PR:-(07)राजनीति का शोर बढ़ रहा है।ब्रह्मा कुमारीज में शिव बाबा का गुप्त समाधान।
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
अध्याय 1: परिवर्तन काल और राजनीति का शोर
मुरली संकेत (साकार मुरली – 1967–69):
“बच्चे, यह दुनिया परिवर्तन के समय से गुजर रही है।”
आज पूरी दुनिया परिवर्तन के दौर में है। राजनीति में बढ़ता हुआ शोर, वाद‑विवाद, संघर्ष और अस्थिरता इसी परिवर्तन की निशानियाँ हैं। बाबा समझाते हैं कि जब पुरानी दुनिया समाप्ति की ओर जाती है, तब अशांति स्वाभाविक हो जाती है।
उदाहरण:
जैसे तेज आँधी आने से पहले धूल उड़ती है, वैसे ही नई दुनिया से पहले पुरानी व्यवस्थाएँ हिलती हैं।
अध्याय 2: राजनीति पतित क्यों दिखाई देती है?
मुरली संकेत (साकार मुरली – 18‑01‑1973):
“अंत समय में तमोप्रधानता चरम पर पहुँचती है।”
राजनीति में आज वाद‑विवाद, आरोप‑प्रत्यारोप और टकराव दिखाई देता है। यह किसी व्यक्ति विशेष की कमी नहीं, बल्कि समय का प्रभाव है। संगम युग के अंत में तमोप्रधानता बढ़ती है, इसलिए व्यवस्था विकृत लगती है।
अध्याय 3: यह सब ड्रामा है – अंतिम पार्ट की निशानियाँ
मुरली संकेत (साकार मुरली – 12‑10‑1968):
“ड्रामा अनादि और अकाट्य है।”
बाबा कहते हैं – जो हो रहा है, वह ड्रामा के अनुसार है। एक सीन भी आगे‑पीछे नहीं हो सकता। राजनीति का शोर, विरोध और संघर्ष – सब अंतिम पार्ट की निशानियाँ हैं।
उदाहरण:
जैसे फिल्म के क्लाइमेक्स में तनाव बढ़ता है, वैसे ही विश्व‑ड्रामा के अंत में हलचल तेज होती है।
अध्याय 4: साक्षी भाव क्या है?
मुरली संकेत (साकार मुरली – 05‑03‑1972):
“बच्चे, तुम साक्षी होकर देखो।”
साक्षी भाव का अर्थ है – अच्छा या बुरा कुछ भी हो, आत्मा पर उसका प्रभाव न पड़े। न खुशी में उछाल, न दुख में गिरावट।
अध्याय 5: स्वयं और दूसरों के प्रति साक्षी दृष्टा
मुरली संकेत (साकार मुरली – 22‑07‑1971):
“न्यारा और प्यारा बनो।”
खुद के साथ कुछ हो या दूसरों के साथ – दोनों ही स्थितियों में साक्षी भाव। बचाने का कार्य करें, पर द्वेष या हिंसा नहीं।
उदाहरण:
अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध की कथा – वाणी की शक्ति से हिंसा रुक गई।
अध्याय 6: कर्म, न्याय और निर्भयता
मुरली संकेत (साकार मुरली – 09‑09‑1970):
“हर आत्मा अपना कर्मिक अकाउंट बराबर कर रही है।”
कोर्ट‑केस, अपमान या हानि – यह सब कर्मों का हिसाब है। साक्षी आत्मा डरती नहीं, क्योंकि उसे कर्म‑सिद्धांत की समझ होती है।
अध्याय 7: बीके दृष्टि – राजनीति को कैसे देखें?
मुरली संकेत (साकार मुरली – 14‑02‑1974):
“आलोचना से शक्ति नष्ट होती है।”
बीके ज्ञान सिखाता है – न आलोचना, न गुस्सा। राजनीति को परमात्मा की दृष्टि से देखें, शोर में शामिल न हों।
उदाहरण:
मंदिर की मूर्ति – कोई फूल चढ़ाए या पत्थर मारे, मूर्ति अचल रहती है।
अध्याय 8: साक्षी भाव का एक‑मिनट अभ्यास
मुरली संकेत (साकार मुरली – 28‑08‑1976):
“स्वयं को आत्मा समझो।”
आँखें हल्की बंद करें।
मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।
मैं निष्पक्ष, शांत, दर्शक आत्मा हूँ।
अनुभव करें – राजनीति और मीडिया का शोर आपकी शांति को छू नहीं सकता।
अध्याय 9: बीके जीवन का उद्देश्य
मुरली संकेत (साकार मुरली – 21‑01‑1975):
“मन, बुद्धि और संस्कारों को शुद्ध बनाओ।”
राजनीतिक वायुमंडल से ऊपर उठकर ही सच्ची सेवा संभव है। शांति की स्थिति में रहकर ही हम विश्व को शांति का दान दे सकते हैं।
अंतिम सार
राजनीति चिल्लाएगी,
ब्रह्मा कुमार‑कुमारियाँ शांति फैलाएँगे।
दुनिया का काम है शोर करना।
हमारा काम है – अडोल, शांत, साक्षी बनकर चलना।
प्रश्न 1: आज दुनिया में इतना परिवर्तन और अशांति क्यों दिखाई दे रही है?
