अव्यक्त मुरली-(39)19-11-1984 “बेहद की वैराग्य वृत्ति से सिद्धियों की प्राप्ति”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
19-11-1984 “बेहद की वैराग्य वृत्ति से सिद्धियों की प्राप्ति”
आज विश्व रचयिता अपनी श्रेष्ठ रचना को वा रचना के पूर्वज आत्माओं को देख रहे हैं। चारों ओर की पूर्वज पूज्य आत्मायें बापदादा के सामने हैं। पूर्वज आत्माओं के आधार से विश्व की सर्व आत्माओं को शक्ति और शान्ति प्राप्त हो रही है और होनी है। अनेक आत्मायें पूर्वज पूज्य आत्माओं को शान्ति देवा, शक्ति देवा कह याद कर रही हैं। ऐसे समय पर शान्ति देवा आत्मायें मास्टर शान्ति के सागर, मास्टर शान्ति के सूर्य अपनी शान्ति की किरणें, शान्ति की लहरें दाता के बच्चे देवा बन सर्व को दे रहे हो! वह विशेष सेवा करने के अभ्यासी बने हो वा अन्य भिन्न-भिन्न प्रकार की सेवाओं में इतने बिज़ी हो जो इस विशेष सेवा के लिए फुर्सत और अभ्यास कम होता है? जैसा समय वैसे सेवा के स्वरूप को अपना सकते हो? अगर किसी को पानी की प्यास हो और आप बढ़िया भोजन दे दो तो वह सन्तुष्ट होगा? ऐसे वर्तमान समय शान्ति और शक्ति की आवश्यकता है। मन्सा की शान्ति द्वारा आत्माओं को मन की शान्ति अनुभव करा सकते हो। वाणी द्वारा कानों तक आवाज़ पहुंचा सकते हो। लेकिन वाणी के साथ मन्सा शक्ति द्वारा मन तक पहुंचा सकते हो। मन का आवाज़ मन तक पहुंचता है। सिर्फ मुख का आवाज़ कानों और मुख तक रह जाता। सिर्फ वाणी से वर्णन शक्ति और मन से मनन शक्ति, मगन स्वरूप की शक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। वह सुनने वाले और वह बनने वाले बन जाते, दोनों में अन्तर हो जाता है, तो सदा वाचा और मन्सा दोनों साथ-साथ सेवा में रहें।
वर्तमान समय विशेष भारतवासियों का क्या हालचाल देखा? अभी शमशानी वैराग्य की वृत्ति में हैं। ऐसे शमशानी वैराग्य वृत्ति वालों को बेहद की वैराग्य वृत्ति दिलाने के लिए स्वयं बेहद के वैराग्य वृत्ति वाले बनो। अपने आपको चेक करो – कभी राग कभी वैराग्य दोनों में चलते हैं वा सदा बेहद के वैरागी बने हो? बेहद के वैरागी अर्थात् देह रूपी घर से भी बेघर। देह भी बाप की है न कि मेरी, इतना देह के भान से परे। बेहद के वैरागी कभी भी संस्कार, स्वभाव साधन किसी के भी वशीभूत नहीं होंगे। न्यारा बन, मालिक बन साधनों द्वारा सिद्धि स्वरूप बनेंगे। साधन को विधि बनायेंगे। विधि द्वारा स्व उन्नति की वृद्धि की सिद्धि पायेंगे। सेवा से वृद्धि की सिद्धि प्राप्त करेंगे। निमित्त आधार होगा लेकिन अधीन नहीं होंगे। आधार के अधीन होना अर्थात् वशीभूत होना। वशीभूत शब्द का अर्थ ही है, जैसे भूत आत्मा परवश और परेशान करती है, ऐसे किसी भी साधन वा संस्कार वा स्वभाव वा सम्पर्क के वशीभूत हो जाते तो भूत समान परेशान और परवश हो जाते हैं। बेहद के