अतीन्द्रिय सुख-(05)अतिइंद्रिय सुख का रहस्य?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
अध्याय 1 : अति इंद्रिय सुख – पाँचवाँ और श्रेष्ठ विषय
हमने चार विषय पूरे किए।
आज पाँचवाँ विषय है —
अति इंद्रिय सुख की अवस्था क्या है?
अति इंद्रिय सुख वह आनंद है
जो इंद्रियों से परे है
जो किसी कारण पर निर्भर नहीं
जो परिस्थिति के “राउंड” में दिखाई नहीं देता
यह सुख देखने-सुनने-पाने से नहीं,
बल्कि अवस्था बनने से प्रकट होता है।
अध्याय 2 : प्रश्न जो हर साधक के मन में उठता है
योग करते हैं, फिर भी आनंद क्यों नहीं टिकता?
ज्ञान सुनते हैं, समझते हैं, फिर भी खालीपन क्यों रहता है?
Murli Note
“सुख मिलने की बात नहीं है, सुख बनने की बात है।”
(साकार मुरली – भावार्थ)
प्रश्न यह नहीं कि हमें कितना सुख मिला
प्रश्न यह है कि हम कितने सुखी बने
अध्याय 3 : सुख मिलना और सुखी बनना – अंतर समझिए
उदाहरण
किसी ने आपको बहुत अच्छा भोजन दिया,
लेकिन आप खा ही नहीं पाए।
भोजन मिला, पर तृप्ति नहीं हुई
सुख मिला, पर आप सुखी नहीं बने
इसीलिए बाबा कहते हैं —
सुख मिलना महत्वपूर्ण नहीं, सुखी बनना महत्वपूर्ण है।
अध्याय 4 : अति इंद्रिय सुख – क्रिया नहीं, अवस्था का फल
Murli Insight
अति इंद्रिय सुख
किसी कर्म का फल नहीं
किसी मेहनत की रसीद नहीं
✔️ यह एक अवस्था का फल है
जब आत्मा उस अवस्था में पहुँचती है,
तो उसका स्वाभाविक परिणाम होता है —
अति इंद्रिय सुख
अध्याय 5 : करने से नहीं, होने से मिलता है
हम कर्म करते हैं, इसलिए कर्मफल मिलता है —
-
सुख दिया → सुख मिला
-
सहयोग दिया → सहयोग मिला
लेकिन अति इंद्रिय सुख
कुछ करने से नहीं
कुछ बनने से मिलता है
🔹 Murli Line (भावार्थ)
“अवस्था बदली तो अनुभूति बदली।”
अध्याय 6 : दीपक का उदाहरण – साधन और स्थिति का फर्क
उदाहरण
दीपक जलाने के लिए चाहिए —
-
तेल
-
बाती
-
माचिस
पर रोशनी कब होती है?
माचिस जलाने से नहीं
✔️ बाती जलने से
योग, ज्ञान, सेवा = माचिस
आत्मिक स्थिति = जलती हुई बाती
बाबा कहते हैं —
आत्मा का दीपक तब सदा जलता है
जब वह एक शिव बाबा की याद में स्थित होती है।
अध्याय 7 : सुख-दुख परिस्थिति से नहीं, स्थिति से
Sakar Murli Note
“सुख-दुख परिस्थिति से नहीं, स्थिति से अनुभव होता है।”
-
परिस्थिति वही
-
स्थिति अचल → शांति
-
स्थिति डगमग → अशांति
इसलिए सुख-दुख बाहर नहीं, अंदर है।
अध्याय 8 : पहली और मूल अवस्था – देही अभिमानी
देह अभिमान में
-
तुलना
-
प्रतिक्रिया
-
अपेक्षा
-
अशांति
देही अभिमानी बनने पर
-
स्वीकृति
-
स्थिरता
-
हल्कापन
-
मौन का आनंद
इसी अंतर में अति इंद्रिय सुख छिपा है।
अध्याय 9 : आत्म-स्मृति स्थिर हुई तो सुख स्वतः आया
शुरुआत में —
-
“मैं आत्मा हूँ” याद करना पड़ता है
अभ्यास के बाद —
-
