S.Y.(22)भक्ति का भगवान संगम युग में शिक्षक कैसे?
Creaate YouTube वीडियो & disclamer, डिस्क्रिप्शन और हैशटैग्स “संगम युग ही
नई दुनिया की नीव।
आज हम इसका 22वां विषय कर रहे हैं।
भक्ति का भगवान
संगम युग में शिक्षक कैसे?
जिसे हम भक्ति में भगवान कहते आए
वही अब संगम पर आकर
हमारा शिक्षक बना है कैसे? हमारा शिक्षक
बना है तो कैसे?
भक्ति का भगवान संगम युग में शिक्षक कैसे
बनते हैं?
पुकार से पढ़ाई तक की दिव्य यात्रा — हम उस
भगवान को पुकारते आए। पुकारते आए। अब
परमात्मा
आकर पढ़ा रहे हैं। यह दिव्य यात्रा के
बारे में हमको जानना है।
आवश्यक सूचना है कि यह प्रस्तुति
प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय
विश्वविद्यालय के किसी मूल्य विज्ञान,
मुरली ज्ञान और आध्यात्मिक अध्ययन एवं
आत्मिक चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य
किसी धर्म परंपरा या भक्ति भावना का खंडन
करना नहीं। यह वीडियो केवल भक्ति मार्ग और
ज्ञान मार्ग के आध्यात्मिक अंतर तथा संगम
युग में परमात्मा के शिक्षक भूमिका को
स्पष्ट करने हेतु है। दर्शक इसे
आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण करें।
एक गहरा प्रश्न जो हर भक्त के मन में उठता
है। हर भक्त के मन में उठता है। सदियों से
मनुष्य भगवान को पुकारता आया है। पुकारना
यह सिद्ध करता है कि जरूर वो हमारी पुकार
सुनकर आता होगा। आया होगा। तभी तो उसे
पुकारते हैं और फिर भगवान आकर करेगा क्या
यह नहीं जानते थे। अपनी इच्छा जरूर व्यक्त
करते थे — भगवान हमें अकल दो। भगवान हमें
बुद्धि दो। भगवान हमें समझ दो। परंतु वह
हमें समझ कैसे देंगे? यह हम नहीं जानते
थे।
अब हमें इस बात का राज समझना है कि आखिर
परमात्मा आकर हमें वह समझ, वो ज्ञान, वो
बुद्धि, वो अकल, वो जीवन शैली, वो तरीका
कब और कैसे समझाते हैं।
हे प्रभु, हे ईश्वर, हे अल्लाह, हे गॉड —
हमने उनको पुकारा। अलग-अलग अपनी अपनी भाषा
में अपने अपने तरीके से पुकारा तो हमने एक
ईश्वर को ही
भक्ति मार्ग में भगवान को हमने
सर्वशक्तिमान
मान लिया कि भगवान क्या है? सर्वशक्तिमान
है। पूजनीय है। हमें उसकी पूजा करनी
चाहिए। और हम यह समझते थे कि वह बहुत दूर
बैठा हुआ है। बहुत दूर बैठा हुआ है।
इसलिए हम कहते हैं — आजा रे इस धरती पर, छोड़
भी दे आकाश सिंहासन।
लेकिन संगम युग में कहा जाता है कि वही
भगवान
वही भगवान अब टीचर बनकर पढ़ा रहे हैं। वही
भगवान अब टीचर बनकर पढ़ा रहे हैं।
भगवान शिक्षक कैसे बन सकते हैं? भगवान
शिक्षक कैसे बन सकते हैं? प्रश्न उठ गया
यह कि हमने कहा परमात्मा ने आकर कहा कि
भगवान आकर पढ़ा रहा है। यह प्रश्न इस समय
आम दुनिया का आता है कि वो फिर टीचर कैसे
बन गया? हम तो उसको बुला रहे थे। फिर वो
टीचर आकर हमें क्यों नहीं पढ़ा रहा?
ब्रह्मा कुमारीज को क्यों पढ़ा रहा है?
ऐसे प्रश्न उठने शुरू हुए। भगवान शिक्षक
कैसे बन सकता है? यही आज का हमारा गहन
चिंतन है।
भक्ति मार्ग का भगवान
पुकार का विषय
भक्ति मार्ग का भगवान वो क्या था? पुकार
का विषय। हम सब उसको पुकार रहे थे — चाहे
मंदिर में, मस्जिद में, गुरुद्वारे में,
चर्च में, किसी भी धार्मिक संस्थान में
सभी बुला उसी गॉड को रहे थे।
मुरली है 30 नवंबर 1967 —
भक्ति में मनुष्य भगवान को पुकारते हैं।
भक्ति मार्ग की विशेषताएं।
नंबर एक — भक्ति में क्या होती है? श्रद्धा।
श्रद्धा नहीं है तो मंदिर में जाएगा ही
नहीं। किसी भी धार्मिक संस्थान में, किसी
गुरु के पास, किसी सत्संग में वह जाता है
तो क्या है? उसकी उसमें श्रद्धा है।
समर्पण —
अपने आप में पूरी तरह समर्पित हो जाना कि
मेरा जो कुछ भी है वो यही है।
प्रेम — प्रेम होता है तभी तो उसके लिए
जाते हैं। यदि प्रेम नहीं हो तो वहां जाए
ही क्यों?
