12-12-1984 “विशेष आत्माओं का फर्ज”
आज दिलाराम बाप अपने दिलखुश बच्चों से मिलने आये हैं। सारे विश्व में सदा दिल खुश आप बच्चे ही हैं। बाकी और सभी कभी न कभी किसी न किसी दिल के दर्द में दु:खी हैं। ऐसे दिल के दर्द को हरण करने वाले दु:ख हर्ता सुख दाता बाप के सुख स्वरूप आप बच्चे हो। और सभी के दिल के दर्द की पुकार हाय-हाय का आवाज निकलता है। और आप दिल-खुश बच्चों की दिल से वाह-वाह का आवाज निकलता है। जैसे स्थूल शरीर के दर्द भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। ऐसे आज की मनुष्य आत्माओं के दिल के दर्द भी अनेक प्रकार के हैं। कभी तन के कर्म भोग का दर्द, कभी सम्बन्ध सम्पर्क से दु:खी होने का दर्द, कभी धन ज्यादा आया वा कम हो गया दोनों की चिंता का दर्द, और कभी प्राकृतिक आपदाओं से प्राप्त दु:ख का दर्द। ऐसे एक दर्द से अनेक दर्द पैदा होते रहते हैं। विश्व ही दु:ख दर्द की पुकार करने वाला बन गया है। ऐसे समय पर आप सुखदाई, सुख स्वरूप बच्चों का फर्ज क्या है? जन्म-जन्म के दु:ख दर्द के कर्ज से सभी को छुड़ाओ। यह पुराना कर्ज दु:ख दर्द का मर्ज बन गया है। ऐसे समय पर आप सभी का फर्ज है दाता बन जिस आत्मा को जिस प्रकार के कर्ज का मर्ज लगा हुआ है उनको उस प्राप्ति से भरपूर करो। जैसे तन के कर्मभोग की दु:ख दर्द वाली आत्मा कर्मयोगी बन कर्मयोग से कर्म भोग समाप्त करे, ऐसे कर्मयोगी बनने की शक्ति की प्राप्ति महादान के रूप में दो। वरदान के रूप में दो, स्वयं तो कर्जदार हैं अर्थात् शक्तिहीन हैं, खाली हैं। ऐसे को अपने कर्मयोग की शक्ति का हिस्सा दो। कुछ न कुछ अपने खाते से उनके खाते में जमा करो तब वह कर्ज के मर्ज से मुक्त हो सकते हैं। इतना समय जो डायरेक्ट बाप के वारिस बन सर्व शक्तियों का वर्सा जमा किया है, उस जमा किये हुए खाते से फ्राकदिली से दान करो, तब दिल के दर्द की समाप्ति कर सकेंगे। जैसे अन्तिम समय समीप आ रहा है, वैसे सर्व आत्माओं के भक्ति की शक्ति भी समाप्त हो रही है। द्वापर से रजोगुणी आत्माओं में फिर भी दान पुण्य, भक्ति की शक्ति अपने खातों में जमा थी। इसलिए अपने आत्म निर्वाह के लिए कुछ न कुछ शान्ति के साधन प्राप्त थे। लेकिन अब तमोगुणी आत्मायें इस थोड़े समय के सुख के आत्म निर्वाह के साधनों से भी खाली हो गई हैं अर्थात् भक्ति के फल को भी खाकर खाली हो गई हैं। अब नामधारी भक्ति है। फलस्वरूप भक्ति नहीं है। भक्ति का वृक्ष विस्तार को पा चुका है। वृक्ष की रंग-बिरंगी रंगत की रौनक जरूर है। लेकिन शक्तिहीन होने के कारण फल नहीं मिल सकता। जैसे स्थूल वृक्ष जब पूरा विस्तार को प्राप्त कर लेता, जड़जड़ीभूत अवस्था तक पहुँच जाता है तो फलदायक नहीं बन सकता है। लेकिन छाया देने वाला बन जाता है। ऐसे भक्ति का वृक्ष भी दिल खुश करने की छाया जरूर दे रहा है। गुरू कर लिया, मुक्ति मिल जायेगी। तीर्थ यात्रा दान पुण्य