अव्यक्त मुरली-(09)23-01-1985 दिव्य जन्म की गिफ्ट – दिव्य नेत्र।
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
आज की अव्यक्त मुरली है
नौवीं 1985 की।
आज की मुरली का विषय है
दिव्य जन्म की गिफ्ट।
दिव्य जन्म की गिफ्ट – दिव्य नेत्र।
कल हमने दिव्य नेत्र की बात सुनी। मैं इंतज़ार करता रहा कि यह दिव्य नेत्र कहाँ चला गया। दिव्य नेत्र की बात करने के बाद बाबा ने दिव्य नेत्र का कोई ज़िक्र नहीं किया और मुरली ओम शांति हो गई।
मैंने कहा – चलो, आज बाबा ने उस दिन जो कल की मुरली थी (21 जनवरी 1985) उसी को आगे बढ़ाया।
21 जनवरी 1985 की आठवीं मुरली में दोनों नाम दिए थे – दिव्य नेत्र और दिव्य बुद्धि। लेकिन वहाँ केवल दिव्य बुद्धि का ज़िक्र किया गया, दिव्य नेत्र का नहीं। बाबा ने कहा था कि अगले दिन सुनाऊँगा, इसलिए मुरली वहीं पूरी कर दी थी।
आज त्रिकालदर्शी बाप अपने त्रिकालदर्शी, त्रिनेत्री बच्चों को देख रहे हैं।
बापदादा ने दिव्य बुद्धि और दिव्य नेत्र – जिसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं – का वर्णन किया।
दिव्य बुद्धि और दिव्य नेत्र दो अलग-अलग चीज़ें हैं।
कल दिव्य बुद्धि पर वर्णन किया था, आज दिव्य नेत्र पर।
दिव्य नेत्र, जिसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं – यह नेत्र कितना स्पष्ट और शक्तिशाली है, बापदादा हर बच्चे के दिव्य नेत्र की शक्ति का प्रतिशत देख रहे हैं।
बापदादा ने सभी को 100% शक्तिशाली दिव्य नेत्र जन्म की गिफ्ट दी है।
किसी को कम, किसी को ज़्यादा – ऐसा नहीं किया।
लेकिन इस दिव्य नेत्र को हर एक बच्चे ने अपने कायदे प्रमाण, परहेज प्रमाण और अटेंशन प्रमाण अपने प्रैक्टिकल जीवन में लगाया है।
नेत्र तो बाबा ने सबको एक जैसा दिया है, पर उपयोग में अंतर आया है।
तीन बातें हैं:
कायदे प्रमाण
परहेज प्रमाण
अटेंशन देने प्रमाण
कायदा अर्थात नियम, नियत।
परहेज अर्थात वह सब त्यागना जो बाबा की श्रीमत पर चलने से रोकता है।
अटेंशन अर्थात कितनी सावधानी और सजगता से इस शक्ति को प्रयोग में लाया।
जिसने इन तीनों को जितना प्रयोग किया, उतनी ही दिव्य नेत्र की शक्ति प्रकट हुई।
हर आत्मा ने अपने पुरुषार्थ से दिव्य नेत्र की शक्ति प्राप्त की है।
यह तीसरा नेत्र अनुभव का नेत्र है – यह कोई माथे पर निकलने वाला नेत्र नहीं है।
इसको:
अनुभव का नेत्र
समझ का नेत्र
ज्ञान का नेत्र
भी कहते हैं।
इस नेत्र से 5000 वर्ष की बातें ऐसे स्पष्ट दिखाई देती हैं जैसे कल की बात हो।
आज ब्राह्मण, कल देवता – यह स्थिति सहज हो जाती है।
शक्तिशाली नेत्र वाले बच्चे अपने डबल ताजधारी देव स्वरूप को सदा सामने स्पष्ट देखते रहते हैं।
जैसे ब्रह्मा बाबा को अपना भविष्य श्रीकृष्ण स्वरूप सदा सामने स्पष्ट दिखाई देता था, वैसे ही बच्चों को भी फरिश्ता से देवता बनने का अनुभव होता है।
यह दिव्य नेत्र दिव्य दूरबीन की तरह काम करता है।
साइंस की दूरबीन दूर की वस्तु को पास दिखाती है,
यह दिव्य नेत्र तीनों लोक और तीनों काल दिखाता है।
यह दिव्य नेत्र एक दिव्य टीवी भी है।
इससे अपने 21 जन्मों की दिव्य फिल्म देख सकते हो –
अपने राज्य के सुंदर नज़ारे, ताज-तख्त, राज्य-भाग्य।
लेकिन यह देखने का अर्थ कल्पना नहीं है,
बल्कि ज्ञान और समझ के आधार पर स्पष्ट अनुभव है।
यह नेत्र अवगुण नहीं, गुण देखता है।
कमज़ोर नेत्र अवगुण देखते हैं,
शक्तिशाली नेत्र आत्मिक गुण देखते हैं।
दूसरों के अवगुण देखना मतलब नेत्र की कमजोरी।
बापदादा ने कमजोर नेत्र नहीं दिया,
हमने अपने परहेज में कमी करके उसे कमजोर बनाया।
यदि श्रीमत रूपी परहेज सदा रखा,
तो नेत्र सदा शक्तिशाली रहता है।
यह दिव्य नेत्र माया के सूक्ष्म स्वरूप को भी पहचान लेता है,
इसलिए माया की बीमारी बढ़ने नहीं देता।
यह नेत्र अनेक कार्य सिद्ध करने वाला शक्तिशाली यंत्र है।
बापदादा कहते हैं –
दिव्य बुद्धि मिली है, दिव्य नेत्र मिला है,
इन्हें विधिपूर्वक सदा यूज़ करते रहो।
तो ना व्यर्थ सोचने की फुर्सत रहेगी,
ना व्यर्थ देखने की फुर्सत।
जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे।
इसलिए सदा समर्थ बनो,
भोला भाई बनकर मत रहो।
ज्ञान है तो उसका प्रयोग करो,
और औरों को भी समर्थ बनाओ।
अंत में बापदादा का वरदान:
सदा दिव्य बुद्धि से श्रेष्ठ मनन-चिंतन करने वाले,
दिव्य नेत्र से अपने भविष्य देव स्वरूप को स्पष्ट देखने वाले,
आज और कल को समीप अनुभव करने वाले,
ऐसे त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बच्चों को