“मैं आत्मा हूँ” स्थिति बन जाती है
जब स्मृति स्वाभाविक हो जाती है
अति इंद्रिय सुख स्वतः उतरता है
अध्याय 10 : पवित्रता और निष्कामता – सुख का द्वार
पवित्रता केवल ब्रह्मचर्य नहीं —
✔️ विचारों की शुद्धता
✔️ दृष्टि की पवित्रता
✔️ भावनाओं की सफाई
जहाँ —
-
द्वेष नहीं
-
ईर्ष्या नहीं
-
वासना नहीं
वहाँ मन हल्का होता है
और हल्केपन में अति इंद्रिय सुख उतरता है।
अध्याय 11 : अति इंद्रिय सुख के पहचान चिन्ह
✔️ मौन में आनंद
✔️ बिना कारण प्रसन्नता
✔️ प्रतिक्रिया की समाप्ति
✔️ वर्तमान में स्थित रहना
अध्याय 12 : निष्कर्ष – सच्चा सुख कब प्रकट होता है
जब आत्मा जान लेती है —
-
मैं कौन हूँ
-
मैं किसकी हूँ
तब —
देही अभिमानी अवस्था
परमात्मा से स्नेही संबंध
पवित्रता और निष्कामता
अति इंद्रिय सुख अपने आप प्रकट हो जाता है।
अति इंद्रिय सुख – पाँचवाँ और श्रेष्ठ विषय
प्रश्न 1 : आज का पाँचवाँ विषय क्या है?
उत्तर :
आज का पाँचवाँ और श्रेष्ठ विषय है —
अति इंद्रिय सुख की अवस्था क्या है?
प्रश्न 2 : अति इंद्रिय सुख क्या होता है?
उत्तर :
अति इंद्रिय सुख वह आनंद है —
-
जो इंद्रियों से परे होता है
-
जो किसी कारण पर निर्भर नहीं
-
जो परिस्थिति के राउंड में दिखाई नहीं देता
यह सुख देखने, सुनने या पाने से नहीं,
बल्कि आत्मा की अवस्था बनने से प्रकट होता है।
अध्याय 2 : साधक के मन में उठने वाले सामान्य प्रश्न
प्रश्न 3 : योग करने के बाद भी आनंद क्यों नहीं टिकता?
उत्तर :
क्योंकि योग, ज्ञान और सेवा —
साधन हैं,
लेकिन जब तक आत्मा की अवस्था नहीं बदलती,
तब तक अति इंद्रिय सुख स्थायी नहीं बनता।
प्रश्न 4 : ज्ञान समझने के बाद भी खालीपन क्यों रहता है?
उत्तर :
क्योंकि ज्ञान सुनना और समझना अलग बात है,
और ज्ञान की स्थिति बन जाना अलग बात है।
जब तक आत्मा ज्ञान स्वरूप नहीं बनती,
अंदर का खालीपन भरता नहीं।
Murli Note (भावार्थ)
“सुख मिलने की बात नहीं है, सुख बनने की बात है।”
(साकार मुरली)
अध्याय 3 : सुख मिलना और सुखी बनना – क्या अंतर है?
प्रश्न 5 : सुख मिलना और सुखी बनना अलग कैसे है?
उत्तर :
सुख मिलना बाहरी है,
सुखी बनना आंतरिक अवस्था है।
उदाहरण :
किसी ने आपको स्वादिष्ट भोजन दिया,
लेकिन आप खा ही नहीं पाए।
➡️ भोजन मिला, पर तृप्ति नहीं हुई
➡️ सुख मिला, पर आप सुखी नहीं बने
इसलिए बाबा कहते हैं —
सुख मिलना नहीं, सुखी बनना महत्वपूर्ण है।
अध्याय 4 : अति इंद्रिय सुख – कर्म नहीं, अवस्था का फल
प्रश्न 6 : क्या अति इंद्रिय सुख कर्मों का फल है?
उत्तर :
नहीं।
अति इंद्रिय सुख —
किसी कर्म का फल नहीं
किसी मेहनत की रसीद नहीं
यह आत्मा की अवस्था का स्वाभाविक फल है।
अध्याय 5 : करने से नहीं, होने से मिलता है
प्रश्न 7 : अति इंद्रिय सुख क्यों “करने” से नहीं मिलता?
