(50)26-12-1984 “The Power of Truth”

अव्यक्त मुरली-(50)26-12-1984 “सत्यता की शक्ति”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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26-12-1984 “सत्यता की शक्ति”

सर्व शक्तिमान बाप आज विशेष दो सत्ताओं को देख रहे हैं। एक राज सत्ता दूसरी है ईश्वरीय सत्ता। दोनों सत्ताओं का अब संगम पर विशेष पार्ट चल रहा है। राज्य सत्ता हलचल में है। ईश्वरीय सत्ता सदा अचल अविनाशी है। ईश्वरीय सत्ता को सत्यता की शक्ति कहा जाता है क्योंकि देने वाला सत् बाप, सत् शिक्षक, सतगुरू है। इसलिए सत्यता की शक्ति सदा श्रेष्ठ है। सत्यता की शक्ति द्वारा सतयुग, सचखण्ड स्थापन कर रहे हो। सत अर्थात् अविनाशी भी है। तो सत्यता की शक्ति द्वारा अविनाशी वर्सा, अविनाशी पद प्राप्त करने वाली पढ़ाई, अविनाशी वरदान प्राप्त किये हैं। इस प्राप्ति से कोई भी मिटा नहीं सकता। सत्यता की शक्ति से सारी विश्व आप सत्यता की शक्ति वालों का भक्तिमार्ग के आदि से अन्त तक अविनाशी गायन और पूजन करती आती है अर्थात् गायन पूजन भी अविनाशी सत हो जाता है। सत अर्थात् सत्य। तो सबसे पहले क्या जाना? अपने आपको सत आत्मा जाना। सत बाप के सत्य परिचय को जाना। इस सत्य पहचान से सत्य ज्ञान से सत्यता की शक्ति स्वत: ही सत्य हो जाती। सत्यता की शक्ति द्वारा असत्य रूपी अंधकार, अज्ञान रूपी अंधकार स्वत: ही समाप्त हो जाता है। अज्ञान सदा असत्य होता है। ज्ञान सत है, सत्य है। इसलिए भक्तों ने बाप की महिमा में भी कहा है “सत्यम् शिवम् सुन्दरम”। सत्यता की शक्ति सहज ही प्रकृति जीत, मायाजीत बना देती है। अभी अपने आप से पूछो सत् बाप के बच्चे हैं तो सत्यता की शक्ति कहाँ तक धारण की है?

सत्यता के शक्ति की निशानी है वह सदा निर्भय होगा। जैसे मुरली में सुना है – “सच तो बिठो नच” अर्थात् सत्यता की शक्ति वाला सदा बेफिकर निश्चिन्त होने के कारण, निर्भय होने के कारण खुशी में नाचता रहेगा। जहाँ भय है, चिंता है वहाँ खुशी में नाचना नहीं। अपनी कमजोरियों की भी चिंता होती है। अपने संस्कार वा संकल्प कमजोर हैं तो सत्य मार्ग होने के कारण मन में अपनी कमजोरी का चिंतन चलता जरूर है। कमजोरी मन की स्थिति को हलचल में जरूर लाती है। चाहे कितना भी अपने को छिपावे वा आर्टीफिशल अल्पकाल के समय प्रमाण, परिस्थिति प्रमाण बाहर से मुस्कराहट भी दिखावे लेकिन सत्यता की शक्ति स्वयं को महसूसता अवश्य कराती है। बाप से और अपने आप से छिप नहीं सकता। दूसरों से छिप सकता है। चाहे अलबेलेपन के कारण अपने आप को भी कभी-कभी महसूस होते हुए भी चला लेवे फिर भी सत्यता की शक्ति मन में उलझन के रूप में, उदासी के रूप में, व्यर्थ संकल्प के रूप में आती जरूर है क्योंकि सत्यता के आगे असत्य टिक नहीं सकता। जैसे भक्ति मार्ग में चित्र दिखाया है – सागर के बीच साँप के ऊपर नाच रहे हैं। है साँप लेकिन सत्यता की शक्ति से साँप भी नाचने की स्टेज बन जाते हैं। कैसी भी भयानक परिस्थिति हो, माया के विकराल रूप हों, सम्बन्ध-सम्पर्क वाले परेशान करने वाले हों, वायुमण्डल कितना भी जहरीला हो लेकिन सत्यता की शक्ति वाला इन सबको खुशी में नाचने की स्टेज बना देता है। तो यह चित्र किसका है? आप सभी का है ना। सभी कृष्ण बनने वाले हैं। इसी में हाथ उठाते हैं ना। राम के चरित्रों में ऐसी बातें नहीं हैं। उसका अभी-अभी वियोग, अभी-अभी खुशी है। तो कृष्ण बनने वाली आत्मायें ऐसी स्थिति रूपी स्टेज पर सदा नाचती रहती हैं। कोई प्रकृति वा माया वा व्यक्ति, वैभव उसे हिला नहीं सकता। माया को ही अपनी स्टेज वा शैया बना देगा। यह भी चित्र देखा है ना। साँप को शैया बना दिया अर्थात् विजयी बन गये। तो सत्यता की शक्ति की निशानी सच तो नच, यह चित्र है। सत्यता की शक्ति वाले कभी भी डूब नहीं सकते। सत्य की नईया डगमग खेल कर सकती है लेकिन डूब नहीं सकती। डगमगाना भी खेल अनुभव करेंगे। आजकल खेल भी जान बूझ कर ऊपर नीचे हिलने के बनाते हैं ना। है गिरना लेकिन खेल होने के कारण विजयी अनुभव करते कितनी भी हलचल होगी लेकिन खेल करने वाला यह समझेगा कि मैंने जीत प्राप्त कर ली। ऐसे सत्यता की शक्ति अर्थात् विजयी के वरदानी अपने को समझते हो? अपना विजयी स्वरूप सदा अनुभव करते हो? अगर अब तक भी कोई हलचल है, भय है तो सत्य के साथ असत्य अभी रहा हुआ है। इसलिए हलचल में ला रहा है। तो चेक करो – संकल्प, दृष्टि, वृत्ति, बोल और सम्बन्ध सम्पर्क में सत्यता की शक्ति अचल हैं? अच्छा, आज मिलने वाले बहुत हैं इसलिए इस सत्यता की शक्ति पर, ब्राहमण जीवन में कैसे विशेषता सम्पन्न चल सकते हैं इसका विस्तार फिर सुनायेंगे। समझा!

