S.Y.(05)देह भान नहीं होता। इसका वास्तविक अर्थ क्या है?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
देह भान नहीं होता – इसका वास्तविक और व्यवहारिक अर्थ
भूमिका
“देह भान नहीं होता” — सुनने में यह वाक्य बहुत सरल लगता है।
लेकिन जब आत्मा शरीर में है, शरीर से चलती-फिरती है, कर्म करती है —
तो प्रश्न उठता है:
-
क्या शरीर का ज्ञान नहीं रहेगा?
-
क्या खाना-पीना बंद हो जाएगा?
-
क्या यह केवल बड़े-बड़े योगियों की अवस्था है?
इस अध्याय में हम मुरली ज्ञान के आधार पर इसका व्यवहारिक, जीवन से जुड़ा अर्थ समझेंगे।
1. सबसे पहले गलतफहमी दूर करें
देह भान नहीं होने का अर्थ क्या नहीं है?
देह भान नहीं होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि—
-
शरीर दिखाई नहीं देगा
-
शरीर का उपयोग बंद हो जाएगा
-
आत्मा उड़ने लगेगी
-
कर्म नहीं होंगे
शरीर रहेगा, कर्म होंगे, जीवन चलेगा —
पर भ्रम नहीं रहेगा।
2. देह भान क्या है? (Murli Definition)
देह भान का अर्थ:
“मैं शरीर हूँ” — यह भावना।
यानी—
-
मेरा नाम
-
मेरी जाति
-
मेरी उम्र
-
मेरी बीमारी
-
मेरी सुंदरता
जब “मैं” शरीर से जुड़ जाता है,
वही देह भान है।
3. आत्म अभिमान क्या है?
आत्म अभिमान का अर्थ:
“मैं आत्मा हूँ, यह शरीर मेरा ड्रेस है।”
मुरली (25 नवम्बर 1965):
“अपने को आत्मा समझना ही आत्म-अभिमान है।”
शरीर का भान रहेगा,
लेकिन शरीर मैं नहीं हूँ।
उदाहरण
जैसे गाड़ी चलाते समय हम गाड़ी नहीं होते,
हम ड्राइवर होते हैं।
अगर ड्राइवर अपने को गाड़ी समझ ले —
वही देह भान है।
4. देह भान – दुख का मूल कारण क्यों?
📜 मुरली (7 फरवरी 1971):
“देह भान से ही राग-द्वेष पैदा होता है।”
-
किसी ने अपमान किया → दुख हुआ
-
किसी ने तारीफ की → सुख हुआ
प्रश्न:
दुख-सुख किसे हुआ?
उत्तर:
आत्मा को
लेकिन क्यों?
क्योंकि आत्मा ने अपने को शरीर समझ लिया।
5. सतयुग में “देह भान नहीं होता” – व्यवहारिक अर्थ
मुरली (18 जनवरी 1969):
“सतयुग में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित रहती है।”
इसका अर्थ:
-
सम्मान मिले या अपमान
-
लाभ हो या हानि
भीतर कोई हलचल नहीं होती
स्थिति समान रहती है
यही है
देह भान न होना।
6. क्या देह भान नहीं होने से जिम्मेदारियाँ खत्म हो जाती हैं?
नहीं।
मुरली (5 दिसंबर 1966):
“आत्म अभिमानी बनने से कर्म श्रेष्ठ हो जाते हैं।”
जिम्मेदारियाँ निभाई जाती हैं —
लेकिन अहंकार और लगाव के बिना।
उदाहरण
जैसे अभिनेता रोल निभाता है,
पर जानता है —
“यह मेरा असली स्वरूप नहीं।”
वैसे ही आत्मा
शरीर रूपी कॉस्ट्यूम में भूमिका निभाती है।
7. सतयुग में देह भान नहीं होता – इसका गहरा रहस्य
मुरली (21 मार्च 1970):
“सतयुग में देह के धर्म याद नहीं रहते।”
अर्थात—
-
जाति का अहंकार नहीं
-
लिंग का अहंकार नहीं
-
उम्र का भय नहीं
इसलिए—
-
तुलना नहीं
-
प्रतिस्पर्धा नहीं
-
ईर्ष्या नहीं
इसलिए उसे स्वर्ग कहा जाता है।
8. संगम युग में देह भान कैसे कम करें?
मुरली (14 अप्रैल 1972):
“अभ्यास से ही स्थिति पक्की होती है।”
तीन व्यवहारिक अभ्यास:
हर कर्म से पहले स्मृति
“मैं आत्मा हूँ”
बाप की याद
— इससे आत्मा को शक्ति मिलती है
ड्रामा अनुसार प्रतिक्रिया
— रिएक्शन कम, अवेयरनेस अधिक
9. देह भान कम होने के परिणाम
मुरली (9 सितम्बर 1965):
“जहाँ आत्म अभिमान है, वहाँ सहज शांति है।”
परिणाम:
-
क्रोध कम
-
भय समाप्त
-
आकर्षण शुद्ध
-
निर्णय स्पष्ट
10. निष्कर्ष
“देह भान नहीं होता” का अर्थ है —
-
बेहोश होना नहीं
-
शरीर का त्याग नहीं
-
संसार छोड़ना नहीं
बल्कि
शरीर में रहते हुए आत्मिक स्थिति।
अंतिम संदेश
यदि आज भी—
-
छोटी-छोटी बातों पर दुख हो जाता है
-
लोग हमारा मूड हिला देते हैं
तो समझिए, देह भान बाकी है।
और यदि—
-
हर स्थिति में शांति बनी रहती है
तो जान लीजिए,
आत्म अभिमान की शुरुआत हो चुकी है।
प्रश्न 1: देह भान नहीं होने का क्या अर्थ शरीर का ज्ञान समाप्त हो जाना है?
