अव्यक्त मुरली-(22)04-04-1984 “संगमयुग की श्रेष्ठ वेला, श्रेष्ठ तकदीर की तस्वीर बनाने की वेला”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
04-04-1984 “संगमयुग की श्रेष्ठ वेला, श्रेष्ठ तकदीर की तस्वीर बनाने की वेला”
आज बापदादा हरेक ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्मा के श्रेष्ठ जीवन के जन्म की वेला, तकदीर की रेखा देख रहे थे। जन्म की वेला सभी बच्चों की श्रेष्ठ हैं क्योंकि अभी युग ही पुरुषोत्तम श्रेष्ठ है। श्रेष्ठ संगमयुग पर अर्थात् श्रेष्ठ वेला में सभी का श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म हुआ। जन्म, वेला सभी की श्रेष्ठ है। तकदीर की रेखा, तकदीर भी सभी ब्राह्मणों की श्रेष्ठ है क्योंकि श्रेष्ठ बाप के शिव वंशी ब्रह्माकुमार वा कुमारी हैं। तो श्रेष्ठ बाप, श्रेष्ठ जन्म, श्रेष्ठ वर्सा, श्रेष्ठ परिवार, श्रेष्ठ खजाने – यह तकदीर की लकीर जन्म से सभी की श्रेष्ठ है। वेला भी श्रेष्ठ और प्राप्ति के कारण तकदीर की लकीर भी श्रेष्ठ है। यह तकदीर सभी बच्चों को एक बाप द्वारा एक जैसी प्राप्त है, इसमें अन्तर नहीं है। फिर भी एक जैसी तकदीर प्राप्त होते भी नम्बरवार क्यों? बाप एक, जन्म एक, वर्सा एक, परिवार एक, वेला भी एक संगमयुग, फिर नम्बर क्यों? सर्व प्राप्ति अर्थात् तकदीर सभी को बेहद की मिली है। अन्तर क्या हुआ? बेहद की तकदीर को जीवन के कर्म की तस्वीर में लाना इसमें यथाशक्ति होने के कारण अन्तर पड़ जाता है। ब्राह्मण जीवन अर्थात् तकदीर को तस्वीर में लाना, जीवन में लाना। हर कर्म में लाना, हर संकल्प से, बोल से, कर्म से तकदीरवान को तकदीर अनुभव हो अर्थात् दिखाई दे। ब्राह्मण अर्थात् तकदीरवान आत्मा के नयन, मस्तक, मुख की मुस्कराहट हर कदम सभी को श्रेष्ठ तकदीर की अनुभूति करावे, इसको कहा जाता है – तकदीर की तस्वीर बनाना। तकदीर को अनुभव की कलम से, कर्म के कागज की तस्वीर में लाना। तकदीर के तस्वीर की चित्र रेखा बनाना। तस्वीर तो सभी बना रहे हो लेकिन किसकी तस्वीर सम्पन्न है और किसकी तस्वीर कुछ न कुछ किसी बात में कम रह जाती है अर्थात् प्रैक्टिकल जीवन में लाने में किसकी मस्तक रेखा अर्थात् मन्सा, नयन रेखा अर्थात् रुहानी दृष्टि, मुख की मुस्कराहट की रेखा अर्थात् सदा सर्व प्राप्ति स्वरुप सन्तुष्ट आत्मा। सन्तुष्टता ही मुस्कराहट की रेखा है। हाथों की रेखा अर्थात् श्रेष्ठ कर्म की रेखा। पांव की रेखा अर्थात् हर कदम श्रीमत प्रमाण चलने की शक्ति। इसी प्रकार तकदीर की तस्वीर बनाने में किसका किसमें, किसका किसमें अन्तर पड़ जाता है। जैसे स्थूल तस्वीर भी बनाते हैं तो कोई को नैन नहीं बनाने आते, कोई को टांग नहीं बनाने आती। कोई मुस्कराहट नहीं बना सकते। तो फर्क पड़ जाता है ना। जितना सम्पन्न चित्र उतना मूल्यवान होता है। वो ही एक का चित्र लाखों का मूल्य कमाता और कोई 100 भी कमाता। तो अन्तर किस बात का हुआ? सम्पन्नता का। ऐसे ही ब्राह्मण आत्मायें भी सर्व रेखाओं में सम्पन्न न होने कारण किसी एक रेखा, दो रेखा की सम्पूर्णता न होने कारण नम्बरवार हो जाते हैं।
