की सेवा। सुने हुए मधुर बोल का स्वरूप बन, स्वरूप से सेवा, नि:स्वार्थ सेवा। त्याग, तपस्या स्वरूप से सेवा। हद की कामनाओं से परे निष्काम सेवा। इसको कहा जाता है ईश्वरीय सेवा, रूहानी सेवा। जो सिर्फ मुख की सेवा है उसको कहते हैं सिर्फ स्वयं को खुश करने की सेवा। सर्व को खुश करने की सेवा मन और मुख की साथ-साथ होती है। मन से अर्थात् मनमनाभव स्थिति से मुख की सेवा।
बापदादा आज अपने राइट हैण्ड्स सेवाधारी और लेफ्ट हैण्ड सेवाधारी दोनों को देख रहे थे। सेवाधारी दोनों ही हैं लेकिन राइट और लेफ्ट में अन्तर तो है ना। राइट हैण्ड सदा निष्काम सेवाधारी है। लेफ्ट हैण्ड कोई न कोई हद की इस जन्म के लिए सेवा का फल खाने की इच्छा से सेवा के निमित्त बनते हैं। वह गुप्त सेवाधारी और वह नामधारी सेवाधारी। अभी-अभी सेवा की अभी-अभी नाम हुआ – बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। लेकिन अभी किया अभी खाया। जमा का खाता नहीं। गुप्त सेवाधारी अर्थात् निष्काम सेवाधारी। तो एक है निष्काम सेवाधारी, दूसरे हैं नामधारी सेवाधारी। तो गुप्त सेवाधारी का चाहे वर्तमान समय नाम गुप्त रहता भी है लेकिन गुप्त सेवाधारी सफलता की खुशी में सदा भरपूर रहता है। कई बच्चों को संकल्प आता है कि हम करते भी हैं लेकिन नाम नहीं होता। और जो बाहर से नामधारी बन सेवा का शो दिखाते हैं, उनका नाम ज्यादा होता है। लेकिन ऐसे नहीं है जो निष्काम अविनाशी नाम कमाने वाले हैं उनके दिल का आवाज दिल तक पहुँचता हैं। छिपा हुआ नहीं रह सकता है। उसकी सूरत में, मूर्त में सच्चे सेवाधारी की झलक अवश्य दिखाई देती है। अगर कोई नामधारी यहाँ नाम कमा लिया तो आगे के लिए किया और खाया और खत्म कर दिया, भविष्य श्रेष्ठ नहीं, अविनाशी नहीं। इसलिए बापदादा के पास सभी सेवाधारियों का पूरा रिकार्ड है। सेवा करते चलो, नाम हो यह संकल्प नहीं करो। जमा हो यह सोचो। अविनाशी फल के अधिकारी बनो। अविनाशी वर्से के लिए आये हो। सेवा का फल विनाशी समय के लिए खाया तो अविनाशी वर्से का अधिकार कम हो जायेगा। इसलिए सदा विनाशी कामनाओं से मुक्त निष्काम सेवाधारी, राइट हैण्ड बन सेवा में बढ़ते चलो। गुप्त दान का महत्व, गुप्त सेवा का महत्व ज्यादा होता है। वह आत्मा सदा स्वयं में भरपूर होगी। बेपरवाह बादशाह होगी। नाम-शान की परवाह नहीं। इसमें ही बेपरवाह बादशाह होंगे अर्थात् सदा स्वमान के तख्तनशीन होंगे। हद के मान के तख्तनशीन नहीं। स्वमान के तख्तनशीन, अविनाशी तख्तनशीन। अटल अखण्ड प्राप्ति के तख्तनशीन। इसको कहते हैं विश्व कल्याणकारी सेवाधारी। कभी साधारण संकल्पों के कारण विश्व सेवा के कार्य में सफलता प्राप्त करने में पीछे नहीं हटना। त्याग और तपस्या से सदा सफलता को प्राप्त कर आगे बढ़ते रहना। समझा।
