6-4 How is liberation possible while still alive?

J.D.BK 6-4 जीवन में रहते हुए मुक्ति कैसे संभव है?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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जीवन रहते हुए भी मुक्ति – क्या यह संभव है?

आमतौर पर यह धारणा बनी हुई है कि
मुक्ति मृत्यु के बाद मिलती है
 शरीर है तो बंधन है

पर एक गहरा प्रश्न उठता है—

यदि मुक्ति केवल मरने के बाद ही संभव है,
तो जीते-जी आध्यात्मिक पुरुषार्थ का अर्थ क्या रहा?

 मुरली नोट

मुरली – 12 अगस्त 2024

“यदि मुक्ति केवल मरने के बाद होती,
तो जीते-जी पुरुषार्थ की आवश्यकता ही नहीं रहती।”


अध्याय 2️⃣

जीवन मुक्ति का वास्तविक अर्थ

जीवन मुक्ति का अर्थ है—
✔ जीवन भी हो
✔ और मुक्ति भी हो

  • शरीर + आत्मा = जीवन

  • शरीर छूटने के बाद = आत्मा की स्थिति, जीवन मुक्ति नहीं

 इसलिए जीवन मुक्ति केवल सतयुग की बात नहीं,
 उसका अनुभव कलयुग में भी संभव है


अध्याय 3️⃣

जैन दर्शन में मुक्ति और जीवन की भूमिका

जैन दर्शन स्पष्ट कहता है—

  • आत्मा स्वभाव से शुद्ध है

  • कर्म बंधन आत्मा को बांधते हैं

  • कर्मों का हिसाब पूर्ण होने पर मोक्ष प्राप्त होता है

लेकिन एक महत्वपूर्ण सत्य यह भी है—

मुक्ति की तैयारी जीवन में ही होती है

🔹 मुख्य बिंदु

  • संयम

  • तप

  • सम्यक दर्शन

ये सब जीते-जी किए जाते हैं।


 परमधाम और कर्मिक अकाउंट

  • परमधाम में कोई कर्मिक अकाउंट नहीं बनता

  • कर्म केवल शरीर में रहते हुए बनते और समाप्त होते हैं

 इसलिए शरीर रहते हुए
बंधन कम किया जा सकता है
 आत्मा हल्की और स्वतंत्र अनुभव कर सकती है


🔹 उदाहरण

जेल में रहते हुए भी कैदी मानसिक रूप से स्वतंत्र हो सकता है
जब उसे यह बोध हो जाए—

“मैं आत्मा हूँ,
यह ड्रामा अनुसार है।”

यह स्मृति
✔ मन को हल्का करती है
✔ दुख का भार कम कर देती है


अध्याय 4️⃣

ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान में जीवन मुक्ति

जीवन मुक्ति को समझने से पहले
जीवन बंधन को समझना जरूरी है।

बंधन कैसे बनता है?

  • देह अभिमान में किए गए कर्म

  • आत्म विस्मृति

  • गलत पहचान

🔹 मुरली नोट

मुरली – 25 मई 2024

“बंधन शरीर में नहीं,
आत्मा की गलत पहचान से बनते हैं।”


जीवन मुक्ति =

  • शरीर है

  • कर्म हैं

  • लेकिन बंधन नहीं

बंधन मन और चेतना में होता है,
शरीर में नहीं।


🔹 उदाहरण

सोने की चेन

  • हाथ में हो → आभूषण

  • गले में कस जाए → बंधन

वस्तु वही,
अनुभव बदल गया।


अध्याय 5️⃣

आत्म स्मृति – जीवन मुक्ति की पहली सीढ़ी

“मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं”

आत्म स्मृति से—

  • भय कम होता है

  • अपेक्षाएँ घटती हैं

  • दूसरों से निर्भरता समाप्त होती है

🔹 मुरली नोट

मुरली – 18 सितंबर 2024

“आत्म स्मृति में रहने से
बंधन स्वतः टूटने लगते हैं।”


अध्याय 6️⃣

ईश्वर स्मृति और राजयोग – शक्ति का स्रोत

केवल आत्म स्मृति पर्याप्त नहीं।
आत्मा को शक्ति चाहिए।

राजयोग में—

  • आत्मा परमात्मा से जुड़ती है

  • विकारों की जड़ पर कार्य होता है

  • पुराने कर्म कटते जाते हैं

🔹 मुरली नोट

मुरली – 14 जुलाई 2024

“राजयोग से आत्मा शक्तिशाली बनती है
और शक्ति ही मुक्ति का आधार है।”


अध्याय 7️⃣

जीवन रहते हुए मुक्ति के पाँच व्यवहारिक लक्षण

जीवन मुक्त आत्मा—

1️⃣ परिस्थितियों से नहीं डरती
2️⃣ दूसरों को दोष नहीं देती
3️⃣ अपेक्षाओं से मुक्त रहती है
4️⃣ सम्मान देती है, मांगती नहीं
5️⃣ दुख को अनुभव नहीं, सीख मानती है

🔹 मुरली नोट

मुरली – 27 जुलाई 2024

“जो परिस्थितियों से स्वतंत्र है
वही जीवन मुक्त है।”


अध्याय 8️⃣

क्या संसार छोड़ना जरूरी है?