वैरागी, सदा करावनहार करा रहे हैं, इसी मस्ती में रमता योगी से भी ऊपर उड़ता योगी होगा। जैसे हद के हठयोग की विधियों से धरनी, आग, पानी सबसे ऊंचा आसनधारी दिखाते हैं। उसको योग के सिद्धि स्वरूप मानते हैं। वह है अल्पकाल के हठयोग की विधि की सिद्धि। ऐसे बेहद के वैराग्य वृत्ति वाले इस विधि द्वारा देह भान की धरनी से ऊपर माया के भिन्न-भिन्न विकारों की अग्नि से ऊपर, भिन्न-भिन्न प्रकार के साधनों द्वारा संग के बहाव में आने से न्यारे बन जाते हैं। जैसे पानी का बहाव अपना बना देता है, अपनी तरफ खींच लेता है। ऐसे किसी भी प्रकार के अल्पकाल के बहाव अपनी तरफ आकर्षित न करें। ऐसे पानी के बहाव से भी ऊपर इसको कहा जाता है उड़ता योगी। यह सब सिद्धियाँ बेहद के वैराग्य की विधि से प्राप्त होती हैं।
बेहद के वैरागी अर्थात् हर संकल्प, बोल और सेवा में बेहद की वृत्ति, स्मृति भावना और कामना हो। हर संकल्प बेहद की सेवा में समर्पित हो। हर बोल में नि:स्वार्थ भावना हो। हर कर्म में करावनहार करा रहे हैं – यह वायब्रेशन सर्व को अनुभव हो, इसको कहा जाता है बेहद के वैरागी। बेहद के वैरागी अर्थात् अपनापन मिट जाए। बाबा-पन आ जाए। जैसे अनहद जाप जपते हैं, ऐसे अनहद स्मृति स्वरूप हों। हर संकल्प में, हर श्वांस में बेहद और बाबा समाया हुआ हो। तो हद के वैरागी, शमशानी वैरागी आत्माओं को वर्तमान समय शान्ति और शक्ति देवा बन बेहद के वैरागी बनाओ।
तो वर्तमान समय के प्रमाण बच्चों की रिजल्ट क्या रही – यह टी.वी. बापदादा ने देखी और बच्चों ने इन्दिरा गांधी की टी.वी. देखी। समय पर देखी, नॉलेज के लिए देखी, समाचार के लिए देखी इसमें कोई हर्जा नहीं। लेकिन क्या हुआ, क्या होगा, इस रूप से नहीं देखना। नॉलेजफुल बन हर दृश्य को कल्प पहले की स्मृति से देखो। तो बापदादा ने बच्चों का क्या देखा। बच्चों का दृश्य भी रमणीक था। तीन प्रकार की रिजल्ट देखी।
1. एक थे, चलते-चलते अलबेलेपन की नींद में सोई हुई आत्मायें। जैसे कोई ज़ोर से आवाज़ होता है वा कोई हिलाता है तो सोया हुआ जाग जाता है लेकिन क्या हुआ! इस संकल्प से कुछ समय जागे और फिर धीरे-धीरे वही अलबेलेपन की नींद। यह तो होता ही है, इस चादर को ओढ़ के सो गए। अभी तो रिहर्सल है, फाइनल तो आगे होना है। इससे और मुंह तक चादर ओढ़ ली।
2. दूसरे थे, आलस्य की नींद में सोये हुए। यह तो सब होना ही था, वह हुआ। पुरूषार्थ तो कर ही रहे हैं और आगे भी कर ही लेंगे। संगमयुग में तो पुरूषार्थ करना ही है। कुछ किया है, कुछ आगे कर लेंगे। दूसरों को जागकर देखते रहते। जैसे चादर से मुंह निकाल एक दो को (सोये हुए को) देखते हैं ना। जो नामीग्रामी हैं वह भी इतना ही रफ्तार से चल रहे हैं, हम भी चल रहे हैं। ऐसे दूसरों की कमजोरियों को देख फॉलो फादर के बजाए सिस्टर्स और ब्रदर्स को फालो कर लेते हैं