(17)क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
क्या श्री कृष्ण भगवान थे?
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
आज का प्रश्न अत्यंत गहरा है —
क्या वही आत्मा जो सतयुग में दिव्य और पवित्र है, धीरे-धीरे भोग प्रधान अवस्था में आ जाती है?
क्या सुंदर Shri Krishna श्याम कृष्ण बन जाता है?
क्या सतोप्रधान आत्मा तमोप्रधान बनती है?
इस अध्याय में हम समझेंगे —
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योगेश्वर अवस्था
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भोगेश्वर अवस्था
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आत्मा की 84 जन्मों की यात्रा
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पूज्य से पुजारी तक का परिवर्तन
1️⃣ योगेश्वर अवस्था क्या है?
योगेश्वर शब्द दो शब्दों से बना है —
योग + ईश्वर
-
योग = संबंध
-
ईश्वर = स्वामी
अर्थात —
जो आत्मा परमात्मा से योग जोड़ने में समर्थ है, वह योगेश्वर अवस्था में है।
जब आत्मा योगेश्वर अवस्था में होती है —
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आत्मस्मृति होती है
-
परमात्म संबंध होता है
-
मन स्थिर होता है
-
इच्छाएँ सीमित होती हैं
-
पवित्रता और संतोष स्वाभाविक होते हैं
यह अवस्था संगम युग में बनती है।
मुरली संदर्भ
6 मार्च 1968
“यह राजयोग की पढ़ाई है जिससे तुम राजाओं के राजा बनते हो।”
अर्थात राजयोग का अभ्यास आत्मा को सर्वोच्च अवस्था तक पहुँचाता है।
2️⃣ योगेश्वर से देवता बनने की प्रक्रिया
संगम युग में आत्मा —
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राजयोग सीखती है
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परमात्मा से शक्तियाँ प्राप्त करती है
-
पवित्रता धारण करती है
और फिर सतयुग में देवता के रूप में जन्म लेती है।
सतयुग में जन्म लेने पर उसे यह याद नहीं रहता कि उसने यह सब कैसे प्राप्त किया।
उदाहरण
जैसे एक छात्र परीक्षा देता है।
-
परीक्षा के समय मेहनत करता है
-
परिणाम आने पर फल भोगता है
ठीक वैसे ही —
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संगम पर योग
-
सतयुग में उसका फल।
3️⃣ सतयुग की अवस्था
सतयुग में —
-
दुख नहीं
-
संघर्ष नहीं
-
विकार नहीं
वहाँ सहज आनंद और संतोष होता है।
Radha और Shri Krishna बड़े होकर
Lakshmi और Narayana बनते हैं।
यह योगाभ्यास नहीं, बल्कि योग का फल है।
मुरली संदर्भ
13 जनवरी 1969
“सतयुग में योग की आवश्यकता नहीं रहती, वहाँ योग का फल भोगते हैं।”
4️⃣ पतन की शुरुआत कैसे होती है?
आत्मा अचानक नहीं गिरती।
यह धीरे-धीरे होता है —
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स्मृति कम होती है
-
देह-अभिमान आता है
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इच्छाएँ बढ़ती हैं
-
विकार प्रवेश करते हैं
जैसे सूर्य धीरे-धीरे अस्त होता है,
वैसे ही चेतना धीरे-धीरे गिरती है।
सतयुग → त्रेता → द्वापर → कलयुग
हर युग में चेतना थोड़ी-थोड़ी गिरती है।
5️⃣ भोगेश्वर अवस्था क्या है?