उत्तर:
साकार मुरली (1967–69) के अनुसार यह समय परिवर्तन काल है। जब पुरानी दुनिया समाप्ति की ओर जाती है, तब व्यवस्थाएँ हिलती हैं और अशांति बढ़ती है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जैसे आँधी से पहले धूल उड़ती है।
प्रश्न 2: राजनीति में आज इतना शोर, टकराव और अस्थिरता क्यों है?
उत्तर:
मुरली (18-01-1973) कहती है कि अंत समय में तमोप्रधानता चरम पर पहुँचती है। इसलिए राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और संघर्ष दिखाई देता है। यह किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि समय का प्रभाव है।
प्रश्न 3: क्या यह राजनीतिक उथल-पुथल अचानक हो रही है?
उत्तर:
नहीं। मुरली (12-10-1968) के अनुसार ड्रामा अनादि और अकाट्य है। जो कुछ भी हो रहा है, वह ड्रामा के अंतिम पार्ट का सीन है। एक भी घटना आगे-पीछे नहीं हो सकती।
प्रश्न 4: विश्व-ड्रामा के अंतिम पार्ट की क्या निशानियाँ हैं?
उत्तर:
राजनीति का बढ़ता शोर, विरोध, संघर्ष और अस्थिरता – ये सभी अंतिम पार्ट की निशानियाँ हैं। जैसे फिल्म के क्लाइमेक्स में तनाव बढ़ता है, वैसे ही अंत में हलचल तेज होती है।
प्रश्न 5: साक्षी भाव क्या होता है?
उत्तर:
मुरली (05-03-1972) में बाबा कहते हैं – साक्षी होकर देखो। साक्षी भाव का अर्थ है कि परिस्थितियाँ अच्छी हों या बुरी, आत्मा भीतर से अडोल रहे। न अधिक खुशी, न अधिक दुख।
प्रश्न 6: क्या साक्षी भाव केवल स्वयं के लिए होता है या दूसरों के लिए भी?
उत्तर:
मुरली (22-07-1971) कहती है – न्यारा और प्यारा बनो। स्वयं के प्रति और दूसरों के प्रति भी साक्षी दृष्टा बनना है। सेवा करें, बचाव करें, पर द्वेष या हिंसा के बिना।
प्रश्न 7: अंगुलिमाल की कथा साक्षी भाव को कैसे समझाती है?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध ने क्रोध या हिंसा नहीं की, बल्कि शांत वाणी की शक्ति से अंगुलिमाल का परिवर्तन किया। यह साक्षी और करुण दृष्टि का श्रेष्ठ उदाहरण है।
प्रश्न 8: कोर्ट-केस, अपमान या हानि को कैसे समझें?
उत्तर:
मुरली (09-09-1970) के अनुसार हर आत्मा अपना कर्मिक अकाउंट बराबर कर रही है। जो भी हो रहा है, वह कर्मों का हिसाब है। साक्षी आत्मा इसलिए निर्भय रहती है।
प्रश्न 9: बीके दृष्टि से राजनीति को कैसे देखना चाहिए?
उत्तर:
मुरली (14-02-1974) कहती है – आलोचना से शक्ति नष्ट होती है। इसलिए न आलोचना, न क्रोध। राजनीति को परमात्मा की दृष्टि से देखकर शोर में शामिल नहीं होना है।
प्रश्न 10: मंदिर की मूर्ति का उदाहरण क्या सिखाता है?
उत्तर:
मूर्ति पर कोई फूल चढ़ाए या पत्थर मारे, मूर्ति अचल रहती है। यही शिक्षा है – परिस्थितियाँ कैसी भी हों, आत्मा अचल और शांत रहे।
प्रश्न 11: साक्षी भाव का एक-मिनट अभ्यास कैसे करें?
उत्तर:
मुरली (28-08-1976) के अनुसार:
आँखें हल्की बंद करें।
सोचें – मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।
मैं शांत, निष्पक्ष, दर्शक आत्मा हूँ।
अनुभव करें कि बाहरी शोर आपकी शांति को नहीं छू सकता।
प्रश्न 12: बीके जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
मुरली (21-01-1975) कहती है – मन, बुद्धि और संस्कारों को शुद्ध बनाओ। राजनीतिक वातावरण से ऊपर उठकर, शांत स्थिति में रहकर ही सच्ची सेवा और विश्व-शांति का दान संभव है।
अंतिम प्रश्न: इस परिवर्तन काल में ब्रह्मा कुमार-कुमारियों की भूमिका क्या है?
उत्तर:
दुनिया शोर करेगी, राजनीति चिल्लाएगी।
लेकिन ब्रह्मा कुमार-कुमारियाँ साक्षी, अडोल और शांत रहकर शांति फैलाएँगे।
यही इस समय की सच्ची ईश्वरीय सेवा है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं मुरली आधारित विचारों पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, शांति और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना है। यह वीडियो किसी भी राजनीतिक दल, व्यक्ति, विचारधारा या धर्म के पक्ष या विरोध में नहीं है। यहाँ व्यक्त विचार पूर्णतः आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए गए हैं। कृपया इसे राजनीतिक नहीं, आध्यात्मिक संदेश के रूप में ग्रहण करें।
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