तो आज तकदीरवान बच्चों की तस्वीर देख रहे थे। जैसे स्थूल तकदीर में भी भिन्न-भिन्न तकदीर होती है। वैसे यहाँ तकदीर की भिन्न-भिन्न तस्वीरें देखी। हर तस्वीर में मुख्य मस्तक और नयन तस्वीर की वैल्यु बढ़ाते हैं। वैसे यहाँ भी मनसा वृत्ति की शक्ति और नयन रुहानी दृष्टि की शक्ति, इसका ही महत्व होता है। यही तस्वीर का फाउण्डेशन है। सभी अपनी तस्वीर को देखो कि हमारी तस्वीर कितनी सम्पन्न बनी है। ऐसी तस्वीर बनी है जो तस्वीर में तकदीर बनाने वाला दिखाई दे। हर एक रेखा को चेक करो। इसी कारण नम्बर हो जाता है। समझा।
दाता एक है, देता भी एक जैसा है। लेकिन बनाने वाले बनाने में नम्बरवार हो जाते। कोई अष्ट और ईष्ट देव बन जाते। कोई देव बन जाते। कोई देवों को देख-देख हर्षित होने वाले हो जाते। अपना चित्र देख लिया ना। अच्छा।
साकार रुप में मिलने में तो समय और संख्या को देखना पड़ता और अव्यक्त मिलन में समय और संख्या की बात नहीं है। अव्यक्त मिलन के अनुभवी बन जायेंगे तो अव्यक्त मिलन के विचित्र अनुभव सदा करते रहेंगे। बापदादा बच्चों के सदा आज्ञाकारी हैं। इसलिए अव्यक्त होते भी व्यक्त में आना पड़ता है। लेकिन बनना क्या है? अव्यक्त बनना है ना या व्यक्त में आना है? अव्यक्त बनो। अव्यक्त बनने से बाप के साथ निराकार बन घर में चलेंगे। अभी वाया की स्टेज तक नहीं पहुँचे हो। फरिश्ता स्वरुप से निराकार बन घर जा सकेंगे। तो अभी फरिश्ता स्वरुप बने हो! तकदीर की तस्वीर सम्पन्न की है? सम्पन्न तस्वीर ही फरिश्ता है। अच्छा।
सभी आये हुए भिन्न-भिन्न ज़ोन के बच्चों को हर एक ज़ोन की विशेषता सहित बापदादा देख-देख हर्षित हो रहे हैं। कोई भाषा भले नहीं जानते लेकिन प्रेम और भावना की भाषा जानने में होशियार हैं और कुछ नहीं जानते लेकिन मुरली की भाषा जानते हैं। प्रेम और भावना से न समझने वाले भी समझ जाते हैं। बंगाल बिहार तो सदा बहारी मौसम में रहते। सदा बहार है।
पंजाब है ही सदा सभी को हराभरा करने वाला। पंजाब में खेती अच्छी होती है। हरियाणा तो है ही हरा भरा। पंजाब, हरियाणा सदा हरियाली से हरा भरा है। जहाँ हरियाली होती है उस स्थान को सदा कुशल, श्रेष्ठ स्थान कहा जाता है। पंजाब हरियाणा सदा खुशी में हरा भरा है। इसलिए बापदादा भी देख-देख हर्षित होते हैं। राजस्थान की क्या विशेषता है? राजस्थान चित्र रेखा में प्रसिद्ध है। राजस्थान की तस्वीरें बहुत मूल्यवान होती हैं क्योंकि राज़े बहुत हुए हैं ना। तो राजस्थान तकदीर की तस्वीरें सबसे ज्यादा मूल्यवान बनाने वाले हैं। चित्रों की रेखा में सदा श्रेष्ठ हैं। गुजरात की क्या विशेषता है? वहाँ आइनों का श्रृंगार ज्यादा होता है। तो गुजरात दर्पण है। दर्पण कहो, आइना कहो, जिसमें बाप की मूर्त देखी जाए। आइने में शक्ल देखते हैं ना। तो गुजरात के दर्पण द्वारा बाप की तस्वीर फरिश्ता स्वरुप की तस्वीर सभी को दिखाने की विशेषता है। तो गुजरात की विशेषता है – बाप को प्रत्यक्ष करने वाले दर्पण। बाकी