(17) “06-03-1985 “The Spiritual Secret of Holi”

अव्यक्त मुरली-(17)”06-03-1985 “होली का रूहानी रहस्य”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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06-03-1985 “होली का रूहानी रहस्य”

आज होलीएस्ट, हाइएस्ट बाप अपने होली और हैपी हंसों से होली मनाने आये हैं। त्रिमूर्ति बाप तीन प्रकार की होली का दिव्य राज़ सुनाने आये हैं। वैसे संमगयुग होली युग है। संमगयुग उत्सव का युग है। आप श्रेष्ठ आत्माओं का हर दिन, हर समय उत्साह भरा उत्सव है। अज्ञानी आत्मायें स्वयं को उत्साह में लाने के लिए उत्सव मनाते हैं। लेकिन आप श्रेष्ठ आत्माओं के लिए यह ब्राह्मण जीवन उत्साह की जीवन है। उमंग, खुशी से भरी हुई जीवन है। इसलिए संगमयुग ही उत्सव का युग है। ईश्वरीय जीवन सदा उमंग उत्साह वाली जीवन है। सदा ही खुशियों में नाचते, ज्ञान का शक्तिशाली अमृत पीते, सुख के गीत गाते, दिल के स्नेह के गीत गाते, अपनी श्रेष्ठ जीवन बिता रहे हैं। अज्ञानी आत्मायें एक दिन मनाती, अल्पकाल के उत्साह में आती फिर वैसे की वैसी हो जाती। आप उत्सव मनाते हुए होली बन जाते हो और दूसरों को भी होली बनाते हो। वह सिर्फ मनाते हैं, आप मनाते बन जाते हो। लोग तीन प्रकार की होली मनाते हैं – एक जलाने की होली। दूसरी रंग लगाने की होली। तीसरी मंगल मिलन मनाने की होली। यह तीनों होली हैं रूहानी रहस्य से। लेकिन वह स्थूल रूप में मनाते रहते हैं। इस संगमयुग पर आप महान आत्मायें जब बाप की बनती हो अर्थात् होली बनती हो तो पहले क्या करती हो? पहले सब पुराने स्वभाव संस्कार योग अग्नि से भस्म करते हो अर्थात् जलाते हो। उसके बाद ही याद द्वारा बाप के संग का रंग लगता है। आप भी पहले जलाने वाली होली मनाते हो फिर प्रभू संग के रंग में रंग जाते हो अर्थात् बाप समान बन जाते हो। बाप ज्ञान सागर तो बच्चे भी संग के रंग में ज्ञान स्वरूप बन जाते हैं। जो बाप के गुण वह आपके गुण हो जाते, जो बाप की शक्तियाँ वह आपका खजाना बन जाती। आपकी प्रॉपर्टी हो जाती। तो संग का रंग ऐसा अविनाशी लग जाता जो जन्म-जन्मान्तर के लिये यह रंग अविनाशी बन जाता है। और जब संग का रंग लग जाता, यह रूहानी रंग की होली मना लेते तो आत्मा और परमात्मा का, बाप और बच्चों का श्रेष्ठ मिलन का मेला सदा ही होता रहता। अज्ञानी आत्माओं ने आपके इस रूहानी होली को यादगार के रूप में मनाना शुरू किया है। आपकी प्रैक्टिकल उत्साह भरी जीवन का भिन्न-भिन्न रूप में यादगार मनाकर अल्पकाल के लिए खुश हो जाते। हर कदम में, आपके श्रेष्ठ जीवन में जो विशेषतायें प्राप्त हुई उनको याद कर थोड़े समय के लिए वह भी मौज मनाते रहते हैं। यह यादगार देख वा सुन हर्षित होते हो ना कि हमारी विशेषताओं का यादगार है! आपने माया को जलाया और वह होलिका बनाके जला देते हैं। इतनी रमणीक कहानियाँ बनाई हैं जो सुनकर आपको हंसी आयेगी कि हमारी बात को कैसे बना दिया है! होली का उत्सव आपके भिन्न-भिन्न प्राप्ति के याद रूप में मनाते हैं। अभी आप सदा खुश रहते हो। खुशी की प्राप्ति का यादगार बहुत खुश होकर होली मनाते हैं। उस समय सब दुख भूल जाते हैं। और आप सदा के लिए दुख भूल गये हो। आपकी खुशी की प्राप्ति का यादगार मनाते हैं।