किया, प्राप्ति हो जायेगी। यह दिल खुश करने के दिलासे की छाया अभी रह गई है। “अभी नहीं तो कभी मिल जायेगा”, इसी छाया में बिचारे भोले भक्त आराम कर रहे हैं लेकिन फल नहीं है। इसलिए सबके आत्म निर्वाह के खाते खाली हैं। तो ऐसे समय पर आप भरपूर आत्माओं का फर्ज है अपने जमा किये हुए हिस्से से ऐसी आत्माओं को हिम्मत हुल्लास दिलाना। जमा है या अपने प्रति ही कमाया और खाया। कमाया और खाया उसको राजयोगी नहीं कहेंगे। स्वराज्य अधिकारी नहीं कहेंगे। राजा के भण्डारे सदा भरपूर रहते हैं। प्रजा के पालना की जिम्मेवारी राजा पर होती है। स्वराज्य अधिकारी अर्थात् सर्व खजाने भरपूर। अगर खजाने भरपूर नहीं तो अब भी प्रजा योगी हैं। राजयोगी नहीं। प्रजा कमाती और खाती है। साहूकार प्रजा थोड़ा बहुत जमा रखती है, लेकिन राजा खजानों का मालिक है। तो राजयोगी अर्थात् स्वराज्य अधिकारी आत्मायें। किसी भी खजाने में जमा का खाता खाली नहीं हो सकता। तो अपने को देखो कि खजाने भरपूर हैं। दाता के बच्चे सर्व को देने की भावना है वा अपने में ही मस्त हैं। स्व की पालना में ही समय बीत जाता वा औरों की पालना के लिए समय और खजाना भरपूर है। यहाँ संगम से ही रूहानी पालना के संस्कार वाले भविष्य में प्रजा के पालनहार विश्व राजन् बन सकते हैं। राजा वा प्रजा का स्टैम्प यहाँ से ही लगता है। स्टेटस वहाँ मिलता है। अगर यहाँ की स्टैम्प नहीं तो स्टेटस नहीं। संगमयुग स्टैम्प आफिस है। बाप द्वारा ब्राह्मण परिवार द्वारा स्टैम्प लगती है। तो अपने आपको अच्छी तरह से देखो। स्टॉक चेक करो। ऐसे न हो समय पर एक अप्राप्ति भी सम्पन्न बनने में धोखा दे देवे। जैसे स्थूल स्टाक जमा करते, अगर सब राशन जमा कर लिया लेकिन छोटा सा माचिस रह गया तो अनाज क्या करेंगे। अनेक प्राप्तियाँ होते भी एक अप्राप्ति धोखा दे सकती है। ऐसे एक भी अप्राप्ति सम्पन्नता का स्टैम्प लगाने के अधिकारी बनने में धोखा दे देगी।
यह नहीं सोचो – याद की शक्ति तो है, किसी गुण की कमी है तो कोई हर्जा नहीं। याद की शक्ति महान है, नम्बरवन है यह ठीक है। लेकिन किसी भी एक गुण की कमी भी समय पर फुल पास होने में फेल कर देगी। यह छोटी बात नहीं समझो। एक एक गुण का महत्व और सम्बन्ध क्या है, यह भी गहरा हिसाब है, वह फिर कभी सुनायेंगे।
आप विशेष आत्माओं की फर्ज-अदाई क्या है? आज यह विशेष स्मृति दिलाई। समझा। इस समय देहली राजधानी वाले आये हैं ना। तो राज्य अधिकारी की बातें सुनाई। ऐसे ही राजधानी में महल नहीं मिल जायेगा। पालना कर प्रजा बनानी होगी। देहली वाले तो जोर-शोर से तैयारी कर रहे होंगे ना। राजधानी में रहना है ना, दूर तो नहीं जाना है ना।
गुजरात वाले तो अभी भी साथ हैं। संगम पर मधुबन के साथ हैं तो राज्य में भी साथ होंगे ना। साथ रहने का दृढ़ संकल्प किया है ना। तीसरा है इन्दौर। इन-डोर अर्थात् घर में रहने वाले। तो इन्दौर जोन वाले राज्य के घर में रहेंगे ना। अभी भी बाप के दिल रूपी घर में रहने वाले। तो तीनों की समीपता की राशि मिलती है। सदा ऐसे ही इस भाग्य की रेखा को स्पष्ट और विस्तार को प्राप्त करते रहना। अच्छा।