भोगेश्वर अवस्था वह है जब —
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आत्मा बाहरी सुख पर निर्भर हो जाती है
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इंद्रियाँ प्रमुख हो जाती हैं
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तुलना और असंतोष बढ़ता है
निर्विकारी से विकारी।
पावन से पतित।
शास्त्रों में प्रतीक के रूप में दिखाया गया —
सुंदर कृष्ण श्याम बन जाता है।
पाँच मुख वाला सर्प — पाँच विकारों का प्रतीक।
6️⃣ 84 जन्मों की आत्मिक यात्रा
कृष्ण का नाम केवल एक बार रखा जाता है।
लेकिन आत्मा 84 जन्मों की यात्रा करती है।
इस यात्रा में अवस्था बदलती है —
1️⃣ सतयुग — पूज्य
2️⃣ त्रेता — पूज्य
3️⃣ द्वापर — पूजनीय
4️⃣ कलयुग — पुजारी
अर्थ
पूज्य
जो स्वयं दिव्य हो।
पूजनीय
जिसकी मूर्ति की पूजा हो।
पुजारी
जो स्वयं पूजा करता है।
यही आत्मा की यात्रा है।
7️⃣ क्या यह दोष है?
नहीं।
यह विश्व ड्रामा है।
बना-बनाया, सटीक और पुनरावृत्त होने वाला।
हर 5000 वर्ष बाद यह पूरा चक्र पुनः चलता है।
मुरली संदर्भ
18 जनवरी 1969
“जो पहले नंबर में आता है, उसकी योग तपस्या पूरी होती है।”
8️⃣ योग से भोग और फिर भोग से योग
यह आत्मा की पूर्ण यात्रा है —
योग → देवता → पतन → भोग → पुनः योग।
अर्थात —
-
संगम पर योगेश्वर
-
मध्य में भोगेश्वर
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अंत में फिर योगेश्वर
अंतिम आत्म चिंतन
प्रश्न यह नहीं है कि कृष्ण क्या बना।
प्रश्न यह है —
हम अभी क्या बन रहे हैं?
क्या हम —
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योगेश्वर बन रहे हैं?
या -
भोगेश्वर की ओर जा रहे हैं?
अंतिम संदेश
योगेश्वर कोई केवल उपाधि नहीं।
जब आत्मा —
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शांति में स्थिर हो
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पवित्रता में रहे
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परमात्मा की स्मृति में हो
तब वही योगेश्वर अवस्था बनती है।
इसलिए —
योगेश्वर को मत खोजो।
योगेश्वर अवस्था बनाओ।
प्रश्न 1: क्या Shri Krishna की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
उत्तर:
आध्यात्मिक दृष्टि से समझें तो आत्मा की चेतना समय के साथ बदलती है।
सतयुग में आत्मा सतोप्रधान और अत्यंत पवित्र होती है।
लेकिन युगों के परिवर्तन के साथ-साथ आत्मा की शक्ति कम होती जाती है और चेतना भोग प्रधान बनती जाती है।
इसीलिए कहा जाता है कि आत्मा योग की सर्वोच्च अवस्था से धीरे-धीरे भोग प्रधान अवस्था में आती है।
प्रश्न 2: योगेश्वर अवस्था क्या होती है?
उत्तर:
योगेश्वर शब्द दो भागों से बना है —
योग + ईश्वर
-
योग = परमात्मा से संबंध
-
ईश्वर = स्वामी
अर्थात —
जो आत्मा परमात्मा से संबंध जोड़ने में समर्थ है, वह योगेश्वर अवस्था में है।
इस अवस्था में —
-
आत्मस्मृति रहती है
-
मन स्थिर रहता है
-
इच्छाएँ सीमित होती हैं
-
पवित्रता और संतोष स्वाभाविक होते हैं
यह अवस्था संगम युग में बनती है।
मुरली संदर्भ
6 मार्च 1968
“यह राजयोग की पढ़ाई है जिससे तुम राजाओं के राजा बनते हो।”
प्रश्न 3: योगेश्वर से देवता बनने की प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
संगम युग में आत्मा —
-
राजयोग सीखती है
-
परमात्मा से शक्तियाँ प्राप्त करती है
-
पवित्रता धारण करती है
इसके बाद वह सतयुग में देवता रूप में जन्म लेती है।
उदाहरण
जैसे एक छात्र परीक्षा देता है —
-
परीक्षा के समय मेहनत करता है
-
परिणाम आने पर फल भोगता है
ठीक वैसे ही —
-
संगम पर योग
-
सतयुग में योग का फल।
प्रश्न 4: सतयुग में योग क्यों नहीं होता?
