S.Y.(08)नई दुनिया में राज सिंहासन कैसे बनेगा?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
संगम युग ही नई दुनिया की नींव
नई दुनिया में राज सिंहासन – पहले से बने होंगे या स्वतः बनेंगे?
भूमिका : विषय की पृष्ठभूमि
हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि राजा कैसे चुना जाता है।
अब प्रश्न उठता है —
राजा चुना गया,
पर वह बैठेगा कहाँ?
क्या नई दुनिया में सिंहासन पहले से बने होंगे
या बाद में बनाए जाएंगे?
यही प्रश्न हमें सतयुग की शासन व्यवस्था के गहरे रहस्य तक ले जाता है।
स्वर्ग की कल्पना और स्वाभाविक प्रश्न
जब भी हम स्वर्ग या नई दुनिया की कल्पना करते हैं,
तो मन में तुरंत चित्र आता है —
-
भव्य महल
-
हीरे-जवाहरात
-
स्वर्ण सिंहासन
लेकिन जैसे ही यह ज्ञान आता है कि
नई दुनिया के पहले दिन सभी आत्माएँ अजनबी होंगी,
तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है —
-
राजा कहाँ बैठेगा?
-
सिंहासन पहले से होंगे या बाद में बनेंगे?
आज की दुनिया में सिंहासन कैसे बनते हैं? (उदाहरण सहित)
मुरली का स्पष्ट ज्ञान है — यह रावण की दुनिया है।
यहाँ व्यवस्था ऐसी है —
-
पहले सत्ता चाहिए
-
फिर महल बनते हैं
-
फिर सिंहासन बनते हैं
-
फिर सुरक्षा, सेना और कानून की जरूरत पड़ती है
उदाहरण:
आज की दुनिया में कोई भी शासक पहले सत्ता प्राप्त करता है,
फिर अपने लिए महल, कुर्सी और व्यवस्था बनाता है।
यहाँ सिंहासन सत्ता का कारण बनता है।
नई दुनिया में सत्ता कारण नहीं, परिणाम है
सतयुग में व्यवस्था बिल्कुल उलटी है।
यहाँ —
-
सत्ता कारण नहीं होती
-
सत्ता पुरुषार्थ का परिणाम होती है
जो संगम युग में आत्मिक मेहनत की,
वही सतयुग में फल के रूप में प्राप्त होती है।
मुरली प्रमाण
मुरली – 18 जनवरी 1969
“सतयुग में राज्य स्वतः ही प्राप्त होता है।”
इसलिए वहाँ —
-
न चुनाव होते हैं
-
न युद्ध
-
न ताजपोशी
सिंहासन आत्मिक स्थिति को आकर्षित करता है
नई दुनिया में —
-
कोई आपको अधिकार नहीं देता
-
आपकी आत्मिक स्थिति स्वयं सिंहासन को आकर्षित करती है
सत्ता के कारण सिंहासन नहीं मिलता
आत्मिक स्थिति के कारण सिंहासन मिलता है
सिंहासन का वास्तविक अर्थ
-
सम्मान
-
अधिकार
-
सबके दिलों पर राज्य
सब मन-बुद्धि-संस्कार से स्वीकार करें —
“आप ही हमारे राजा हो।”
वास्तविक सिंहासन क्या है?
वास्तविक सिंहासन —
-
स्वर्ण की कुर्सी नहीं
-
बल्कि कर्मेन्द्रियों पर राज्य है
जो आत्मा —
-
क्रोध से ऊपर
-
लोभ से ऊपर
-
मोह से ऊपर
वही सच्चा राजा है।
बाहरी सिंहासन, भीतरी सिंहासन का प्रतिबिंब है।
क्या भौतिक सिंहासन पहले से बने होंगे?
मुरली प्रमाण
मुरली – 5 दिसंबर 1966
“जो सृष्टि बनने वाली है, उसकी व्यवस्था पहले से ही तैयार होती है — संगम पर।”
नई दुनिया के लिए —
-
प्रकृति शुद्ध होगी
-
धरती, धातु, पत्थर, हीरे-जवाहरात शुद्धतम होंगे
-
महल, भवन, सिंहासन ड्रामा अनुसार स्वतः प्रकट होंगे
‘स्वतः बनने’ का आध्यात्मिक अर्थ
मुरली प्रमाण
मुरली – 21 मार्च 1970
“सतयुग में सब कुछ सहज प्राप्ति से मिलता है।”
आज —
-
घर बनाने में वर्षों लगते हैं
सतयुग में —
-
प्रकृति सहयोगी होती है
-
आवश्यकता अनुसार सब सहज मिलता है
राजा पहले या सिंहासन?
