S.Y.(04)नई दुनिया में रिश्ते नहीं होंगे तो संबंध कैसे बनेंगे?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
अध्याय : नई दुनिया में संबंधों का दिव्य रहस्य
भूमिका : एक स्वर्गीय प्रश्न
हमने देखा कि नई दुनिया में हम पहले दिन आएंगे।
अब एक बहुत गहरा और स्वाभाविक प्रश्न खड़ा होता है—
जब नई दुनिया में हमारे कोई रिश्ते ही नहीं होंगे,
तो हमारे संबंध कैसे बनेंगे?
कौन हमें एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करेगा?
बाबा कहते हैं—
“संगम युग ही नई दुनिया की नीव है।”
अर्थात् जो कुछ वहां होगा, उसकी तैयारी यहीं हो रही है।
एक स्वर्ग का प्रश्न – स्वर्गीय प्रश्न
जब भी हम स्वर्ग या नई दुनिया की कल्पना करते हैं,
तो सबसे पहला प्रश्न यही आता है—
अगर वहां
माता-पिता नहीं,
भाई-बहन नहीं,
पति-पत्नी नहीं,
तो जीवन कैसे चलेगा?
आज की दुनिया में तो पूरा जीवन रिश्तों पर टिका है।
फिर बाबा क्यों कहते हैं—
“वहां कोई रिश्ता नहीं होगा”?
यही प्रश्न हमें ले जाता है—
आत्मा और संबंधों के वास्तविक आधार तक।
पुरानी दुनिया के रिश्ते – आवश्यकता से बंधन तक
पुरानी दुनिया के रिश्ते प्रेम से नहीं, आवश्यकता से जन्म लेते हैं।
मुरली – 30 नवंबर 1967
“यह सब देह के रिश्ते हैं, आत्मा के नहीं।”
आज के रिश्ते आधारित हैं—
-
देह पर
-
खून पर
-
आवश्यकता पर
-
अपेक्षा पर
जहां अपेक्षा है, वहीं रिश्ता है।
जहां अपेक्षा खत्म, वहां रिश्ता भी खत्म।
उदाहरण – बचपन और बुढ़ापा
बचपन
बच्चे को सुरक्षा चाहिए → मां-बाप चाहिए
जैसे ही बच्चा self-dependent बनता है, दूरी आ जाती है।
बुढ़ापा
सहारे की आवश्यकता → संतान
इसीलिए संतान पैदा की जाती है—
“बुढ़ापे में काम आएगी।”
स्पष्ट है—
रिश्ते आवश्यकता से जन्म लेते हैं,
शुद्ध प्रेम से नहीं।
नई दुनिया – आवश्यकता-मुक्त संसार
नई दुनिया आवश्यकता-मुक्त संसार है।
मुरली – 18 जनवरी 1969
“सतयुग में कोई किसी पर निर्भर नहीं करता।”
नई दुनिया में—
-
शरीर संपूर्ण
-
बुद्धि सतोप्रधान
-
प्रकृति सहयोगी
जब किसी चीज की कमी ही नहीं,
तो रिश्तों की मजबूरी भी नहीं।
सतयुग में माता-पिता क्यों नहीं?
सतयुग में माता-पिता होते ही नहीं।
वहां सभी आत्माएं परिपक्व हैं।
मुरली – 21 मार्च 1970
“सतयुग में आत्मा पूर्ण है।”
आत्मा अपना पालन-पोषण
संगम युग में कर चुकी होती है,
इसलिए वह self-dependent होती है।
देह-भान नहीं, तो देह का रिश्ता भी नहीं
मुरली – 7 फरवरी 1971
“जहां देह भान नहीं, वहां देह का रिश्ता भी नहीं।”
नई दुनिया में पहचान है—
“मैं आत्मा हूं।”
वहां—
-
देह का आकर्षण नहीं
-
आत्मिक आकर्षण है
-
रूहानी सहयोग है
संबंधों का सबसे सुंदर रहस्य
मुरली – 14 अप्रैल 1972
“सतयुग में संबंध संस्कार और कंपन से बनते हैं।”
हर आत्मा से वाइब्रेशन निकलते हैं।
उसी से पहचान होती है—
कौन प्रेम में है,
कौन शुद्धता में है।
बाबा का वाक्य
“आंख ना जाने, दिल पहचाने।”
मुरली – 9 सितंबर 1965
शुद्ध आकर्षण = रूहानी आकर्षण
देह का नहीं, आत्मा का।
नई दुनिया के संबंधों की विशेषताएं
-
बिना अधिकार
-
बिना अपेक्षा
-
बिना ईर्ष्या
-
बिना भय
जहां स्वार्थ नहीं,
वहां टूटन भी नहीं।
नई दुनिया में—
-
स्वार्थ शून्य
-
अधिकार शून्य
इसीलिए वहां संबंध अटूट हैं।
निष्कर्ष
संबंध नहीं बदलते,
संबंधों की शुद्धता बदलती है।
नई दुनिया में जीवन—
-
अकेला नहीं
-
लेकिन निर्भरता-मुक्त है
आत्मिक संबंध सच्चे और स्थाई हैं।
जिस्मानी संबंध अस्थायी हैं।
अंतिम संदेश
अगर आज—
-
रिश्ते बोझ लगते हैं
-
अपेक्षाएं दुख देती हैं
तो समझ लो—
हम नई दुनिया के पाठ को पहचानने लगे हैं।
अब इस पाठ में एक्सपर्ट बनकर
हमें नई दुनिया में जाना है।
प्रश्न 1: नई दुनिया में जब कोई रिश्ते ही नहीं होंगे, तो जीवन कैसे चलेगा?