डबल विदेशी बच्चों ने क्रिसमस मनाई कि आज भी क्रिसमस है? ब्राह्मण बच्चों के लिए संगमयुग ही मनाने का युग है। तो रोज़ नाचो, गाओ, खुशी मनाओ। कल्प के हिसाब से तो संगमयुग थोड़े दिनों के समान है ना। इसलिए संगमयुग का हर दिन बड़ा है। अच्छा।

सभी सत्यता के शक्ति स्वरूप, सत बाप द्वारा सत वरदान वा वर्सा पाने वाले, सदा सत्यता की शक्ति द्वारा विजयी आत्मायें, सदा प्रकृति जीत, मायाजीत, खुशी में नाचने वाले, ऐसे सत बच्चों को सत बाप, शिक्षक और सतगुरू का यादप्यार और नमस्ते।

दादी चन्द्रमणी जी बापदादा से छुट्टी ले पंजाब जा रही हैं:-

सभी पंजाब निवासी सो मधुबन निवासी बच्चों को यादप्यार स्वीकार हो। सभी बच्चे सदा ही बेफिकर बादशाह बन रहे हो। क्यों? योगयुक्त बच्चे सदा छत्रछाया के अन्दर रहे हुए हैं। योगी बच्चे पंजाब में नहीं रहते लेकिन बापदादा की छत्रछाया में रहते हैं। चाहे पंजाब में हो चाहे कहाँ भी हो लेकिन छत्रछाया के बीच रहने वाले बच्चे सदा सेफ रहते हैं। अगर हलचल में आये तो कुछ न कुछ चोट लग जाती है। लेकिन अचल रहे तो चोट के स्थान पर होते हुए भी बाल बांका नहीं हो सकता। इसलिए बापदादा का हाथ है, साथ है, तो बेफिकर बादशाह होकर रहो और खूब ऐसे अशान्त वातावरण में शान्ति की किरणें फैलाओ। नाउम्मीद वालों को ईश्वरीय सहारे की उम्मीद दिलाओ। हलचल वालों को अविनाशी सहारे की स्मृति दिलाए अचल बनाओ। यही सेवा पंजाब वालों को विशेष करनी है। पहले भी कहा था कि पंजाब वालों को नाम बाला करने का चांस भी अच्छा है। चारों ओर कोई सहारा नजर नहीं आ रहा है। ऐसे समय पर अनुभव करें कि दिल को आराम देने वाले, दिल को शान्ति का सहारा देने वाले यही श्रेष्ठ आत्मायें हैं। अशान्ति के समय शान्ति का महत्व होता है तो ऐसे टाइम पर यह अनुभव कराना, यही प्रत्यक्षता का एक निमित्त आधार बन जाता है। तो पंजाब वालों को डरना नहीं है लेकिन ऐसे समय पर वह अनुभव करें कि और सभी डराने वाले हैं लेकिन यह सहारा देने वाले हैं, ऐसा कोई मीटिंग करके प्लैन बनाओ जो अशान्त आत्मायें हैं उन्हों के संगठन में जाकर शान्ति का अनुभव कराओ। एक दो को भी शान्ति की अनुभूति कराई तो एक दो से लहर फैलती जायेगी और आवाज बुलन्द हो जायेगा। मीटिंग कर रहे हैं बहुत अच्छा, हिम्मत वाले हो, हुल्लास वाले हो और सदा ही हर कार्य में सहयोगी, स्नेही साथ रहे हो और सदा रहेंगे। पंजाब का नम्बर पीछे नहीं है, आगे है। पंजाब शेर कहा जाता है, शेर पीछे नहीं रहते, आगे रहते हैं। जो भी प्रोग्राम मिले उसमें हाँ जी, हाँ जी करना तो असम्भव भी सम्भव हो जायेगा। अच्छा।

