(16)क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर है?
“क्या श्री कृष्ण भगवान थे?
16वा विषय हम कर रहे हैं।
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर है?
क्या लगता है आपको?
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर है?
जगत सर है भाई जी।
सभी भक्ति मार्ग में जगत कहते आए हैं।
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर है?
योग का स्वामी कौन?
योग का स्वामी कौन?
कृष्ण,
शिव
या आत्मा की अवस्था।
गहरा आध्यात्मिक रहस्य।
डिस्क्लेमर है।
यह प्रस्तुति ब्रह्मा कुमारीज की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, देवता या आस्था का विरोध करना नहीं है।
यह विषय योग, योगेश्वर, आत्मा की अवस्था और संगम युग की पढ़ाई की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है।
दर्शक इसे श्रद्धा और विवेक दोनों से सुनें तथा स्वयं मनन करें।
योगेश्वर कौन है?
आज हम एक अत्यंत रोचक और गहरे प्रश्न पर मनन करेंगे।
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर है?
योगेश्वर का वास्तविक अर्थ क्या है?
क्या योगेश्वर कोई व्यक्तित्व है
या अवस्था?
क्या योगेश्वर कोई व्यक्तित्व है?
व्यक्तित्व माना शरीरधारी।
या आत्मा की अवस्था है।
दुनिया में अक्सर कहा जाता है—
योगेश्वर कृष्ण।
कृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है।
लेकिन क्या इसका अर्थ वही है जो हम समझते हैं?
या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है?
योगेश्वर शब्द का अर्थ—
दो शब्द हैं: योग + ईश्वर।
सबसे पहले योगेश्वर शब्द को समझें।
योग और ईश्वर।
योग अर्थात संबंध।
ईश्वर अर्थात स्वामी।
स्वामी के साथ संबंध लगाना।
अर्थात योग का स्वामी,
योग का अधिकारी,
योग में स्थिति का अधिकारी।
योग में सिद्धि-असिद्धि की प्राप्ति।
योग में सिद्ध अवस्था।
तो प्रश्न उठता है—
क्या योगेश्वर एक व्यक्ति है
या योग में पूर्ण सिद्ध अवस्था?
योग में पूर्ण सिद्धि आवश्यक है।
गीता में योगेश्वर कृष्ण क्यों कहा गया है?
गीता में योगेश्वर कृष्ण शब्द आता है।
परंतु उनका उद्धार नहीं हुआ।
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से समझें।
मुरली 6 अक्टूबर 1969 में कहा गया—
गीता का ज्ञान देने वाला एक ही शिव है।
तो योग सिखाने वाला कौन?
निराकार शिव।
लेकिन गीता के चित्रों में कौन दिखाई देता है?
कृष्ण।
यहाँ एक प्रतीकात्मक परिवर्तन हुआ।
ज्ञान देने वाला शिव, दिखाया गया कृष्ण।
इसलिए योगेश्वर कृष्ण की धारणा बनी।
क्या श्री कृष्ण योगेश्वर है?
यहाँ सूक्ष्म समझ आवश्यक है।
सतयुग में कृष्ण योग करते नहीं।
सतयुग में दुख नहीं।
वहाँ स्मृति स्वाभाविक है कि हम आत्मा हैं।
और परमधाम की यात्रा अंत में स्वाभाविक होती है।
मुरली 13 जनवरी 1969 में कहा गया—
सतयुग में योग की आवश्यकता ही नहीं,
वहाँ फल भोगते हैं।
अर्थात योगेश्वर अवस्था कहाँ बनती है?
संगम युग में।
उदाहरण—
एक छात्र और एक टॉपर।
छात्र पढ़ाई करता है, परीक्षा देता है, मेहनत करता है और टॉपर बन जाता है।
टॉपर बनने के बाद क्या वह पढ़ाई कर रहा है?
नहीं।
वह परिणाम भोग रहा है।
ठीक वैसे ही संगम युग में योगाभ्यास होता है
और उसका परिणाम सतयुग में मिलता है।
कृष्ण बनने वाली आत्मा संगम युग में राजयोग सीखती है।
निरंतर स्मृति में रहती है।
पूर्ण पवित्रता प्राप्त करती है।
मुरली 6 मार्च 1968—
यह राजयोग की पढ़ाई है जिससे तुम राजाओं के राजा बनते हो।
अर्थात योगेश्वर—
योग में सिद्ध आत्मा।
इस दृष्टि से कृष्ण आत्मा योग की पूर्णता का परिणाम है।
अब प्रश्न—
योगेश्वर कौन है?
परम योगेश्वर शिव—
योग सिखाने वाला।
योग सिद्ध आत्मा—
वह पूर्ण आत्मा जिसने योग पूर्ण किया।
अर्थात योगेश्वर शब्द के दो स्तर हैं—
प्रतीक और वास्तविकता।
इतिहास में अक्सर प्रतीक सरल होता है,
वास्तविकता गहरी होती है।
कृष्ण का चित्र सुंदर, आकर्षक और सहज है।
इसलिए गीता में योगेश्वर कृष्ण कहा गया।
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से
योगेश्वर शिव है।
और कृष्ण आत्मा योग की सिद्धि का परिणाम है।
मुरली 18 जनवरी 1969—
जो पहले नंबर में आता है, उसकी योग तपस्या पूरी होती है।
अर्थात कृष्ण बनने वाली आत्मा—
योग में प्रथम,
पवित्रता में प्रथम,
स्मृति में प्रथम।
इसलिए उसे योग सिद्ध आत्मा कह सकते हैं।
योगेश्वर का वास्तविक संदेश क्या है?
योगेश्वर कोई उपाधि नहीं।
योग एक प्रेरणा है।
राजयोगी बनेंगे तो फरिश्ता देवता बनेंगे।
उदाहरण—
एक खिलाड़ी और एक कोच।
कोच सिखाता है,
खिलाड़ी अभ्यास करता है।
खिलाड़ी चैंपियन बनता है।
ठीक वैसे ही—
शिव योग शिक्षक है।
और कृष्ण बनने वाली आत्मा योग का परिणाम है।
गहरा आध्यात्मिक निष्कर्ष—
योग सिखाने वाला शिव।
योग की सिद्धि प्राप्त करने वाली आत्मा।
और योगेश्वर— योग की सिद्ध अवस्था।
अब आत्म चिंतन—
क्या हम योग सुनते हैं
या योग करते हैं?
क्या हम योग के बारे में जानते हैं
या योग में जीते हैं?
अंतिम संदेश—
योगेश्वर कोई दूर की उपाधि नहीं।
शांति, पवित्रता और स्मृति का संगम ही योग है।
योगेश्वर को मत खोजो।
योगेश्वर अवस्था बनाओ।
योगेश्वर।

