PR:-(09)परमात्मा आज की राजनीति को कैसे देखते हैं?
परमात्मा आज की राजनीति को कैसे देखते हैं?
सत्ता, स्वार्थ और संस्कारों का रहस्य
1️⃣ आज की दुनिया: राजनीति हर जगह
आज संसार में हर तरफ राजनीति दिखाई देती है।
टीवी पर राजनीति,
मोबाइल पर राजनीति,
सोशल मीडिया पर राजनीति,
परिवारों में राजनीति,
यहाँ तक कि मन के भीतर भी राजनीति।
सवाल उठता है –
राजनीति का अर्थ क्या है?
2️⃣ राजनीति का सूक्ष्म अर्थ
आमतौर पर राजनीति को सत्ता, सरकार और चुनाव से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन गहराई में जाएँ तो राजनीति का अर्थ है –
“मेरा पक्ष सही है, बाकी सब गलत हैं।”
उदाहरण:
-
मैं कांग्रेस के पक्ष में हूँ, आप बीजेपी के पक्ष में हैं – राजनीति शुरू
-
मैं मोबाइल न देखने के पक्ष में हूँ, दूसरा देखने के पक्ष में है – राजनीति शुरू
-
परिवार में दो अलग-अलग राय – राजनीति शुरू
जब कोई व्यक्ति अपने पक्ष को ज़ोर देकर सिद्ध करना चाहता है,
उसे ही राजनीति कहा जाता है।
3️⃣ मन के भीतर चलने वाली राजनीति
राजनीति केवल बाहर नहीं, मन के अंदर भी चलती है।
-
ये करूँ या न करूँ
-
ये मानूँ या न मानूँ
-
मेरे पक्के संस्कार बनाम मेरे कच्चे संस्कार
यही आंतरिक महाभारत है।
4️⃣ प्रश्न: परमात्मा इस राजनीति को कैसे देखते हैं?
क्या परमात्मा किसी पार्टी के समर्थक हैं?
क्या बाबा किसी नेता को चुनते हैं?
नहीं।
मुरली – 18 जनवरी 1968
“मैं राजनीति नहीं सिखाता, मैं तुम्हें राजयोग सिखाता हूँ।”
परमात्मा की दृष्टि सत्ता पर नहीं, संस्कार पर है।
5️⃣ आज की राजनीति: सत्ता की भूख या सेवा का भाव?
आज की राजनीति का आधार क्या है?
-
कुर्सी चाहिए
-
वोट चाहिए
-
बहुमत चाहिए
-
शक्ति चाहिए
परिणाम:
-
स्वार्थ
-
बदला
-
अहंकार
-
डर फैलाना
-
धर्म और जाति का उपयोग
बाबा कहते हैं:
आज के मनुष्य पद के भूखे हैं, पर गुणों से खाली।
6️⃣ सत्ता से नहीं, संस्कार से दुनिया बदलती है
परमात्मा स्पष्ट कहते हैं –
“सत्ता से दुनिया नहीं बदलती,
संस्कार बदलने से दुनिया बदलती है।”
-
संस्कार गंदे → दुनिया गंदी
-
संस्कार अच्छे → दुनिया अच्छी
7️⃣ परमात्मा की दृष्टि: पद नहीं, आत्मा
हम नेता को कैसे देखते हैं?
-
नाम से
-
पद से
-
पार्टी से
परमात्मा कैसे देखते हैं?
मुरली – 2 अगस्त 1969
“मैं आत्माओं को देखता हूँ, शरीर और पद को नहीं।”
उदाहरण:
-
एक ईमानदार किसान → परमात्मा की नजर में राजा आत्मा
-
अहंकार से भरा नेता → गरीब आत्मा
8️⃣ राजनीति और धर्म क्यों असफल हो रहे हैं?
क्योंकि –
-
राजनीति धर्म से अलग हो गई
-
धर्म शक्ति से विहीन हो गया
जब धर्म में शक्ति नहीं होती,
तो राजनीति रावण बन जाती है।
9️⃣ परमात्मा का दर्द: आत्माओं की पीड़ा
भूख,
युद्ध,
भय,
हिंसा,
नशा,
नफरत।
मुरली – 21 जनवरी 1967
“मेरे बच्चे दुख में हैं, इसलिए मैं आया हूँ।”
🔟 परमात्मा की राजनीति क्या है?