सभी बच्चों से मिलन के बाद 5.30 बजे प्रात: बापदादा ने सतगुरूवार की यादप्यार दी।

चारों ओर के सच्चे-सच्चे सत बाप, सत शिक्षक, सतगुरू के अति समीप, स्नेही सदा साथी बच्चों को सतगुरूवार के दिन बहुत-बहुत यादप्यार स्वीकार हो। आज सतगुरूवार के दिन बापदादा सभी को सदा सफलता स्वरूप रहो, सदा हिम्मत हुल्लास में रहो, सदा बाप की छत्रछाया के अन्दर सेफ रहो, सदा एक बल एक भरोसे में स्थित रह साक्षी हो सब दृश्य देखते हुए हर्षित रहो, ऐसे विशेष स्नेह भरे वरदान दे रहे हैं। इन्हीं वरदानों को सदा स्मृति में रखते हुए समर्थ रहो, सदा याद रहे और सदा याद में रहो। अच्छा, सभी को गुडमॉर्निंग और सदा हर दिन की बधाई।

अध्याय : सत्यता की शक्ति

(अव्यक्त मुरली – 26 दिसम्बर 1984)


 भूमिका : दो सत्ताओं का संगम

सर्वशक्तिमान बाप आज दो सत्ताओं को देख रहे हैं—

  • एक : राज सत्ता

  • दूसरी : ईश्वरीय सत्ता

राज सत्ता सदा हलचल में रहती है, बदलती रहती है।
लेकिन ईश्वरीय सत्ता अचल, अविनाशी और सत्य है।
इसी ईश्वरीय सत्ता को कहा गया है—
“सत्यता की शक्ति”

क्यों?
क्योंकि देने वाला है—

  • सत् बाप

  • सत् शिक्षक

  • सतगुरू

इसलिए सत्यता की शक्ति सदा श्रेष्ठ और अडोल रहती है।


 सत्यता की शक्ति क्या है?

सत्यता की शक्ति वह दिव्य शक्ति है—

  • जो सतयुग (सचखण्ड) की स्थापना कर रही है

  • जो अविनाशी वर्सा और अविनाशी पद दिलाती है

  • जिसे कोई भी मिटा नहीं सकता

सत् का अर्थ है—
अविनाशी, सदा रहने वाला

इसलिए सत्यता की शक्ति से प्राप्त वरदान भी अविनाशी हैं।


 मुरली नोट्स (मुख्य बिंदु)

  • सत्यता की शक्ति से

    • सत ज्ञान

    • सत पहचान

    • सत जीवन
      स्वतः बनता है।

  • असत्य = अज्ञान

  • ज्ञान = सत्य

  • इसलिए असत्य का अंधकार,
    सत्य ज्ञान के सामने स्वतः समाप्त हो जाता है।


 “सत्यम् शिवम् सुन्दरम्” – गूढ़ अर्थ

भक्तिमार्ग में भी बाप की महिमा कही गई—

“सत्यम् शिवम् सुन्दरम्”

  • सत्यम् – सत्य

  • शिवम् – कल्याणकारी

  • सुन्दरम् – श्रेष्ठ स्वरूप

अर्थात्
 परमात्मा का स्वरूप ही सत्यता की शक्ति है।


 सबसे पहला सत्य क्या जाना?