और उन्हों की भी कमजोरियों को फॉलो करते हैं। ऐसे संकल्प करने वाले आलस्य की नींद में सोये हुए वह भी जागे जरूर। उमंग और उत्साह के आधार से आलस्य की नींद का कईयों ने त्याग भी किया। स्व उन्नति और सेवा की उन्नति में आगे कदम भी बढ़ाया। हलचल ने हिलाया और आगे बढ़े। लेकिन आलस्य के संस्कार बीच-बीच में फिर भी अपनी तरफ खींचते रहते हैं। फिर भी हलचल ने हिलाया, आगे बढ़ाया।
3. तीसरे थे, हलचल को देख अचल रहने वाले। सेवा के श्रेष्ठ संकल्प में सेवा के भिन्न-भिन्न प्लैन सोचना और करना। सारी विश्व को शान्ति और शक्ति की सहायता देने वाले, साहस रखने वाले। औरों को भी हिम्मत दिलाने वाले। ऐसे भी बच्चे देखे। लेकिन शमशानी उमंग-उत्साह वा शमशानी तीव्र पुरूषार्थ वा कमजोरियों से वैराग्य वृत्ति, इसी लहर में नहीं चलना। सदा परिस्थिति को स्व-स्थिति की शक्ति से परिवर्तन करने वाले, विश्व परिवर्तक की स्मृति में रहो। परिस्थिति स्थिति को आगे बढ़ावे वा वायुमण्डल मास्टर सर्वशक्तिवान को चलावे। मनुष्य आत्माओं का शमशानी वैराग्य, अल्पकाल के लिए बेहद का वैरागी बनावे यह पूर्वज आत्माओं का कर्म नहीं। समय रचना, मास्टर रचता को आगे बढ़ावे यह मास्टर रचता की कमज़ोरी है। आपके श्रेष्ठ संकल्प समय को परिवर्तन करने वाले हैं। समय आप विश्व परिवर्तक आत्माओं का सहयोगी है। समझा। समय को देखकर, समय के हिलाने से आगे बढ़ने वाले नहीं। लेकिन स्वयं आगे बढ़ समय को समीप लाओ। क्वेश्चन भी बहुतों का उठा कि अब क्या होगा? लेकिन क्वेश्चन को फुलस्टाप के रूप में परिवर्तन करो अर्थात् अपने को सभी सब्जेक्ट में फुल करो। यह है फुलस्टाप। ऐसे समय पर क्या होगा? यह क्वेश्चन नहीं उठता लेकिन क्या करना है, मेरा कर्तव्य ऐसे समय पर क्या है, उस सेवा में लग जाओ। जैसे आग बुझाने वाले आग को बुझाने में लग गए। क्वेश्चन नहीं किया कि यह क्या हुआ। अपनी सेवा में लग गये ना। ऐसे रूहानी सेवाधारी का कर्तव्य है अपनी रूहानी सेवा में लग जाना। दुनिया वालों को भी न्यारापन अनुभव हो। समझा। फिर भी समय प्रमाण पहुंच तो गये हो ना। परिस्थिति क्या भी हो लेकिन ड्रामा ने फिर भी मिलन मेला मना लिया और ही लकी हो गये ना जो पहुंच तो गये हो ना। खुश हो रहे हो ना कि हमारा भाग्य है जो पहुंच गये। भले आये। मधुबन की रौनक आप सब बच्चे हैं। मधुबन का श्रृंगार मधुबन में पहुंचा। सिर्फ मधुबन वाले बाबा नहीं, मधुबन वाले बच्चे भी हैं। अच्छा।
चारों ओर के संकल्प द्वारा, स्नेह द्वारा, आकारी रूप द्वारा पहुंचे हुए सर्व बच्चों को बापदादा सदा अचल भव, सदा बेहद के वैरागी, सदा उड़ते योगी भव का वर्सा और वरदान दे रहे हैं। सदा अनहद स्मृति स्वरूप, अलबेले और आलस्य के निद्राजीत, सदा बेहद के स्मृति स्वरूप ऐसे पूर्वज और पूज्य आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।