मुरली प्रमाण
मुरली – 12 अगस्त 1968
“पहले आत्मा बनती है, फिर पद मिलता है।”
राजा आत्मा —
-
संगम युग में तैयार होती है
-
योग, पवित्रता और सेवा से
सिंहासन आत्मा के अनुसार होता है
आत्मा सिंहासन के अनुसार नहीं
क्या सभी को सिंहासन मिलेगा?
हर आत्मा को —
-
अपना-अपना पद मिलता है
-
कोई छोटा-बड़ा नहीं
-
पर पद में अंतर है — दिल से
उदाहरण:
जैसे शरीर में —
-
सिर, हाथ, हृदय — सब आवश्यक हैं
वैसे ही —
-
नई दुनिया में हर आत्मा का अपना स्थान है
यह व्यवस्था कब तय होती है?
संगम युग पर।
मुरली प्रमाण
“जो संगम पर पुरुषार्थ करता है, वही राज्य पद पाता है।”
आज सिंहासन बन रहे हैं —
-
पत्थर से नहीं
-
संस्कारों से
निष्कर्ष (Final Message)
नई दुनिया में —
-
न पहले सिंहासन
-
न पहले राजा
जैसी आत्मिक स्थिति — वैसी प्राप्ति
आत्मा जैसी — सिंहासन वैसा
आज यदि हमें —
-
अधिकार चाहिए
-
सम्मान चाहिए
तो कुर्सी मत खोजो,
अपनी स्थिति बनाओ।
क्योंकि —
स्वर्ग में सिंहासन खरीदे नहीं जाते,
योग से प्रकट होते हैं।प्रश्न 1: इस विषय पर चर्चा की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
हम पहले यह समझ चुके हैं कि राजा कैसे चुना जाता है।
अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है —राजा तो चुना गया,
लेकिन वह बैठेगा कहाँ?क्या नई दुनिया में सिंहासन पहले से बने होंगे
या बाद में बनाए जाएंगे?यही प्रश्न हमें सतयुग की शासन व्यवस्था के गहरे रहस्य तक ले जाता है।
स्वर्ग की कल्पना और स्वाभाविक प्रश्न
प्रश्न 2: स्वर्ग की कल्पना करते ही मन में क्या चित्र आता है?
उत्तर:
जब भी हम स्वर्ग या नई दुनिया की कल्पना करते हैं,
तो मन में तुरंत यह दृश्य उभरता है —
भव्य महल
हीरे-जवाहरात
स्वर्ण सिंहासन
प्रश्न 3: फिर भ्रम या प्रश्न क्यों उत्पन्न होता है?
उत्तर:
जैसे ही यह ज्ञान आता है कि
नई दुनिया के पहले दिन सभी आत्माएँ अजनबी होंगी,
तो मन में प्रश्न उठता है —राजा कहाँ बैठेगा?
सिंहासन पहले से होंगे या बाद में बनेंगे?
आज की दुनिया में सिंहासन कैसे बनते हैं? (उदाहरण सहित)
प्रश्न 4: आज की दुनिया में सत्ता और सिंहासन का क्रम क्या है?
उत्तर:
मुरली का स्पष्ट ज्ञान है — यह रावण की दुनिया है।
यहाँ व्यवस्था इस प्रकार चलती है —
पहले सत्ता प्राप्त की जाती है
फिर महल बनाए जाते हैं
फिर सिंहासन बनते हैं
फिर सुरक्षा, सेना और कानून की आवश्यकता पड़ती है
उदाहरण:
आज की दुनिया में कोई भी शासक पहले सत्ता लेता है,
फिर अपने लिए महल, कुर्सी और व्यवस्था बनाता है।यहाँ सिंहासन सत्ता का कारण बनता है।
नई दुनिया में सत्ता कारण नहीं, परिणाम है
प्रश्न 5: सतयुग में सत्ता की व्यवस्था कैसी होती है?
उत्तर:
सतयुग में व्यवस्था बिल्कुल उलटी है —
सत्ता कारण नहीं होती
सत्ता पुरुषार्थ का परिणाम होती है
जो आत्मा संगम युग में आत्मिक मेहनत करती है,
वही सतयुग में उसका फल पाती है।
प्रश्न 6: इसका मुरली प्रमाण क्या है?