उत्तर:
नई दुनिया आवश्यकता-मुक्त संसार है। वहां किसी को किसी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होती। जब निर्भरता नहीं, तो रिश्तों की मजबूरी भी नहीं। जीवन आत्मिक स्वतंत्रता और पूर्णता पर आधारित होता है।
प्रश्न 2: अगर माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी नहीं होंगे, तो समाज की व्यवस्था कैसे बनेगी?
उत्तर:
नई दुनिया की व्यवस्था देह के रिश्तों पर नहीं, बल्कि आत्मिक गुणों और शुद्ध संस्कारों पर आधारित होती है। वहां समाज नियम, प्रेम और सतोप्रधान संस्कारों से स्वयं संतुलित रहता है।
प्रश्न 3: बाबा क्यों कहते हैं कि “वहां कोई रिश्ता नहीं होगा”?
उत्तर:
क्योंकि वहां देह-भान नहीं होता।
मुरली – 30 नवंबर 1967
“यह सब देह के रिश्ते हैं, आत्मा के नहीं।”
जब आत्मिक स्थिति होती है, तो देह के रिश्तों की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
प्रश्न 4: पुरानी दुनिया के रिश्तों का वास्तविक आधार क्या है?
उत्तर:
पुरानी दुनिया के रिश्ते प्रेम से नहीं, आवश्यकता और अपेक्षा से जन्म लेते हैं—
देह, खून, सुरक्षा और स्वार्थ पर आधारित होते हैं।
जहां अपेक्षा खत्म, वहां रिश्ता भी खत्म।
प्रश्न 5: बचपन और बुढ़ापे का उदाहरण हमें क्या सिखाता है?
उत्तर:
बचपन में सुरक्षा के लिए माता-पिता चाहिए,
बुढ़ापे में सहारे के लिए संतान।
इससे स्पष्ट है कि रिश्ते आवश्यकता से बनते हैं, शुद्ध प्रेम से नहीं।
प्रश्न 6: नई दुनिया को “आवश्यकता-मुक्त संसार” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
मुरली – 18 जनवरी 1969
“सतयुग में कोई किसी पर निर्भर नहीं करता।”
वहां शरीर संपूर्ण, बुद्धि सतोप्रधान और प्रकृति सहयोगी होती है। इसलिए किसी चीज की कमी नहीं होती।
प्रश्न 7: सतयुग में माता-पिता क्यों नहीं होते?
उत्तर:
क्योंकि वहां सभी आत्माएं परिपक्व और पूर्ण होती हैं।
मुरली – 21 मार्च 1970
“सतयुग में आत्मा पूर्ण है।”
आत्मा अपना पालन-पोषण संगम युग में कर चुकी होती है।
प्रश्न 8: देह-भान और देह के रिश्तों का क्या संबंध है?
उत्तर:
मुरली – 7 फरवरी 1971
“जहां देह भान नहीं, वहां देह का रिश्ता भी नहीं।”
जब पहचान “मैं आत्मा हूं” होती है, तो देह आधारित आकर्षण स्वतः समाप्त हो जाता है।
प्रश्न 9: नई दुनिया में आत्माएं एक-दूसरे को कैसे पहचानती हैं?
उत्तर:
संस्कारों और वाइब्रेशन से।
मुरली – 14 अप्रैल 1972
“सतयुग में संबंध संस्कार और कंपन से बनते हैं।”
बाबा कहते हैं—
“आंख ना जाने, दिल पहचाने।”
प्रश्न 10: शुद्ध आकर्षण क्या होता है?
उत्तर:
मुरली – 9 सितंबर 1965
शुद्ध आकर्षण = रूहानी आकर्षण
यह आत्मा से आत्मा का आकर्षण है, देह का नहीं।
प्रश्न 11: नई दुनिया के संबंधों की मुख्य विशेषताएं क्या हैं?
उत्तर:
-
बिना अधिकार
-
बिना अपेक्षा
-
बिना ईर्ष्या
-
बिना भय
जहां स्वार्थ नहीं, वहां टूटन भी नहीं।
इसलिए नई दुनिया के संबंध अटूट होते हैं।
प्रश्न 12: क्या नई दुनिया में जीवन अकेला होता है?
उत्तर:
नहीं। जीवन अकेला नहीं, बल्कि निर्भरता-मुक्त होता है।
वहां आत्मिक सहयोग है, बंधन नहीं।
प्रश्न 13: वास्तविक परिवर्तन किसमें होता है—संबंधों में या हमारी दृष्टि में?
उत्तर:
संबंध नहीं बदलते,
संबंधों की शुद्धता बदलती है।
आत्मिक दृष्टि आते ही संबंध पवित्र और स्थाई बन जाते हैं।
प्रश्न 14: आज अगर रिश्ते बोझ लगने लगें, तो इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ है कि आत्मा अब नई दुनिया के पाठ को पहचानने लगी है।
पुरानी दुनिया की अपेक्षाएं अब आत्मा को स्वीकार नहीं हो रहीं।
अंतिम प्रश्न: हमें अभी क्या करना है?
उत्तर:
संगम युग में रहते हुए—
-
आत्मिक स्थिति बनानी है
-
निर्भरता छोड़नी है
-
शुद्ध संस्कार भरने हैं
ताकि इस पाठ में एक्सपर्ट बनकर
हम नई दुनिया में प्रवेश कर सकें।
Disclaimer
डिस्क्लेमर
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुरली ज्ञान, आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक अनुभवों पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, सामाजिक व्यवस्था या पारिवारिक संबंधों का खंडन करना नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल आत्मिक दृष्टि से नई दुनिया की व्यवस्था को समझाने के लिए है।
दर्शक इसे आध्यात्मिक चिंतन के रूप में ग्रहण करें।
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