छोटा-सा तामिलनाडु रह गया। छोटा ही कमाल करता है। बड़ा कार्य करके दिखाता है। तामिलनाडु क्या करेंगे? वहाँ मन्दिर बहुत हैं। मन्दिरों में नाद बजाते हैं। तामिलनाडु की विशेषता है – नगाड़ा बजाए बाप की प्रत्यक्षता का आवाज बुलन्द करना। अच्छी विशेषता है। छोटे-पन में भी नाद बजाते हैं। भक्त लोग भी बड़े प्यार से नाद बजाते हैं और बच्चे भी प्यार से बजाते हैं। अब हरेक स्थान अपनी विशेषता को प्रत्यक्ष स्वरुप में लाओ। सभी ज़ोन वालों से मिल लिया ना! आखिर तो ऐसा ही मिलना होगा। पुराने बच्चे कहते हैं हमको क्यों नहीं बुलाते। प्रजा भी बनाते, बढ़ाते भी रहते। तो पुरानों को नये-नये को चांस देना पड़े तब तो संख्या बढ़े। पुराने भी पुरानी चाल से चलते रहें तो नयों का क्या होगा। पुराने हैं दाता देने वाले और नये हैं लेने वाले। तो चांस देना हैं इसमें दाता बनना पड़े। साकार मिलन में सब हद आ जाती हैं। अव्यक्त मिलन में कोई हद नहीं। कई कहते हैं संख्या बढ़ेगी फिर क्या होगा! साकार मिलन की विधि भी तो बदलेगी। जब संख्या बढ़ती है तो कुछ दान पुण्य भी करना होता है। अच्छा।
सभी देश विदेश के चारों ओर के स्नेही बच्चों के स्नेह के दिल के आवाज, खुशी के गीत और दिल के समाचार के पत्रों के रेसपान्ड में बापदादा सभी बच्चों को पदमगुणा यादप्यार के साथ रेसपान्ड दे रहे हैं कि सदा याद से अमर भव के वरदानी बन बढ़ते चलो और बढ़ाते चलो। सभी उमंग उत्साह में रहने वाले बच्चों को बापदादा स्व उन्नति और सेवा की उन्नति के लिए मुबारक दे रहे हैं। मुबारक हो। सदा साथ हो। सदा सम्पन्न और सम्पूर्ण हो, ऐसे सर्व वरदानी बच्चों को बापदादा फिर से यादप्यार दे रहे हैं। यादप्यार और नमस्ते।
पार्टियों से:- सदा स्वयं को बाप समान सम्पन्न आत्मा समझते हो! जो सम्पन्न है वह सदा आगे बढ़ते रहेंगे। सम्पन्नता नहीं तो आगे नहीं बढ़ सकते। तो जैसे बाप वैसे बच्चे। बाप सागर है बच्चे मास्टर सागर हैं। हर गुण को चेक करो – जैसे बाप ज्ञान का सागर है तो हम मास्टर ज्ञान सागर हैं। बाप प्रेम का सागर है तो हम मास्टर प्रेम के सागर हैं। ऐसे समानता को चेक करो तब बाप समान सम्पन्न बन सदा आगे बढ़ते जायेंगे। समझा, सदा ऐसी चेकिग करते चलो। सदा इसी खुशी में रहो कि जिसको विश्व ढूंढता है। उसने हमको अपना बनाया है।
भूमिका: श्रेष्ठ वेला और श्रेष्ठ जन्म
आज बापदादा हरेक ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्मा के श्रेष्ठ जीवन के जन्म की वेला देख रहे हैं।
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श्रेष्ठ जन्म – क्योंकि युग ही पुरुषोत्तम श्रेष्ठ है।
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श्रेष्ठ वेला – संगमयुग का समय, जब जन्म और तकदीर दोनों श्रेष्ठ हैं।
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श्रेष्ठ परिवार, वर्सा और खजाने – जन्म से ही सभी ब्राह्मणों को समान और श्रेष्ठ प्राप्त है।
मुख्य प्रश्न:
यदि सबकी प्राप्ति एक जैसी है, तो नम्बरवार क्यों भिन्नता होती है?