उत्तर (मुरली – 18 जनवरी 1969):
“सतयुग में राज्य स्वतः ही प्राप्त होता है।”
इसलिए वहाँ —
न चुनाव होते हैं
न युद्ध
न ताजपोशी
सिंहासन आत्मिक स्थिति को आकर्षित करता है
प्रश्न 7: नई दुनिया में अधिकार कैसे मिलता है?
उत्तर:
नई दुनिया में —
कोई आपको अधिकार नहीं देता
आपकी आत्मिक स्थिति स्वयं सिंहासन को आकर्षित करती है
सत्ता के कारण सिंहासन नहीं मिलता,
आत्मिक स्थिति के कारण सिंहासन मिलता है।
प्रश्न 8: सिंहासन का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
सिंहासन का अर्थ है —
सम्मान
अधिकार
सबके दिलों पर राज्य
जब सब मन-बुद्धि-संस्कार से स्वीकार करें —
“आप ही हमारे राजा हो।”यही सबसे बड़ा सिंहासन है।
वास्तविक सिंहासन क्या है?
प्रश्न 9: सच्चा सिंहासन कौन-सा है?
उत्तर:
वास्तविक सिंहासन —
स्वर्ण की कुर्सी नहीं
बल्कि कर्मेन्द्रियों पर राज्य है
जो आत्मा —
क्रोध से ऊपर
लोभ से ऊपर
मोह से ऊपर
वही सच्चा राजा है।
बाहरी सिंहासन, भीतरी सिंहासन का प्रतिबिंब है।
क्या भौतिक सिंहासन पहले से बने होंगे?
प्रश्न 10: क्या नई दुनिया में भौतिक सिंहासन पहले से तैयार होंगे?
उत्तर (मुरली – 5 दिसंबर 1966):
“जो सृष्टि बनने वाली है, उसकी व्यवस्था पहले से ही तैयार होती है — संगम पर।”
नई दुनिया के लिए —
प्रकृति शुद्ध होगी
धरती, धातु, पत्थर, हीरे-जवाहरात शुद्धतम होंगे
महल, भवन, सिंहासन ड्रामा अनुसार स्वतः प्रकट होंगे
‘स्वतः बनने’ का आध्यात्मिक अर्थ
प्रश्न 11: ‘स्वतः बनने’ का क्या अर्थ है?
उत्तर (मुरली – 21 मार्च 1970):
“सतयुग में सब कुछ सहज प्राप्ति से मिलता है।”
आज —
घर बनाने में वर्षों लगते हैं
सतयुग में —
प्रकृति सहयोगी होती है
आवश्यकता अनुसार सब सहज मिलता है
राजा पहले या सिंहासन?
प्रश्न 12: पहले राजा बनता है या सिंहासन?
उत्तर (मुरली – 12 अगस्त 1968):
“पहले आत्मा बनती है, फिर पद मिलता है।”
राजा आत्मा —
संगम युग में तैयार होती है
योग, पवित्रता और सेवा से
सिंहासन आत्मा के अनुसार होता है,
आत्मा सिंहासन के अनुसार नहीं।
क्या सभी को सिंहासन मिलेगा?
प्रश्न 13: क्या नई दुनिया में सभी को सिंहासन मिलता है?
उत्तर:
हर आत्मा को —
अपना-अपना पद मिलता है
कोई छोटा-बड़ा नहीं
पर पद में अंतर है — दिल से
उदाहरण:
जैसे शरीर में —
सिर, हाथ, हृदय — सब आवश्यक हैं
वैसे ही —
नई दुनिया में हर आत्मा का अपना स्थान है
यह व्यवस्था कब तय होती है?
प्रश्न 14: राज्य पद की व्यवस्था कब निश्चित होती है?
उत्तर:
संगम युग पर।मुरली प्रमाण:
“जो संगम पर पुरुषार्थ करता है, वही राज्य पद पाता है।”
आज सिंहासन बन रहे हैं —
पत्थर से नहीं
संस्कारों से
निष्कर्ष (Final Message)
प्रश्न 15: इस पूरे ज्ञान का सार क्या है?