सेवाधारी किसको कहा जाता है। तो सभी सेवाधारी हो? सेवा स्थिति को डगमग करे वह सेवा नहीं है। कई सोचते हैं सेवा में नीचे ऊपर भी बहुत होते हैं। विघ्न भी सेवा में आते हैं और निर्विघ्न भी सेवा ही बनाती है। लेकिन जो सेवा विघ्न रूप बने वह सेवा नहीं। उसको सच्ची सेवा नहीं कहेंगे। नामधारी सेवा कहेंगे। सच्ची सेवा सच्चा हीरा है। जैसे सच्चा हीरा कभी चमक से छिप नहीं सकता। ऐसे सच्चा सेवाधारी सच्चा हीरा है। चाहे झूठे हीरे में चमक कितनी भी बढ़िया हो लेकिन मूल्यवान कौन? मूल्य तो सच्चे का होता है ना। झूठे का तो नहीं होता। अमूल्य रत्न सच्चे सेवाधारी हैं। अनेक जन्म का मूल्य सच्चे सेवाधारी का है। अल्पकाल की चमक का शो नामधारी सेवा है। इसलिए सदा सेवाधारी बन सेवा से विश्व कल्याण करते चलो। समझा – सेवा का महत्व क्या है। कोई कम नहीं है। हरेक सेवाधारी अपनी-अपनी विशेषता से विशेष सेवाधारी है। अपने को कम भी नहीं समझो और फिर करने से नाम की इच्छा भी नहीं रखो। सेवा को विश्व कल्याण के अर्पण करते चलो। वैसे भी भक्ति में जो गुप्त दानी पुण्य आत्मायें होती हैं वो यही संकल्प करती हैं कि सर्व के भले प्रति हो! मेरे प्रति हो, मुझे फल मिले, नहीं, सर्व को फल मिले। सर्व की सेवा में अर्पण हो। कभी अपनेपन की कामना नहीं रखेंगे। ऐसे ही सर्व प्रति सेवा करो। सर्व के कल्याण की बैंक में जमा करते चलो। तो सभी क्या बन जायेंगे? निष्काम सेवाधारी। अभी कोई ने नहीं पूछा तो 2500 वर्ष आपको पूछेंगे। एक जन्म में कोई पूछे या 2500 वर्ष कोई पूछे, तो ज्यादा क्या हुआ। वह ज्यादा है ना। हद के संकल्प से परे होकर बेहद के सेवाधारी बन बाप के दिलतख्तनशीन बेपरवाह बादशाह बन, संगमयुग की खुशियों को, मौजों को मनाते चलो। कभी भी कोई सेवा उदास करे तो समझो वह सेवा नहीं है। डगमग करे, हलचल में लाये तो वह सेवा नहीं है। सेवा तो उड़ाने वाली है। सेवा बेगमपुर का बादशाह बनाने वाली है। ऐसे सेवाधारी हो ना? बेपरवाह बादशाह, बेगमपुर के बादशाह। जिसके पीछे सफलता स्वयं आती है। सफलता के पीछे वह नहीं भागता। सफलता उसके पीछे-पीछे है। अच्छा, बेहद की सेवा के प्लैन बनाते हो ना। बेहद की स्थिति से बेहद की सेवा के प्लैन सहज सफल होते ही हैं। (डबल विदेशी भाई बहनों ने एक प्लैन बनया है जिसमें सभी आत्माओं से कुछ मिनट शान्ति का दान लेना है।)
यह भी विश्व को महादानी बनाने का अच्छा प्लैन बनाया है ना! थोड़ा समय भी शान्ति के संस्कारों को चाहे मजबूरी से, चाहे स्नेह से इमर्ज तो करेंगे ना। प्रोग्राम प्रमाण भी करें तो भी जब आत्मा में शान्ति के संस्कार इमर्ज होते हैं तो शान्ति स्वधर्म तो है ही ना। शान्ति के सागर के बच्चे तो हैं ही। शान्तिधाम के निवासी भी हैं। तो प्रोग्राम प्रमाण भी वह इमर्ज होने से वह शान्ति की शक्ति उन्हों को आकर्षित करती रहेगी। जैसे कहते