Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 27-12-2025 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – तुम्हारे दु:ख के दिन अब पूरे हुए, तुम अब ऐसी दुनिया में जा रहे हो जहाँ कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं” | |
| प्रश्नः- | किन दो शब्दों का राज़ तुम्हारी बुद्धि में होने कारण पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य रहता है? |
| उत्तर:- | उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ तुम्हारी बुद्धि में है। तुम जानते हो आधाकल्प हम उतरते आये, अभी है चढ़ने का समय। बाप आये हैं नर से नारायण बनाने की सत्य नॉलेज देने। हमारे लिए अब कलियुग पूरा हुआ, नई दुनिया में जाना है इसलिए इससे बेहद का वैराग्य है। |
| गीत:- | धीरज धर मनुवा…… |
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। रूहानी बाप बैठ समझाते हैं – यह एक ही पुरुषोत्तम संगमयुग है जबकि कल्प-कल्प बाप आकर रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं। राजयोग सिखलाते हैं। बाप रूहानी बच्चों को कहते हैं मनुवा अर्थात् आत्मा, हे आत्मा धीरज धरो। आत्माओं से बात करते हैं। इस शरीर का मालिक आत्मा है। आत्मा कहती है – मैं अविनाशी आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर विनाशी है। रूहानी बाप कहते हैं – मैं एक ही बार कल्प के संगम पर आकर तुम बच्चों को धीरज देता हूँ कि अब सुख के दिन आते हैं। अभी तुम दु:खधाम रौरव नर्क में हो। सिर्फ तुम नहीं हो परन्तु सारी दुनिया रौरव नर्क में है, तुम जो मेरे बच्चे बने हो, रौरव नर्क से निकलकर स्वर्ग में चल रहे हो। सतयुग, त्रेता, द्वापर पास हो गया। कलियुग भी तुम्हारे लिए पास हो गया। तुम्हारे लिए यह पुरुषोत्तम संगमयुग है जबकि तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हो। आत्मा जब सतोप्रधान बन जायेगी तो फिर यह शरीर भी छोड़ेगी। सतोप्रधान आत्मा को सतयुग में नया शरीर चाहिए। वहाँ सब कुछ नया होता है। बाप कहते हैं बच्चे अब दु:खधाम से सुखधाम में चलना है, उसके लिए पुरुषार्थ करना है। सुखधाम में इन लक्ष्मी-नारायण की राजाई थी। तुम पुरुषार्थ कर रहे हो नर से नारायण बनने का। यह सत्य नर से नारायण बनने की नॉलेज है। भक्ति मार्ग में हर पूर्णमासी पर कथा सुनते आये हो, परन्तु वह है ही भक्ति मार्ग। उसे सत्य मार्ग नहीं कहेंगे, ज्ञान मार्ग है सत्य मार्ग। तुम सीढ़ी उतरते-उतरते झूठ खण्ड में आते हो। अभी तुम जानते हो सत्य बाप से हम यह नॉलेज पाकर 21 जन्म देवी-देवता बनेंगे। हम थे, फिर सीढ़ी उतरते आये। उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ तुम्हारी बुद्धि में है। पुकारते भी हैं हे बाबा आकर हमको पावन बनाओ। एक बाप ही पावन बनाने वाला है। बाप कहते हैं – बच्चे, तुम सतयुग में विश्व के मालिक थे। बहुत धनवान, बहुत सुखी थे। अभी बाकी थोड़ा समय है। पुरानी दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। नई दुनिया में एक राज्य, एक भाषा थी। उसको कहा जाता है अद्वैत राज्य। अभी कितना द्वैत है, अनेक भाषायें हैं। जैसे मनुष्यों का