 नहीं।

  • बंधन स्थान से नहीं

  • स्थिति से है

🔹 मुरली नोट

मुरली – 30 जून 2024

“संसार छोड़ने से नहीं,
देह अभिमान छोड़ने से मुक्ति है।”

 कमल फूल का उदाहरण

कीचड़ में रहते हुए भी
उससे न्यारा।


अध्याय 9️⃣

संगम युग – जीवन मुक्ति का विशेष समय

अभी संगम युग है—

  • परमात्मा स्वयं ज्ञान देते हैं

  • राजयोग सिखाते हैं

  • जीवन मुक्ति का अधिकार देते हैं

🔹 मुरली नोट

मुरली – 4 सितंबर 2024

“संगम युग में ही आत्माएँ
जीवन मुक्ति का अनुभव करती हैं।”


 निष्कर्ष

✔ मुक्ति केवल मृत्यु के बाद नहीं
जीवन रहते हुए भी संभव है

जैन दर्शन:
मुक्ति की तैयारी जीवन में।

ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान:
आत्म स्मृति + ईश्वर स्मृति =
विकारों से स्वतंत्रता = सच्ची जीवन मुक्ति

🔹 अंतिम मुरली

मुरली – 22 सितंबर 2024

“सच्ची मुक्ति है—
जीते-जी दुखों से स्वतंत्रता।”

जीवन रहते हुए भी मुक्ति – क्या यह संभव है?


प्रश्न 1️⃣: आम धारणा क्या है मुक्ति के बारे में?

उत्तर:
आमतौर पर यह मान्यता बनी हुई है कि मुक्ति मृत्यु के बाद मिलती है।
लोग सोचते हैं कि जब तक शरीर है तब तक बंधन है और शरीर छूटते ही आत्मा मुक्त हो जाती है।


प्रश्न 2️⃣: यदि मुक्ति केवल मृत्यु के बाद ही है, तो जीते-जी पुरुषार्थ का क्या अर्थ है?

उत्तर:
यदि मुक्ति केवल मरने के बाद ही संभव होती, तो जीवन में आध्यात्मिक पुरुषार्थ करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती।
लेकिन मुरली स्पष्ट कहती है—

मुरली (12 अगस्त 2024):
“यदि मुक्ति केवल मरने के बाद होती, तो जीते-जी पुरुषार्थ की आवश्यकता ही नहीं रहती।”

इससे स्पष्ट है कि मुक्ति का अनुभव जीवन में ही संभव है।


प्रश्न 3️⃣: जीवन मुक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
जीवन मुक्ति का अर्थ है—
✔ जीवन भी हो
✔ और मुक्ति भी हो

जब आत्मा और शरीर साथ हैं, वही जीवन है।
शरीर छूटने के बाद आत्मा की स्थिति होती है, उसे जीवन मुक्ति नहीं कहा जा सकता।


प्रश्न 4️⃣: क्या जीवन मुक्ति केवल सतयुग में ही संभव है?

उत्तर:
नहीं।
जीवन मुक्ति का अनुभव कलयुग में भी किया जा सकता है, विशेष रूप से संगम युग में, जब आत्मा को सत्य ज्ञान और राजयोग की प्राप्ति होती है।


प्रश्न 5️⃣: जैन दर्शन में मुक्ति को कैसे समझाया गया है?

उत्तर:
जैन दर्शन के अनुसार—
✔ आत्मा स्वभाव से शुद्ध है
✔ कर्म बंधन आत्मा को बांधते हैं
✔ कर्मों का हिसाब पूर्ण होने पर मोक्ष मिलता है

लेकिन जैन दर्शन यह भी स्पष्ट करता है कि मुक्ति की तैयारी जीवन में ही होती है।


प्रश्न 6️⃣: जैन दर्शन के अनुसार मुक्ति की तैयारी कैसे होती है?

उत्तर:
मुक्ति की तैयारी जीते-जी होती है—
✔ संयम
✔ तप
✔ सम्यक दर्शन
के माध्यम से।

ये सभी साधन शरीर रहते हुए ही किए जाते हैं।


प्रश्न 7️⃣: परमधाम और कर्मिक अकाउंट का क्या संबंध है?