और बात मनाने के समय छोटे बड़े बहुत ही हल्के बन, हल्के रूप में मनाते हैं। उस दिन के लिए सभी का मूड भी हल्का रहता है। तो यह आपके डबल लाइट बनने का यादगार है। जब प्रभू-संग के रंग में रंग जाते हो तो डबल लाइट बन जाते हो ना। तो इस विशेषता का यादगार है। और बात – इस दिन छोटे बड़े किसी भी सम्बन्ध वाले समान स्वभाव में रहते हैं। चाहे छोटा-सा पोत्रा भी हो वह भी दादा को रंग लगायेगा। सभी सम्बन्ध का, आयु का भान भूल जाते हैं। समान भाव में आ जाते हैं। यह भी आपके विशेष समान भाव अर्थात् भाई-भाई की स्थिति और कोई भी देह के सम्बन्ध की दृष्टि नहीं, यह भाई-भाई की समान स्थिति का यादगार है। और बात – इस दिन भिन्न-भिन्न रंगों से खूब पिचकारियाँ भर एक दो को रंगते हैं। यह भी इस समय की आपकी सेवा का यादगार है। कोई भी आत्मा को आप दृष्टि की पिचकारी द्वारा प्रेम स्वरूप बनाने का रंग, आनन्द स्वरूप बनाने का रंग, सुख का, शान्ति का, शक्तियों का कितने रंग लगाते हो? ऐसा रंग लगाते हो जो सदा लगा रहे। मिटाना नहीं पड़ता। मेहनत नहीं करनी पड़ती। और ही हर आत्मा यही चाहती कि सदा इन रंगों में रंगी रहूँ। तो सभी के पास रूहानी रंगों की रूहानी दृष्टि की पिचकारी है ना! होली खेलते हो ना! यह रूहानी होली आप सबके जीवन का यादगार है। ऐसा बापदादा से मंगल मिलन मनाया है, जो मिलन मनाते बाप समान बन गये। ऐसा मंगल मिलन मनाया है जो कम्बाइण्ड बन गये हो। कोई अलग कर नहीं सकता।

और बात – यह दिन सभी बीती हुई बातों को भुलाने का दिन है। 63 जन्म की बीती को भुला देते हो ना। बीती को बिन्दी लगा देते हो। इसलिए होली को बीती सो बीती के अर्थ में भी कहते हैं। कैसी भी कड़ी दुश्मनी को भूल मिलन मनाने का दिन माना जाता है। आपने भी आत्मा के दुश्मन आसुरी संस्कार, आसुरी स्वभाव भूल कर प्रभू मिलन मनाया ना! संकल्प मात्र भी पुराना संस्कार स्मृति में न आये। यह भी आपके इस भूलने की विशेषता का यादगार मना रहे हैं। तो सुना आपकी विशेषतायें कितनी हैं? आपके हर गुण का, हर विशेषता का, कर्म का अलग-अलग यादगार बना दिया है। जिसके हर कर्म का यादगार बन जाए, जो याद कर खुशी में आ जाएं वह स्वयं कितने महान हैं? समझा, अपने आपको कि आप कौन हो? होली तो हो लेकिन कितने विशेष हो!

डबल विदेशी भल यह अपनी श्रेष्ठता का यादगार न भी जानते हो लेकिन आपके याद का महत्व दुनिया वाले याद कर यादगार मना रहे हैं। समझा होली क्या होती है? आप सब तो रंग में रंगे हुए हो। ऐसे प्रेम के रंग में रंग गये हो जो सिवाए बाप के और कुछ दिखाई नहीं देता। स्नेह में ही खाते-पीते, चलते, गाते, नाचते रहते हो। पक्का रंग लग गया है ना कि कच्चा है? कौन सा रंग लगा है कच्चा वा पक्का? बीती सो बीती कर ली? गलती से भी पुरानी बात याद न आवे। कहते हो ना क्या करें आ गई। यह गलती से आ जाती है। नया जन्म, नई बातें, नये संस्कार, नई दुनिया, यह ब्राह्मणों का संसार भी नया संसार है। ब्राह्मणों की भाषा भी नई है! आत्मा की भाषा नई है ना! वह क्या कहते और आप क्या कहते! परमात्मा के प्रति भी नई बातें हैं। तो भाषा भी नई, रीति रसम भी नई, सम्बन्ध-सम्पर्क भी नया, सब नया हो गया। पुराना समाप्त हुआ। नया शुरू हुआ, नये गीत गाते हो। पुराने नहीं। क्या, क्यों के हैं पुराने गीत। अहा! वाह! ओहो! यह हैं नये गीत। तो कौन से गीत गाते हो? हाय हाय के गीत तो नहीं गाते हो ना! हाय हाय करने वाले दुनिया में बहुत हैं आप नहीं हो। तो अविनाशी होली मना ली अर्थात् बीती सो बीती कर सम्पूर्ण पवित्र बन गये। बाप के संग के रंग में रंग गये हो। तो होली मना ली ना!