हैं ना – एक बारी जिसने मीठा चखकर देखा तो चाहे उसे मीठा मिले न मिले लेकिन वह चखा हुआ रस उसको बार-बार खींचता रहेगा। तो यह भी शान्ति की माखी चखना है। तो यह शान्ति के संस्कार स्वत: ही स्मृति दिलाते रहेंगे। इसलिए धीरे-धीरे आत्माओं में शान्ति की जागृति आती रहे यह भी आप सभी शान्ति का दान दे उन्हों को भी दानी बनाते हो। आप लोगों का शुभ संकल्प है कि किसी भी रीति से आत्मायें शान्ति की अनुभूति करें। विश्व शान्ति भी आत्मिक शान्ति के आधार पर होगी ना। प्रकृति भी पुरूष के आधार से चलती है। यह प्रकृति भी तब शान्त होगी जब आत्माओं में शान्ति की स्मृति आये। चाहे किस विधि से भी करें लेकिन अशान्ति से तो परे हो गया ना। और एक मिनट की शान्ति भी उन्हों को अनेक समय के लिए आकर्षित करती रहेगी। तो अच्छा प्लैन बनाया है। यह भी जैसे कोई को थोड़ा-सा आक्सीजन दे करके शान्ति का श्वाँस चलाने का साधन है। शान्ति के श्वाँस से वास्तव में बेहोश पड़े हैं। तो यह साधन जैसे आक्सीजन है। उससे थोड़ा श्वाँस चलना शुरू होगा। कईयों का श्वाँस आक्सीजन से चलते-चलते चल भी पड़ता है। तो सभी उमंग उत्साह से पहले स्वयं पूरा ही समय शान्ति हाउस बन शान्ति की किरणें देना। तब आपके शान्ति की किरणों की मदद से, आपके शान्ति के संकल्प से उन्हों को भी संकल्प उठेगा और किसी भी विधि से करेंगे, लेकिन आप लोगों की शान्ति के वायब्रेशन उनको सच्ची विधि तक खींचकर ले आयेंगे। यह भी किसी को जो नाउम्मीद हैं उनको उम्मीद की झलक दिखाने का साधन है। नाउम्मीद में उम्मीद पैदा करने का साधन है। जहाँ तक हो सके वहाँ तक जो भी सम्पर्क में आये, जिसके भी सम्पर्क में आये तो उनको दो शब्दों में आत्मिक शान्ति, मन की शान्ति का परिचय देने का प्रयत्न जरूर करना। क्योंकि हरेक अपना-अपना नाम एड तो करायेंगे ही। चाहे पत्र-व्यहार द्वारा करें लेकिन कनेक्शन में तो आयेंगे ना। लिस्ट में तो आयेगा ना। तो जहाँ तक हो सके शान्ति का अर्थ क्या है, वह दो शब्दों में भी स्पष्ट करने का प्रयत्न करना। एक मिनट में भी आत्मा में जागृति आ सकती है। समझा! प्लैन तो आप सबको भी पसन्द है ना। दूसरे तो काम उतारते हैं, आप काम करते हो। जब हैं ही शान्ति के दूत तो चारों ओर शान्ति दूतों की यह आवाज गूंजेगी और शान्ति के फरिश्ते प्रत्यक्ष होते जायेंगे। सिर्फ आपस में यह राय करना कि पीस के आगे कोई ऐसा शब्द हो जो दुनिया से थोड़ा न्यारा लगे। पीस मार्च या पीस यह शब्द तो दुनिया भी यूज़ करती है। तो पीस शब्द के साथ कोई विशेष शब्द हो जो युनिवर्सल भी हो और सुनने से ही लगे कि यह न्यारे हैं। तो इन्वेन्शन करना। बाकी अच्छी बातें हैं। कम से कम जितना समय यह प्रोग्राम चले उतना समय कुछ भी हो जाए – स्वयं न अशान्त होना है, न अशान्त करना है। शान्ति को नहीं