उत्तर:
नई दुनिया में —
न पहले सिंहासन
न पहले राजा
जैसी आत्मिक स्थिति — वैसी प्राप्ति
आत्मा जैसी — सिंहासन वैसाआज यदि हमें —
अधिकार चाहिए
सम्मान चाहिए
तो कुर्सी मत खोजो,
अपनी स्थिति बनाओ।क्योंकि —
स्वर्ग में सिंहासन खरीदे नहीं जाते,
योग से प्रकट होते हैं।प्रश्न 1: इस विषय पर चर्चा की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
हम पहले यह समझ चुके हैं कि राजा कैसे चुना जाता है।
अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है —राजा तो चुना गया,
लेकिन वह बैठेगा कहाँ?क्या नई दुनिया में सिंहासन पहले से बने होंगे
या बाद में बनाए जाएंगे?यही प्रश्न हमें सतयुग की शासन व्यवस्था के गहरे रहस्य तक ले जाता है।
स्वर्ग की कल्पना और स्वाभाविक प्रश्न
प्रश्न 2: स्वर्ग की कल्पना करते ही मन में क्या चित्र आता है?
उत्तर:
जब भी हम स्वर्ग या नई दुनिया की कल्पना करते हैं,
तो मन में तुरंत यह दृश्य उभरता है —
भव्य महल
हीरे-जवाहरात
स्वर्ण सिंहासन
प्रश्न 3: फिर भ्रम या प्रश्न क्यों उत्पन्न होता है?
उत्तर:
जैसे ही यह ज्ञान आता है कि
नई दुनिया के पहले दिन सभी आत्माएँ अजनबी होंगी,
तो मन में प्रश्न उठता है —राजा कहाँ बैठेगा?
सिंहासन पहले से होंगे या बाद में बनेंगे?
आज की दुनिया में सिंहासन कैसे बनते हैं? (उदाहरण सहित)
प्रश्न 4: आज की दुनिया में सत्ता और सिंहासन का क्रम क्या है?
उत्तर:
मुरली का स्पष्ट ज्ञान है — यह रावण की दुनिया है।
यहाँ व्यवस्था इस प्रकार चलती है —
पहले सत्ता प्राप्त की जाती है
फिर महल बनाए जाते हैं
फिर सिंहासन बनते हैं
फिर सुरक्षा, सेना और कानून की आवश्यकता पड़ती है
उदाहरण:
आज की दुनिया में कोई भी शासक पहले सत्ता लेता है,
फिर अपने लिए महल, कुर्सी और व्यवस्था बनाता है।यहाँ सिंहासन सत्ता का कारण बनता है।
नई दुनिया में सत्ता कारण नहीं, परिणाम है
प्रश्न 5: सतयुग में सत्ता की व्यवस्था कैसी होती है?
उत्तर:
सतयुग में व्यवस्था बिल्कुल उलटी है —
सत्ता कारण नहीं होती
सत्ता पुरुषार्थ का परिणाम होती है
जो आत्मा संगम युग में आत्मिक मेहनत करती है,
वही सतयुग में उसका फल पाती है।
प्रश्न 6: इसका मुरली प्रमाण क्या है?
उत्तर (मुरली – 18 जनवरी 1969):
“सतयुग में राज्य स्वतः ही प्राप्त होता है।”
इसलिए वहाँ —
न चुनाव होते हैं
न युद्ध
न ताजपोशी
सिंहासन आत्मिक स्थिति को आकर्षित करता है
प्रश्न 7: नई दुनिया में अधिकार कैसे मिलता है?
उत्तर:
नई दुनिया में —
कोई आपको अधिकार नहीं देता
आपकी आत्मिक स्थिति स्वयं सिंहासन को आकर्षित करती है
सत्ता के कारण सिंहासन नहीं मिलता,
आत्मिक स्थिति के कारण सिंहासन मिलता है।
प्रश्न 8: सिंहासन का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
सिंहासन का अर्थ है —
सम्मान
अधिकार
सबके दिलों पर राज्य
जब सब मन-बुद्धि-संस्कार से स्वीकार करें —
“आप ही हमारे राजा हो।”यही सबसे बड़ा सिंहासन है।
वास्तविक सिंहासन क्या है?
प्रश्न 9: सच्चा सिंहासन कौन-सा है?
उत्तर:
वास्तविक सिंहासन —
स्वर्ण की कुर्सी नहीं
बल्कि कर्मेन्द्रियों पर राज्य है
जो आत्मा —
क्रोध से ऊपर
लोभ से ऊपर
मोह से ऊपर
वही सच्चा राजा है।
बाहरी सिंहासन, भीतरी सिंहासन का प्रतिबिंब है।
क्या भौतिक सिंहासन पहले से बने होंगे?