परमात्मा कहते हैं –
“मैं तुम्हें राजनीति नहीं देता,
मैं तुम्हें पवित्रता की सत्ता देता हूँ।”
परमात्मा की राजनीति = राजयोग
मुरली – 14 नवंबर 1965
“जो स्वयं पर राज्य करता है, वही विश्व पर राज्य करता है।”
1️⃣1️⃣ सच्चा नेता कौन?
जो –
-
क्रोध पर विजय पाए
-
लोभ पर विजय पाए
-
अहंकार पर विजय पाए
वही सच्चा नेता है।
1️⃣2️⃣ नई दुनिया की विशेषता
परमात्मा जिस दुनिया की स्थापना कर रहे हैं:
-
न चुनाव
-
न पार्टियाँ
-
न प्रचार
मुरली – 3 अप्रैल 1969
“वहाँ न संसद है, न कोर्ट – क्योंकि सब न्यायप्रिय हैं।”
जैसे शुद्ध परिवार में पुलिस नहीं चाहिए,
वैसे शुद्ध संसार में कोर्ट नहीं चाहिए।
1️⃣3️⃣ आज हमारा कर्तव्य क्या है?
-
नेताओं से नफरत मत करो
-
स्वयं को बदलो
-
सेवा भाव जगाओ
मुरली – 7 जुलाई 1968
“तुम बदलो, तो दुनिया बदलेगी।”
संकल्प
-
मैं आत्मा हूँ
-
मैं शांति का दाता हूँ
-
मैं विश्व परिवर्तन का निमित्त हूँ
🔚 उपसंहार
आज की राजनीति डर पर आधारित है।
परमात्मा की राजनीति प्यार और पवित्रता पर आधारित है।
याद रखिए:
दुनिया का भविष्य
बैलेट बॉक्स से नहीं,
आत्म-चेतना से बदलेगा।
प्रश्न 1: आज की दुनिया में राजनीति कहाँ-कहाँ दिखाई देती है?
उत्तर:
आज राजनीति केवल संसद या चुनाव तक सीमित नहीं है।
यह टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया, परिवारों और यहाँ तक कि मन के भीतर भी दिखाई देती है।
प्रश्न 2: सामान्य रूप से राजनीति का अर्थ क्या समझा जाता है?
उत्तर:
आमतौर पर राजनीति को सत्ता, सरकार और चुनाव से जोड़ा जाता है।
प्रश्न 3: राजनीति का सूक्ष्म और वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
गहराई से देखें तो राजनीति का अर्थ है –
“मेरा पक्ष सही है, बाकी सब गलत हैं।”
प्रश्न 4: क्या रोज़मर्रा के जीवन में भी राजनीति होती है?
उत्तर:
हाँ।
-
मैं एक पार्टी के पक्ष में, आप दूसरी के पक्ष में
-
एक मोबाइल देखने के पक्ष में, दूसरा विरोध में
-
परिवार में अलग-अलग विचार
जहाँ अपने पक्ष को ज़ोर देकर सिद्ध किया जाता है, वहीं राजनीति शुरू होती है।
प्रश्न 5: क्या मन के भीतर भी राजनीति चलती है?
उत्तर:
हाँ।
मन के भीतर –
-
ये करूँ या न करूँ
-
ये मानूँ या न मानूँ
-
पक्के संस्कार बनाम कच्चे संस्कार
यही आंतरिक महाभारत है।
प्रश्न 6: परमात्मा इस राजनीति को कैसे देखते हैं?
उत्तर:
परमात्मा किसी भी राजनीतिक दल या नेता के समर्थक नहीं हैं।
मुरली – 18 जनवरी 1968
“मैं राजनीति नहीं सिखाता, मैं तुम्हें राजयोग सिखाता हूँ।”
परमात्मा की दृष्टि सत्ता पर नहीं, संस्कार पर है।
प्रश्न 7: क्या परमात्मा किसी नेता या पार्टी को चुनते हैं?
उत्तर:
नहीं।
परमात्मा आत्माओं को देखते हैं, न कि पद, पार्टी या पहचान को।
प्रश्न 8: आज की राजनीति का मुख्य आधार क्या है?