ऐसे सदा सम्पन्न-पन की फर्ज-अदाई पालन करने वाले, अपने दाता-पन के श्रेष्ठ संस्कारों से सर्व के दर्द मिटाने वाले, सदा स्वराज्य अधिकारी बन रूहानी पालना करने वाले, सर्व खजानों से भरपूर भण्डारे करने वाले, मास्टर दाता वरदाता, ऐसे राजयोगी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:- 1. सदा अपने को साक्षीपन की सीट पर स्थित आत्मायें अनुभव करते हो? यह साक्षीपन की स्थिति सबसे बढ़िया श्रेष्ठ सीट है। इस सीट पर बैठ कर्म करने या देखने में बहुत मजा आता है। जैसे सीट अच्छी होती है तो बैठने में मजा आता है ना। सीट अच्छी नहीं तो बैठने में मजा नहीं। यह साक्षीपन की सीट सबसे श्रेष्ठ सीट है। इसी सीट पर सदा रहते हो? दुनिया में भी आजकल सीट के पीछे भाग-दौड़ कर रहे हैं। आपको कितनी बढ़िया सीट मिली हुई है। जिस सीट से कोई उतार नहीं सकता। उन्हें कितना डर रहता है, आज सीट है कल नहीं। आपको अविनाशी है निर्भय होकर बैठ सकते हो। तो साक्षी-पन की सीट पर सदा रहते हो? अपसेट वाला सेट नहीं हो सकता। सदा इस सीट पर सेट रहो। यह ऐसी आराम की सीट है जिस पर बैठकर जो देखने चाहो जो अनुभव करने चाहो वह कर सकते हो।
2. अपने को इस सृष्टि के अन्दर कोटों में कोई और कोई में भी कोई… ऐसी विशेष आत्मा समझते हो? जो गायन है कोटों में कोई बाप के बनते हैं, वह हम हैं। यह खुशी सदा रहती है? विश्व की अनेक आत्मायें बाप को पाने का प्रयत्न कर रहीं हैं और हमने पा लिया! बाप का बनना अर्थात् बाप को पाना। दुनिया ढूंढ रही है और हम उनके बन गये। भक्तिमार्ग और ज्ञान मार्ग की प्राप्ति में बहुत अन्तर है। ज्ञान है पढ़ाई, भक्ति पढ़ाई नहीं है। वह थोड़े समय के लिए आध्यात्मिक मनोरंजन है। लेकिन सदाकाल की प्राप्ति का साधन ज्ञान है। तो सदा इसी स्मृति में रह औरों को भी समर्थ बनाओ। जो ख्याल ख्वाब में न था वह प्रैक्टिकल में पा लिया। बाप ने हर कोने से बच्चों को निकाल अपना बना लिया। तो इसी खुशी में रहो।
3. सभी अपने को एक ही बाप के, एक ही मत पर चलने वाले एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले अनुभव करते हो? जब एक बाप है, दूसरा है ही नहीं तो सहज ही एकरस स्थिति हो जाती है। ऐसे अनुभव है? जब दूसरा कोई है ही नहीं तो बुद्धि कहाँ जायेगी और कहाँ जाने की मार्जिन ही नहीं है। है ही एक। जहाँ दो चार बातें होती हैं तो सोचने को मार्जिन हो जाती। जब एक ही रास्ता है तो कहाँ जायेंगे। तो यहाँ मार्ग बताने के लिए ही सहज विधि है – एक बाप, एक मत, एकरस एक ही परिवार। तो एक ही बात याद रखो तो वन नम्बर हो जायेंगे। एक का हिसाब जानना है, बस। कहाँ भी रहो लेकिन एक की याद है तो सदा के साथ हैं, दूर नहीं। जहाँ बाप का साथ है वहाँ माया का साथ हो नहीं सकता। बाप से किनारा करके फिर माया आती है। ऐसे नहीं आती। न किनारा हो न माया आये। एक का ही महत्व है।