  1. अपने आप को सत आत्मा जाना

  2. सत बाप की सत्य पहचान को जाना

इसी पहचान से—

  • सत्य ज्ञान आता है

  • और सत्यता की शक्ति स्वतः धारण हो जाती है


 सत्यता की शक्ति की निशानी

“सच तो बिठो नच”

मुरली वाक्य:

“सच तो बिठो नच”

अर्थात—

  • सत्यता की शक्ति वाला निर्भय होता है

  • बेफिक्र बादशाह होता है

  • और सदा खुशी में नाचता है

जहाँ—

  • भय है

  • चिंता है

  • उलझन है

वहाँ सत्यता की शक्ति पूरी नहीं है।


 कमजोरी और सत्यता का संबंध

यदि—

  • संकल्प कमजोर हैं

  • संस्कार कमजोर हैं

तो मन में—

  • हलचल

  • उदासी

  • व्यर्थ संकल्प
    ज़रूर आते हैं।

 सत्यता की शक्ति स्वयं को महसूस कराती है।
बाप से और अपने आप से कुछ भी छिप नहीं सकता।


 मुरली का गूढ़ चित्र : साँप पर नाचना

भक्ति मार्ग का चित्र—

  • सागर के बीच

  • साँप के ऊपर नाचते हुए

अर्थ:

  • साँप = माया, परिस्थिति, विकार

  • नाचना = विजय, खुशी

 सत्यता की शक्ति वाला
माया को भी अपनी स्टेज बना देता है।


 कृष्ण बनने वाली आत्माओं की पहचान

  • राम के जीवन में

    • कभी वियोग

    • कभी खुशी

लेकिन कृष्ण बनने वाली आत्माएँ

  • हर स्थिति को
    नाचने की स्टेज बना लेती हैं

कोई—

  • व्यक्ति

  • परिस्थिति

  • प्रकृति

  • माया

उन्हें हिला नहीं सकती।


 सत्य की नैया

मुरली का सुंदर संकेत—

  • सत्य की नैया

    • डगमगा सकती है

    • लेकिन डूब नहीं सकती

डगमगाना भी—
एक खेल है
और खेल में सदा विजय होती है।


 आत्म-परीक्षण (Check List)

अपने आप से पूछो—

  • क्या मेरे संकल्प सत्य हैं?

  • क्या मेरी दृष्टि सत्य है?

  • क्या मेरी वृत्ति अचल है?

  • क्या मेरे बोल सत्य हैं?

  • क्या मेरे सम्बन्ध-सम्पर्क सत्यता पर आधारित हैं?

जहाँ भी असत्य छिपा है—
वहीं हलचल आएगी।


 संगमयुग – सदा उत्सव का युग

ब्राह्मण जीवन में—

  • संगमयुग = मनाने का युग

  • हर दिन बड़ा दिन है

  • रोज़ नाचो, गाओ, खुशी मनाओ

क्योंकि—
संगमयुग बहुत थोड़े समय का है
लेकिन सबसे महान है।


 पंजाब सेवा पर विशेष निर्देश

बापदादा का संदेश—

  • डरने का समय नहीं

  • शान्ति की किरणें फैलाने का समय है

  • अशान्त आत्माओं को
     ईश्वरीय सहारे की अनुभूति कराओ

एक-दो आत्माओं में शान्ति भर दी—
तो लहर फैलती जाएगी।


 सतगुरूवार का विशेष वरदान

बापदादा के वरदान—

  • सदा सफलता स्वरूप रहो

  • सदा हिम्मत-हुल्लास में रहो

  • सदा छत्रछाया में सेफ रहो

  • सदा एक बल, एक भरोसा रखो

  • साक्षी बनकर सब दृश्य देखते हुए हर्षित रहो


 समापन संदेश

सभी—

  • सत्यता की शक्ति स्वरूप

  • सत बाप से सत वर्सा पाने वाले

  • सदा विजयी

  • सदा खुशी में नाचने वाले

ऐसे बच्चों को
सत बाप, सत शिक्षक, सतगुरू का
यादप्यार और नमस्ते।

 Disclaimer

यह वीडियो / लेख
प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय
की अव्यक्त मुरलियों एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, सकारात्मक परिवर्तन
और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार है,
न कि किसी व्यक्ति, धर्म या विचारधारा की आलोचना।

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