AV-23/10-12-1987-“तन, मन, धन और सम्बन्ध का श्रेष्ठ सौदा”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“तन, मन, धन और सम्बन्ध की शक्ति”
आज सर्वशक्तिवान बाप अपने शक्तिशाली बच्चों को देख रहे हैं। हर एक ब्राह्मण आत्मा शक्तिशाली बनी है लेकिन नम्बरवार है। सर्व शक्तियां बाप का वर्सा और वरदाता का वरदान हैं। बाप और वरदाता – इन डबल सम्बन्ध से हरेक बच्चे को यह श्रेष्ठ प्राप्ति जन्म से ही होती है। जन्म से ही बाप सर्व शक्तियों का अर्थात् जन्म-सिद्ध अधिकार का अधिकारी बना देता है, साथ-साथ वरदाता के नाते से जन्म होते ही मास्टर सर्वशक्तिवान बनाए ‘सर्व शक्ति भव’ का वरदान दे देते हैं। सभी बच्चों को एक द्वारा एक जैसा ही डबल अधिकार मिलता है लेकिन धारण करने की शक्ति नम्बरवार बना देती है। बाप सभी को सदा और सर्व शक्तिशाली बनाते हैं लेकिन बच्चे यथा-शक्ति बन जाते हैं। वैसे लौकिक जीवन में वा अलौकिक जीवन में सफलता का आधार शक्तियां ही हैं। जितनी शक्तियां, उतनी सफलता। मुख्य शक्तियां हैं – तन की, मन की, धन की और सम्बन्ध की। चारों ही आवश्यक हैं। अगर चार में से एक भी शक्ति कम है तो जीवन में सदा व सर्व सफलता नहीं होती। अलौकिक जीवन में भी चारों ही शक्तियां आवश्यक है।
इस अलौकिक जीवन में आत्मा और प्रकृति दोनों की तन्दरूस्ती आवश्यक है। जब आत्मा स्वस्थ है तो तन का हिसाब-किताब वा तन का रोग सूली से कांटा बनने के कारण, स्व-स्थिति के कारण स्वस्थ अनुभव करता है। उनके मुख पर, चेहरे पर बीमारी के कष्ट के चिन्ह नहीं रहते। मुख पर कभी बीमारी का वर्णन नही होता, कर्मभोग के वर्णन के बदले कर्मयोग की स्थिति का वर्णन करते हैं क्योंकि बीमारी का वर्णन भी बीमारी की वृद्धि करने का कारण बन जाता है। वह कभी भी बीमारी के कष्ट का अनुभव नहीं करेगा, न दूसरे को कष्ट सुनाकर कष्ट की लहर फैलायेगा। और ही परिवर्तन की शक्ति से कष्ट को सन्तुष्टता में परिवर्तन कर सन्तुष्ट रह औरों में भी सन्तुष्टता की लहर फैलायेगा अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान बन शक्तियों के वरदान में से समय प्रमाण सहन शक्ति, समाने की शक्ति प्रयोग करेगा और समय पर शक्तियों का वरदान वा वर्सा कार्य में लाना – यही उसके लिए वरदान अर्थात् दुआ दवाई का काम कर देती है क्योंकि सर्वशक्तिवान बाप द्वारा जो सर्वशक्तियां प्राप्त हैं वह जैसी परिस्थिति, जैसा समय और जिस विधि से आप कार्य में लगाने चाहो, वैसे ही रूप से यह शक्तियां आपकी सहयोगी बन सकती हैं। इन शक्तियों को वा प्रभु-वरदान को जिस रूप में चाहे वह रूप धारण कर सकती है। अभी-अभी शीतलता के रूप में, अभी-अभी जलाने के रूप में। पानी की शीतलता का भी अनुभव करा सकते तो आग के जलाने का भी