5-4 What is true non-violence?


J.D.BK 5-4 सच्ची अहिंसा क्या है?केवल शरीर से या विचारों से भी?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

YouTube player

जैन दर्शन
और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान

आज पाँचवें दिन का चौथा विषय कर रहे हैं।
आज का विषय है — सच्ची अहिंसा क्या है?

केवल शरीर से या विचारों से भी

अहिंसा
अर्थात किसी को दुख न देना।

हम इस दुख के बारे में अच्छी तरह समझते हैं
कि हमने स्वयं को भी दुख नहीं देना
और किसी भी आत्मा को दुख नहीं देना —
तभी अहिंसा है।

परंतु आज हम इस अहिंसा को
और अच्छी तरह, स्टेप-बाय-स्टेप समझने का प्रयास करेंगे।

यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी
ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य जैन धर्म, अहिंसा
या किसी भी धार्मिक सिद्धांत की आलोचना करना नहीं है।

यह प्रस्तुति
जैन अहिंसा और
ब्रह्मा कुमारी आत्मा ज्ञान
के साझा लक्ष्य —
पूर्ण आंतरिक और बाह्य अहिंसा —
को स्पष्ट करने के लिए है।

ब्रह्मा कुमारीज क्या कहते हैं?
और जैन दर्शन अहिंसा के बारे में क्या कहता है?
उसका एक साझा स्वरूप
हम समझने का प्रयास करेंगे।

दर्शक इसे आध्यात्मिक अध्ययन
और आत्म-चिंतन की दृष्टि से ग्रहण करें।

सच्ची अहिंसा क्या है?
केवल शरीर से या विचारों से भी?

जैन अहिंसा और बी.के. राजयोग का रहस्य

जैन भाइयों के लिए
बी.के. ज्ञान में सच्ची अहिंसा पर चिंतन —

प्रश्न यह है —
क्या सच्ची अहिंसा केवल शारीरिक स्तर पर आवश्यक है
या विचारों में भी?

क्या इतना पर्याप्त है कि
हम शारीरिक रूप से किसी को कष्ट न दें?
या विचारों में भी किसी को कष्ट नहीं देना चाहिए?

अहिंसा का प्रश्न क्यों गहरा है?

जैन धर्म की पहचान ही अहिंसा से होती है।
अहिंसा केवल एक सिद्धांत नहीं,
बल्कि जीवन जीने की कला है।

जैन धर्म में अहिंसा को अत्यंत महत्व दिया गया है।
मुख पर पट्टी इसलिए बाँधी जाती है
कि श्वास से भी कोई जीव कष्ट न पाए।

जूते नहीं पहनते
ताकि किसी जीव को अनजाने में भी हानि न हो।
पैर से जीव मरने की संभावना कम होती है,
जूते या चप्पल से अधिक।

पर आज एक गहरा प्रश्न उठता है —

क्या अहिंसा केवल किसी को मारना न हो?
या अहिंसा विचार, भावना और दृष्टि तक भी आवश्यक है?

यदि हाथ से हिंसा न हो
पर मन में क्रोध, द्वेष, निंदा, ईर्ष्या या बदले की भावना हो —
तो क्या उसे सच्ची अहिंसा कहा जा सकता है?

हमने किसी को हाथ से नहीं मारा,
पर मन में ऐसे भाव आए —
तो क्या वह अहिंसा है?

मुरली – 7 अगस्त 2024

“बच्चे, हिंसा पहले मन में होती है,
फिर वाणी और कर्म में आती है।”

हिंसा पहले कहाँ होती है?
मन में।

जैन दर्शन में अहिंसा का वास्तविक अर्थ

जैन दर्शन कहता है —
अहिंसा परमो धर्मः

ब्रह्मा कुमारीज भी यही कहती हैं —
अहिंसा परम धर्म है।

अर्थ —
ना मन से,
ना वचन से,
ना कर्म से
किसी भी जीव को कष्ट न देना।

जैन आगमों में
भाव हिंसा और द्रव्य हिंसा
दोनों का स्पष्ट उल्लेख है।

भाव हिंसा —
मन में किसी को दुख देने का भाव रखना।

द्रव्य हिंसा —
लेन-देन, व्यवहार या वस्तुओं के माध्यम से
किसी को दुख पहुँचाना।

इसका अर्थ है —
विचारों की हिंसा भी वास्तविक हिंसा है।

यदि कोई व्यक्ति बाहर से शांत दिखे
लेकिन भीतर ही भीतर किसी को अपमानित करता रहे —
तो यह सूक्ष्म हिंसा है।

हिंसा की जड़ कहाँ है?

हिंसा हाथ से नहीं,
हथियार से नहीं,
विचार से शुरू होती है।

पहले संकल्प आता है,
फिर वाणी निकलती है,
फिर कर्म होता है।

मुरली – 25 मई 2024

“कर्म का बीज संकल्प है।
जैसा संकल्प, वैसा कर्म।”

जैसे बीज बोए बिना पेड़ नहीं उगता,
वैसे संकल्प के बिना
कोई वाणी या कर्म नहीं निकलता।

केवल शारीरिक अहिंसा क्यों अधूरी है?

आज बहुत से लोग
मांस नहीं खाते,
जीव-हत्या नहीं करते,
संयम रखते हैं।

परंतु
क्रोध करते हैं,
निंदा करते हैं,
मन में दूसरों को नीचा दिखाते हैं।

यह बाहरी अहिंसा है
और आंतरिक हिंसा।

मुरली – 18 सितंबर 2024

“सच्ची अहिंसा है
मन को विकारों से मुक्त बनाना।”

विचारों की हिंसा क्या है?

क्रोध,
ईर्ष्या,
द्वेष,
घृणा,
निंदा,
बदले की भावना —
ये सब सूक्ष्म हिंसा हैं।

मुरली – 9 जून 2024

“जो मन से हिंसक है,
वह कर्म से भी हिंसक बनेगा।”

कोई व्यक्ति बोले कुछ नहीं,
पर उसकी दृष्टि और भावना
दूसरे को घायल कर देती है —
यह भी हिंसा है।

बी.के. ज्ञान में सच्ची अहिंसा

ब्रह्मा कुमारी ज्ञान कहता है —
सच्ची अहिंसा आत्म-स्मृति से आती है।

जब मैं स्वयं को आत्मा समझता हूँ
और सामने वाले को भी आत्मा देखता हूँ —

तो
क्रोध कम हो जाता है,
तुलना समाप्त होती है,
हिंसा की जड़ कट जाती है।

मुरली – 14 जुलाई 2024

“आत्म-स्मृति में रहने से
अहिंसा स्वभाव बन जाती है।”

अहिंसा और राजयोग का गहरा संबंध

राजयोग आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है,
आत्मा को शक्ति देता है
और विकारों की जड़ पर कार्य करता है।

मुरली – 2 अक्टूबर 2024

“योग से आत्मा पवित्र और शांत बनती है —
यही सच्ची अहिंसा है।”

अंधेरा हटाने के लिए डंडा नहीं,
प्रकाश चाहिए।

निष्कर्ष

सच्ची अहिंसा केवल हाथ से नहीं,
मन, बुद्धि और भावना से भी होती है।

शारीरिक अहिंसा आधार है,
विचारों की अहिंसा पूर्णता।

जब
विचार पवित्र हों,
भावना करुणामय हो,
और दृष्टि सम्मानपूर्ण हो —

तभी आत्मा कहलाती है
सच्ची अहिंसक आत्मा।

मुरली – 22 सितंबर 2024

“जो मन से अहिंसक है,
वही सच्चा धर्मात्मा है।”