दादी जी तथा जगदीश भाई ने विदेश यात्रा का समाचार सुनाया तथा याद प्यार दी :-
सभी को सन्देश दे अनुभव कराया। स्नेह और सम्बन्ध बढ़ाया। अभी अधिकार लेने के लिए आगे आयेंगे। हर कदम में अनेक आत्माओं के कल्याण का पार्ट नूंधा हुआ है। इसी नूंध से सभी के दिल में उमंग-उत्साह दिलाया। बहुत अच्छा सेवा और स्नेह का पार्ट बजाया। बापदादा करावनहार भी हैं और साक्षी हो देखने वाले भी हैं। कराया भी और देखा भी। बच्चों के उमंग-उत्साह और हिम्मत पर बापदादा को नाज़ है। आगे भी और आवाज बुलन्द होगा। ऐसा आवाज बुलन्द होगा जो सभी कुम्भकरण आंख खोलकर देखेंगे कि यह क्या हुआ। कईयों के भाग्य परिवर्तन होंगे। धरनी बनाकर आये, बीज डालकर आये। अभी जल्दी बीज का फल भी निकलेगा। प्रत्यक्षता का फल निकलने वाला ही है। समय समीप आ रहा है। अभी तो आप लोग गये लेकिन जो सेवा करके आये। उस सेवा के फल स्वरूप वह स्वयं भागते हुए आयेंगे। ऐसे अनुभव करेंगे जैसे चुम्बक दूर से खींचता है ना। ऐसे कोई खींच रहा है। जैसे आदि में अनेक आत्माओं को यह रूहानी खींच हुई कि कोई खींच रहा है, कहाँ जायें। ऐसे यह भी खींचे हुए आयेंगे। ऐसा अनुभव किया ना कि रूहानी खींच बढ़ रही है। बढ़ते-बढ़ते खींचे हुए उड़कर पहुंच जायेंगे, वह भी अभी दृश्य होने वाला ही है। अभी यही रहा हुआ है। सन्देश वाहक जाते हैं लेकिन वह स्वयं सत्य तीर्थ पर पहुंचें, यह है लास्ट सीन। इसके लिए अभी धरनी तैयार हो गई है, बीज भी पड़ गया है अब फिर निकला कि निकला। अच्छा, दोनों तरफ गये। बापदादा के पास सभी के हिम्मत उल्हास उमंग का पहुंचता है। मैजारिटी सेवा के उमंग-उत्साह होने के कारण मायाजीत बनने में भी सहज ही आगे बढ़ रहे हैं। फुर्सत होती है तो माया का वार भी होता है लेकिन बिजी रहते हैं दिल से, ड्यूटी से नहीं। जो दिल से सेवा में बिजी रहते हैं, वह सहज ही मायाजीत हो जाते हैं। तो बापदादा बच्चों के उमंग-उत्साह को देख खुश हैं। वहाँ साधन भी सहज है और इन्हों को प्राप्त भी हो जाते हैं। लक्ष्य है, मेहनत है और साधन भी सहज प्राप्त हैं, तीनों बातों के कारण अच्छी रेस में आगे नम्बर ले रहे हैं। अच्छा है। लेकिन देश में भी कोई कम नहीं। सभी अपने-अपने उमंग-उत्साह के आधार पर बढ़ रहे हैं। नाम तो देश से ही निकलना है। विदेशों की सफलता भी देश से ही निकलनी है। यह अच्छी स्मृति उन्हों को रहती है और अपनी ड्यूटी समझते हैं कि हमको नाम बाला करना है। विदेश के आवाज़ से भारत को जगाना है। यह लक्ष्य पक्का है और निभा भी रहे हैं। तैयार कर रहे हैं लेकिन अभी विदेश तक आवाज़ है। विदेश का देश तक पहुंचे, वह उड़ते-उड़ते आ रहा है। अभी उड़ रहा है। अभी सफर कर रहा है आवाज। उड़ते-उड़ते यहाँ पहुंच जायेगा। अभी विदेश में अच्छा फैल रहा है लेकिन विदेश का देश में पहुंचे, यह भी होना ही है। अच्छा – जो भी पार्ट बजाया, अच्छा बजाया। सदा आगे बढ़ने का सहयोग और वरदान है। हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। जितना अनुभवी बनते जाते हैं उतना और भी अनुभवों के आधार से आगे बढ़ते रहेंगे। करावनहार ने जो जिससे कराया वह ड्रामा अनुसार अच्छे से अच्छा कराया। निमित्त भाव सेवा करा ही लेता है। तो सेवा कराई, निमित्त बने, जमा हुआ और आगे भी जमा होता रहेगा। अच्छा।
पार्टियों से:– सदा मिलन मेले में रहने वाले हो ना? यह मिलन का मेला अविनाशी मिलन मेले का अनुभव करा देता है। कहाँ भी रहते लेकिन मेले में रहते हो। मेले से दूर नहीं होते। मेला अर्थात् मिलन। तो सदा मिलन मेला है ही। तो ऐसा भाग्यवान कौन होगा जो सदा मेले में रहे। वैसे तो मेला लगता और खत्म हो जाता है लेकिन सदा मेले में कोई नहीं रहता। आप भाग्यवान आत्मायें सदा मेले में रहती हो। सदा मिलन मेला। मेले में क्या होता? मिलना और झूलना। झूलना भी होता है ना! तो सदा प्राप्तियों के झूले में झूलने वाले। एक झूला नहीं है अनेक प्राप्तियों के अनेक झूले हैं। कभी किस झूले में झूलते, कभी किस झूले में। लेकिन हैं मेले में। ऐसा झूला है जो सदा ही सुख और सर्व प्राप्तियों का अनुभव कराने वाला है। ऐसी कोटों में कोई भाग्यवान आत्मायें हो। पहले महिमा सुनते थे, अभी महान बन गये।
भूमिका : विश्व रचयिता की दृष्टि और पूर्वज आत्माएँ
आज विश्व रचयिता बापदादा अपनी श्रेष्ठ रचना — पूर्वज पूज्य आत्माओं — को देख रहे हैं।
इन पूर्वज आत्माओं के आधार से ही संपूर्ण विश्व को शक्ति और शान्ति मिलनी है।
आज अनेक आत्माएँ पुकार रही हैं —
“शान्ति देवा… शक्ति देवा…”
इस समय बापदादा बच्चों को याद दिला रहे हैं कि —
आप मास्टर शान्ति के सागर, मास्टर शान्ति के सूर्य हो।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी सेवा : मन्सा की सेवा
आज का समय वाणी से अधिक मन्सा की सेवा चाहता है।
🔹 उदाहरण
अगर किसी को पानी की प्यास हो और आप उसे स्वादिष्ट भोजन दे दें —
तो क्या उसकी प्यास बुझेगी?
उसी प्रकार, आज आत्माओं को ज्ञान से अधिक शान्ति और शक्ति चाहिए।
मुरली नोट:
“वाणी कानों तक जाती है, लेकिन मन्सा मन तक पहुँचती है।”
इसलिए बापदादा कहते हैं —
वाचा + मन्सा दोनों साथ-साथ सेवा में रहें।
शमशानी वैराग्य नहीं, बेहद का वैराग्य चाहिए
आज भारत में जो वैराग्य दिखाई देता है, वह अधिकतर शमशानी वैराग्य है —
दुख, हलचल या भय से उत्पन्न हुआ।
शमशानी वैराग्य
-
अल्पकाल का
-
परिस्थिति पर आधारित
-
समय आने पर समाप्त
बेहद का वैराग्य
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आत्मिक स्थिति से
-
स्थायी
-
मालिकाना और न्यारा भाव
मुरली नोट:
“शमशानी वैराग्य वालों को बेहद का वैराग्य दिलाने के लिए स्वयं बेहद का वैरागी बनो।”
बेहद का वैरागी कौन?