सदा बाप और मैं, साथ-साथ हैं। और संगमयुग सदा साथ रहेंगे। अलग हो ही नहीं सकते। ऐसा उमंग उत्साह दिल में है ना कि मैं और मेरा बाबा! कि पर्दे के पीछे तीसरा भी कोई है? कभी चूहा कभी बिल्ली निकल आती, ऐसे तो नहीं! सब समाप्त हो गये ना! जब बाप मिला तो सब कुछ मिला। और कुछ रहता नहीं। न सम्बन्धी रह जाता, न खजाना रह जाता, न शक्ति, न गुण रह जाता, न ज्ञान रह जाता, न कोई प्राप्ति रह जाती। तो बाकी और क्या चाहिए। इसको कहा जाता है होली मनाना। समझा!

आप लोग कितना मौज में रहते हो। बेफिकर बादशाह, बिन कौड़ी बादशाह, बेगमपुर के बादशाह। ऐसी मौज में कोई रह न सके। दुनिया के साहूकार से साहूकार हो वा दुनिया में नामीग्रामी कोई व्यक्ति हो, बहुत ही शास्त्रवादी हो, वेदों के पाठ पढ़ने वाले हो, नौधा भक्त हो, नम्बरवन साइन्सदान हो, कोई भी आक्यूपेशन वाले हो लेकिन ऐसी मौज की जीवन नहीं हो सकती। जिसमें मेहनत नहीं। मुहब्बत ही मुहब्बत है। चिंता नहीं। लेकिन शुभचिन्तक है, शुभचिन्तन है। ऐसी मौज की जीवन सारे विश्व में चक्कर लगाओ, अगर कोई मिले तो ले आओ। इसलिए गीत गाते हो ना – मधुबन में, बाप के संसार में मौजें ही मौजें हैं। खाओ तो भी मौज, सोओ तो भी मौज। गोली लेकर सोने की जरूरत नहीं। बाप के साथ सो जाओ तो गोली नहीं लेनी पड़ेगी। अकेले सोते हो तो कहते हाई ब्लडप्रेशर है, दर्द है। तब गोली लेनी पड़ती। बाप साथ हो, बस बाबा आपके साथ सो रहे हैं, यह है गोली। ऐसा भी फिर समय आयेगा जैसे आदि में दवाईयाँ नहीं चलती थी। याद है ना। शुरू में कितना समय दवाईयाँ नहीं थी। हाँ, थोड़ा मलाई मक्खन खा लिया। दवाई नहीं खाते थे। तो जैसे आदि में प्रैक्टिस कराई है ना। थे तो पुराने शरीर। अन्त में फिर वह आदि वाले दिन रिपीट होंगे। साक्षात्कार भी सब बहुत विचित्र करते रहेंगे। बहुतों की इच्छा है ना – एक बार साक्षात्कार हो जाए। लास्ट तक जो पक्के होंगे उन्हों को साक्षात्कार होंगे फिर वही संगठन की भट्ठी होगी। सेवा पूरी हो जायेगी। अभी सेवा के कारण जहाँ तहाँ बिखर गये हो! फिर नदियाँ सब सागर में समा जायेंगी। लेकिन समय नाजुक होगा। साधन होते हुए भी काम नहीं करेंगे। इसलिए बुद्धि की लाइन बहुत क्लीयर चाहिए। जो टच हो जाए कि अभी क्या करना है। एक सेकेण्ड भी देरी की तो गये। जैसे वह भी अगर बटन दबाने में एक सेकेण्ड भी देरी की तो क्या रिजल्ट होगी? यह भी अगर एक सेकेण्ड टचिंग होने में देरी हुई तो फिर पहुँचना मुश्किल होगा। वह लोग भी कितना अटेन्शन से बैठे रहते हैं। तो यह बुद्धि की टचिंग। जैसे शुरू में घर बैठे आवाज आया, बुलावा हुआ कि आओ, पहुँचो, अभी निकलो। और फौरन निकल पड़े। ऐसे ही अन्त में भी बाप का आवाज पहुँचेगा। जैसे साकार में सभी बच्चों को बुलाया। ऐसे आकार रूप में सभी बच्चों को – आओ आओ का आह्वान करेंगे। बस आना और साथ जाना। ऐसे सदा अपनी बुद्धि क्लीयर हो और कहाँ अटेन्शन गया तो बाप का आवाज, बाप का आह्वान मिस हो जायेगा। यह सब होना ही है।