झाड़ बढ़ता जाता है, भाषाओं का भी झाड़ वृद्धि को पाता जाता है। फिर होगी एक भाषा। गायन है ना वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट। मनुष्यों की बुद्धि में नहीं बैठता। बाप ही दु:ख की पुरानी दुनिया को बदल सुख की नई दुनिया स्थापन करते हैं। लिखा हुआ है प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा डिटीज्म की स्थापना। यह है राजयोग की पढ़ाई। यह ज्ञान जो गीता में लिखा हुआ है, बाप ने जो सम्मुख सुनाया वह फिर मनुष्यों ने भक्ति मार्ग के लिए बैठ लिखा है, जिससे तुम उतरते आये हो। अभी भगवान तुमको पढ़ाते हैं ऊपर चढ़ने के लिए। भक्ति को कहा ही जाता है उतरती कला का मार्ग। ज्ञान है चढ़ती कला का मार्ग। यह समझाने में तुम डरो मत। भल ऐसे भी हैं जो इन बातों को न समझने कारण विरोध करेंगे, शास्त्रवाद करेंगे। परन्तु तुमको कोई से शास्त्रवाद नहीं करना है। बोलो शास्त्र, वेद, उपनिषद वा गंगा स्नान करना, तीर्थ आदि करना यह सब भक्ति काण्ड है। भारत में रावण भी है बरोबर, जिसकी एफीजी जलाते हैं। वैसे तो दुश्मनों की एफीजी जलाते हैं, अल्पकाल के लिए। यह इस एक रावण की ही एफीज़ी हर वर्ष जलाते आते हैं। बाप कहते हैं तुम गोल्डन एजेड बुद्धि से आइरन एजेड बुद्धि हो गये हो। तुम कितने सुखी थे। बाप आते ही हैं सुखधाम की स्थापना करने। फिर बाद में जब भक्ति मार्ग शुरू होता है तो दु:खी बनते हैं। फिर सुखदाता को याद करते हैं, वह भी नाम मात्र क्योंकि उनको जानते नहीं। गीता में नाम बदल दिया है। पहले-पहले तुम यह समझाओ कि ऊंच ते ऊंच भगवान एक है, याद भी उनको करना चाहिए। एक को याद करना उसको ही अव्यभिचारी याद, अव्यभिचारी ज्ञान कहा जाता है। तुम अभी ब्राह्मण बने हो तो भक्ति नहीं करते हो। तुमको ज्ञान है। बाप पढ़ाते हैं जिससे हम यह देवता बनते हैं। दैवीगुण भी धारण करने हैं इसलिए बाबा कहते हैं अपना चार्ट रखो तो मालूम पड़ेगा हमारे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं। देह-अभिमान है पहला अवगुण फिर दुश्मन है काम। काम पर जीत पाने से ही तुम जगतजीत बनेंगे। तुम्हारा उद्देश्य ही यह है, इन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में कोई अनेक धर्म थे नहीं। सतयुग में देवताओं का ही राज्य होता है। मनुष्य होते हैं कलियुग में। हैं भल वह भी मनुष्य, परन्तु दैवीगुणों वाले। इस समय सब मनुष्य हैं आसुरी गुणों वाले। सतयुग में काम महाशत्रु होता नहीं। बाप कहते हैं इस काम महाशत्रु पर जीत पाने से तुम जगतजीत बनेंगे। वहाँ रावण होता नहीं। यह भी मनुष्य समझ नहीं सकते। गोल्डन एज से उतरते-उतरते तमोप्रधान बुद्धि बने हैं। अब फिर सतोप्रधान बनना है। उसके लिए एक ही दवाई मिलती है – बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो जन्म-जन्मान्तर के पाप भस्म हो जायेंगे। तुम बैठे हो पापों को भस्म करने तो फिर आगे पाप नहीं करना चाहिए। नहीं तो वह सौ गुणा बन जायेगा। विकार में गये तो सौ गुणा दण्ड पड़ जायेगा, फिर वह मुश्किल चढ़ सकते हैं। पहला नम्बर दुश्मन है यह काम। 5 मंजिल से गिरेंगे तो हडगुड एकदम टूट जायेंगी। शायद मर भी जायें। ऊपर से गिरने से एकदम चकनाचूर हो जाते हैं। बाप से प्रतिज्ञा तोड़ काला मुंह किया तो गोया आसुरी दुनिया में चला गया। यहाँ से मर गया। उनको ब्राह्मण भी नहीं, शूद्र कहा जायेगा।