बेहद का वैरागी वह है जो —
-
देह को भी बाप की अमानत समझे
-
संस्कार, स्वभाव, साधन — किसी के वशीभूत न हो
-
न्यारा और मालिक बनकर रहे
मुरली नोट:
“वशीभूत होना अर्थात् भूत समान परेशान और परवश होना।”
🔹 उदाहरण
जैसे पानी का बहाव अपने साथ बहा ले जाता है —
वैसे ही साधनों, संग या आकर्षण का बहाव
आत्मा को खींच सकता है।
बेहद का वैरागी इन सबसे ऊपर रहता है —
इसी को कहा गया है उड़ता योगी।
उड़ता योगी बनने की विधि
हठयोग में लोग
धरनी, अग्नि, जल पर विजय दिखाते हैं —
लेकिन वह अल्पकाल की सिद्धि है।
बेहद के वैरागी की सिद्धि —
-
देह-भान की धरनी से ऊपर
-
विकारों की अग्नि से ऊपर
-
संग और साधनों के बहाव से ऊपर
मुरली नोट:
“यह सब सिद्धियाँ बेहद के वैराग्य की विधि से प्राप्त होती हैं।”
बेहद के वैरागी की पहचान
✔ हर संकल्प — बेहद की सेवा में समर्पित
✔ हर बोल — निःस्वार्थ भावना से
✔ हर कर्म — करावनहार करा रहे हैं की अनुभूति
मुरली नोट:
“अपनापन मिट जाए, बाबा-पन आ जाए — यही बेहद का वैराग्य है।”
जैसे अनहद जाप चलता रहता है —
वैसे ही हर श्वांस में बाबा समाया हो।
बापदादा द्वारा देखी गई तीन प्रकार की रिज़ल्ट
1️⃣ अलबेलेपन की नींद
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थोड़ा हिले, थोड़ी देर जागे
-
फिर वही लापरवाही
2️⃣ आलस्य की नींद
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“सब हो ही रहा है”
-
दूसरों को देखकर स्वयं को ठीक मान लेना
-
कभी-कभी जागना, फिर ढीले पड़ जाना
3️⃣ अचल रहने वाले
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हलचल में भी अचल
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सेवा के श्रेष्ठ प्लान
-
विश्व को शान्ति-शक्ति देने का साहस
मुरली नोट:
“परिस्थिति को स्थिति से परिवर्तन करने वाले बनो।”
समय को नहीं, समय को समीप लाओ
बापदादा कहते हैं —
समय देखकर आगे बढ़ने वाले नहीं बनो
स्वयं आगे बढ़कर समय को समीप लाओ
गहरा सूत्र
“अब क्या होगा?” — यह प्रश्न नहीं
“मुझे क्या करना है?” — यह संकल्प
मुरली नोट:
“क्वेश्चन को फुलस्टॉप बनाओ — स्वयं को सभी सब्जेक्ट में फुल करो।”
सदा मिलन मेले में रहने वाले भाग्यवान
आप भाग्यवान आत्माएँ हो —
जो सदा मिलन मेले में रहती हो।
मिलन मेला अर्थात् —
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सदा मिलन
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सदा झूलना
-
सदा प्राप्तियों का अनुभव
मुरली नोट:
“यह ऐसा मेला है जो कभी समाप्त नहीं होता।”
बापदादा का वरदान (19-11-1984)
सदा अचल भव
सदा बेहद के वैरागी भव
सदा उड़ते योगी भव
अनहद स्मृति स्वरूप भव
प्रश्न 1️⃣ : आज विश्व रचयिता बापदादा किसे देख रहे हैं?
उत्तर:
आज विश्व रचयिता बापदादा अपनी श्रेष्ठ रचना — पूर्वज पूज्य आत्माओं — को देख रहे हैं, जिनके आधार से सम्पूर्ण विश्व को शक्ति और शान्ति प्राप्त होनी है।
प्रश्न 2️⃣ : पूर्वज पूज्य आत्माओं की भूमिका विश्व के लिए क्या है?
उत्तर:
पूर्वज पूज्य आत्माओं के आधार से ही विश्व की सर्व आत्माओं को शक्ति और शान्ति मिलती है और आगे भी मिलती रहेगी।
मुरली नोट (19-11-1984):
“पूर्वज पूज्य आत्माओं के आधार से विश्व की सर्व आत्माओं को शक्ति और शान्ति प्राप्त हो रही है और होनी है।”
प्रश्न 3️⃣ : आज विश्व की आत्माएँ किस पुकार के साथ याद कर रही हैं?