टीचर्स सोच रहीं हैं हम तो पहुँच जायेंगे। यह भी हो सकता है कि आपको वहाँ ही बाप डायरेक्शन दें। वहाँ कोई विशेष कार्य हो। वहाँ कोई औरों को शक्ति देनी हो। साथ ले जाना हो। यह भी होगा लेकिन बाप के डायरेक्शन प्रमाण रहें। मनमत से नहीं। लगाव से नहीं। हाय मेरा सेन्टर; यह याद न आये। फलाना जिज्ञासू भी साथ ले जाऊं, यह अनन्य है, मददगार है। ऐसा भी नहीं। किसी के लिए भी अगर रूके तो रह जायेंगे। ऐसे तैयार हो ना। इसको कहते हैं एवररेडी। सदा ही सब कुछ समेटा हुआ हो। उस समय समेटने का संकल्प नहीं आवे। यह कर लूँ, यह कर लूँ। साकार में याद है ना जो सर्विसएबुल बच्चे थे उन्हों की स्थूल बैग बैगेज सदा तैयार होती थी। ट्रेन पहुँचने में 5 मिनट हैं और डायरेक्शन मिलता था कि जाओ। तो बैग बैगेज तैयार रहते थे। एक स्टेशन पहले ट्रेन पहुँच गई है, और वह जा रहे हैं। ऐसे भी अनुभव किया ना। यह भी मन की स्थिति में बैग बैगेज तैयार हों। बाप ने बुलाया और बच्चे जी हाजिर हो जाएं। इसको कहते हैं एवररेडी। अच्छा।

ऐसे सदा संग के रंग में रंगे हुए, सदा बीती सो बीती कर वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ बनाने वाले, सदा परमात्म मिलन मनाने वाले, सदा हर कर्म याद में रह करने वाले अर्थात् हर कर्म का यादगार बनाने वाले, सदा खुशी में नाचते गाते संगमयुग की मौज मनाने वाले, ऐसे बाप समान बाप के हर संकल्प को कैच करने वाले, सदा बुद्धि श्रेष्ठ और स्पष्ट रखने वाले, ऐसे होली हैपी हंसों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