प्रतीक्षा —
वहां पर कि कब पता नहीं भगवान दर्शन देंगे,
कब हमारी सुनेंगे, कब करेंगे।
श्रद्धा, समर्पण, प्रेम और प्रतीक्षा —
यह चार बातें भक्ति मार्ग में होती हैं।
भक्त क्या करते हैं? याद करता है। नाम
बैठकर याद करता है। भजन करता है, प्रार्थना
करता है — मेरा यह काम कर दो, मेरा वो काम
कर दो।
लेकिन उत्तर तुरंत नहीं मिलता।
भक्ति मार्ग में उत्तर तुरंत नहीं मिलता।
वेट करते रहो।
सारा जीवन बीत जाए।
भक्ति बराबर संवाद की शुरुआत।
भक्ति के अंदर एक बात होती है कि हमारा
परमात्मा के साथ संवाद शुरू हो जाता है।
हम मूर्ति के आगे जाकर उसके साथ संवाद
करते हैं। अपनी बात उसको कहते हैं।
हमारा वन साइडेड संवाद शुरू हो जाता है।
भक्ति क्यों शुरू होती है?
मुरली है 25-1-1965 —
जब आत्मा दुखी होती है तब भक्ति शुरू
होती है।
दुख।
असुरक्षा।
मृत्यु का भय।
संबंध टूटना।
आत्मा खोजती है स्थाई सहारा। इसलिए
भगवान को पुकारती है।
भक्ति का चरम — प्रतीक्षा।
भक्त प्रतीक्षा करता है कि भगवान आए।
आकर हमारी समस्या का समाधान करें।
हर धर्म में मसीहा की प्रतीक्षा, अवतार की
प्रतीक्षा — जैसे आज दुनिया में कल्कि की
भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यह प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं।
यह संगम युग की तैयारी है।
संगम युग — पुकार का उत्तर।
जो भक्ति में हमने परमात्मा को पुकारा
उसका जवाब है संगम युग।
मुरली है 18 जनवरी 1969 —
मैं भक्तों की पुकार सुनकर आता हूं।
परमात्मा अपने समय पर आते हैं।
संगम पर आते हैं और आकर पढ़ाते हैं।
हमारी समस्याओं का निराकरण करते हैं।
भक्ति का उत्तर — ज्ञान की शुरुआत।
मतलब भक्ति का अंत और ज्ञान की शुरुआत।
भगवान शिक्षक क्यों बनते हैं?
मुरली 5 दिसंबर 1966 —
मैं आता ही पढ़ाने के लिए हूं।
क्योंकि समस्या दुख नहीं, अज्ञान है।
ज्ञान का अभाव होना ही हम सबके दुख का
कारण है।
इसलिए समाधान चमत्कार नहीं — शिक्षा है।
बाबा कोई चमत्कार नहीं दिखाते हैं।
भक्ति बनाम ज्ञान।
मुरली 9 सितंबर 1965 —
भक्ति में याद।
ज्ञान में पढ़ाई।
भक्ति में पुकार।
ज्ञान में उत्तर।
भक्ति में श्रद्धा।
ज्ञान में समझ।
भक्ति में दूरी।
ज्ञान में निकटता।
भक्ति में प्रतीक्षा।
ज्ञान में अनुभव।
आज शिक्षक के रूप में भगवान क्या सिखाते
हैं?
मुरली 21 मार्च 1970 —
मैं तुम्हें आत्मा और परमात्मा का ज्ञान
देता हूं।
मुख्य पाठ —
आत्मा का स्वरूप।
परमात्मा का स्वरूप।
ड्रामा।
कर्म सिद्धांत।
यह जीवन परिवर्तनकारी शिक्षा है।
भगवान चमत्कार क्यों नहीं करते?
मुरली 2 अक्टूबर 1967 —
ज्ञान से परिवर्तन होता है।
चमत्कार अस्थाई समाधान है।
ज्ञान स्थाई परिवर्तन है।
इसलिए भगवान शिक्षक है, जादूगर नहीं।
शिक्षक से सतगुरु बनने की यात्रा।
मुरली 14 अप्रैल 1972 —
मैं तुम्हें घर भी ले जाता हूं।
शिक्षक ज्ञान देता है।
सतगुरु मंजिल तक ले जाता है।
भगवान दोनों भूमिका निभाते हैं —
पढ़ाने की भी और मंजिल तक ले जाने की भी।
बाप, टीचर, सतगुरु —
तीनों रूप एक साथ।
मुरली 18 जनवरी 1969 —
मैं बाप भी हूं, टीचर भी और सतगुरु भी हूं।
बाप के रूप में प्रेम।
टीचर के रूप में ज्ञान।
सतगुरु के रूप में मार्गदर्शन।
निष्कर्ष —
भक्ति से ज्ञान तक की यात्रा।
भक्ति गलत नहीं,
परंतु भक्ति अधूरी है।
मुरली 30 नवंबर 1967 —
भक्ति का फल ज्ञान है।
पुकार।
आगमन।
शिक्षा।
मुक्ति।
अंतिम संदेश —
यदि आप भगवान को याद करते हैं
तो जान लें — यह भक्ति है।
और यदि आप भगवान से सीख रहे हैं
तो समझ लें — यह संगम युग का अनुभव है।
यदि आज आप भगवान को याद करते हैं
तो भगत हैं।
यदि आप भगवान से सीख रहे हैं, प्राप्ति
हो रही है —
तो समझ लें कि संगम युग का अनुभव है।