अधर कुमारों से बापदादा की मुलाकात:-
सदा प्रवृति में रहते अलौकिक वृत्ति में रहते हो? गृहस्थी जीवन से परे रहने वाले, सदा ट्रस्टी रूप में रहने वाले। ऐसे अनुभव करते हो? ट्रस्टी माना सदा सुखी और गृहस्थी माना सदा दु:खी, आप कौन हो? सदा सुखी। अभी दु:ख की दुनिया छोड़ दी। उससे निकल गये। अभी संगमयुगी सुखों की दुनिया में हो। अलौकिक प्रवृत्ति वाले हो, लौकिक प्रवृति वाले नहीं। आपस में भी अलौकिक वृत्ति, अलौकिक दृष्टि रहे।
ट्रस्टी-पन की निशानी है सदा न्यारा और बाप का प्यारा। अगर न्यारा प्यारा नहीं तो ट्रस्टी नहीं। गृहस्थी जीवन अर्थात् बन्धन वाली जीवन। ट्रस्टी जीवन निर्बन्धन है। ट्रस्टी बनने से सब बन्धन सहज ही समाप्त हो जाते हैं। बन्धनमुक्त हैं तो सदा सुखी हैं। उनके पास दु:ख की लहर भी नहीं आ सकती। अगर संकल्प में भी आता है – मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा यह काम है तो यह स्मृति भी माया का आह्वान करती है। तो मेरे को तेरा बना दो। जहाँ तेरा है वहाँ दु:ख खत्म। मेरा कहना और मूंझना। तेरा कहना और मौज में रहना। अभी मौज में नहीं रहेंगे तो कब रहेंगे। संगमयुग ही मौजों का युग है। इसलिए सदा मौज में रहो। स्वप्न और संकल्प में भी व्यर्थ न हो। आधाकल्प सब व्यर्थ गंवाया, अब गंवाने का समय पूरा हुआ। कमाई का समय है। जितने समर्थ होंगे उतना कमाई कर जमा कर सकेंगे। इतना जमा करो जो 21 जन्म आराम से खाते रहो। इतना स्टॉक हो जो दूसरों को भी दे सको क्योंकि दाता के बच्चे हो। जितना जमा होगा उतनी खुशी जरूर होगी।
सदा एक बाप दूसरा न कोई इसी लगन में मगन रहो। जहाँ लगन है वहाँ विघ्न नहीं रह सकता। दिन है तो रात नहीं, रात है तो दिन नहीं। ऐसे यह लगन और विघ्न हैं। लगन ऐसी शक्तिशाली है जो विघ्न को भस्म कर देती है। ऐसी लगन वाली निर्विघ्न आत्मायें हों? कितना भी बड़ा विघ्न हो, माया विघ्न रूप बनकर आये लेकिन लगन वाले उसे ऐसे पार करते हैं जैसे माखन से बाल। लगन ही सर्व प्राप्तियों का अनुभव कराती है। जहाँ बाप है वहाँ प्राप्ति जरूर है, जो बाप का खजाना वह बच्चे का।
माताओं के साथ:- शक्ति दल है ना। मातायें, जगत मातायें बन गई। अभी हद की मातायें नहीं। सदा अपने को जगत माता समझो। हद की गृहस्थी में फँसने वाली नहीं। बेहद की सेवा में सदा खुश रहने वाली। कितना श्रेष्ठ मर्तबा बाप ने दिला दिया। दासी से सिर का ताज बना दिया। वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! बस यही गीत गाती रहो। बस यही एक काम बाप ने माताओं को दिया है। क्योंकि मातायें बहुत भटक-भटक कर थक गई है। तो बाप माताओं की थकावट देख, उन्हें थकावट से छुड़ाने आये हैं। 63 जन्म की थकावट एक जन्म में समाप्त कर दी। एक सेकेण्ड में समाप्त कर दी। बाप के बने और थकावट खत्म। माताओं को झूलना और झुलाना अच्छा लगता है। तो बाप ने माताओं को खुशी का, अतीन्द्रिय सुख का झुला दिया है। उसी झूले में झूलती रहो। सदा सुखी, सदा सुहागिन बन गई। अमर बाप के अमर बच्चे बन गये। बापदादा भी बच्चों को देखकर खुश होते हैं।