छोड़ना है। पहले तो ब्राह्मण यह कंगन बांधेंगे ना! जब उन्हों को भी कंगन बांधते हो तो पहले ब्राह्मण जब अपने को कंगन बांधेंगे तब ही औरों को भी बांध सकेंगे। जैसे गोल्डन जुबली में सभी ने क्या संकल्प किया? हम समस्या स्वरूप नहीं बनेंगे, यही संकल्प किया ना। इसको ही बार-बार अण्डरलाइन करते रहना। ऐसे नहीं समस्या बनो और कहो कि समस्या स्वरूप नहीं बनेंगे। तो यह कंगन बांधना पसन्द है ना। पहले स्व, पीछे विश्व। स्व का प्रभाव विश्व पर पड़ता है। अच्छा।
आज यूरोप का टर्न है। यूरोप भी बहुत बड़ा है ना। जितना बड़ा यूरोप है उतनी बड़ी दिल वाले हो ना। जैसे यूरोप का विस्तार है, जितना विस्तार है उतना ही सेवा में सार है। विनाश की चिंगारी कहाँ से निकली? यूरोप से निकली ना! तो जैसे विनाश का साधन यूरोप से निकला तो स्थापना के कार्य में विशेष यूरोप से आत्मायें प्रख्यात होनी ही है। जैसे पहले बाम्बस अण्डरग्राउण्ड बने, पीछे कार्य में लाये गये। ऐसे ऐसी आत्मायें भी तैयार हो रही हैं, अभी गुप्त हैं, अण्डरग्राउण्ड हैं लेकिन प्रख्यात हो भी रही हैं और होती भी रहेंगी। जैसे हर देश की अपनी-अपनी विशेषता होती है ना, तो यहाँ भी हर स्थान की अपनी विशेषता है। नाम बाला करने के लिए यूरोप का यन्त्र काम में आयेगा। जैसे साइन्स के यन्त्र कार्य में आये, ऐसे आवाज बुलन्द करने के लिए यूरोप से यन्त्र निमित्त बनेंगे। नई विश्व तैयार करने के लिए यूरोप ही आपका मददगार बनेगा। यूरोप की चीज़ सदा मजबूत होती है। जर्मनी की चीज़ को सब महत्व देते हैं। तो ऐसे ही सेवा के निमित्त महत्व वाली आत्मायें प्रत्यक्ष होती रहेंगी। समझा। यूरोप भी कम नहीं है। अभी प्रत्यक्षता का पर्दा खुलने शुरू हो रहा है। समय पर बाहर आ जायेगा। अच्छा है, थोड़े समय में चारों ओर विस्तार अच्छा किया है, रचना अच्छी रची है। अभी इस रचना को पालना का पानी दे मजबूत बना रहे हैं। जैसे यूरोप की स्थूल चीजें मजबूत होती है वैसे आत्मायें भी विशेष अचल अडोल मजबूत होंगी। मेहनत मुहब्बत से कर रहे हो इसलिए मेहनत, मेहनत नहीं है लेकिन सेवा की लगन अच्छी है। जहाँ लगन है वहाँ विघ्न आते भी समाप्त हो, सफलता मिलती रहती है। वैसे टोटल यूरोप की अगर क्वालिटी देखो तो बहुत अच्छी है। ब्राह्मण भी आई. पी. हैं। वैसे भी आई. पी. हैं। इसलिए यूरोप के निमित्त सेवाधारियों को और भी स्नेह भरी श्रेष्ठ पालना से मजबूत कर विशेष सेवा के मैदान में लाते रहो। वैसे धरनी फल देने वाली है। अच्छा यह तो विशेषता है जो बाप का बनते ही दूसरों को बनाने में लग जाते हैं। हिम्मत अच्छी रखते हैं और हिम्मत के कारण ही यह गिफ्ट है, जो सेवाकेन्द्र वृद्धि को पाते रहते हैं। क्वालिटी भी बढ़ाओ और क्वान्टिटी भी बढ़ाओ। दोनों का बेलेन्स हो। क्वालिटी की शोभा अपनी है और क्वान्टिटी की शोभा फिर अपनी है। दोनों ही चाहिए। सिर्फ क्वालिटी हो क्वान्टिटी न हो तो भी सेवा करने वाले थक जाते हैं। इसलिए दोनों ही अपनी-अपनी विशेषता के काम के हैं। दोनों की सेवा जरूरी है क्योंकि 9 लाख तो बनाना है ना। 