अनुभव करा सकते; दवाई का भी काम कर सकता और शक्तिशाली बनाने का माजून का भी काम कर सकता। सिर्फ समय पर कार्य में लगाने की अथॉरिटी बनो। यह सर्वशक्तियां आप मास्टर सर्वशक्तिवान की सेवाधारी हैं। जब जिसको आर्डर करो, वह ‘हाजिर हजूर’ कह सहयोगी बनेगी लेकिन सेवा लेने वाले भी इतने चतुर-सुजान चाहिए। तो तन की शक्ति आत्मिक शक्ति के आधार पर सदा अनुभव कर सकते हो अर्थात् सदा स्वस्थ रहने का अनुभव कर सकते हो।
यह अलौकिक ब्राह्मण जीवन है ही सदा स्वस्थ जीवन। वरदाता से ‘सदा स्वस्थ भव’ का वरदान मिला हुआ है। बापदादा देखते हैं कि प्राप्त हुए वरदानों को कई बच्चे समय पर कार्य में लगाकर लाभ नहीं ले सकते हैं वा यह कहें कि शक्तियों अर्थात् सेवाधारियों से अपनी विशालता और विशाल बुद्धि द्वारा सेवा नहीं ले पाते हैं। ‘मास्टर सर्वशक्तिवान’ – यह स्थिति कोई कम नहीं है! यह श्रेष्ठ स्थिति भी है, साथ-साथ डायरेक्ट परमात्मा द्वारा ‘परम टाइटल’ भी है। टाइटल का नशा कितना रखते हैं! टाइटल कितने कार्य सफल कर देता है! तो यह परमात्म-टाइटल है, इसमें कितनी खुशी और शक्ति भरी हुई है! अगर इसी एक टाइटल की स्थिति रूपी सीट पर सेट रहो तो यह सर्वशक्तियाँ सेवा के लिए सदा हाजिर अनुभव होंगी, आपके आर्डर की इन्तजार में होगी। तो वरदान को वा वर्से को कार्य में लगाओ। अगर मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान में स्थित नहीं होते तो शक्तियों को आर्डर में चलाने के बजाए बार-बार बाप को अर्जी डालते रहते कि यह शक्ति दे दो, यह हमारा कार्य करा दो, यह हो जाए, ऐसा हो जाए। तो अर्जी डालने वाले कभी भी सदा राज़ी नहीं रह सकते हैं। एक बात पूरी होगी, दूसरी शुरू हो जायेगी। इसलिए मालिक बन, योगयुक्त बन युक्तियुक्त सेवा सेवाधारियों से लो तो सदा स्वस्थ का स्वत: ही अनुभव करेंगे। इसको कहते हैं तन के शक्ति की प्राप्ति।
ऐसे ही मन की शक्ति अर्थात् श्रेष्ठ संकल्प शक्ति। मास्टर सर्वशक्तिवान के हर संकल्प में इतनी शक्ति है जो जिस समय जो चाहे वह कर सकता है और करा भी सकता है क्योंकि उनके संकल्प सदा शुभ, श्रेष्ठ और कल्याणकारी होंगे। तो जहाँ श्रेष्ठ कल्याण का संकल्प है, वह सिद्ध जरूर होता है और मास्टर सर्वशक्तिवान होने के कारण मन कभी मालिक को धोखा नहीं दे सकता है, दु:ख नहीं अनुभव करा सकता है। मन एकाग्र अर्थात् एक ठिकाने पर स्थित रहता है, भटकता नहीं है। जहाँ चाहो, जब चाहो मन को वहाँ स्थित कर सकते हो। कभी मन उदास नहीं हो सकता है, क्योंकि वह सेवाधारी दास बन जाता है। यह है मन की शक्ति जो अलौकिक जीवन में वर्से वा वरदान में प्राप्त हैं।