बाप कितना सहज समझाते हैं। पहले तो यह नशा रहना चाहिए। अगर समझो श्रीकृष्ण भगवानुवाच भी हो, वह भी तो जरूर पढ़ा करके आपसमान बनायेंगे ना। परन्तु श्रीकृष्ण तो भगवान हो न सके। वह तो पुनर्जन्म में आते हैं। बाप कहते हैं मैं ही पुनर्जन्म रहित हूँ। राधे-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण अथवा विष्णु एक ही बात है। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण और लक्ष्मी-नारायण का ही बचपन है राधे-कृष्ण। ब्रह्मा का भी राज़ समझाया है – ब्रह्मा-सरस्वती सो लक्ष्मी-नारायण। अब ट्रांसफर होते हैं। पिछाड़ी का नाम इनका ब्रह्मा रखा है। बाकी यह ब्रह्मा तो देखो एकदम आइरन एज में खड़ा है। यही फिर तपस्या कर श्रीकृष्ण वा श्री नारायण बनते हैं। विष्णु कहने से उसमें दोनों आ जाते हैं। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती। यह बातें कोई समझ न सकें। 4 भुजा ब्रह्मा को भी देते हैं क्योंकि प्रवृत्ति मार्ग है ना। निवृत्ति मार्ग वाले यह ज्ञान दे नहीं सकते। बहुतों को बाहर से फंसा कर ले आते हैं कि चलो हम प्राचीन राजयोग सिखलायें। अब संन्यासी राजयोग सिखला न सकें। अब ईश्वर आये हैं, तुम अब उनके बच्चे ईश्वरीय सम्प्रदाय बने हो। ईश्वर आये हैं तुमको पढ़ाने। तुमको राजयोग सिखला रहे हैं। वह तो है निराकार। ब्रह्मा द्वारा तुमको अपना बनाया है। बाबा-बाबा तुम उनको कहते हो, ब्रह्मा तो बीच में इन्टरप्रेटर है। भाग्यशाली रथ है। इस द्वारा बाबा तुमको पढ़ाते हैं। तुम भी पतित से पावन बनते हो। बाप पढ़ाते हैं – मनुष्य से देवता बनाने। अभी तो रावण राज्य, आसुरी सम्प्रदाय है ना। अभी तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय बने हो फिर दैवी सम्प्रदाय बनेंगे। अभी तुम पुरुषोत्तम संगमयुग पर हो, पावन बन रहे हो। संन्यासी लोग तो घरबार छोड़ जाते हैं। यहाँ बाप तो कहते हैं – भल स्त्री-पुरुष घर में इकट्ठे रहो, ऐसे मत समझो स्त्री नागिन है इसलिए हम अलग हो जायें तो छूट जायेंगे। तुमको भागना नहीं है। वह हद का संन्यास है जो भागते हैं, तुम यहाँ बैठे हो परन्तु तुमको इस विकारी दुनिया से वैराग्य है। यह सब बातें तुम्हें अच्छी रीति धारण करनी है, नोट करना है और परहेज भी रखनी है। दैवीगुण धारण करने हैं। श्रीकृष्ण के गुण गाये जाते हैं ना। यह तुम्हारी एम आब्जेक्ट है। बाप नहीं बनते, तुमको बनाते हैं। फिर आधाकल्प के बाद तुम नीचे उतरते, तमोप्रधान बनते हो। मैं नहीं बनता हूँ, यह बनते हैं। 84 जन्म भी इसने लिए हैं। इनको भी अभी सतोप्रधान बनना है, यह पुरुषार्थी है। नई दुनिया को सतोप्रधान कहेंगे। हर एक चीज़ पहले सतोप्रधान फिर सतो-रजो-तमो में आती है। छोटे बच्चे को भी महात्मा कहा जाता है क्योंकि उनमें विकार होते नहीं, इसलिए उनको फूल कहा जाता है। संन्यासियों से छोटे बच्चों को उत्तम कहेंगे क्योंकि संन्यासी तो फिर भी लाइफ पास कर आते हैं ना। 5 विकारों का अनुभव है। बच्चों को तो पता नहीं रहता इसलिए बच्चों को देख खुशी होती है, चैतन्य फूल हैं। अपना तो है ही प्रवृत्ति मार्ग।
