(60)Confusion created by the name ‘Krishna’

(60)’कृष्ण’ नाम से बना भ्रम

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“गीता का भगवान कौन? | कृष्ण नाम से बना भ्रम | असली भगवान की पहचान | 


ओम् शांति

ओम् शांति।
आज हम ‘गीता का भगवान कौन?’ इस शृंखला का सातवां विषय ले रहे हैं —
“कृष्ण नाम से बना भ्रम”।

बहुत गहन विषय है,
क्योंकि ‘कृष्ण’ नाम से आज तक एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक भ्रम बना हुआ है।


1. क्या गीता श्रीकृष्ण ने सुनाई थी?

आज तक लगभग हर कोई मानता है कि गीता का उपदेश मोर मुकुटधारी श्रीकृष्ण ने दिया।
लेकिन प्रश्न यह उठता है:
क्या वास्तव में गीता श्रीकृष्ण ने सुनाई थी?
या फिर, ‘कृष्ण’ नाम किसी विशेष गुणों से युक्त परम सत्ता का प्रतीक है?


2. कृष्ण – संज्ञावाचक या गुणवाचक नाम?

यह समझना ज़रूरी है कि ‘कृष्ण’ नाम क्या किसी शरीर या व्यक्ति का नाम है,
या यह कोई गुणवाचक विशेषण है?

उदाहरण:
जैसे “प्रेम कुटी” किसी भवन का नाम हो सकता है,
पर उसमें रहने वाले व्यक्ति का नाम कुछ और हो सकता है।
वैसे ही, शरीर और आत्मा के नाम अलग होते हैं।

गीता श्लोक प्रमाण:
“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय…”
आत्मा शरीर बदलती है,
शरीर वस्त्र है — आत्मा अमर है।

तो आत्मा का नाम ‘कृष्ण’ नहीं हो सकता।
कृष्ण नाम शरीर का नहीं — गुणों का परिचय है।


3. कृष्ण नाम के 6 आध्यात्मिक अर्थ

अब देखते हैं कृष्ण नाम के गुणवाचक और आध्यात्मिक अर्थ:

  1. जो भक्तों के मन को अपनी ओर आकर्षित करे — आकर्षण केंद्र।

  2. “कृष्” = सत्ता, “ण” = आनंद → सत-चित-आनंद स्वरूप।

  3. जो संपूर्ण आत्माओं को अंत समय में खींच ले — “मैं सबको अंत में ले जाता हूँ।”

  4. पापों का नाश करने वाला।

  5. जो शत्रुओं को भी अपने बल से वश में करे।

  6. जो दुर्लभ पुरुषार्थ कराए।

इन सभी गुणों का वर्णन परमात्मा शिव में ही फिट बैठता है —
निराकार, ज्योति बिंदु, सर्वशक्तिमान।


4. गीता में आए अन्य दिव्य नाम

गीता में ‘कृष्ण’ के साथ-साथ ये नाम भी आए हैं:

  • अच्युत – जो अपनी स्थिति से कभी नहीं गिरता।

  • आदि पुरुष – सबसे पहले, सबका आदि।

  • जनार्दन – जो जनता की पुकार सुनता है।

  • गोविंद – इंद्रियों का स्वामी।

  • ऋषिकेश – इंद्रियों का नियंत्रक।

  • केशव – ब्रह्मा और शंकर को भी संपूर्ण ज्ञान देने वाला।

इन सब गुणों में कोई मनुष्य फिट नहीं बैठता।
सिर्फ शिव बाबा — निराकार परमात्मा — इन गुणों के अधिकारी हैं।


5. गीता में ‘कृष्ण’ का नाम कैसे आया?

‘कृष्ण’ नाम गीता में सांकेतिक रूप से प्रयुक्त हुआ है।
भगवान ने स्वयं कहा:
“प्रयाण काले मनसा अचलं भक्त्वा…”
शरीर छोड़ते समय जो परम पुरुष को याद करता है, वही परम गति को प्राप्त करता है।

परम पुरुष कौन?
कोई देहधारी नहीं,
बल्कि निराकार परमात्मा शिव


6. ब्रह्माकुमारी मुरली प्रमाण

मुरली में कहा गया है:
“पुरानी गीता का अंत तब होता है जब चैतन्य गीता प्रैक्टिकल में आती है।”
और चैतन्य गीता कौन लाता है?
शिव बाबा — स्वयं आकर ज्ञान दे रहे हैं,
अब देहधारी नहीं, स्वयं अशरीरी परमात्मा


7. निष्कर्ष – कृष्ण नाम का असली अर्थ

कृष्ण नाम देहधारी श्रीकृष्ण का नहीं,
बल्कि दिव्य आत्मा स्वरूप परमात्मा शिव का है।

जो

  • स्वयं प्रकट हुए हैं,

  • ज्ञान दे रहे हैं,

  • आत्माओं को पावन बना रहे हैं,

  • कल्याण कर रहे हैं।

अब भ्रम से निकलें।
भगवान को शरीर में नहीं,
ज्योति स्वरूप में पहचानें।

गीता का भगवान कौन है? | भगवान का दिव्य स्वरूप क्या है? |


ओम् शांति।

आज हम चर्चा करेंगे गीता के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर –
“भगवान का दिव्य स्वरूप कौन है?”