“विशेष आत्माओं का फर्ज – 12 दिसंबर 1984 अव्यक्त वाणी”
1. प्रस्तावना — आज दिलाराम बाप दिलखुश बच्चों से मिलने आये हैं
बापदादा कहते हैं—
दुनिया में सबके दिल में दर्द, चिंता, हाय-हाय है।
लेकिन दिल-खुश आप बच्चे ही हैं।
उदाहरण:
जैसे दर्द से भरी भीड़ में कोई एक डॉक्टर आराम से, शान्त होकर सभी की सेवा कर रहा हो—
वह स्वयं खुश होता है क्योंकि उसे इलाज का ज्ञान है।
वैसे ही ब्रह्मण आत्माएं — इस दुनिया के डॉक्टर हैं।
2. दुनिया का आज का दृश्य — दुख का महीन जाल
बापदादा स्पष्ट करते हैं—
आज मनुष्य 4 मुख्य प्रकार के दुखों में फँसे हुए हैं:
-
तन का दर्द / बीमारी
-
सम्बन्ध-संसार का दु:ख
-
धन की चिंता — कम हो तो भी तनाव, ज्यादा हो तो भी डर
-
प्राकृतिक आपदाएँ
ये दुख एक-दूसरे को जन्म देते जाते हैं।
इसलिए दुनिया की सामूहिक पुकार—
“हाय-हाय! बचाओ!”
3. ब्रह्मणों का फर्ज — दुख के कर्ज से सभी को मुक्त करना
बाप कहते हैं—
“जो 63 जन्मों का कर्ज है, वह आज मर्ज बन गया है।”
आपका कर्तव्य:
-
हर आत्मा को—उसकी स्थिति के अनुसार—शक्ति देना
-
वरदान देना
-
अपने जमा खजाने से हिस्सा दान करना
-
आत्माओं को कर्मयोग से कर्म-भोग मिटाने की शक्ति दिलाना
उदाहरण:
जैसे एक अमीर राजा भूखी प्रजा को अपने खजाने से भोजन देता है—
वैसे ही ब्रह्मण आत्माओं को अपने योग-बल, गुण-बल, और संकल्प-बल का दान देना है।
4. भक्ति का वृक्ष अब फलहीन क्यों हो गया?
बाप बताते हैं—
भक्ति की शक्ति अब खत्म हो चुकी है।
लोगों के खाते खाली हैं।
क्या बचा है?
केवल दिलासा देने वाली छाया—
“अभी नहीं तो कभी मिल जाएगा।”
लेकिन फल नहीं है।
उदाहरण:
पुराना पेड़ दिखने में सुंदर लगे, पर फल न दे—
ठीक वैसा ही आज का भक्ति-पंथ बन गया है।
5. सवाल — राजा बनना है या प्रजा?
बाप एक गहरा रहस्य बताते हैं:
-
प्रजा कमाती–खाती है
-
राजा जमा करता है
-
राजा के खजाने सदा भरपूर होते हैं
अब प्रश्न
आप खजाने जमा कर रहे हैं या सिर्फ खुद ही खा रहे हैं?
6. “एक अप्राप्ति” भी धोखा दे सकती है
बाप चेतावनी देते हैं—
“एक भी गुण की कमी फुल पास में फेल कर सकती है।”
उदाहरण:
यदि घर में सब राशन है, पर माचिस नहीं—
तो भोजन नहीं बन सकता।
वैसे ही—
गुण, शक्तियाँ और प्राप्तियाँ चाहे कितनी हों,
लेकिन एक कमी पूरी सम्पन्नता में बाधा बन सकती है।
7. स्टैम्प और स्टेटस — संगम का गहरा नियम
संगमयुग = स्टैम्प ऑफिस
सत्ययुग-त्रेता = स्टेटस
यहाँ स्टैम्प न लगे → वहाँ स्टेटस नहीं मिलेगा।
इसलिए—
अभी ही चेक करें:
✔︎ खजाने भरे हैं?