इसी प्रकार तीसरी है धन की शक्ति अर्थात् ज्ञान-धन की शक्ति। ज्ञान-धन स्थूल धन की प्राप्ति स्वत: ही कराता है। जहाँ ज्ञान धन है, वहाँ प्रकृति स्वत: ही दासी बन जाती है। यह स्थूल धन प्रकृति के साधन के लिए है। ज्ञान-धन से प्रकृति के सर्व साधन स्वत: प्राप्त होते हैं। इसलिए ज्ञान-धन सब धन का राजा है। जहाँ राजा है, वहाँ सर्व पदार्थ स्वत: ही प्राप्त होते हैं, मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर कोई भी लौकिक पदार्थ प्राप्त करने में मेहनत करनी पड़ती है तो इसका कारण ज्ञान-धन की कमी है। वास्तव में, ज्ञान-धन पद्मापद्मपति बनाने वाला है। परमार्थ व्यवहार को स्वत: ही सिद्ध करता है। तो परमात्म-धन वाले परमार्थी बन जाते हैं। संकल्प करने की भी आवश्यकता नहीं, स्वत: ही सर्व आवश्यकतायें पूर्ण होती रहती। धन की इतनी शक्ति है जो अनेक जन्म यह ज्ञान-धन राजाओं का भी राजा बना देता है। तो धन की भी शक्ति सहज प्राप्त हो जाती है।
इसी प्रकार – सम्बन्ध की शक्ति। सम्बन्ध की शक्ति के प्राप्ति की शुभ इच्छा इसलिए होती है क्योंकि सम्बन्ध में स्नेह और सहयोग की प्राप्ति होती है। इस अलौकिक जीवन में सम्बन्ध की शक्ति डबल रूप में प्राप्त होती है। जानते हो, डबल सम्बन्ध की शक्ति कैसे प्राप्त होती है? एक – बाप द्वारा सर्व सम्बन्ध, दूसरा – दैवी परिवार द्वारा सम्बन्ध। तो डबल सम्बन्ध हो गया ना – बाप से भी और आपस में भी। तो सम्बन्ध द्वारा सदा नि:स्वार्थ स्नेह, अविनाशी स्नेह और अविनाशी सहयोग सदा ही प्राप्त होता रहता है। तो सम्बन्ध की भी शक्ति है ना। वैसे भी बाप, बच्चे को क्यों चाहता है अथवा बच्चा, बाप को क्यों चाहता है? सहयोग के लिए, समय पर सहयोग मिले। तो इस अलौकिक जीवन में चारों शक्तियों की प्राप्ति वरदान रूप में, वर्से के रूप में है। जहाँ चारों प्रकार की शक्तियां प्राप्त हैं, उसकी हर समय की स्थिति कैसी होगी? सदा मास्टर सर्वशक्तिवान। इसी स्थिति की सीट पर सदा स्थित हो? इसी को ही दूसरे शब्दों में स्व के राजे वा राजयोगी कहा जाता है। राजाओं के भण्डार सदा भरपूर रहते हैं। तो राजयोगी अर्थात् सदा शक्तियों के भण्डार भरपूर रहते, समझा? इसको कहा जाता है श्रेष्ठ ब्राह्मण अलौकिक जीवन। सदा मालिक बन सर्व शक्तियों को कार्य में लगाओ। यथाशक्ति के बजाए सदा शक्तिशाली बनो। अर्जी करने वाले नहीं, सदा राज़ी रहने वाले बनो। अच्छा।
मधुबन आने का चांस तो सभी को मिल रहा है ना। इस प्राप्त हुए भाग्य को सदा साथ रखो। भाग्यविधाता को साथ रखना अर्थात् भाग्य को साथ रखना है। तीन ज़ोन के आये हैं। अलग-अलग स्थान की 3 नदियां आकर इकट्ठी हुई – इसको त्रिवेणी का संगम कहते हैं। बापदादा तो वरदाता बन सबको वरदान देते हैं। वरदानों को कार्य में लगाना, वह हर एक के ऊपर है।
तन, मन, धन और सम्बन्ध की शक्ति
