अति इंद्रिय सुख
ईश्वरीय आनंद का
सार्वभौमिक सत्य
सार्वभौमिक
सत्य
जो अति इंद्रिय सुख है
उसको सारे क्या मानते हैं?
क्या अति इंद्रिय सुख
केवल ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारियां ही
अनुभव कर सकती हैं?
क्या जवाब देंगे?
क्या अति इंद्रिय सुख केवल ब्रह्मा कुमार–
ब्रह्मा कुमारियां ही अनुभव कर सकती हैं?
या और भी कोई कर सकता है
जी ब्रह्मा कुमार और ब्रह्मा कुमारी ही अनुभव कर सकती है और कोई नहीं कर सकता।
नहीं।
क्या यह सुख सबके लिए है?
हां जी।
नहीं भाई, नहीं।
नहीं। नाम से नहीं, ये स्थिति से मिलता है।
ये बात ठीक है।
ठीक है भाई जी। जी भाई जी ठीक है।
इसका क्या मतलब है? नाम से नहीं, स्थिति से मिलता है।
हां भाई, व्यवस्था बनानी पड़ती है इसकी। नाम से नहीं मिलता है।
नाम का क्या मतलब? कौन सा नाम होना चाहिए?
सुरेंद्र नाम होगा तो मिला, रमेश नाम होगा तो नहीं मिलेगा।
नहीं भाई जी, ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारी नाम से नहीं मिलता।
अच्छा ब्रह्मा कुमार है या ब्रह्मा कुमारी है या नहीं है,
परंतु उससे नहीं मिलता कि कोई ब्रह्मा कुमार है तो उसको अति इंद्रिय सुख मिल जाएगा।
नहीं, जो उस स्थिति को बनाएगा उसे मिलेगा।
मतलब ब्रह्मा कुमार को भी जरूरी नहीं,
ब्रह्मा कुमारी को भी जरूरी नहीं कि यह सुख मिले।
नाम के ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारी को सुख नहीं मिलेगा।
जो वास्तव में ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारी बनेंगे,
जो अपनी स्थिति ऐसी बनाएंगे, तब उनको मिलेगा।
और यह स्थिति चाहे कोई भी बना ले,
उसको मिल सकता है।
परंतु शर्त है, कंडीशन है कि उसे वो स्थिति बनानी होगी।
भाई जी, जो नॉन है, जिसके पास बाबा का ज्ञान नहीं है,
वो तो स्थिति नहीं बना पाएंगे ना।
लेकिन नहीं, क्या उसको भी होगा?
हम यह नहीं कह रहे हैं कि वो ब्रह्मा कुमार है या नहीं है।
यह लाइन हमें यह स्पष्ट कर रही है कि
नाम से कोई ब्रह्मा कुमार है या नहीं है,
इसका कोई मतलब नहीं है।
स्थिति से मिलता है।
यदि आपने वह स्थिति बना ली है,
तो अति इंद्रिय सुख को पा सकते हैं।
बिना स्थिति बनाए कोई नहीं पा सकता।
इसमें बीके–नॉन बीके कोई बात नहीं।
आगे इसको स्पष्ट करेंगे,
परंतु अभी आप इतनी बात समझें।
यह सुख सबके लिए है।
कोई ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारियों के लिए ही नहीं है।
जो भी आए, जो भी इस अवस्था को बनाएगा,
वो अति इंद्रिय सुख को पा सकेगा।
क्या अति इंद्रिय सुख केवल ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारियां ही अनुभव कर सकते हैं?
एक सामान्य लेकिन गहरा प्रश्न।
अक्सर लोगों के मन में प्रश्न उठता है—
क्या अति इंद्रिय सुख सिर्फ उन्हीं को मिलता है जो बीके हैं?
क्या बिना ब्रह्मा कुमार बने कोई यह आनंद अनुभव नहीं कर सकता?
आज हम इस प्रश्न को
भावना से नहीं,
ज्ञान और मुरली के आधार पर समझेंगे।
अति इंद्रिय सुख क्या है?
इंद्रियों से परे आत्मिक आनंद।
अति इंद्रिय सुख क्या है?