उत्तर:
आज की राजनीति का आधार है –
-
कुर्सी
-
वोट
-
बहुमत
-
शक्ति
और इसके परिणाम हैं –
स्वार्थ, बदला, अहंकार, डर फैलाना, धर्म और जाति का उपयोग।
बाबा कहते हैं:
आज के मनुष्य पद के भूखे हैं, पर गुणों से खाली।
प्रश्न 9: क्या सत्ता से दुनिया बदल सकती है?
उत्तर:
नहीं।
परमात्मा कहते हैं –
“सत्ता से दुनिया नहीं बदलती,
संस्कार बदलने से दुनिया बदलती है।”
-
गंदे संस्कार → गंदी दुनिया
-
अच्छे संस्कार → अच्छी दुनिया
प्रश्न 10: परमात्मा नेता को कैसे देखते हैं?
उत्तर:
हम नेता को नाम, पद और पार्टी से देखते हैं,
पर परमात्मा आत्मा और उसके संस्कारों को देखते हैं।
मुरली – 2 अगस्त 1969
“मैं आत्माओं को देखता हूँ, शरीर और पद को नहीं।”
प्रश्न 11: परमात्मा की नजर में सच्चा राजा कौन है?
उत्तर:
जो सच्चाई और ईमानदारी से जीवन जीता है।
एक ईमानदार किसान भी परमात्मा की नजर में राजा आत्मा है,
और अहंकार से भरा नेता गरीब आत्मा।
प्रश्न 12: राजनीति और धर्म आज क्यों असफल हो रहे हैं?
उत्तर:
क्योंकि –
-
राजनीति धर्म से अलग हो गई
-
धर्म शक्ति से विहीन हो गया
जब धर्म में शक्ति नहीं होती,
तो राजनीति रावण बन जाती है।
प्रश्न 13: परमात्मा को सबसे अधिक दुख किस बात का है?
उत्तर:
आत्माओं की पीड़ा से –
भूख, युद्ध, भय, हिंसा, नशा, नफरत।
मुरली – 21 जनवरी 1967
“मेरे बच्चे दुख में हैं, इसलिए मैं आया हूँ।”
प्रश्न 14: परमात्मा की राजनीति क्या है?
उत्तर:
परमात्मा की राजनीति है – राजयोग
अर्थात् स्वयं पर राज्य।
मुरली – 14 नवंबर 1965
“जो स्वयं पर राज्य करता है, वही विश्व पर राज्य करता है।”
प्रश्न 15: सच्चा नेता कौन कहलाता है?
उत्तर:
जो –
-
क्रोध पर विजय पाए
-
लोभ पर विजय पाए
-
अहंकार पर विजय पाए
वही सच्चा नेता है।
प्रश्न 16: परमात्मा जिस नई दुनिया की स्थापना कर रहे हैं, उसकी विशेषता क्या है?
उत्तर:
-
न चुनाव
-
न पार्टियाँ
-
न प्रचार
मुरली – 3 अप्रैल 1969
“वहाँ न संसद है, न कोर्ट – क्योंकि सब न्यायप्रिय हैं।”
प्रश्न 17: आज हमारा कर्तव्य क्या है?
उत्तर:
-
नेताओं से नफरत न करें
-
स्वयं को बदलें
-
सेवा भाव जगाएँ
मुरली – 7 जुलाई 1968
“तुम बदलो, तो दुनिया बदलेगी।”
संकल्प
-
मैं आत्मा हूँ
-
मैं शांति का दाता हूँ
-
मैं विश्व परिवर्तन का निमित्त हूँ
उपसंहार
आज की राजनीति डर पर आधारित है,
परमात्मा की राजनीति प्यार और पवित्रता पर आधारित है।
याद रखिए:
दुनिया का भविष्य
बैलेट बॉक्स से नहीं,
आत्म-चेतना से बदलेगा।
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं, साकार एवं अव्यक्त मुरलियों पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, नेता या विचारधारा का समर्थन या विरोध करना नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल आत्मिक जागृति, संस्कार परिवर्तन और आध्यात्मिक दृष्टि विकसित करने के लिए है।
वीडियो में व्यक्त विचार आध्यात्मिक अध्ययन हेतु हैं, न कि राजनीतिक बहस के लिए।
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