(84)स्वाध्याय से ही इन्द्रिय निग्रह सम्भव
स्वाध्याय से ही इन्द्रिय निग्रह सम्भव | गीता की असली शिक्षा |
मुख्य भाषण (Speech with Headings)
1. गीता – केवल दार्शनिक ग्रंथ नहीं
-
गीता जीवन की व्यवहारिक शिक्षा देती है।
-
यह हमें दैवी सम्पदा को धारण करने और आसुरी प्रवृत्तियों को त्यागने की प्रेरणा देती है।
-
श्रेष्ठ आचरण का आधार – इन्द्रिय-निग्रह।
2. इन्द्रिय लोलुपता – भ्रष्ट आचरण का कारण
-
इन्द्रियों पर नियंत्रण न होने से पापाचार बढ़ता है।
-
जिह्वा का संयम न होना – चुगली, निन्दा और विवाद का कारण।
-
आंखों और अन्य इन्द्रियों का दुरुपयोग – व्यसन, भ्रष्टाचार, हिंसा और लोभ का कारण।
-
मूल कारण – मन पर इन्द्रियों का हावी होना।
3. स्वाध्याय – इन्द्रिय नियंत्रण का उपाय
-
भगवान गीता में कहते हैं – “नित्य स्वाध्याय करो।”
-
स्वाध्याय से बुद्धि निर्मल होती है।
-
निर्मल बुद्धि मन को नियंत्रित करती है।
-
नियंत्रित मन इन्द्रियों को वश में करता है।
-
उदाहरण: जो रोज मुरली का अध्ययन करते हैं, वे विकारों को जीतते हैं।
4. अन्य दैवी गुण – क्षमा, सन्तुष्टता, सरलता
-
क्षमा – अपकार होने पर भी क्षमा समाज में वैर मिटाती है।
-
सन्तुष्टता – लोभ, शोषण और मुकदमों को समाप्त करती है।
-
सरलता – विश्वास, सहानुभूति और ईश्वर की सहायता दिलाती है।
5. मुरली वचन
सा. मुरली 21 जुलाई 2025
“बच्चे, स्वाध्याय ही इन्द्रिय जीतने का मार्ग है। जो ज्ञान में टिके रहते हैं, वे ही मन को जीत पाते हैं। मन पर जीत है तो इन्द्रियां स्वतः वश में हो जाती हैं।”
निष्कर्ष
-
इन्द्रिय-निग्रह ही श्रेष्ठ आचरण की नींव है।
-
यह केवल स्वाध्याय, योग और ईश्वरीय स्मृति से ही सम्भव है।
स्वाध्याय से ही इन्द्रिय निग्रह सम्भव – प्रश्नोत्तर रूप में गीता का ज्ञान
प्रश्न 1: गीता केवल दार्शनिक ग्रंथ है या कुछ और?
उत्तर: गीता केवल दार्शनिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन की व्यवहारिक शिक्षा देने वाली संहिता है जो हमें दैवी सम्पदा धारण करना और आसुरी प्रवृत्तियों को त्यागना सिखाती है।
प्रश्न 2: भ्रष्ट आचरण का मूल कारण क्या है?
उत्तर: भ्रष्ट आचरण का मूल कारण इन्द्रिय लोलुपता है। जब इन्द्रियां मन पर हावी हो जाती हैं, तो मनुष्य चुगली, निन्दा, व्यसन, हिंसा, लोभ और भ्रष्टाचार की ओर बढ़ता है।
प्रश्न 3: इन्द्रिय नियंत्रण का सबसे प्रभावी उपाय क्या है?
उत्तर: भगवान गीता में कहते हैं – नित्य स्वाध्याय करो। स्वाध्याय बुद्धि को निर्मल करता है, बुद्धि मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है। यही इन्द्रिय-निग्रह का मार्ग है।
प्रश्न 4: अन्य दैवी गुण कौन से हैं जो इन्द्रिय-निग्रह में सहायक हैं?
उत्तर: क्षमा, सन्तुष्टता और सरलता जैसे दैवी गुण इन्द्रिय-निग्रह को मजबूत करते हैं। क्षमा वैर समाप्त करती है, सन्तुष्टता लोभ मिटाती है और सरलता ईश्वर की सहायता को आकर्षित करती है।
प्रश्न 5: मुरली में इन्द्रिय-निग्रह के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर: 21 जुलाई 2025 की मुरली में कहा गया –
“बच्चे, स्वाध्याय ही इन्द्रिय जीतने का मार्ग है। जो ज्ञान में टिके रहते हैं, वे ही मन को जीत पाते हैं। मन पर जीत है तो इन्द्रियां स्वतः वश में हो जाती हैं।”
Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है।
इसका उद्देश्य केवल आत्म-उन्नति और जीवन मूल्यों को समझाने का है।
किसी भी धर्म, पंथ या परंपरा की आलोचना करना इसका उद्देश्य नहीं है।
दर्शकों से निवेदन है कि इसे केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें।
Self-study, Indriya Nigraha, Gita Gyan, Divine Wealth, Demonic Wealth, Brahma Kumaris, Shivbaba, Murli Saar, Spiritual Education, Knowledge of Soul, Rajyoga, BK Dr Surender Sharma, Om Shanti Gyan, Code of Life, Spiritual Guidance,
स्वाध्याय, इन्द्रिय निग्रह, गीता ज्ञान, दैवी सम्पदा, आसुरी सम्पदा, ब्रह्माकुमारीज, शिवबाबा, मुरली सार, आध्यात्मिक शिक्षा, आत्मा का ज्ञान, राजयोग, बीके डॉ. सुरेंद्र शर्मा, ओम शांति ज्ञान, जीवन संहिता, आध्यात्मिक उपदेश,