9 लाख में विदेश से कितने हुए हैं? (5 हजार) अच्छा। एक कल्प का चक्र तो पूरा किया। विदेश को लास्ट सो फास्ट का वरदान है तो भारत से फास्ट जाना है क्योंकि भारत वालों को धरनी बनाने में मेहनत होती है। विदेश में कलराठी जमीन नहीं है। यहाँ पहले बुरे को अच्छा बनाना पड़ता है। वहाँ बुरा सुना ही नहीं है तो बुरी बातें उल्टी बातें सुनी ही नहीं इसलिए साफ है। और भारत वालों को पहले स्लेट साफ करनी पड़ती है फिर लिखना पड़ता है। विदेश को समय प्रमाण वरदान है लास्ट सो फास्ट का। इसलिए यूरोप कितने लाख तैयार करेगा? जैसे यह मिलियन मिनट का प्रोग्राम बनाया है ऐसे ही प्रजा का बनाओ। प्रजा तो बन सकती हैं ना। मिलियन मिनट बना सकते हो तो मिलियन प्रजा नहीं बना सकते हो। और ही एक लाख कम 9 लाख ही कहते हैं! समझा, यूरोप वालों को क्या करना है। जोर शोर से तैयारी करो। अच्छा – डबल विदेशियों का डबल लक है, वैसे सभी को दो मुरलियाँ सुनने को मिलती आपको डबल मिलीं। कॉन्फ्रेंस भी देखी, गोल्डन जुबली भी देखी। बड़ी-बड़ी दादियाँ भी देखी। गंगा, जमुना, गोदावरी, ब्रह्मापुत्रा सब देखी। सब बड़ी-बड़ी दादियाँ देखी ना! एक-एक दादी की एक-एक विशेषता सौगात में लेकर जाना तो सभी की विशेषता काम में आ जायेगी। विशेषताओं के सौगात की झोली भर करके जाना। इसमें कस्टम वाले नहीं रोकेंगे। अच्छा!
सदा विश्व कल्याणकारी बन विश्व सेवा के निमित्त सच्चे सेवाधारी श्रेष्ठ आत्मायें, सदा सफलता के जन्म सिद्ध अधिकार को प्राप्त करने वाली विशेष आत्मायें, सदा स्व के स्वरूप द्वारा सर्व को स्वरूप की स्मृति दिलाने वाली समीप आत्मायें, सदा बेहद के निष्काम सेवाधारी बन उड़ती कला में उड़ने वाले, डबल लाइट बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
अध्याय: रूहानी सेवा – निस्वार्थ सेवा
(Avyakt Murli – 22 फरवरी 1986)
भूमिका: विश्व कल्याणकारी बाप और सेवाधारी बच्चे
आज विश्व के कल्याणकारी बाप
अपने सेवाधारी, सेवा के साथी बच्चों को देख रहे हैं।
आदि से लेकर अन्त तक—
-
बापदादा स्वयं
-
और सेवाधारी ब्राह्मण आत्माएँ
विश्व सेवा के निमित्त साथी बनी हैं।
आदि में सेवा गुप्त रूप में थी
अब सेवा प्रत्यक्ष रूप में चल रही है
Murli Note (22-02-1986):
“ब्राह्मण जीवन ही सेवा का जीवन है।
सेवा के बिना ब्राह्मण आत्मा जी नहीं सकती।”
सेवा क्यों आवश्यक है?
बापदादा स्पष्ट करते हैं—
-
सेवा माया से बचने का श्रेष्ठ साधन है
-
सेवा योगयुक्त बनाती है
-
सेवा से ही आत्मा जीवित और जागृत रहती है
लेकिन प्रश्न है—
कौन-सी सेवा?
