(53)गीता के ज्ञान को ठीक से समझने की आवश्यकता-17
( प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“गीता का सच्चा ज्ञानदाता कौन? | श्रीकृष्ण या परमात्मा शिव? | गीता और मुरली का रहस्य”
“गीता का सच्चा ज्ञानदाता कौन?”
क्या हमने अब तक जिसे गीता का वक्ता माना है, वह वास्तव में वही है? आज इस रहस्य से परदा उठाते हैं…
1. गीता – सर्वशास्त्रमयी ग्रंथ, लेकिन…
गीता को सर्वशास्त्रमयी, राजविद्या, राजगुह्य कहा गया है।
यह केवल युद्ध का संवाद नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या है — परमात्मा की अमूल्य वाणी।
गीता का समापन श्लोक:
“इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे…”
यह दर्शाता है कि यह ग्रंथ किसी मनुष्य की नहीं, बल्कि परम सत्ता की वाणी है।
2. श्रीकृष्ण नहीं, परमात्मा शिव हैं गीता ज्ञानदाता
Murli (18 जनवरी 2025) से उद्धरण:
“बच्चे, श्रीकृष्ण तो देवता हैं, लेकिन गीता ज्ञानदाता मैं, परमपिता परमात्मा हूँ। मैं ब्रह्मा के तन में प्रवेश कर तुम आत्माओं को ज्ञान देता हूँ।”
श्रीकृष्ण की आत्मा इस ज्ञान को पहले पाया था, बोला नहीं था।
वह स्वयं देवता है, लेकिन ज्ञानदाता नहीं।
3. अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग
गीता श्लोक:
“गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः”
Murli भावार्थ:
हम आत्माएँ तीन गुणों — सतो, रजो, तमो — के चक्र में फँसी हैं।
परंतु इनसे पार जाने का ‘पुरुषोत्तम’ ज्ञान सिर्फ परमात्मा शिव ही देते हैं।
4. अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग
गीता श्लोक:
“पुरुषोत्तमयोगो नाम पंचदशोऽध्यायः”
Murli भावार्थ:
परमात्मा ही वह पुरुषोत्तम शिव है, जो आत्माओं को पतित से पावन बनाता है।
यह अव्यक्त ज्ञान ब्रह्मा के मुख से संगमयुग पर मिलता है।
5. अध्याय 16 – दैवासुर सम्पद्विभागयोग
गीता श्लोक:
“दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः”
Murli भावार्थ:
परमात्मा शिव कहते हैं:
“बच्चे, अब तुम दैवीगुणों को धारणा करो। आसुरी संस्कारों को समाप्त करो।”
यह परिवर्तन केवल परमात्म शक्ति से ही संभव है।
6. अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता श्लोक:
“श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः”
Murli भावार्थ:
सच्ची श्रद्धा वह है जो आत्मा को बाप से जोड़ दे।
श्रद्धा जो सत्य पुरुषार्थ कराए — वही सच्ची श्रद्धा है।
7. निष्कर्ष — गीता का सच्चा वक्ता कौन?
गीता का वक्ता श्रीकृष्ण नहीं, बल्कि परमपिता परमात्मा शिव हैं।
श्रीकृष्ण स्वयं ज्ञान के फल हैं, लेकिन ज्ञानदाता नहीं।
यह ज्ञान संगमयुग पर परमात्मा शिव द्वारा ब्रह्मा तन में प्रवेश कर दिया जाता है।
गीता और मुरली — दोनों के स्रोत एक ही हैं: परमात्मा शिव।
गीता का सच्चा ज्ञानदाता कौन? | प्रश्नोत्तर स्वरूप में रहस्योद्घाटन
प्रश्न 1: गीता को “सर्वशास्त्रमयी” क्यों कहा गया है?
उत्तर:क्योंकि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें ब्रह्मविद्या और राजयोग दोनों समाहित हैं। यह केवल युद्ध का संवाद नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला दिव्य ज्ञान है।
गीता समापन श्लोक में भी कहा गया है:
“इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे…”
प्रश्न 2: क्या श्रीकृष्ण गीता के सच्चे वक्ता हैं?
उत्तर:नहीं। श्रीकृष्ण एक देवता आत्मा हैं, जिन्हें यह ज्ञान प्राप्त हुआ, लेकिन दिया नहीं।
Murli (18 जनवरी 2025) में परमात्मा स्वयं कहते हैं:
“बच्चे, श्रीकृष्ण तो देवता हैं, लेकिन गीता ज्ञानदाता मैं, परमपिता परमात्मा हूँ।”
वे संगमयुग पर ब्रह्मा के तन में प्रवेश कर यह ज्ञान सुनाते हैं।
प्रश्न 3: अध्याय 14 (गुणत्रयविभागयोग) का आत्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर:यह अध्याय दर्शाता है कि आत्मा सतो, रजो, तमो — इन तीन गुणों के बंधन में है।
परंतु इनसे मुक्त कर ‘गुणातीत’ बनाने वाला ज्ञान सिर्फ परमात्मा शिव ही देते हैं।
प्रश्न 4: अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग) में “पुरुषोत्तम” कौन है?
उत्तर:“पुरुषोत्तम” कोई मनुष्य नहीं, बल्कि परमात्मा शिव हैं — जो सभी आत्माओं को पतित से पावन बनाते हैं।
ब्रह्मा के मुख से वह अव्यक्त ज्ञान देते हैं, जिससे आत्मा की स्थिति उच्च बनती है।
प्रश्न 5: अध्याय 16 (दैवासुर संपत्ति) से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:परमात्मा शिव हमें निर्देश देते हैं कि हम दैवी संस्कार अपनाएं और आसुरी गुणों का त्याग करें।
यह परिवर्तन केवल परमात्मा के योगबल और ज्ञान से संभव है।
प्रश्न 6: अध्याय 17 (श्रद्धा त्रय विभाग) की मुरली व्याख्या क्या है?
उत्तर:सच्ची श्रद्धा वही है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ दे और सत्य पुरुषार्थ के मार्ग पर चलाए।
बाबा कहते हैं — “श्रद्धा में शक्ति है, लेकिन वो श्रद्धा सत्य होनी चाहिए।”
प्रश्न 7: गीता और मुरली का आपसी संबंध क्या है?
उत्तर:गीता और मुरली — दोनों का ज्ञान स्रोत एक ही है: परमपिता परमात्मा शिव।
गीता उस ज्ञान का ऐतिहासिक स्मृति रूप है, जो संगमयुग पर ब्रह्मा मुख द्वारा दिया गया।
Disclaimer (अस्वीकरण):
इस वीडियो का उद्देश्य शास्त्रों, मुरली वचनों एवं आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से आध्यात्मिक रहस्यों का प्रकाशन करना है।
यह किसी व्यक्ति, मत, परंपरा या आस्था की निंदा नहीं करता।
उद्देश्य केवल सत्य की खोज है — “जो जैसा है, वैसा स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करना।”
यह ज्ञान ब्रह्माकुमारी संस्था की शिक्षाओं व मुरली महावाक्यों पर आधारित है।
सभी दर्शकों से निवेदन है कि वे इसे खुले हृदय व विवेक से समझें।
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