✔︎ देने की भावना है?
✔︎ स्वराज्य अधिकारी की स्थिति है?
8. साक्षीपन की सीट — सबसे आरामदायक सीट
बापदादा पार्टियों से मिलते हुए पूछते हैं:
“क्या साक्षीपन की सीट पर सदा स्थित हो?”
क्यों महत्वपूर्ण?
-
इस सीट से कोई उतार नहीं सकता
-
यहाँ बैठे-बैठे हम कर्म भी कर सकते हैं और देख भी सकते हैं
-
यहाँ से माया की आंधी तक छू नहीं पाती
9. “एक बाप दूसरा न कोई” — Success का मूल मंत्र
एक बाप, एक मत, एक रस →
सहज निर्विघ्न मार्ग।
जहाँ “एक” है, वहाँ
-
बुद्धि भटकती नहीं
-
संकल्प व्यर्थ नहीं जाते
-
माया पास नहीं आ सकती
10. अधर कुमारों के लिए संदेश — ट्रस्टी बनो
बाप कहते हैं—
गृहस्थी जीवन = बंधन
ट्रस्टी जीवन = बंधन-मुक्त
मेरा → बांधता है
तेरा → मुक्त करता है
11. माताओं के लिए वरदान — “जगत माता” बनो
माताएँ थकी हुई थीं 63 जन्मों से।
अब बाप ने उनके दुख समाप्त कर दिए।
उनकी पहचान:
-
सुहागिन
-
अमर बच्चे
-
जगत की पालना करने वाली शक्तियाँ
-
अतीन्द्रिय सुख का झूला
अंतिम आशीर्वाद (Murlis Note — 12-12-1984)
“सदा सम्पन्न–पन की फर्ज-अदाई करने वाले,
सर्व के दर्द मिटाने वाले,
स्वराज्य अधिकारी,
मास्टर दाता,
वरदाता,
राजयोगी श्रेष्ठ आत्माएँ बनो।”
डिस्क्लेमर:
इस वीडियो का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक शिक्षा, आत्म-उन्नति और राजयोग पर आधारित समझ को साझा करना है।
यह ब्रह्माकुमारीज संस्था की आधिकारिक मुरली नहीं है, बल्कि 12-12-1984 की अव्यक्त वाणी पर आधारित एक व्याख्या, अध्ययन और मनन है।
किसी भी व्यक्ति, संस्था या धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाना उद्देश्य नहीं है
प्रश्न 1:
बापदादा आज किस रूप में बच्चों से मिलने आए?
उत्तर:
आज बापदादा दिलाराम बनकर दिल-खुश बच्चों से मिलने आए हैं। दुनिया में सबके दिल में दर्द, चिंता और हाय-हाय है—परंतु दिल-खुश ब्रह्मण बच्चों का स्तर अलग है।
प्रश्न 2:
ब्रह्मण आत्माओं को ‘दुनिया का डॉक्टर’ क्यों कहा गया?
उत्तर:
क्योंकि जैसे डॉक्टर दर्द से भरी भीड़ में भी शान्त रहते हुए सेवा करता है,
वैसे ही ब्रह्मण आत्माएँ दुखी दुनिया को योग-बल, गुण-बल और शक्ति देकर उपचार करती हैं।
प्रश्न 3:
आज मनुष्य किन चार मुख्य प्रकार के दुखों में फंसे हुए हैं?
उत्तर:
-
तन का दर्द और बीमारी
-
सम्बन्धों का दुख
-
धन की चिंता — कम हो या अधिक हो, दोनों में तनाव
-
प्राकृतिक आपदाएँ
ये दुख एक-दूसरे को जन्म देते हुए सामूहिक पुकार बन जाते हैं—“हाय-हाय! बचाओ!”
प्रश्न 4:
ब्रह्मण आत्माओं का मुख्य फ़र्ज क्या है?