सेवा के दो प्रकार
1️⃣ केवल मुख की सेवा
-
सुना हुआ सुनाना
-
भाषण, शब्द, प्रदर्शन
यह सेवा कई बार स्वयं को खुश करने तक सीमित रह जाती है
2️⃣ रूहानी सेवा (सच्ची ईश्वरीय सेवा)
-
मन + मुख की सेवा
-
मनमनाभव स्थिति से वाणी
-
त्याग, तपस्या और निष्काम भाव
यही कहलाती है—
नि:स्वार्थ सेवा | रूहानी सेवा
Murli Note:
“सर्व को खुश करने की सेवा
मन और मुख दोनों से होती है।”
राइट हैंड और लेफ्ट हैंड सेवाधारी
बापदादा सेवाधारियों को दो श्रेणियों में समझाते हैं—
राइट हैंड सेवाधारी
-
निष्काम
-
गुप्त सेवाधारी
-
फल की इच्छा से मुक्त
-
जमा का खाता बढ़ाने वाले
यही विश्व कल्याणकारी सेवाधारी हैं
लेफ्ट हैंड सेवाधारी
-
नाम, मान, शान की इच्छा
-
अभी सेवा – अभी फल
-
“किया और खाया”
भविष्य का अविनाशी भाग्य कम हो जाता है
Murli Note:
“नाम नहीं, जमा देखो।
विनाशी फल नहीं, अविनाशी वर्से के अधिकारी बनो।”
गुप्त सेवाधारी की पहचान
बापदादा कहते हैं—
-
गुप्त सेवाधारी का नाम भले छुपा रहे
-
लेकिन उसकी सूरत, मूर्त और वायब्रेशन
सच्चे सेवाधारी की गवाही देते हैं
जैसे—
-
सच्चा हीरा छुप नहीं सकता
-
वैसे ही सच्ची सेवा छुप नहीं सकती
स्वमान के तख्तनशीन – बेपरवाह बादशाह
निष्काम सेवाधारी—
-
नाम-शान की परवाह नहीं करता
-
स्वमान के तख्त पर स्थित रहता है
-
अटल, अखण्ड प्राप्तियों का अधिकारी बनता है
यही है—
बेपरवाह बादशाह की स्थिति
Murli Note:
“हद के मान के तख्तनशीन नहीं,
स्वमान के तख्तनशीन बनो।”
सच्ची सेवा की पहचान
जो सेवा—
-
मन को डगमग करे
-
हलचल में लाये
-
उदासी पैदा करे
वह सच्ची सेवा नहीं
सच्ची सेवा—
-
उड़ाने वाली होती है
-
बेगमपुर का बादशाह बनाती है
-
सफलता को स्वयं पीछे-पीछे लाती है
शान्ति दान – विश्व कल्याण की श्रेष्ठ योजना
डबल विदेशी भाई-बहनों का “कुछ मिनट शान्ति दान” का प्लैन—
-
आत्माओं में शान्ति के संस्कार इमर्ज करता है
-
मजबूरी से भी अगर शान्ति आई
संस्कार बनकर आकर्षण पैदा करेगी
उदाहरण:
जैसे मीठा एक बार चख लिया
तो स्वाद बार-बार खींचता है
Murli Note:
“एक मिनट की शान्ति
अनेक समय के लिए आकर्षित करती है।”
पहले स्वयं, फिर विश्व
बापदादा स्पष्ट करते हैं—
-
पहले स्वयं शान्ति हाउस बनो
-
पहले स्वयं कंगन बाँधो
-
फिर दूसरों को बाँधो
स्व का प्रभाव ही
विश्व परिवर्तन का आधार है
यूरोप की विशेष भूमिका
यूरोप—
-
विनाश का यन्त्र भी बना
-
और अब स्थापना का यन्त्र बनेगा
जैसे—
-
यूरोप की चीज़ें मजबूत होती हैं
-
वैसे ही यूरोप की आत्माएँ
अचल-अडोल, मजबूत बनेंगी
यूरोप से ही
विश्व में आवाज़ बुलन्द होगी
Murli Note:
“जहाँ लगन है
वहाँ विघ्न समाप्त
और सफलता निश्चित है।”
क्वालिटी और क्वान्टिटी – दोनों जरूरी
-
केवल क्वालिटी → सेवाधारी थकते हैं
-
केवल क्वान्टिटी → गहराई नहीं रहती
इसलिए—
क्वालिटी + क्वान्टिटी = सम्पूर्ण सेवा
समापन संदेश
सदा—
-
विश्व कल्याणकारी
-
निष्काम सेवाधारी
-
स्व के स्वरूप से सर्व को जगाने वाले
-
उड़ती कला में उड़ने वाले
-
डबल लाइट, डबल विदेशी बच्चे
ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को
बापदादा का याद-प्यार और
प्रश्न 1️⃣ : आज बापदादा किन आत्माओं को देख रहे हैं?