अभी तुम बच्चों को इस पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाना है। अमरलोक में चलने के लिए तुम सब पुरुषार्थ करते हो, मृत्यु-लोक से ट्रांसफर होते हो। देवता बनना है तो उसके लिए अब मेहनत करनी पड़े, प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे भाई-बहन हो जाते हैं। भाई-बहन तो थे ना। प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद आपस में क्या ठहरे? प्रजापिता ब्रह्मा गाया जाता है। जब तक प्रजापिता का बच्चा न बनें, सृष्टि की रचना कैसे हो? प्रजापिता ब्रह्मा के हैं सब रूहानी बच्चे। वह ब्राह्मण होते हैं जिस्मानी यात्रा वाले। तुम हो रूहानी यात्रा वाले। वह पतित, तुम पावन। वह कोई प्रजापिता की सन्तान नहीं हैं, यह तुम समझते हो। भाई-बहन जब समझें तक विकार में न जायें। बाप भी कहते हैं खबरदार रहना, हमारा बच्चा बनकर कोई क्रिमिनल काम नहीं करना, नहीं तो पत्थरबुद्धि बन जायेंगे। इन्द्र सभा की कहानी भी है। शूद्र को ले आई तो इन्द्र सभा में उनकी बदबू आने लगी। तो बोला पतित को यहाँ क्यों लाया है। फिर उनको श्राप दे दिया। वास्तव में इस सभा में भी कोई पतित आ नहीं सकते। भल बाप को मालूम पड़े वा न पड़े, यह तो अपना ही नुकसान करते हैं, और ही सौगुणा दण्ड पड़ जाता है। पतित को एलाउ नहीं है। उन्हों के लिए विजिटिंग रूम ठीक है। जब पावन बनने की गैरन्टी करे, दैवीगुण धारण करे तब एलाउ हो। दैवीगुण धारण करने में टाइम लगता है। पावन बनने की एक ही प्रतिज्ञा है।
यह भी समझाया है, देवताओं की और परमात्मा की महिमा अलग-अलग है। पतित-पावन, लिबरेटर, गाइड बाप ही है। सब दु:खों से लिबरेट कर अपने शान्तिधाम में ले जाते हैं। शान्तिधाम, सुखधाम और दु:खधाम यह भी चक्र है। अभी दु:खधाम को भूल जाना है। शान्तिधाम से सुखधाम में वो आयेंगे जो नम्बरवार पास होंगे, वही आते रहेंगे। यह चक्र फिरता रहता है। ढेर की ढेर आत्मायें हैं, सबका पार्ट नम्बरवार है। जायेंगे भी नम्बरवार। उनको कहा जाता है शिवबाबा का सिजरा अथवा रूद्र माला। नम्बरवार जाते हैं फिर नम्बरवार आते हैं। दूसरे धर्म वालों का भी ऐसा होता है। बच्चों को रोज़ समझाया जाता है, स्कूल में रोज़ नहीं पढ़ेंगे, मुरली नहीं सुनेंगे तो फिर अबसेन्ट हो जायेंगे। पढ़ाई की लिफ्ट तो जरूर चाहिए। गॉडली युनिवर्सिटी में अबसेन्ट थोड़ेही होनी चाहिए। पढ़ाई कितनी ऊंच है, जिससे तुम सुखधाम के मालिक बनते हो। वहाँ तो अनाज सब फ्री रहता है, पैसा नहीं लगता। अभी तो कितना मंहगा है। 100 वर्ष में कितना महंगा हो गया है। वहाँ कोई अप्राप्त वस्तु नहीं होती जिसके लिए मुश्किलात आये। वह है ही सुखधाम। तुम अभी वहाँ के लिए तैयारी कर रहे हो। तुम बेगर टू प्रिन्स बनते हो। साहूकार लोग अपने को बेगर नहीं समझते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप से जो सम्पूर्ण पावन बनने की प्रतिज्ञा की है, इसे तोड़ना नहीं है। बहुत-बहुत परहेज रखनी है। अपना चार्ट देखना है – हमारे में कोई अवगुण तो नहीं है?