उत्तर:
परमधाम में कोई कर्मिक अकाउंट नहीं बनता।
कर्म केवल शरीर में रहते हुए बनते और समाप्त होते हैं।
इसलिए शरीर रहते हुए ही बंधन कम किए जा सकते हैं और आत्मा हल्की अनुभव कर सकती है।


प्रश्न 8️⃣: क्या कोई व्यक्ति बंधन में रहते हुए भी मुक्त अनुभव कर सकता है?

उत्तर:
हाँ।
जैसे जेल में रहते हुए भी कोई कैदी मानसिक रूप से स्वतंत्र हो सकता है,
जब उसे यह स्मृति हो जाए—

“मैं आत्मा हूँ, यह ड्रामा अनुसार है।”

यह स्मृति मन को हल्का कर देती है।


प्रश्न 9️⃣: ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान में जीवन मुक्ति को कैसे समझाया गया है?

उत्तर:
बी.के. ज्ञान के अनुसार—
बंधन शरीर से नहीं, आत्मा की गलत पहचान से बनते हैं।

मुरली (25 मई 2024):
“बंधन शरीर में नहीं, आत्मा की गलत पहचान से बनते हैं।”


प्रश्न 🔟: जीवन मुक्ति की स्थिति क्या होती है?

उत्तर:
जीवन मुक्ति की स्थिति में—
✔ शरीर होता है
✔ कर्म होते हैं
✔ लेकिन बंधन नहीं होता

बंधन मन और चेतना में होता है, शरीर में नहीं।


प्रश्न 1️⃣1️⃣: आत्म स्मृति जीवन मुक्ति में कैसे सहायक है?

उत्तर:
“मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं”—
यह आत्म स्मृति जीवन मुक्ति की पहली सीढ़ी है।

इससे—
✔ भय कम होता है
✔ अपेक्षाएँ घटती हैं
✔ दूसरों पर निर्भरता समाप्त होती है

मुरली (18 सितंबर 2024):
“आत्म स्मृति में रहने से बंधन स्वतः टूटने लगते हैं।”


प्रश्न 1️⃣2️⃣: क्या केवल आत्म स्मृति पर्याप्त है?

उत्तर:
नहीं।
आत्मा को शक्ति भी चाहिए।

राजयोग द्वारा आत्मा परमात्मा से जुड़ती है,
विकारों की जड़ पर कार्य होता है और पुराने कर्म कटते जाते हैं।

मुरली (14 जुलाई 2024):
“राजयोग से आत्मा शक्तिशाली बनती है और शक्ति ही मुक्ति का आधार है।”


प्रश्न 1️⃣3️⃣: जीवन मुक्त आत्मा के व्यवहारिक लक्षण क्या हैं?

उत्तर:
जीवन मुक्त आत्मा—
1️⃣ परिस्थितियों से नहीं डरती
2️⃣ दूसरों को दोष नहीं देती
3️⃣ अपेक्षाओं से मुक्त रहती है
4️⃣ सम्मान देती है, मांगती नहीं
5️⃣ दुख को सीख मानती है, बोझ नहीं

मुरली (27 जुलाई 2024):
“जो परिस्थितियों से स्वतंत्र है वही जीवन मुक्त है।”


प्रश्न 1️⃣4️⃣: क्या जीवन मुक्ति के लिए संसार छोड़ना आवश्यक है?

उत्तर:
नहीं।
बंधन स्थान से नहीं, स्थिति से है।

मुरली (30 जून 2024):
“संसार छोड़ने से नहीं, देह अभिमान छोड़ने से मुक्ति है।”

कमल फूल की तरह—
कीचड़ में रहते हुए भी उससे न्यारा।


प्रश्न 1️⃣5️⃣: संगम युग का जीवन मुक्ति में क्या महत्व है?

उत्तर:
संगम युग वह विशेष समय है जब—
✔ परमात्मा स्वयं ज्ञान देते हैं
✔ राजयोग सिखाते हैं
✔ जीवन मुक्ति का अधिकार देते हैं

मुरली (4 सितंबर 2024):
“संगम युग में ही आत्माएँ जीवन मुक्ति का अनुभव करती हैं।”


निष्कर्ष:

✔ मुक्ति केवल मृत्यु के बाद नहीं
✔ जीवन रहते हुए भी संभव है

जैन दर्शन:
मुक्ति की तैयारी जीवन में।

ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान:
आत्म स्मृति + ईश्वर स्मृति
= विकारों से स्वतंत्रता
= सच्ची जीवन मुक्ति।

डिस्क्लेमर

यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य जैन दर्शन के मोक्ष सिद्धांत या किसी भी धार्मिक मान्यता की आलोचना करना नहीं है।

यह प्रस्तुति जैन दर्शन और ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान में जीवन-मुक्ति की अवधारणा को आत्मिक अध्ययन और समझ के उद्देश्य से प्रस्तुत करती है, ताकि आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध हो और जीवन में मुक्ति को धारण किया जा सके।
दर्शक इसे आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण करें।

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