उत्तर:
आज विश्व के कल्याणकारी बाप, अपने सेवाधारी, सेवा के साथी बच्चों को देख रहे हैं, जो आदि से लेकर अन्त तक विश्व सेवा के निमित्त साथी बने हैं।
प्रश्न 2️⃣ : विश्व सेवा में बाप और बच्चे का क्या संबंध है?
उत्तर:
विश्व सेवा में बापदादा स्वयं भी साथ हैं और ब्राह्मण आत्माएँ भी। दोनों मिलकर विश्व कल्याण का कार्य कर रहे हैं।
प्रश्न 3️⃣ : आदि और अब की सेवा में क्या अंतर है?
उत्तर:
आदि में सेवा गुप्त रूप में थी, जबकि अब सेवा प्रत्यक्ष रूप में चल रही है।
प्रश्न 4️⃣ : मुरली के अनुसार ब्राह्मण जीवन की पहचान क्या है?
उत्तर:
ब्राह्मण जीवन ही सेवा का जीवन है। सेवा के बिना ब्राह्मण आत्मा जीवित नहीं रह सकती।
प्रश्न 5️⃣ : सेवा को क्यों आवश्यक बताया गया है?
उत्तर:
सेवा माया से बचने का श्रेष्ठ साधन है, सेवा योगयुक्त बनाती है और सेवा से ही आत्मा जीवित व जागृत रहती है।
प्रश्न 6️⃣ : बापदादा सेवा के विषय में मुख्य प्रश्न क्या रखते हैं?
उत्तर:
मुख्य प्रश्न यह है— कौन-सी सेवा?
प्रश्न 7️⃣ : सेवा के कितने प्रकार बताए गए हैं?
उत्तर:
सेवा के दो प्रकार बताए गए हैं—
-
केवल मुख की सेवा
-
रूहानी (नि:स्वार्थ) सेवा
प्रश्न 8️⃣ : केवल मुख की सेवा क्या होती है?
उत्तर:
सुना हुआ सुनाना, भाषण देना, शब्दों का प्रदर्शन करना—जो कई बार स्वयं को खुश करने तक सीमित रह जाता है।
प्रश्न 9️⃣ : रूहानी सेवा किसे कहते हैं?
उत्तर:
मन और मुख दोनों से की गई सेवा, मनमनाभव स्थिति से निकली वाणी, त्याग, तपस्या और निष्काम भाव से की गई सेवा को रूहानी सेवा कहते हैं।
प्रश्न 🔟 : मुरली के अनुसार सच्ची सेवा की पहचान क्या है?
उत्तर:
जो सेवा मन और मुख दोनों से होकर सर्व को खुश करे, वही सच्ची ईश्वरीय सेवा है।
प्रश्न 1️⃣1️⃣ : राइट हैंड सेवाधारी कौन होते हैं?
उत्तर:
जो निष्काम हों, गुप्त सेवा करें, फल की इच्छा से मुक्त हों और जमा का खाता बढ़ाने वाले हों—वही राइट हैंड सेवाधारी हैं।
प्रश्न 1️⃣2️⃣ : लेफ्ट हैंड सेवाधारी की पहचान क्या है?