प्रश्न 10: क्या नई दुनिया में भौतिक सिंहासन पहले से तैयार होंगे?
उत्तर (मुरली – 5 दिसंबर 1966):
“जो सृष्टि बनने वाली है, उसकी व्यवस्था पहले से ही तैयार होती है — संगम पर।”
नई दुनिया के लिए —
प्रकृति शुद्ध होगी
धरती, धातु, पत्थर, हीरे-जवाहरात शुद्धतम होंगे
महल, भवन, सिंहासन ड्रामा अनुसार स्वतः प्रकट होंगे
‘स्वतः बनने’ का आध्यात्मिक अर्थ
प्रश्न 11: ‘स्वतः बनने’ का क्या अर्थ है?
उत्तर (मुरली – 21 मार्च 1970):
“सतयुग में सब कुछ सहज प्राप्ति से मिलता है।”
आज —
घर बनाने में वर्षों लगते हैं
सतयुग में —
प्रकृति सहयोगी होती है
आवश्यकता अनुसार सब सहज मिलता है
राजा पहले या सिंहासन?
प्रश्न 12: पहले राजा बनता है या सिंहासन?
उत्तर (मुरली – 12 अगस्त 1968):
“पहले आत्मा बनती है, फिर पद मिलता है।”
राजा आत्मा —
संगम युग में तैयार होती है
योग, पवित्रता और सेवा से
सिंहासन आत्मा के अनुसार होता है,
आत्मा सिंहासन के अनुसार नहीं।
क्या सभी को सिंहासन मिलेगा?
प्रश्न 13: क्या नई दुनिया में सभी को सिंहासन मिलता है?
उत्तर:
हर आत्मा को —
अपना-अपना पद मिलता है
कोई छोटा-बड़ा नहीं
पर पद में अंतर है — दिल से
उदाहरण:
जैसे शरीर में —
सिर, हाथ, हृदय — सब आवश्यक हैं
वैसे ही —
नई दुनिया में हर आत्मा का अपना स्थान है
यह व्यवस्था कब तय होती है?
प्रश्न 14: राज्य पद की व्यवस्था कब निश्चित होती है?
उत्तर:
संगम युग पर।मुरली प्रमाण:
“जो संगम पर पुरुषार्थ करता है, वही राज्य पद पाता है।”
आज सिंहासन बन रहे हैं —
पत्थर से नहीं
संस्कारों से
निष्कर्ष (Final Message)
प्रश्न 15: इस पूरे ज्ञान का सार क्या है?
उत्तर:
नई दुनिया में —
न पहले सिंहासन
न पहले राजा
जैसी आत्मिक स्थिति — वैसी प्राप्ति
आत्मा जैसी — सिंहासन वैसाआज यदि हमें —
अधिकार चाहिए
सम्मान चाहिए
तो कुर्सी मत खोजो,
अपनी स्थिति बनाओ।क्योंकि —
स्वर्ग में सिंहासन खरीदे नहीं जाते,
योग से प्रकट होते हैं।Disclaimer (YouTube के लिए)
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरलियों, शिक्षाओं एवं आध्यात्मिक चिंतन पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक व्यवस्था, ऐतिहासिक राजशाही या वर्तमान शासन प्रणाली की तुलना, समर्थन या विरोध करना नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार नई दुनिया (सतयुग) की आत्मिक शासन व्यवस्था को स्पष्ट करने हेतु है।
दर्शक इसे केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण करें।नई दुनिया, सतयुग, संगम युग, राज सिंहासन, स्वर्ग की व्यवस्था, आत्मिक राज्य, ब्रह्माकुमारी ज्ञान, मुरली ज्ञान, राजा कैसे बनता है, आत्मिक स्थिति, कर्मेन्द्रिय जीत, योग से प्राप्ति, स्वर्ग का रहस्य, सतयुगी शासन, आध्यात्मिक रहस्य, नई सृष्टि, शिवबाबा ज्ञान, ईश्वरीय विश्वविद्यालय, BK spirituality, spiritual gyan,New world, Satyayuga, Confluence Age, royal throne, system of heaven, spiritual kingdom, Brahmakumari knowledge, Murli knowledge, how one becomes a king, spiritual state, victory over the sense organs, attainment through yoga, secret of heaven, Satyayuga rule, spiritual secret, new creation, Shivbaba knowledge, Divine University, BK spirituality, spiritual gyan,