बापदादा ने सभी बच्चों के पत्रों का उत्तर देते हुए होली की मुबारक दी:-

चारों ओर के देश विदेश के सभी बच्चों के स्नेह भरे, उमंग-उत्साह भरे और कहाँ-कहाँ अपने पुरुषार्थ के प्रतिज्ञा भरे सभी के पत्र और सन्देश बापदादा को प्राप्त हुए। बापदादा सभी होली हंसों को सदा “जैसा बाप वैसे मैं” यह स्मृति का विशेष स्लोगन वरदान के रूप में याद दिला रहे हैं। कोई भी कर्म करते संकल्प करते पहले चेक करो जो बाप का संकल्प वह यह संकल्प है। जो बाप का कर्म वही मेरा कर्म है। सेकेण्ड में चेक करो और फिर साकार में लाओ। तो सदा ही बाप समान शक्तिशाली आत्मा बन सफलता का अनुभव करेंगे। सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार है, ऐसा सहज प्राप्ति का अनुभव करेंगे। सफलता का सितारा मैं स्वयं हूँ तो सफलता मेरे से अलग हो नहीं सकती। सफलता की माला सदा गले में पिरोई हुई है अर्थात् हर कर्म में अनुभव करते रहेंगे। बापदादा आज के इस होली के संगठन में आप सभी होली हंसों को सम्मुख देख रहे हैं, मना रहे हैं। स्नेह से सभी को देख रहे हैं – सभी के विशेषता की वैराइटी खुशबू ले रहे हैं। कितनी मीठी खुशबू है हरेक के विशेषता की। बाप हर विशेष आत्मा को विशेषताओं से देखते हुए यही गीत गाते – वाह मेरा सहज योगी बच्चा! वाह मेरा पदमापदम भाग्यशाली बच्चा! तो सभी अपनी-अपनी विशेषता और नाम सहित सम्मुख अपने को अनुभव करते हुए यादप्यार स्वीकार करना और सदा बाप की छत्रछाया में रह माया से घबराना नहीं। छोटी बात है, बड़ी बात नहीं है। छोटी को बड़ा नहीं करना। बड़ी को छोटा करना। ऊंचे रहेंगे तो बड़ा छोटा हो जायेगा। नीचे रहेंगे तो छोटा भी बड़ा हो जायेगा। इसलिए बापदादा का साथ है, हाथ है तो घबराओ नहीं खूब उड़ो, उड़ती कला से सेकेण्ड में सबको पार करो। बाप का साथ सदा ही सेफ रखता है। और रखेगा। अच्छा – सभी को सिकीलधा, लाडला कह बापदादा होली की मुबारक दे रहे हैं। (फिर तो बापदादा से सभी बच्चों ने होली मनाई तथा पिकनिक की)

बांधेलियों को यादप्यार देते हुए:- बांधेलियों की याद तो सदा बाप के पास पहुँचती है और बापदादा सभी बांधेलियों को यही कहते कि योग अर्थात् याद की लगन को अग्नि रूप बनाओ। जब लगन अग्नि रूप बन जाती तो अग्नि में सब भस्म हो जाता। जो यह बन्धन भी लगन की अग्नि में समाप्त हो जायेंगे और स्वतन्‍त्र आत्मा बन जो संकल्प करते उसकी सिद्धि को प्राप्त करेंगी। स्नेही हो, स्नेह की याद पहुँचती है। स्नेह के रेसपाण्ड में स्नेह मिलता है लेकिन अभी याद को शक्तिशाली अग्नि रूप बनाओ। फिर वह दिन आ जायेगा जो सम्मुख पहुँच जायेंगी।

पार्टियों से:- सभी के मस्तक पर सदा भाग्य का सितारा चमक रहा है ना! सदा चमकता है? कभी टिमटिमाता तो नहीं है? अखण्ड ज्योति बाप के साथ आप भी अखण्ड ज्योति अर्थात् सदा जगने वाले सितारे बन गये। ऐसे अनुभव करते हो, कभी वायु हिलाती तो नहीं है दीपक वा सितारे को? जहाँ बाप की याद है वह अविनाशी जगमगाता हुआ सितारा है। टिमटिमाता हुआ नहीं। लाइट भी जब टिमटिम करती है तो बन्द कर देते हैं, किसी को अच्छी नहीं लगती। तो यह भी सदा जगमगाता हुआ सितारा। सदा ज्ञान सूर्य बाप से रोशनी ले औरों को भी रोशनी देने वाले। सेवा का उमंग उत्साह सदा कायम रहता है। सभी श्रेष्ठ आत्मायें हो, श्रेष्ठ बाप की श्रेष्ठ आत्मायें हो।

याद की शक्ति से सफलता सहज प्राप्त होती है। जितना याद और सेवा साथ-साथ रहती है तो याद और सेवा का बैलेन्स सदा की सफलता की आशीर्वाद स्वत: प्राप्त कराता है। इसलिए सदा शक्तिशाली याद स्वरूप का वातावरण बनने से शक्तिशाली आत्माओं का आह्वान होता है और सफलता मिलती है। निमित्त लौकिक कार्य है लेकिन लगन बाप और सेवा में है। लौकिक भी सेवा प्रति है, अपने लगाव से नहीं करते, डायरेक्शन प्रमाण करते हैं, इसलिए बाप के स्नेह का हाथ ऐसे बच्चों के साथ है। सदा खुशी में गाओ, नाचो यही सेवा का साधन है। आपकी खुशी को देख दूसरे खुश हो जायेंगे तो यही सेवा हो जायेगी। बापदादा बच्चों को सदा कहते हैं – जितना महादानी बनेंगे उतना खजाना बढ़ता जायेगा। महादानी बनो और खजानों को बढ़ाओ। महादानी बन खूब दान करो। यह देना ही लेना है। जो अच्छी चीज मिलती है वह देने के बिना रह नहीं सकते।

