1️⃣ आत्मा अमर है 2️⃣ यह दुनिया कर्म क्षेत्र है 3️⃣ आत्मा का जीवन काल और शरीर का जीवन काल अलग-अलग है
अक्सर हम कहते हैं — “वे मर गया”
लेकिन प्रश्न है — वास्तव में कौन मरता है? शरीर या आत्मा?
गीता कहती है —
“न जायते म्रियते वा कदाचित” अर्थात आत्मा का न जन्म होता है, न मृत्यु होती है।
आत्मा अमर है — शरीर विनाशी है
प्रश्न: वास्तव में मरता कौन है?
मरता है — शरीर जीवित रहता है — आत्मा
शरीर मिट्टी का बना है पाँच तत्वों से बना है किराए का घर है
लेकिन आत्मा —
✔ अविनाशी है ✔ अजर है ✔ अमर है ✔ चैतन्य तत्व है
ब्रह्माकुमारी परिभाषा
आत्मा एक चैतन्य बिंदु है जो ललाट के मध्य भकुटी के बीच निवास करती है।
मुरली पॉइंट — 30 मार्च 1969
“आत्मा कभी नष्ट नहीं होती।”
आत्मा और शरीर का संबंध
शरीर = रथ आत्मा = रथी
शरीर वस्त्र है आत्मा पहनने वाली है
उदाहरण
जैसे मोबाइल और सिम कार्ड — मोबाइल टूट सकता है लेकिन सिम नहीं मरता
वैसे ही — शरीर नष्ट होता है आत्मा नहीं मरती
कर्म क्षेत्र का रहस्य
यह दुनिया — कर्म क्षेत्र है जहाँ आत्मा कर्म करती है
परमधाम — अकर्म क्षेत्र है जहाँ कोई कर्म नहीं होता
मुरली पॉइंट — 21 जनवरी 1994
“जहाँ कर्म है वहाँ बंधन है, जहाँ अकर्म है वहाँ मुक्ति है।”
कर्म कौन करता है? फल कौन भोगता है?
कर्म — आत्मा करती है फल — आत्मा ही भोगती है
शरीर तो केवल साधन है स्वामी आत्मा है
कर्म बीज है फल अवश्य मिलता है
मुरली पॉइंट — 7 जुलाई 1996
“जैसा बीज बोया है, वैसा फल मिलेगा।”
आत्मा का जीवन काल बनाम शरीर का जीवन काल
शरीर का जीवन काल
60 वर्ष
70 वर्ष
80 वर्ष
100 वर्ष
एक जन्म = एक शरीर
आत्मा का जीवन काल
84 जन्म
अधिकतम 499 वर्ष
एक ही आत्मा अनेक शरीर लेती है
मुरली पॉइंट — 18 जनवरी 1969
“तुम आत्माएँ अविनाशी हो, शरीर विनाशी है।”
जन्म–मरण क्यों चलता है?
कर्मों के कारण
मुरली पॉइंट — 25 नवंबर 1984
“कर्मों की जंजीर आत्मा को जन्म–मरण में बाँधती है।”
ड्रामा का रहस्य
हर 5000 वर्ष बाद आत्मा वही पार्ट बजाती है ड्रामा कल्याणकारी है क्योंकि हर आत्मा को न्याय मिलता है
संगम युग — परिवर्तन का समय
यह अंतिम जन्म है अब कर्मातीत बनना है
राजयोग द्वारा कर्म बंधन समाप्त होते हैं
मुरली पॉइंट — 2 फरवरी 1998
“यह अंतिम जन्म है, अब कर्मातीत बनो।”
निष्कर्ष
✔ आत्मा अमर है ✔ शरीर विनाशी है ✔ कर्म क्षेत्र पर कर्मों का हिसाब चलता है ✔ संगम युग भाग्य बदलने का अवसर है
मुरली पॉइंट — 12 मार्च 2003
“अभी जो बनोगे वही कल्प–कल्प बनोगे।”
समापन संदेश
आत्मा अमर है शरीर नश्वर है
कर्म सुधरेंगे तो भविष्य सुधरेगा
राजयोग सीखिए कर्म सुधारिए अंतिम जन्म को श्रेष्ठ बनाइए
प्रश्न 1 : वास्तव में मरता कौन है — शरीर या आत्मा?