उत्तर:
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अन्तर जीवन के कर्मों और उनके व्यवहारिक प्रदर्शन में पड़ता है।
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ब्राह्मण जीवन का अर्थ है – तकदीर को तस्वीर में लाना।
तकदीर की तस्वीर: कर्म और व्यक्तित्व से
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मस्तक रेखा – मनसा वृत्ति की शक्ति
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नयन रेखा – रुहानी दृष्टि
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मुख मुस्कराहट – सन्तुष्ट आत्मा, सर्व प्राप्ति स्वरूप
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हाथ की रेखा – श्रेष्ठ कर्म
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पांव की रेखा – हर कदम श्रीमत प्रमाण चलने की शक्ति
उदाहरण:
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जैसे स्थूल चित्र में कोई मुस्कराहट नहीं बना पाता, तो उसका चित्र पूर्ण नहीं होता।
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जितना सम्पन्न चित्र, उतनी मूल्यवान तस्वीर – यही ब्राह्मण आत्मा की सम्पूर्णता दर्शाती है।
सारांश:
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दाता (बाप) एक है, सभी को समान दे रहा है।
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बनाने वाले (आत्माएँ) नम्बरवार हो जाते हैं, क्योंकि कर्म, दृष्टि और भावना में भिन्नता होती है।
अव्यक्त और साकार मिलन: अनुभव का अंतर
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साकार मिलन – समय और संख्या महत्वपूर्ण
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अव्यक्त मिलन – समय और संख्या की बाधा नहीं
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उद्देश्य – अव्यक्त बनकर बाप के साथ निराकार घर में चलना
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स्थायित्व – फरिश्ता स्वरुप बनकर तकदीर की तस्वीर सम्पन्न करना
सावधानी:
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केवल साकार मिलन से अनुभव सीमित होता है।
-
अव्यक्त मिलन में अनुभव असीम और अनंत है।
क्षेत्र विशेषताओं का अवलोकन
| स्थान | विशेषता | महत्व |
|---|---|---|
| पंजाब | हरियाली, खुशहाली | कुशल और श्रेष्ठ स्थान |
| हरियाणा | हरा-भरा क्षेत्र | सफलता और समृद्धि |
| राजस्थान | चित्र रेखा, राजे | मूल्यवान तस्वीरें |
| गुजरात | आइनों का श्रृंगार | बाप की प्रत्यक्षता दिखाने का माध्यम |
| तमिलनाडु | मन्दिर, नगाड़ा | बाप की प्रत्यक्षता का आवाज़ बुलंद करना |
सारांश:
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हर क्षेत्र की विशेषता बच्चों की तकदीर की तस्वीर में योगदान देती है।
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स्थान, वातावरण और आत्मा की गुणात्मक स्थिति से तस्वीर सम्पूर्ण और मूल्यवान बनती है।
पार्टियों और बच्चों के लिए संदेश
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स्वयं को बाप समान सम्पन्न आत्मा समझो।
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जैसे बाप सागर हैं, वैसे बच्चे मास्टर सागर।
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हर गुण में बाप समानता जांचते रहो → सम्पन्नता का अभ्यास।
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यही प्रक्रिया विश्व को दिखाती है कि ब्राह्मण आत्मा सर्वोत्तम है।
उपसंहार:
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तकदीर की तस्वीर बनाना कर्म, दृष्टि और सन्तुष्टता का मिश्रण है।
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सम्पूर्ण तस्वीर ही फरिश्ता स्वरुप बनना दर्शाती है।
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हर आत्मा अपनी तस्वीर देखकर स्वयं की श्रेष्ठता और बाप की सम्पूर्णता समझती है।
प्रश्न 1 : तकदीर की तस्वीर कैसे बनती है?