सदा अपने भाग्य को देख हर्षित रहो। कितना बड़ा भाग्य मिला है, घर बैठे भगवान मिल जाए इससे बड़ा भाग्य और क्या होगा। इसी भाग्य को स्मृति में रख हर्षित रहो। तो दुख और अशान्ति सदा के लिए समाप्त हो जायेंगे। सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप बन जायेंगे। जिसका भाग्य स्वयं भगवान बनाये वह कितने श्रेष्ठ हुए। तो सदा अपने में नया उमंग, नया उत्साह अनुभव करते आगे बढ़ते चलो। क्योंकि संगमयुग पर हर दिन का नया उमंग, नया उत्साह है।

जैसे चल रहे हैं, नहीं। सदा नया उमंग, नया उत्साह सदा आगे बढ़ाता है। हर दिन ही नया है। सदा स्वयं में वा सेवा में कोई न कोई नवीनता जरूर चाहिए। जितना अपने को उमंग उत्साह में रखेंगे उतना नई-नई टचिंग होती रहेंगी। स्वयं किसी दूसरी बातों में बिजी रहते तो नई टचिंग भी नहीं होती। मनन करो तो नया उमंग रहेगा।

होली का रूहानी रहस्य – संगमयुग की अविनाशी होली

(अव्यक्त बापदादा मुरली – 06 मार्च 1985)


 भूमिका : संगमयुग – उत्सव का युग

बापदादा कहते हैं –
“संगमयुग होली युग है, उत्सव का युग है।”

अज्ञानी आत्माएँ उत्साह लाने के लिए कभी-कभी उत्सव मनाती हैं,
लेकिन श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन स्वयं उत्सव स्वरूप है।

ब्राह्मण जीवन =

  • सदा उमंग

  • सदा उत्साह

  • सदा खुशी

  • सदा ज्ञान अमृत में मस्त

उदाहरण:
जैसे संसार में लोग एक दिन होली मनाकर फिर पुराने मूड में लौट जाते हैं,
वैसे नहीं —
आप तो होली मनाते नहीं, होली बन जाते हो।


 त्रिमूर्ति बाप द्वारा बताई गई तीन प्रकार की होली

1️⃣ जलाने की होली – योग अग्नि की होली

सबसे पहले आत्मा क्या करती है?

➡️ पुराने स्वभाव, संस्कार, विकारों को योग अग्नि में भस्म करती है।

Murli Note (06-03-1985):

“पहले सब पुराने स्वभाव-संस्कार योग अग्नि से भस्म करते हो।”

उदाहरण:
जैसे अग्नि में पड़ा कचरा फिर उपयोग में नहीं आता,
वैसे ही
भस्म हुए संस्कार फिर लौटकर नहीं आते।


2️⃣ रंग लगाने की होली – प्रभु संग का रंग

जब पुराना जला, तब क्या होता है?

➡️ बाप के संग का रंग लग जाता है।

  • बाप ज्ञान सागर → बच्चे ज्ञान स्वरूप

  • बाप शक्तिशाली → बच्चे मास्टर शक्तिशाली

  • बाप गुणों का भंडार → बच्चे गुणों के अधिकारी

Murli Note:

“जो बाप के गुण, वही आपके गुण बन जाते हैं।”

उदाहरण:
यह रंग पानी का नहीं है,
यह अविनाशी रंग है —
जो जन्म-जन्मांतर साथ चलता है।


3️⃣ मंगल मिलन की होली – आत्मा-परमात्मा का मेला

जब संग का रंग लग जाता है,
तो क्या होता है?

➡️ आत्मा और परमात्मा का सदा का मिलन।

  • बाप और बच्चे कम्बाइन्ड

  • कोई अलग नहीं कर सकता

  • यह ही सच्ची होली

Murli Note:

“ऐसा मंगल मिलन मनाया है जो कम्बाइन्ड बन गये हो।”


 रूहानी रंगों की पिचकारी – सेवा का रहस्य

संसार में लोग रंगों की पिचकारी चलाते हैं,
और आप?