✔ उत्तर :
मरता है — शरीर जीवित रहती है — आत्मा
शरीर — मिट्टी का बना है पाँच तत्वों से बना है किराए का घर है
लेकिन आत्मा — ✔ अविनाशी है ✔ अजर है ✔ अमर है ✔ चैतन्य तत्व है
मुरली पॉइंट — 30 मार्च 1969 “आत्मा कभी नष्ट नहीं होती।”
प्रश्न 2 : आत्मा और शरीर का क्या संबंध है?
✔ उत्तर :
शरीर = रथ आत्मा = रथी
शरीर = वस्त्र आत्मा = पहनने वाली
उदाहरण
जैसे मोबाइल और सिम कार्ड — मोबाइल टूट सकता है लेकिन सिम नहीं मरता
वैसे ही — शरीर नष्ट होता है आत्मा नहीं मरती
प्रश्न 3 : आत्मा कहाँ रहती है?
✔ उत्तर (ब्रह्माकुमारी परिभाषा अनुसार) :
आत्मा एक चैतन्य बिंदु है जो ललाट के मध्य, भकुटी के बीच निवास करती है।
प्रश्न 4 : यह संसार क्या है?
✔ उत्तर :
यह संसार — कर्म क्षेत्र है जहाँ आत्मा कर्म करती है
और परमधाम — अकर्म क्षेत्र है जहाँ कोई कर्म नहीं होता
मुरली पॉइंट — 21 जनवरी 1994 “जहाँ कर्म है वहाँ बंधन है, जहाँ अकर्म है वहाँ मुक्ति है।”
प्रश्न 5 : कर्म कौन करता है और फल कौन भोगता है?
✔ उत्तर :
कर्म — आत्मा करती है फल — आत्मा ही भोगती है
शरीर तो केवल साधन है स्वामी आत्मा है
कर्म बीज है फल अवश्य मिलता है
मुरली पॉइंट — 7 जुलाई 1996 “जैसा बीज बोया है, वैसा फल मिलेगा।”
प्रश्न 6 : शरीर का जीवन काल कितना होता है?
✔ उत्तर :
शरीर का जीवन काल सीमित होता है —
60 वर्ष 70 वर्ष 80 वर्ष 100 वर्ष
एक जन्म = एक शरीर
प्रश्न 7 : आत्मा का जीवन काल कितना होता है?
✔ उत्तर :
आत्मा का जीवन काल — अनन्त है
आत्मा — ✔ न जन्म लेती है ✔ न मरती है ✔ नष्ट नहीं होती ✔ केवल शरीर बदलती है
जैसे — मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नए पहनता है वैसे आत्मा पुराने शरीर को छोड़ नया शरीर धारण करती है
प्रश्न 8 : मृत्यु वास्तव में क्या है?
✔ उत्तर :
मृत्यु आत्मा की नहीं होती मृत्यु केवल शरीर की होती है
आत्मा तो बस — एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर ग्रहण करती है
इसीलिए कहा जाता है — आत्मा अमर है, शरीर विनाशी है।
आत्म-चिंतन
अब स्वयं से पूछिए —
क्या मैं स्वयं को शरीर समझता हूँ या आत्मा? क्या मैं कर्म करते समय यह जानता हूँ कि फल मुझे ही भोगना है? क्या मैं अपने जीवन को कर्म क्षेत्र समझकर श्रेष्ठ कर्म कर रहा हूँ?
समापन संदेश
शरीर मिट्टी में मिल जाता है लेकिन आत्मा आगे की यात्रा पर निकल जाती है
शरीर नश्वर है आत्मा शाश्वत है
इसलिए — देह नहीं, आत्मा बनकर जियो कर्म नहीं, श्रेष्ठ कर्म करो और मृत्यु से नहीं, कर्मफल से डरो
आत्मा अमर है — शरीर नहीं।
Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक ज्ञान, गीता के सिद्धांतों एवं मुरली शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मा के वास्तविक स्वरूप, कर्म सिद्धांत और जीवन–मरण के रहस्य को स्पष्ट करना है। यह वीडियो किसी धार्मिक मत का विरोध नहीं करता बल्कि आत्मिक जागृति के लिए बनाया गया है।
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