उत्तर:
63 जन्मों से संचित दुख के कर्ज को मिटाने में दुनिया की मदद करना।
इसके लिए ब्रह्मणों को—
-
शक्ति देना
-
वरदान देना
-
योग से कर्म-भोग समाप्त कराने में मदद करना
-
अपने जमा खजाने से सबको हिस्सा देना
प्रश्न 5:
भक्ति-पथ आज फलहीन क्यों हो गया?
उत्तर:
क्योंकि भक्ति की शक्ति समाप्त हो चुकी है।
भक्तों के खाते खाली हैं—अब केवल दिलासा का छाया-फल बाकी है, वास्तविक फल नहीं।
जैसे पुराना पेड़ सुन्दर दिखे पर फल न दे।
प्रश्न 6:
बापदादा ‘राजा’ और ‘प्रजा’ का कौन-सा रहस्य समझाते हैं?
उत्तर:
प्रजा खाती है, राजा जमा करता है।
यदि ब्रह्मण आत्माएँ सिर्फ खुद ही खाती जा रहीं—गुण, शक्ति, ज्ञान—तो वे प्रजा बन जाएँगी।
राजा वही बनता है जो जमा करता है और बांटता है।
प्रश्न 7:
एक अप्राप्ति (एक कमी) क्यों धोखा दे सकती है?
उत्तर:
क्योंकि एक भी गुण, शक्ति या प्राप्ति की कमी
फुल पास में भी फेल कर सकती है।
जैसे घर में सब सामान हो पर माचिस न हो तो भोजन नहीं बन सकता—
वैसे ही सम्पूर्णता में “एक कमी” बाधा बन सकती है।
प्रश्न 8:
संगमयुग को ‘स्टैम्प ऑफिस’ क्यों कहा गया?
उत्तर:
क्योंकि यहाँ जो स्टैम्प (स्थिति, गुण, स्वभाव, स्वराज्य) लगता है—
उसी आधार पर सत्ययुग-त्रेता में स्टेटस मिलता है।
यदि यहाँ स्टैम्प नहीं लगा तो वहाँ राज्य नहीं मिलेगा।
प्रश्न 9:
साक्षीपन की सीट को सबसे आरामदायक क्यों कहा गया?
उत्तर:
क्योंकि इस सीट पर बैठने से—
-
कोई उतार नहीं सकता
-
माया की आंधी पास नहीं आ पाती
-
कर्म भी हो जाते हैं और दृष्टा भाव भी बना रहता है
यह सीट ब्रह्मणों की सुरक्षा-सीट है।
प्रश्न 10:
‘एक बाप दूसरा न कोई’ का क्या फल मिलता है?
उत्तर:
जब बुद्धि एक बाप में टिक जाती है तो—
-
संकल्प व्यर्थ नहीं जाते
-
बुद्धि भटकती नहीं
-
मार्ग सहज और निर्विघ्न हो जाता है
-
माया पास नहीं आ सकती
प्रश्न 11:
अधर कुमारों को बापदादा क्या संदेश देते हैं?
उत्तर:
ट्रस्टी बनकर जीवन जियो।
– गृहस्थी जीवन में “मेरा” कहने से बंधन बनते हैं।
– “तेरा” कहने से आत्मा बंधन-मुक्त बन जाती है।
प्रश्न 12:
माताओं को कौन-सा विशेष वरदान मिला है?
उत्तर:
माताओं को “जगत माता” बनने का वरदान मिला है।
बापदादा ने 63 जन्मों का दुख समाप्त कर—
उन्हें
-
सुहागिन
-
अमर बच्चे वाली
-
जगत की पालना करने वाली शक्ति
बना दिया है।
प्रश्न 13:
इस अव्यक्त वाणी का अंतिम आशीर्वाद क्या है?
उत्तर:
“सदा सम्पन्न-पन की फ़र्ज-अदाई करने वाले,
सर्व के दर्द मिटाने वाले,
स्वराज्य अधिकारी,
मास्टर दाता,
वरदाता,
राजयोगी श्रेष्ठ आत्माएँ बनो।”
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