2) गॉडली युनिवर्सिटी में कभी भी अबसेन्ट नहीं होना है। सुखधाम का मालिक बनने की ऊंची पढ़ाई एक दिन भी मिस नहीं करनी है। मुरली रोज़ जरूर सुननी है।
| वरदान:- | हर सेकण्ड हर संकल्प के महत्व को जान पुण्य की पूंजी जमा करने वाले पदमापदमपति भव आप पुण्य आत्माओं के संकल्प में इतनी विशेष शक्ति है जिस शक्ति द्वारा असम्भव को सम्भव कर सकते हो। जैसे आजकल यत्रों द्वारा रेगिस्तान को हरा भरा कर देते हैं, पहाड़ियों पर फूल उगा देते हैं ऐसे आप अपने श्रेष्ठ संकल्पों द्वारा नाउम्मींदवार को उम्मींदवार बना सकते हो। सिर्फ हर सेकण्ड हर संकल्प की वैल्यु को जान, संकल्प और सेकण्ड को यूज कर पुण्य की पूंजी जमा करो। आपके संकल्प की शक्ति इतनी श्रेष्ठ है जो एक संकल्प भी पदमापदमपति बना देता है। |
| स्लोगन:- | हर कर्म अधिकारी पन के निश्चय और नशे से करो तो मेहनत समाप्त हो जायेगी। |
अव्यक्त इशारे – अब सम्पन्न वा कर्मातीत बनने की धुन लगाओ
कर्मातीत स्थिति को पाने के लिए विशेष स्वयं में समेटने और समाने की शक्ति धारण करना आवश्यक है। कर्मबन्धनी आत्माएं जहाँ हैं वहाँ ही कार्य कर सकती हैं और कर्मातीत आत्मायें एक ही समय पर चारों ओर अपना सेवा का पार्ट बजा सकती हैं क्योंकि कर्मातीत हैं। उनकी स्पीड बहुत तीव्र होती है, सेकण्ड में जहाँ चाहे वहाँ पहुँच सकती है, तो इस अनुभूति को बढ़ाओ।
प्रश्न 1️⃣ :
बापदादा बच्चों को “धीरज धर मनुवा” क्यों कहते हैं?**
उत्तर :
बाप आत्माओं से बात करते हैं और समझाते हैं कि तुम अविनाशी आत्मा हो, यह शरीर विनाशी है। यह पुरुषोत्तम संगमयुग है, जहाँ बाप आकर आत्माओं को धीरज देते हैं कि अब दुःख के दिन समाप्त हो रहे हैं और सुख के दिन प्रारम्भ हो रहे हैं।
**प्रश्न 2️⃣ :
पुरुषोत्तम संगमयुग क्या है?**
उत्तर :
पुरुषोत्तम संगमयुग वह अद्भुत समय है जब बाप स्वयं आकर आत्माओं को राजयोग सिखाते हैं और तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाते हैं। यह युग कलियुग के अंत और सतयुग की शुरुआत का संगम है।
**प्रश्न 3️⃣ :
आत्मा और शरीर का सही परिचय क्या है?**
उत्तर :
आत्मा शरीर की मालिक है। आत्मा अविनाशी है और शरीर विनाशी है। जब आत्मा सतोप्रधान बनती है, तब सतयुग में उसे नया, पवित्र शरीर प्राप्त होता है।
**प्रश्न 4️⃣ :
दुःखधाम और सुखधाम में क्या अंतर है?**
उत्तर :
दुःखधाम वह अवस्था है जहाँ रावण राज्य और आसुरी गुण होते हैं।
सुखधाम वह पावन दुनिया है जहाँ लक्ष्मी–नारायण का राज्य था, कोई दुःख या अप्राप्त वस्तु नहीं होती।
**प्रश्न 5️⃣ :
नर से नारायण बनने का अर्थ क्या है?**
उत्तर :
नर से नारायण बनने का अर्थ है—
साधारण मनुष्य से दैवी गुणों से सम्पन्न देवता बनना। यह केवल सत्य ज्ञान और राजयोग के पुरुषार्थ से संभव है।
**प्रश्न 6️⃣ :
भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग में मुख्य अंतर क्या है?**