उत्तर :
क्योंकि बाकी कर्मफलों में —
-
सुख दिया → सुख मिला
-
सहयोग दिया → सहयोग मिला
लेकिन अति इंद्रिय सुख —
कुछ करने से नहीं
कुछ बनने से मिलता है
Murli Line (भावार्थ)
“अवस्था बदली तो अनुभूति बदली।”
अध्याय 6 : दीपक का उदाहरण – साधन और स्थिति
प्रश्न 8 : दीपक का उदाहरण हमें क्या सिखाता है?
उत्तर :
दीपक जलाने के लिए चाहिए —
तेल, बाती, माचिस
पर रोशनी कब होती है?
माचिस से नहीं
✔️ बाती जलने से
योग, ज्ञान, सेवा = माचिस
आत्मिक स्थिति = जलती हुई बाती
बाबा कहते हैं —
जब आत्मा एक शिव बाबा की याद में स्थित होती है,
तब आत्मिक दीपक सदा जलता है।
अध्याय 7 : सुख-दुख परिस्थिति से नहीं, स्थिति से
प्रश्न 9 : सुख-दुख का असली कारण क्या है?
उत्तर :
सुख-दुख बाहर की परिस्थिति से नहीं,
अंदर की स्थिति से अनुभव होता है।
Sakar Murli Note (भावार्थ)
“सुख-दुख परिस्थिति से नहीं, स्थिति से अनुभव होता है।”
अध्याय 8 : पहली और मूल अवस्था – देही अभिमानी
प्रश्न 10 : देह अभिमान और देही अभिमान में क्या अंतर है?
उत्तर :
देह अभिमान में
-
तुलना
-
प्रतिक्रिया
-
अपेक्षा
-
अशांति
देही अभिमानी बनने पर
-
स्वीकृति
-
स्थिरता
-
हल्कापन
-
मौन का आनंद
इसी अंतर में अति इंद्रिय सुख छिपा है।
अध्याय 9 : आत्म-स्मृति स्थिर हुई तो सुख स्वतः आया
प्रश्न 11 : आत्म-स्मृति कब अति इंद्रिय सुख देती है?
उत्तर :
जब आत्म-स्मृति —
-
कभी आती
-
कभी जाती नहीं,
बल्कि स्वाभाविक अवस्था बन जाती है।
शुरुआत में — “मैं आत्मा हूँ” याद करना पड़ता है
बाद में — “मैं आत्मा हूँ” स्थिति बन जाती है
उसी स्थिति में अति इंद्रिय सुख स्वतः उतरता है।
अध्याय 10 : पवित्रता और निष्कामता
प्रश्न 12 : पवित्रता का अति इंद्रिय सुख से क्या संबंध है?
उत्तर :
पवित्रता केवल ब्रह्मचर्य नहीं है —
-
विचारों की शुद्धता
-
दृष्टि की पवित्रता
-
भावनाओं की सफाई
जहाँ द्वेष, ईर्ष्या, वासना नहीं —
वहाँ मन हल्का होता है
और हल्केपन में अति इंद्रिय सुख उतरता है।
अध्याय 11 : अति इंद्रिय सुख की पहचान
प्रश्न 13 : अति इंद्रिय सुख के लक्षण क्या हैं?
उत्तर :
-
मौन में आनंद
-
बिना कारण प्रसन्नता
-
प्रतिक्रिया की समाप्ति
-
वर्तमान में स्थित रहना
अध्याय 12 : निष्कर्ष – सच्चा सुख कब प्रकट होता है?
प्रश्न 14 : अति इंद्रिय सुख कब स्वतः प्रकट होता है?
उत्तर :
जब आत्मा जान लेती है —
-
मैं कौन हूँ
-
मैं किसकी हूँ
तब —
देही अभिमानी अवस्था
परमात्मा से स्नेही संबंध
पवित्रता और निष्कामता
अति इंद्रिय सुख अपने आप प्रकट हो जाता है।
Disclaimer (डिस्क्लेमर)
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के साकार मुरली ज्ञान, आध्यात्मिक सिद्धांतों और आत्मिक अनुभवों पर आधारित है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, आत्म-उन्नति और आंतरिक शांति को बढ़ावा देना है।
यह किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय, मानसिक या कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है।
कृपया इस ज्ञान को आत्मिक समझ और विवेक के साथ ग्रहण करें।
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