(37) Shiv Baba says, do not remember Brahma.

S-B:-(37)शिव बाबा कहते हैं ब्रह्मा को याद नहीं करो।

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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शिव बाबा ब्रह्मा बाबा का रिश्ता
इसका हम 37वां विषय कर रहे हैं।

शिव बाबा कहते हैं —
ब्रह्मा को याद नहीं करो।

फिर कहते हैं —
बिना ब्रह्मा के तुम मुझे कैसे याद करोगे?

शिव बाबा कहते हैं ब्रह्मा को याद नहीं करो।
फिर कहते हैं बिना ब्रह्मा के मुझे कैसे याद करोगे?

याद किसे करें?
शिव को करें या ब्रह्मा को?

याद किसे करें?
बाबा को करेंगे भाई।

बाबा को याद करेंगे?
कौन से बाबा को — ब्रह्मा बाबा को या शिव बाबा को?

एक वाक्य, दो आदेश।
वाक्य एक है, आदेश दो हैं।
यह विरोध है या कोई गहरा रहस्य?

शिव बाबा कहते हैं — मुझे याद करो।
देहधारियों को याद नहीं करो।

फिर वही शिव बाबा कहते हैं —
बिना ब्रह्मा के तुम मुझे कैसे पहचानोगे?

क्योंकि मैं तो इन आँखों से दिखाई देता नहीं।
मैं हवा में समझाऊँगा नहीं।
समझाने के लिए मुझे शरीर चाहिए।

तो प्रश्न उठता है —
क्या यह विरोधाभास है?
या यह ईश्वरीय ज्ञान का सबसे गहरा रहस्य है?

आज का विषय —
शिव बाबा का ब्रह्मा से संबंध — याद का नहीं, पहचान का रहस्य

सबसे पहले स्पष्ट करें —
शिव बाबा किसे कहते हैं?

शिव बाबा निराकार परमात्मा है।
जन्म-मरण से न्यारा है।
सदा परमधाम निवासी है।

मुरली 23 मार्च 1968 —
“मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे।”

यहाँ याद का अर्थ है —
देह से न्यारे होकर आत्मा बनकर
परमात्मा को स्मृति में रखना
और परमात्मा की श्रीमत पर चलना।

यहाँ किसी देहधारी की याद नहीं।
यह व्यक्ति पूजा नहीं है।
यह देह-अभिमान की याद नहीं है।

मुरली 8 अक्टूबर 1981 —
देह और देह के संबंधों को भूलो, मुझे याद करो।

इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्मा बाबा को नकार दो।
इसका अर्थ है — देह-अभिमान छोड़ो।

उदाहरण —
पोस्टमैन चिट्ठी देता है, पर याद भेजने वाले को किया जाता है।
बिचोला माध्यम होता है।

फिर बाबा क्यों कहते हैं —
बिना ब्रह्मा के मुझे कैसे जानोगे?

ज्ञान का टर्निंग पॉइंट —
“मैं इस तन के माध्यम से तुमको पढ़ाता हूँ।”

मुरली 10 जनवरी 1969 —
“यह ब्रह्मा मेरा मुख है।”

शिव स्वयं निराकार है, बोल नहीं सकता।
इसलिए साकार माध्यम आवश्यक है।

निष्कर्ष —
याद शिव की, पहचान ब्रह्मा के द्वारा।

ब्रह्मा बाबा की भूमिका —
याद का विषय नहीं, साधन है।

ब्रह्मा बाबा पहला विद्यार्थी,
पहला शिक्षक
और माध्यम भी।

मुरली 2 फरवरी 1985 —
ब्रह्मा को याद करने से पद नहीं मिलता।

ब्रह्मा साधन है, शिव साध्य है।

सीढ़ी पर चढ़कर छत पर पहुँचते हैं,
पर छत पर पहुँचकर सीढ़ी को गले नहीं लगाते।

तो ब्रह्मा की आवश्यकता क्या है?

मुरली 21 जनवरी 1976 —
बाप को पहचानने के लिए बाप का परिचय चाहिए।

परिचय देने वाला —
ज्ञान देने वाला —
मार्ग दिखाने वाला।

उदाहरण —
सूरज दिखता नहीं, पर शीशे से किरणें आती हैं।

सूक्ष्म अंतर है —
स्मृति (याद) और सम्मान में।

स्मृति = योग संबंध और शक्ति का स्रोत
सम्मान = कृतज्ञता और निमित्त की पहचान

अव्यक्त मुरली 30 मार्च 1987 —
निमित्त को निमित्त समझो, सर्वशक्तिमान को सर्वशक्तिमान।

संगम युग की विशेषता —
शिव + ब्रह्मा = स्थापना

मुरली 18 जनवरी 1969 —
ब्रह्मा द्वारा स्थापना
विष्णु द्वारा पालना
शंकर द्वारा विनाश

यह त्रिमूर्ति का कार्य है, पूजा नहीं।

आज की परीक्षा —
सूक्ष्म देह-अभिमान से बचना।

अव्यक्त मुरली 15 जनवरी 1994 —
देह का आकर्षण योग की शक्ति को समाप्त कर देता है।

निष्कर्ष —
कोई विरोध नहीं, पूर्ण संतुलन।

सार —
शिव बाबा को याद करो
ब्रह्मा को माध्यम समझो
व्यक्ति पूजा नहीं
ज्ञान द्वारा पहचान

मुरली 12 जुलाई 2000 —
जिसने बाप को पहचाना, उसने सब कुछ पा लिया।

समापन —
यदि शिव की याद करो
पर पहचान उस ब्रह्मा की रखो
जिसके द्वारा शिव स्वयं पढ़ाते हैं।

यही संतुलन है।
यही सच्चा राजयोग है।