उत्तर:
आज अनेक आत्माएँ पुकार रही हैं —
“शान्ति देवा… शक्ति देवा…”
प्रश्न 4️⃣ : बापदादा बच्चों को इस समय क्या स्मृति दिला रहे हैं?
उत्तर:
बापदादा याद दिला रहे हैं कि आप मास्टर शान्ति के सागर और मास्टर शान्ति के सूर्य हो, दाता के बच्चे बन सर्व को देने वाले हो।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी सेवा : मन्सा की सेवा
प्रश्न 5️⃣ : आज के समय में सबसे बड़ी सेवा कौन-सी है?
उत्तर:
आज के समय में वाणी से अधिक मन्सा की सेवा की आवश्यकता है।
प्रश्न 6️⃣ : मन्सा सेवा की आवश्यकता को समझाने के लिए बापदादा कौन-सा उदाहरण देते हैं?
उत्तर:
यदि किसी को पानी की प्यास हो और उसे स्वादिष्ट भोजन दे दिया जाए, तो उसकी प्यास नहीं बुझती।
उसी प्रकार आज आत्माओं को ज्ञान से अधिक शान्ति और शक्ति चाहिए।
प्रश्न 7️⃣ : वाणी और मन्सा में क्या अन्तर बताया गया है?
उत्तर:
वाणी कानों तक पहुँचती है,
लेकिन मन्सा मन तक पहुँचती है।
मुरली नोट:
“वाणी कानों तक जाती है, लेकिन मन्सा मन तक पहुँचती है।”
प्रश्न 8️⃣ : सेवा में वाचा और मन्सा का क्या सम्बन्ध होना चाहिए?
उत्तर:
बापदादा कहते हैं कि वाचा और मन्सा दोनों साथ-साथ सेवा में रहें, तभी सम्पूर्ण सेवा होती है।
शमशानी वैराग्य नहीं, बेहद का वैराग्य चाहिए
प्रश्न 9️⃣ : आज समाज में जो वैराग्य दिखाई देता है, वह कैसा है?
उत्तर:
आज अधिकतर वैराग्य शमशानी वैराग्य है, जो दुख, भय या हलचल से उत्पन्न होता है।
प्रश्न 🔟 : शमशानी वैराग्य की पहचान क्या है?
उत्तर:
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अल्पकाल का
-
परिस्थिति पर आधारित
-
समय आने पर समाप्त होने वाला
प्रश्न 1️⃣1️⃣ : बेहद का वैराग्य किसे कहा जाता है?
उत्तर:
जो वैराग्य आत्मिक स्थिति से उत्पन्न हो, स्थायी हो, और जिसमें मालिकाना व न्यारा भाव हो — उसे बेहद का वैराग्य कहा जाता है।
प्रश्न 1️⃣2️⃣ : शमशानी वैराग्य वालों को क्या सन्देश दिया गया है?
उत्तर:
शमशानी वैराग्य वालों को बेहद का वैराग्य दिलाने के लिए स्वयं बेहद का वैरागी बनना आवश्यक है।
मुरली नोट:
“शमशानी वैराग्य वालों को बेहद का वैराग्य दिलाने के लिए स्वयं बेहद का वैरागी बनो।”
बेहद का वैरागी कौन?
प्रश्न 1️⃣3️⃣ : बेहद का वैरागी किसे कहा जाता है?
उत्तर:
जो
-
देह को भी बाप की अमानत समझे
-
संस्कार, स्वभाव और साधनों के वशीभूत न हो
-
सदा न्यारा और मालिक बनकर रहे
प्रश्न 1️⃣4️⃣ : ‘वशीभूत होना’ मुरली में किस अर्थ में बताया गया है?