उत्तर :
तकदीर की तस्वीर बनती है — कर्म और व्यक्तित्व से:
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मस्तक रेखा – मनसा वृत्ति की शक्ति
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नयन रेखा – रुहानी दृष्टि
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मुख मुस्कराहट – सन्तुष्ट आत्मा, सर्व प्राप्ति स्वरूप
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हाथ की रेखा – श्रेष्ठ कर्म
-
पांव की रेखा – हर कदम श्रीमत प्रमाण चलने की शक्ति
उदाहरण:
जैसे स्थूल चित्र में कोई मुस्कराहट नहीं बना पाता, तो उसका चित्र पूर्ण नहीं होता।
जितना सम्पन्न चित्र, उतनी मूल्यवान तस्वीर – यही ब्राह्मण आत्मा की सम्पूर्णता दर्शाती है।
प्रश्न 2 : सबको समान देने वाला कौन है और भिन्नता क्यों होती है?
उत्तर :
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दाता (बाप) – एक है, सभी को समान दे रहा है।
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बनाने वाले (आत्माएँ) – नम्बरवार हो जाते हैं, क्योंकि कर्म, दृष्टि और भावना में भिन्नता होती है।
प्रश्न 3 : साकार और अव्यक्त मिलन में अंतर क्या है?
उत्तर :
| प्रकार | विशेषता | अनुभव |
|---|---|---|
| साकार मिलन | समय और संख्या महत्वपूर्ण | अनुभव सीमित |
| अव्यक्त मिलन | समय और संख्या की बाधा नहीं | अनुभव असीम और अनंत |
उद्देश्य: अव्यक्त बनकर बाप के साथ निराकार घर में चलना
स्थायित्व: फरिश्ता स्वरुप बनकर तकदीर की तस्वीर सम्पन्न करना
प्रश्न 4 : क्षेत्र विशेषताओं का बच्चों की तकदीर पर क्या प्रभाव है?
उत्तर :
| स्थान | विशेषता | महत्व |
|---|---|---|
| पंजाब | हरियाली, खुशहाली | कुशल और श्रेष्ठ स्थान |
| हरियाणा | हरा-भरा क्षेत्र | सफलता और समृद्धि |
| राजस्थान | चित्र रेखा, राजे | मूल्यवान तस्वीरें |
| गुजरात | आइनों का श्रृंगार | बाप की प्रत्यक्षता दिखाने का माध्यम |
| तमिलनाडु | मन्दिर, नगाड़ा | बाप की प्रत्यक्षता का आवाज़ बुलंद करना |
सारांश:
स्थान, वातावरण और आत्मा की गुणात्मक स्थिति से तस्वीर सम्पूर्ण और मूल्यवान बनती है।
प्रश्न 5 : ब्राह्मणों के लिए विशेष संदेश क्या है?
उत्तर :
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स्वयं को बाप समान सम्पन्न आत्मा समझो
-
जैसे बाप सागर हैं, वैसे बच्चे मास्टर सागर
-
हर गुण में बाप समानता जांचते रहो → सम्पन्नता का अभ्यास
यही प्रक्रिया दिखाती है कि ब्राह्मण आत्मा सर्वोत्तम है।
प्रश्न 6 : सम्पूर्ण तस्वीर बनाना किसका मिश्रण है?
उत्तर :
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कर्म
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दृष्टि
-
सन्तुष्टता
सम्पूर्ण तस्वीर = फरिश्ता स्वरुप बनना
हर आत्मा अपनी तस्वीर देखकर स्वयं की श्रेष्ठता और बाप की सम्पूर्णता समझती है।
Disclaimer
यह वीडियो ब्राह्माकुमारी आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसमें साझा किए गए विचार आध्यात्मिक और प्रेरक उद्देश्य के लिए हैं। व्यक्तिगत निर्णय या आचार के लिए आप स्वयं विवेक का उपयोग करें।
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