➡️ दृष्टि की पिचकारी से आत्माओं को रंगते हो।

  • प्रेम का रंग

  • शान्ति का रंग

  • सुख का रंग

  • शक्ति का रंग

उदाहरण:
यह रंग मिटाना नहीं पड़ता,
मेहनत नहीं करनी पड़ती —
हर आत्मा चाहती है कि
सदा इन रंगों में रंगी रहूँ।


 डबल लाइट बनने का रहस्य

होली के दिन लोग हल्के रहते हैं —
यह किसका यादगार है?

➡️ डबल लाइट बनने का।

  • देह का बोझ नहीं

  • विकारों का बोझ नहीं

  • सिर्फ बाप और मैं

Murli Note:

“जब प्रभू संग के रंग में रंग जाते हो तो डबल लाइट बन जाते हो।”


 भाई-भाई की स्थिति – समान भाव

होली के दिन सभी सम्बन्ध भूल जाते हैं।

➡️ यही है
आत्मा-आत्मा की दृष्टि का यादगार।

  • न छोटा

  • न बड़ा

  • न देह का भान

उदाहरण:
पोता भी दादा को रंग लगाता है —
यह समान भाव का प्रतीक है।


 बीती सो बीती – सदा के लिए भूलना

होली =
➡️ बीती को बिन्दी लगाना।

  • 63 जन्म की बीती

  • पुराने शत्रु

  • आसुरी संस्कार

Murli Note:

“बीती को भूल मिलन मनाने का दिन माना जाता है।”

उदाहरण:
गलती से भी पुरानी बात याद न आये —
यही है पक्की होली।


 बेफिक्र बादशाह – ब्राह्मण जीवन की मौज

बापदादा कहते हैं —

➡️ आप बेगमपुर के बादशाह हो।

  • बिना चिंता

  • बिना दवा

  • बिना मेहनत

उदाहरण:
बाप साथ हो तो
गोली की ज़रूरत नहीं —
याद ही दवा है।


 अन्तिम समय की तैयारी – Ever Ready स्थिति

अन्त में क्या चाहिए?

➡️ बुद्धि की क्लियर लाइन।

  • बाप का आह्वान

  • एक सेकण्ड की देरी = नुकसान

Murli Note:

“बटन दबाने में एक सेकण्ड देरी हुई तो रिज़ल्ट बदल जायेगा।”


 विशेष वरदान – बाप जैसा मैं

बापदादा का स्लोगन (06-03-1985):

“जैसा बाप वैसे मैं।”

हर संकल्प, हर कर्म से पहले चेक करो —
➡️ यह बाप का है या नहीं?


 समापन सार

✔️ पुराना जला
✔️ संग का रंग लगा
✔️ बीती सो बीती
✔️ सदा खुशी
✔️ सदा मंगल मिलन

यही है अविनाशी रूहानी होली।

होली का रूहानी रहस्य – संगमयुग की अविनाशी होली

(अव्यक्त बापदादा मुरली – 06 मार्च 1985)


प्रश्न 1️⃣ : बापदादा के अनुसार संगमयुग को उत्सव का युग क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि संगमयुग में श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं का जीवन स्वयं उत्सव स्वरूप होता है। उन्हें खुशी के लिए बाहरी उत्सव मनाने की आवश्यकता नहीं होती, उनका हर दिन उमंग, उत्साह और ज्ञान के आनन्द से भरा होता है।


प्रश्न 2️⃣ : अज्ञानी आत्माओं और श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं के उत्सव में क्या अंतर है?
उत्तर:
अज्ञानी आत्माएँ कभी-कभी उत्सव मनाकर थोड़े समय के लिए खुश होती हैं, फिर जैसे की तैसी हो जाती हैं। जबकि श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माएँ उत्सव मनाती नहीं, बल्कि स्वयं होली बन जाती हैं और सदा खुशी में रहती हैं।


प्रश्न 3️⃣ : त्रिमूर्ति बाप द्वारा बताई गई तीन प्रकार की होली कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. जलाने की होली – योग अग्नि की होली