उत्तर:
जो नाम, मान, शान की इच्छा रखते हैं, “अभी सेवा–अभी फल” चाहते हैं और “किया और खाया” की भावना रखते हैं।
प्रश्न 1️⃣3️⃣ : लेफ्ट हैंड सेवाधारी का नुकसान क्या है?
उत्तर:
ऐसे सेवाधारी भविष्य के अविनाशी भाग्य से वंचित हो जाते हैं।
प्रश्न 1️⃣4️⃣ : मुरली में सेवाधारियों को क्या देखने की शिक्षा दी गई है?
उत्तर:
नाम नहीं, जमा देखो; विनाशी फल नहीं, अविनाशी वर्से के अधिकारी बनो।
प्रश्न 1️⃣5️⃣ : गुप्त सेवाधारी की पहचान क्या है?
उत्तर:
भले उसका नाम छुपा रहे, लेकिन उसकी सूरत, मूर्त और वायब्रेशन स्वयं उसकी सच्ची सेवा की गवाही देते हैं।
प्रश्न 1️⃣6️⃣ : गुप्त सेवा की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
जैसे सच्चा हीरा छुप नहीं सकता, वैसे ही सच्ची सेवा भी छुप नहीं सकती।
प्रश्न 1️⃣7️⃣ : बेपरवाह बादशाह किसे कहा गया है?
उत्तर:
जो निष्काम सेवाधारी नाम-शान की परवाह नहीं करता और स्वमान के तख्त पर स्थित रहता है, वही बेपरवाह बादशाह है।
प्रश्न 1️⃣8️⃣ : स्वमान के तख्तनशीन बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
हद के मान से ऊपर उठकर आत्मिक स्वमान में स्थित रहना और अटल, अखण्ड प्राप्तियों का अधिकारी बनना।
प्रश्न 1️⃣9️⃣ : कौन-सी सेवा सच्ची सेवा नहीं मानी जाती?
उत्तर:
जो सेवा मन को डगमगाए, हलचल लाए या उदासी पैदा करे—वह सच्ची सेवा नहीं है।
प्रश्न 2️⃣0️⃣ : सच्ची सेवा का परिणाम क्या होता है?
उत्तर:
सच्ची सेवा उड़ाने वाली होती है, बेगमपुर का बादशाह बनाती है और सफलता को स्वयं पीछे-पीछे लाती है।
प्रश्न 2️⃣1️⃣ : “शान्ति दान” की सेवा क्यों श्रेष्ठ है?
उत्तर:
क्योंकि यह आत्माओं में शान्ति के संस्कार इमर्ज करती है और आगे चलकर स्वतः आकर्षण पैदा करती है।
प्रश्न 2️⃣2️⃣ : एक मिनट की शान्ति का प्रभाव क्या है?
उत्तर:
एक मिनट की शान्ति अनेक समय के लिए आत्माओं को आकर्षित कर लेती है।
प्रश्न 2️⃣3️⃣ : विश्व परिवर्तन से पहले कौन-सा परिवर्तन आवश्यक है?
उत्तर:
पहले स्वयं शान्ति हाउस बनना और स्वयं में संस्कार धारण करना आवश्यक है।
प्रश्न 2️⃣4️⃣ : यूरोप की विशेष भूमिका क्या बताई गई है?
उत्तर:
यूरोप जो पहले विनाश का यन्त्र बना, अब स्थापना का यन्त्र बनेगा और विश्व में सशक्त आवाज़ बुलन्द करेगा।
प्रश्न 2️⃣5️⃣ : सेवा में क्वालिटी और क्वान्टिटी का संतुलन क्यों जरूरी है?
उत्तर:
केवल क्वालिटी से सेवाधारी थक जाते हैं और केवल क्वान्टिटी से गहराई नहीं रहती। दोनों का संतुलन ही सम्पूर्ण सेवा है।
प्रश्न 2️⃣6️⃣ : इस अध्याय का मुख्य समापन संदेश क्या है?
उत्तर:
सदा निष्काम, विश्व कल्याणकारी सेवाधारी बनकर, स्व के स्वरूप से सर्व को जगाते हुए, उड़ती कला में स्थित रहना।
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