इंद्रियों से परे आत्मिक आनंद,
आत्मा द्वारा प्राप्त होने वाला आनंद।
जब हम कहते हैं “आत्मा द्वारा”,
तो ऐसा लगे कि आत्मा अलग है और आनंद अलग।
इसलिए “द्वारा” शब्द ठीक नहीं है।
यह सुख भोग से नहीं मिलता।
वस्तुओं से नहीं मिलता।
परिस्थितियों से नहीं मिलता।
कर्म इंद्रियों के द्वारा
इस अति इंद्रिय सुख को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
यह सुख आत्मा–परमात्मा के संबंध से जन्म लेता है।
जब आत्मा परमात्मा के संबंध में आती है,
तब आत्मा इस सुख का अनुभव करती है।
जब तक आत्मा परमात्मा के संबंध में नहीं आई,
तब तक अति इंद्रिय सुख का जन्म ही नहीं होता।
उदाहरण
अचानक शांति छा जाना।
याद में आंसू आ जाना।
बिना कारण मन का हल्का हो जाना।
मुरली 2 फरवरी 1968
अति इंद्रिय सुख की पहचान—
अचानक शांति,
खुशी से आंसू,
और बिना कारण मन का हल्का हो जाना।
लेकिन ध्यान रखना है—
खुशी के आंसू सांसारिक या दैहिक प्राप्ति से नहीं,
रूहानी प्राप्ति से हों।
भ्रांति
यह सुख केवल बीके को ही मिलता है—यह भ्रांति है।
भ्रांति और संदेह में अंतर समझना जरूरी है।
संदेह में निश्चय नहीं होता।
भ्रांति में गलत निश्चय हो जाता है।
लोगों के मन में भ्रांति है कि यह सुख केवल बीके को ही मिलता है।
सुख संगठन से नहीं मिलता।
पद से नहीं मिलता।
नाम से नहीं मिलता।
तो सुख किससे मिलता है?
स्थिति से,
याद से,
पवित्रता से।
तीन आधार
सिद्धता,
याद,
पवित्रता।
इन तीनों से अति इंद्रिय सुख मिलता है।
उदाहरण
जैसे बिजली—
जो भी बल्ब सही तरीके से जोड़ता है,
उसे रोशनी मिलती है।
तो फिर ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारियां क्यों अधिक अनुभव करते हैं?
क्योंकि बीके जीवन में तीन बातें स्पष्ट सिखाई जाती हैं—
-
आत्मा की सही पहचान
-
परमात्मा शिव से सीधा संबंध
-
योग और पवित्रता का निरंतर अभ्यास
इसीलिए अनुभव अधिक और स्थिर होता है।
मुरली 10 नवंबर 1970
“याद के अभ्यास से अति इंद्रिय सुख बढ़ता है।”
क्या कोई गैर-बीके यह सुख अनुभव कर सकता है?
उत्तर है—हां, अवश्य कर सकता है।
शर्त है—
आत्मिक पहचान,
परमात्मा से संबंध,
अहंकार का त्याग,
देह अभिमान से दूरी।
इतिहास में कई आत्माओं ने
ध्यान–भक्ति में अल्पकालिक आत्मिक आनंद अनुभव किया है।
लेकिन स्थायी, स्पष्ट,
ज्ञान सहित अनुभव
सिर्फ संगम युग में मिलता है।
मुरली 28 जुलाई 1967
अब यह अभ्यास का समय है।
इसलिए अनुभूति संभव है।
अनुभव और स्थिति का अंतर
अनुभव—क्षणिक।
स्थिति—निरंतर और स्थायी।
बीके ज्ञान
अनुभव को स्थिति में बदल देता है।
अव्यक्त वाणी 21 मार्च 1987
“अनुभव से सिद्धता और सिद्धता से सिद्धि होती है।”
संगम युग क्यों सबके लिए अवसर है?
क्योंकि संगम युग में
परमात्मा स्वयं शिक्षा दे रहे हैं।
अति इंद्रिय सुख कृपा नहीं,
अधिकार है।
मुरली 18 जनवरी 1969
“मैं सब आत्माओं का पिता हूं।”
ब्रह्मा कुमार कहलाने का अर्थ
यह कोई लेबल नहीं,
यह जीवन शैली है।
ब्रह्मा जैसा बनने का प्रयास,
पवित्रता की धारणा,
याद को प्राथमिकता—
नाम नहीं, निर्णय बदलता है।
निष्कर्ष
अति इंद्रिय सुख केवल ब्रह्मा कुमार–ब्रह्मा कुमारियों की बपौती नहीं है।
जो आत्मिक स्थिति बनाएगा,
जो शिव बाबा से सच्चा संबंध जोड़ेगा,
जो याद का अभ्यास करेगा—
वह आत्मा अवश्य अनुभव कर सकती है।
अंतिम संदेश
स्वयं को आत्मा समझिए।
परमात्मा को अपना मानिए।
और रोज थोड़ी देर याद में बैठने का अभ्यास करिए।