उत्तर :
भक्ति मार्ग उतरती कला का मार्ग है, जहाँ आत्मा नीचे उतरती है।
ज्ञान मार्ग चढ़ती कला का मार्ग है, जहाँ बाप स्वयं पढ़ाकर आत्मा को ऊपर उठाते हैं।
**प्रश्न 7️⃣ :
उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ क्या है?**
उत्तर :
आधाकल्प आत्मा उतरती कला में रही—दुःख, अज्ञान और विकारों में।
अब बाप के ज्ञान से चढ़ती कला शुरू हुई है—पवित्रता, सुख और श्रेष्ठ जीवन की ओर।
**प्रश्न 8️⃣ :
एक बाप को ही याद करने पर इतना ज़ोर क्यों है?**
उत्तर :
एक को याद करना ही अव्यभिचारी याद और अव्यभिचारी ज्ञान है।
एक बाप ही पतित से पावन बनाने वाला, लिबरेटर और गाइड है।
**प्रश्न 9️⃣ :
सबसे बड़ा अवगुण और शत्रु कौन-सा बताया गया है?**
उत्तर :
देह-अभिमान पहला अवगुण है और काम महाशत्रु है।
काम पर जीत पाने से ही आत्मा जगतजीत बनती है।
**प्रश्न 🔟 :
सतोप्रधान बनने की एकमात्र दवाई क्या है?**
उत्तर :
अपने को आत्मा समझकर बाप को याद करना।
इससे जन्म-जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाते हैं।
**प्रश्न 1️⃣1️⃣ :
बाप बच्चों को मुरली रोज़ सुनने की शिक्षा क्यों देते हैं?**
उत्तर :
क्योंकि यह गॉडली यूनिवर्सिटी की ऊँची पढ़ाई है।
मुरली से आत्मा को लिफ्ट मिलती है और सुखधाम का अधिकारी बनती है।
**प्रश्न 1️⃣2️⃣ :
दैवी गुण धारण करना क्यों आवश्यक है?**
उत्तर :
क्योंकि देवता वही बन सकता है जिसमें पवित्रता, शांति, प्रेम और विनम्रता जैसे दैवी गुण हों।
बाबा इसलिए चार्ट रखने को कहते हैं ताकि कोई आसुरी गुण न रह जाए।
**प्रश्न 1️⃣3️⃣ :
पावन बनने की प्रतिज्ञा का महत्व क्या है?**
उत्तर :
पावन बनने की प्रतिज्ञा टूटने से आत्मा को भारी नुकसान होता है।
इसलिए बहुत परहेज और सावधानी आवश्यक है।
**प्रश्न 1️⃣4️⃣ :
वरदान में “हर सेकण्ड, हर संकल्प” पर ज़ोर क्यों है?**
उत्तर :
क्योंकि हर श्रेष्ठ संकल्प में इतनी शक्ति है कि असंभव को भी संभव बना सकता है।
हर सेकण्ड का सही उपयोग करने से पुण्य की पूंजी जमा होती है।
**प्रश्न 1️⃣5️⃣ :
कर्मातीत अवस्था का संकेत क्या है?**
उत्तर :
कर्मातीत आत्मा सीमाओं से मुक्त होकर एक साथ अनेक स्थानों पर सेवा कर सकती है।
उसकी स्पीड तीव्र होती है और वह सेकण्ड में कार्य सम्पन्न कर लेती है।
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा प्रदत्त साकार मुरली के आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक समझ पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, संप्रदाय, व्यक्ति या आस्था का खंडन या समर्थन करना नहीं है।
यह सामग्री केवल आत्मिक जागृति, राजयोग अभ्यास और सकारात्मक जीवन मूल्यों के लिए प्रस्तुत की गई है।
वीडियो में व्यक्त विचार ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं।
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