यह हमारा 59वां विषय है –
गीता का भगवान कौन?
क्या श्रीकृष्ण ही गीता के भगवान हैं?
या कोई और?


प्रश्न 1: गीता का भगवान कौन है – श्रीकृष्ण या कोई और?

उत्तर:श्रीकृष्ण तो एक दैवी आत्मा का देहधारी रूप है।
पर गीता में भगवान स्वयं कहते हैं:
“मैं अजन्मा हूं, अविनाशी हूं, निराकार हूं।”

 अतः गीता का भगवान कोई मनुष्य नहीं, बल्कि
परमात्मा शिव हैं – दिव्य ज्योति बिंदु स्वरूप


प्रश्न 2: गीता में भगवान का स्वरूप कैसे बताया गया है?

उत्तर:अध्याय 13, श्लोक 33-34 में कहा गया:

  • “जैसे आकाश लिप्त नहीं होता, वैसे आत्मा भी शरीर से लिप्त नहीं होती।”

  • “जैसे एक सूर्य सारे जगत को प्रकाशित करता है, वैसे आत्मा शरीर को चेतना देती है।”

 इसका अर्थ: भगवान है – निर्लिप्त, चेतना स्वरूप, बिंदु आत्मा।


प्रश्न 3: श्रीकृष्ण को ही गीता का भगवान क्यों मान लिया गया?

उत्तर:क्योंकि गीता का उपदेश युद्ध भूमि में श्रीकृष्ण द्वारा बोला बताया गया।
लेकिन गीता के श्लोकों में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ “श्रीकृष्ण” शब्द आया हो।

श्रीकृष्ण माध्यम थे।
ज्ञानदाता परमात्मा शिव हैं – जो उनके द्वारा बोले।


प्रश्न 4: आत्मा और परमात्मा – क्या दोनों बिंदु हैं?

उत्तर (मुरली प्रमाण सहित):

26 अप्रैल 1971 की मुरली:

“आत्मा एक तारे समान बिंदु है… शरीर को वही चलाती है।”
“परमात्मा भी वैसी ही सूक्ष्म है।”

18 दिसंबर 1985 की मुरली:

“बच्चे, आत्मा और परमात्मा दोनों ही दिव्य ज्योति बिंदु हैं।”


प्रश्न 5: आत्मा और परमात्मा में क्या समानताएं हैं?

गुण आत्मा परमात्मा
स्वरूप बिंदु बिंदु
स्थिति भृकुटि में ब्रह्मा तन में
कर्म करता प्रेरक
भोग भोक्ता अभोक्ता
लिप्तता कभी लिप्त होती कभी लिप्त नहीं

प्रश्न 6: गीता में ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ का अर्थ क्या है?

उत्तर:

  • क्षेत्र = शरीर

  • क्षेत्रज्ञ = आत्मा (ज्ञान देने वाला)

भगवान कहते हैं:

“मैं क्षेत्रज्ञ हूं, न कि क्षेत्र।”
 भगवान देह नहीं है, देही का जानने वाला है।


प्रश्न 7: क्या आत्मा और परमात्मा किसी यंत्र से देखे जा सकते हैं?

उत्तर:नहीं।
मुरली कहती है –

“दोनों इतने सूक्ष्म हैं कि कोई यंत्र उन्हें नहीं देख सकता।”

 उन्हें केवल अनुभव व योगबल से जाना जा सकता है।


प्रश्न 8: गीता का भगवान कब आता है?

उत्तर:जब धरती पर धर्म ग्लानि होती है।
संगम युग पर परमात्मा शिव आते हैं –

“धर्म की हानि होने पर मैं आता हूं।”

श्रीकृष्ण तो सतयुग का जन्म है,
तब गीता का उपदेश संगम पर किसने दिया?
 परमात्मा शिव ने।


प्रश्न 9: परमात्मा के बारे में मुरली क्या बताती है?

उत्तर:27 जून 1994 की मुरली:

“बच्चे, तुम आत्मा हो, शरीर नहीं।”
“आत्मा शरीर के लिए कर्म करती है।”

परमात्मा कभी देह धारण नहीं करता।
वह ज्ञान का सूर्य बनकर शिवबाबा कहलाता है।


प्रश्न 10: निष्कर्ष – गीता का भगवान कौन?

उत्तर:न श्रीकृष्ण, न कोई मानव रूप –
बल्कि परमात्मा शिव,
जो स्वयं कहते हैं:

“मैं अजन्मा, अविनाशी, निराकार, दिव्य बिंदु हूँ।”

 Disclaimer:

यह वीडियो एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है जिसका उद्देश्य आत्म-चिंतन और गहराई से समझ विकसित करना है।
यह किसी धर्म, व्यक्ति, या परंपरा की आलोचना नहीं करता, बल्कि शास्त्रीय ग्रंथों और आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर स्पष्टता लाने का प्रयास करता है।

वीडियो में व्यक्त विचार ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक ज्ञान से प्रेरित हैं।
कृपया इसे खुले मन और शांत चित्त से सुनें। ओम् शांति।

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