उत्तर:
सतयुग में —
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दुख नहीं
-
विकार नहीं
-
संघर्ष नहीं
वहाँ आत्माएँ स्वाभाविक रूप से पवित्र रहती हैं।
Radha और Shri Krishna बड़े होकर
Lakshmi और Narayana बनते हैं।
यह योगाभ्यास नहीं बल्कि योग का परिणाम होता है।
मुरली संदर्भ
13 जनवरी 1969
“सतयुग में योग की आवश्यकता नहीं रहती, वहाँ योग का फल भोगते हैं।”
प्रश्न 5: आत्मा का पतन कैसे शुरू होता है?
उत्तर:
आत्मा का पतन अचानक नहीं होता।
यह धीरे-धीरे होता है —
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आत्मस्मृति कम होती है
-
देह-अभिमान बढ़ता है
-
इच्छाएँ बढ़ती हैं
-
विकार प्रवेश करते हैं
जैसे सूर्य धीरे-धीरे अस्त होता है,
वैसे ही चेतना धीरे-धीरे गिरती है।
युग परिवर्तन के साथ यह क्रम चलता है —
सतयुग → त्रेता → द्वापर → कलयुग
प्रश्न 6: भोगेश्वर अवस्था क्या है?
उत्तर:
भोगेश्वर अवस्था वह है जब आत्मा बाहरी सुखों पर निर्भर हो जाती है।
इस अवस्था में —
-
इंद्रियाँ प्रमुख हो जाती हैं
-
इच्छाएँ बढ़ती हैं
-
तुलना और असंतोष बढ़ता है
अर्थात —
निर्विकारी से विकारी
पावन से पतित।
शास्त्रों में प्रतीक के रूप में बताया गया कि सुंदर कृष्ण श्याम बन जाता है।
पाँच मुख वाला सर्प पाँच विकारों का प्रतीक माना जाता है।
प्रश्न 7: 84 जन्मों की यात्रा क्या है?
उत्तर:
कृष्ण का नाम केवल एक जन्म में होता है।
लेकिन आत्मा 84 जन्मों की यात्रा करती है।
इस यात्रा में आत्मा की स्थिति बदलती रहती है —
1️⃣ सतयुग — पूज्य
2️⃣ त्रेता — पूज्य
3️⃣ द्वापर — पूजनीय
4️⃣ कलयुग — पुजारी
अर्थ
पूज्य
जो स्वयं दिव्य हो।
पूजनीय
जिसकी मूर्ति की पूजा हो।
पुजारी
जो स्वयं पूजा करता है।
यही आत्मा की पूरी आध्यात्मिक यात्रा है।
प्रश्न 8: क्या यह आत्मा का दोष है?
उत्तर:
नहीं।
यह एक निश्चित विश्व ड्रामा का भाग है।
यह सटीक और पुनरावृत्त होने वाला चक्र है जो हर 5000 वर्ष में दोहराया जाता है।
मुरली संदर्भ
18 जनवरी 1969
“जो पहले नंबर में आता है, उसकी योग तपस्या पूरी होती है।”
प्रश्न 9: योग से भोग और भोग से योग का चक्र क्या है?
उत्तर:
आत्मा की यात्रा इस प्रकार समझी जा सकती है —
योग → देवता → पतन → भोग → पुनः योग।
अर्थात —
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संगम युग में योगेश्वर
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मध्य युगों में भोगेश्वर
-
अंत में फिर योगेश्वर बनने की तैयारी।
डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति Brahma Kumaris की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य किसी देवी-देवता, धर्म या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।
यह विषय आत्मा की यात्रा, योग अवस्था, भोग अवस्था और विश्व ड्रामा की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है।
दर्शक इसे श्रद्धा, विवेक और मनन की भावना से सुनें।