  2. रंग लगाने की होली – प्रभु संग का रंग

  3. मंगल मिलन की होली – आत्मा-परमात्मा का मिलन


प्रश्न 4️⃣ : जलाने की होली का रूहानी अर्थ क्या है?
उत्तर:
जलाने की होली का अर्थ है पुराने स्वभाव, संस्कार और विकारों को योग अग्नि में भस्म करना, ताकि वे दोबारा जीवन में न लौटें।


प्रश्न 5️⃣ : बापदादा ने 06-03-1985 की मुरली में जलाने की होली के बारे में क्या कहा?
उत्तर:
बापदादा ने कहा –
“पहले सब पुराने स्वभाव-संस्कार योग अग्नि से भस्म करते हो।”


प्रश्न 6️⃣ : रंग लगाने की होली से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब पुराने संस्कार जल जाते हैं, तब आत्मा बाप के संग के रंग में रंग जाती है। यह रंग अविनाशी होता है, जो जन्म-जन्मांतर साथ चलता है।


प्रश्न 7️⃣ : बाप के संग के रंग का आत्मा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बाप ज्ञान सागर हैं तो बच्चे ज्ञान स्वरूप बनते हैं, बाप शक्तिशाली हैं तो बच्चे मास्टर शक्तिशाली बनते हैं, और बाप के गुण बच्चों की प्रॉपर्टी बन जाते हैं।


प्रश्न 8️⃣ : मंगल मिलन की होली क्या है?
उत्तर:
मंगल मिलन की होली वह स्थिति है जहाँ आत्मा और परमात्मा का सदा का मिलन हो जाता है। बाप और बच्चे कम्बाइन्ड बन जाते हैं, जिन्हें कोई अलग नहीं कर सकता।


प्रश्न 9️⃣ : रूहानी रंगों की पिचकारी का क्या रहस्य है?
उत्तर:
रूहानी पिचकारी का अर्थ है दृष्टि द्वारा सेवा करना—प्रेम, शान्ति, सुख और शक्ति के रंग आत्माओं पर लगाना, जो कभी मिटते नहीं।


प्रश्न 🔟 : डबल लाइट बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
डबल लाइट बनने का अर्थ है देह के बोझ और विकारों के बोझ से मुक्त होना और केवल “बाप और मैं” की स्मृति में रहना।


प्रश्न 1️⃣1️⃣ : होली का भाई-भाई की स्थिति से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
होली के दिन सभी देह के सम्बन्ध भूल जाते हैं। यह आत्मा-आत्मा की समान दृष्टि और भाई-भाई की स्थिति का यादगार है।


प्रश्न 1️⃣2️⃣ : “बीती सो बीती” का रूहानी अर्थ क्या है?
उत्तर:
इसका अर्थ है 63 जन्मों की बीती, पुराने शत्रु और आसुरी संस्कारों को पूरी तरह भूलकर आगे बढ़ जाना।


प्रश्न 1️⃣3️⃣ : बेफिक्र बादशाह किसे कहा गया है?
उत्तर:
श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं को, जो बाप के साथ रहकर बिना चिंता, बिना दवा और बिना मेहनत के मौज में जीवन बिताते हैं।


प्रश्न 1️⃣4️⃣ : अन्तिम समय के लिए बापदादा ने कौन-सी विशेष तैयारी बताई है?
उत्तर:
बुद्धि की क्लियर लाइन और एवर रेडी स्थिति, ताकि बाप के आह्वान में एक सेकण्ड की भी देरी न हो।


प्रश्न 1️⃣5️⃣ : बापदादा का विशेष स्लोगन (06-03-1985) क्या है?
उत्तर:
“जैसा बाप वैसे मैं।”


प्रश्न 1️⃣6️⃣ : अविनाशी रूहानी होली का सार क्या है?
उत्तर:
पुराना जलाना, बाप के संग के रंग में रंगना, बीती सो बीती करना, सदा खुशी में रहना और आत्मा-परमात्मा का सदा मंगल मिलन अनुभव करना।


Disclaimer:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त बापदादा मुरली (06-03-1985) पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है। इसका उद्देश्य आत्मिक उन्नति, सकारात्मक जीवन दृष्टि और ईश्वरीय ज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करना है। यह किसी भी धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं है। सभी विचार ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित हैं।

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