उत्तर:
नहीं। देह भान नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि शरीर दिखाई नहीं देगा या शरीर का उपयोग बंद हो जाएगा।
शरीर रहेगा, कर्म होंगे, जीवन चलेगा —
लेकिन भ्रम समाप्त हो जाएगा कि मैं शरीर हूँ।
प्रश्न 2: देह भान नहीं होने का अर्थ क्या-क्या नहीं है?
उत्तर:
देह भान नहीं होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि—
-
खाना-पीना बंद हो जाएगा
-
कर्म नहीं होंगे
-
आत्मा उड़ने लगेगी
-
संसार छोड़ना पड़ेगा
यह सब गलतफहमियाँ हैं।
प्रश्न 3: मुरली के अनुसार देह भान क्या है?
उत्तर:
देह भान का अर्थ है—
“मैं शरीर हूँ” यह भावना।
जब आत्मा अपने को—
नाम, जाति, उम्र, बीमारी, सुंदरता या पद से जोड़ लेती है,
तब वही देह भान कहलाता है।
प्रश्न 4: आत्म अभिमान किसे कहा जाता है?
उत्तर:
आत्म अभिमान का अर्थ है—
“मैं आत्मा हूँ, यह शरीर मेरा ड्रेस है।”
मुरली (25 नवम्बर 1965):
“अपने को आत्मा समझना ही आत्म-अभिमान है।”
प्रश्न 5: क्या आत्म अभिमानी बनने पर शरीर का भान समाप्त हो जाता है?
उत्तर:
नहीं।
शरीर का भान रहेगा,
लेकिन शरीर ‘मैं’ नहीं हूँ — यह स्पष्ट रहेगा।
जैसे—
ड्राइवर गाड़ी चलाता है,
पर वह अपने को गाड़ी नहीं समझता।
प्रश्न 6: देह भान दुख का मूल कारण क्यों है?
उत्तर:
मुरली (7 फरवरी 1971):
“देह भान से ही राग-द्वेष पैदा होता है।”
जब आत्मा अपने को शरीर समझ लेती है—
तो अपमान में दुख और
तारीफ में सुख महसूस करती है।
दुख-सुख आत्मा को होता है,
लेकिन कारण देह भान है।
प्रश्न 7: सतयुग में ‘देह भान नहीं होता’ इसका व्यवहारिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
मुरली (18 जनवरी 1969):
“सतयुग में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित रहती है।”
अर्थात—
सम्मान-अपमान, लाभ-हानि में
भीतर कोई हलचल नहीं होती।
स्थिति समान रहती है।
यही है देह भान न होना।
प्रश्न 8: क्या देह भान न होने से जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती हैं?
उत्तर:
नहीं।
मुरली (5 दिसंबर 1966):
“आत्म अभिमानी बनने से कर्म श्रेष्ठ हो जाते हैं।”
जिम्मेदारियाँ निभाई जाती हैं,
लेकिन अहंकार और लगाव के बिना।
प्रश्न 9: सतयुग में देह के धर्म याद नहीं रहते – इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
मुरली (21 मार्च 1970):
“सतयुग में देह के धर्म याद नहीं रहते।”
अर्थात—
-
जाति का अहंकार नहीं
-
लिंग का अहंकार नहीं
-
उम्र का भय नहीं
इसलिए वहाँ—
तुलना, प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या नहीं होती।
इसीलिए वह स्वर्ग कहलाता है।
प्रश्न 10: संगम युग में देह भान कैसे कम किया जा सकता है?
उत्तर:
मुरली (14 अप्रैल 1972):
“अभ्यास से ही स्थिति पक्की होती है।”
तीन सरल अभ्यास—
1️⃣ हर कर्म से पहले स्मृति: मैं आत्मा हूँ
2️⃣ बाप की याद: इससे आत्मा को शक्ति मिलती है
3️⃣ ड्रामा अनुसार प्रतिक्रिया: रिएक्शन कम, अवेयरनेस अधिक
प्रश्न 11: देह भान कम होने के क्या परिणाम दिखाई देते हैं?
उत्तर:
मुरली (9 सितम्बर 1965):
“जहाँ आत्म अभिमान है, वहाँ सहज शांति है।”
परिणाम—
-
क्रोध कम हो जाता है
-
भय समाप्त होता है
-
आकर्षण शुद्ध हो जाता है
-
निर्णय स्पष्ट हो जाते हैं
प्रश्न 12: देह भान नहीं होता – इसका सार क्या है?
उत्तर:
इसका अर्थ—
-
बेहोश होना नहीं
-
शरीर का त्याग नहीं
-
संसार छोड़ना नहीं
बल्कि
शरीर में रहते हुए आत्मिक स्थिति में स्थित रहना।
अंतिम संदेश (निष्कर्ष)
यदि आज भी—
छोटी-छोटी बातों पर मन हिल जाता है,
तो समझिए देह भान बाकी है।
और यदि—
हर परिस्थिति में शांति बनी रहती है,
तो जान लीजिए—
आत्म अभिमान की शुरुआत हो चुकी है।
Disclaimer
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुरली ज्ञान, आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं आत्मिक चिंतन पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, परंपरा, चिकित्सा या सामाजिक व्यवस्था का खंडन करना नहीं है।
यह विषय आत्मिक चेतना और जीवन परिवर्तन की दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
दर्शक इसे आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में ग्रहण करें।
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