उत्तर:
वशीभूत होना अर्थात् भूत समान परवश और परेशान होना — चाहे वह संस्कार हो, साधन हो या संग।
प्रश्न 1️⃣5️⃣ : बेहद के वैरागी को ‘उड़ता योगी’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि वह साधनों, आकर्षणों और संग के बहाव से ऊपर रहता है, जैसे पानी के बहाव से ऊपर उड़ने वाला।
उड़ता योगी बनने की विधि
प्रश्न 1️⃣6️⃣ : हठयोग और बेहद के वैराग्य की सिद्धियों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
हठयोग की सिद्धियाँ अल्पकाल की होती हैं,
जबकि बेहद के वैराग्य से प्राप्त सिद्धियाँ आत्मिक और स्थायी होती हैं।
प्रश्न 1️⃣7️⃣ : बेहद के वैरागी किन बातों से ऊपर रहते हैं?
उत्तर:
-
देह-भान की धरनी से
-
विकारों की अग्नि से
-
संग और साधनों के बहाव से
मुरली नोट:
“यह सब सिद्धियाँ बेहद के वैराग्य की विधि से प्राप्त होती हैं।”
बेहद के वैरागी की पहचान
प्रश्न 1️⃣8️⃣ : बेहद के वैरागी की मुख्य पहचान क्या है?
उत्तर:
-
हर संकल्प — बेहद की सेवा में
-
हर बोल — निःस्वार्थ
-
हर कर्म — “करावनहार करा रहे हैं” की अनुभूति
प्रश्न 1️⃣9️⃣ : मुरली के अनुसार सच्चा बेहद का वैराग्य कब होता है?
उत्तर:
जब अपनापन मिट जाए और बाबा-पन आ जाए।
बापदादा द्वारा देखी गई तीन प्रकार की रिज़ल्ट
प्रश्न 2️⃣0️⃣ : पहली प्रकार की आत्माएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
अलबेलेपन की नींद में सोई आत्माएँ — जो थोड़ी देर जागकर फिर लापरवाही में चली जाती हैं।
प्रश्न 2️⃣1️⃣ : दूसरी प्रकार की आत्माओं की विशेषता क्या है?
उत्तर:
आलस्य की नींद —
“सब हो ही रहा है” सोचकर ढीले पड़ जाना और दूसरों को देखकर स्वयं को ठीक मान लेना।
प्रश्न 2️⃣2️⃣ : तीसरी प्रकार की आत्माएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
जो हलचल में भी अचल रहती हैं,
सेवा के श्रेष्ठ प्लान बनाती हैं
और विश्व को शान्ति-शक्ति देने का साहस रखती हैं।
मुरली नोट:
“परिस्थिति को स्थिति से परिवर्तन करने वाले बनो।”
समय को नहीं, समय को समीप लाओ
प्रश्न 2️⃣3️⃣ : बापदादा समय के विषय में क्या सिखाते हैं?
उत्तर:
समय को देखकर आगे नहीं बढ़ना है,
बल्कि स्वयं आगे बढ़कर समय को समीप लाना है।
प्रश्न 2️⃣4️⃣ : इस समय आत्मा का सही प्रश्न क्या होना चाहिए?
उत्तर:
“अब क्या होगा?” नहीं,
बल्कि — “मुझे क्या करना है?”
सदा मिलन मेले में रहने वाले भाग्यवान
प्रश्न 2️⃣5️⃣ : सदा मिलन मेला क्या है?
उत्तर:
सदा बाबा के साथ मिलन,
सदा प्राप्तियों के झूले में झूलना,
और सदा आत्मिक सुख का अनुभव।
मुरली नोट:
“यह ऐसा मेला है जो कभी समाप्त नहीं होता।”
बापदादा का वरदान (19-11-1984)
प्रश्न 2️⃣6️⃣ : बापदादा ने बच्चों को कौन-सा वरदान दिया?
उत्तर:
सदा अचल भव
सदा बेहद के वैरागी भव
सदा उड़ते योगी भव
सदा अनहद स्मृति स्वरूप भव
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के अव्यक्त मुरली (19 नवम्बर 1984) पर आधारित एक आध्यात्मिक व्याख्या है।
इसका उद्देश्य आत्मिक उन्नति, शान्ति और सकारात्मक जीवन मूल्यों की प्रेरणा देना है।
यह किसी धार्मिक विवाद, अंधविश्वास या व्यक्ति-विशेष की आलोचना हेतु नहीं है।
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