आज सर्वशक्तिवान परमपिता Shiva अपने शक्तिशाली बच्चों को देख रहे हैं।
हर ब्राह्मण आत्मा को जन्म से ही सर्व शक्तियों का वर्सा और वरदान प्राप्त होता है।
परंतु सभी बच्चे नम्बरवार इन शक्तियों को धारण करते हैं।
बाप का वर्सा और वरदाता का वरदान —
इन दो संबंधों के कारण हर आत्मा को मास्टर सर्वशक्तिवान बनने का अधिकार मिलता है।
1️⃣ तन की शक्ति (शरीर की शक्ति)
ब्राह्मण जीवन में तन की शक्ति केवल शारीरिक स्वास्थ्य नहीं है, बल्कि आत्मिक शक्ति से समर्थ शरीर है।
जब आत्मा शक्तिशाली होती है, तो शरीर भी स्वस्थ अनुभव करता है।
बीमारी का वर्णन करने से बीमारी बढ़ती है, लेकिन योग की स्थिति में रहने वाला आत्मा बीमारी को भी हल्का अनुभव करता है।
उदाहरण
मान लीजिए किसी को शरीर में दर्द है।
एक व्यक्ति बार-बार उस दर्द की चर्चा करता है,
दूसरा व्यक्ति योग में स्थित होकर उसे स्वीकार करता है।
पहला व्यक्ति कष्ट फैलाता है,
दूसरा व्यक्ति शांति और संतुष्टि की लहर फैलाता है।
यही आत्मिक शक्ति है।
🪶 मुरली संदर्भ
वरदान:
“सदा स्वस्थ भव”
अर्थात आत्मा को परमात्मा द्वारा सदा स्वस्थ रहने का वरदान प्राप्त है।
2️⃣ मन की शक्ति (संकल्प शक्ति)
मन की शक्ति ब्राह्मण जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है।
जब आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान बनती है तो उसका हर संकल्प शक्तिशाली होता है।
ऐसी आत्मा के संकल्प —
-
शुभ होते हैं
-
श्रेष्ठ होते हैं
-
कल्याणकारी होते हैं
जहाँ कल्याणकारी संकल्प होता है, वहाँ सफलता निश्चित होती है।
उदाहरण
एक साधारण मन कहता है —
“यह काम कठिन है।”
लेकिन शक्तिशाली मन कहता है —
“यह कार्य परमात्म सहयोग से अवश्य सफल होगा।”
मन जब मालिक के अधीन रहता है तो वह भटकता नहीं।
3️⃣ धन की शक्ति (ज्ञान-धन)
यहाँ धन का अर्थ केवल पैसे से नहीं है।
सबसे बड़ा धन है — ज्ञान-धन।
ज्ञान-धन से —
-
आत्मा समृद्ध बनती है
-
प्रकृति सहयोगी बनती है
-
आवश्यक साधन स्वतः मिलते हैं
जहाँ ज्ञान-धन है वहाँ कमी नहीं रहती।
उदाहरण
एक व्यक्ति के पास बहुत धन है लेकिन शांति नहीं है।
दूसरे के पास आध्यात्मिक ज्ञान है।
दूसरा व्यक्ति कम साधनों में भी संतुष्ट रहता है और उसका जीवन संतुलित रहता है।
यही ज्ञान-धन की शक्ति है।
ज्ञान-धन को मुरली में सब धन का राजा कहा गया है।
4️⃣ सम्बन्ध की शक्ति
ब्राह्मण जीवन में सम्बन्ध की शक्ति दो प्रकार से प्राप्त होती है —
1️⃣ परमात्मा से सम्बन्ध
2️⃣ दैवी परिवार से सम्बन्ध
परमात्मा से सम्बन्ध आत्मा को प्रेम और शक्ति देता है।
दैवी परिवार से सम्बन्ध आत्मा को सहयोग और स्नेह देता है।
उदाहरण
जब आत्मा अकेली होती है तो वह जल्दी कमजोर हो जाती है।
लेकिन जब वह परमात्मा और परिवार से जुड़ी होती है तो वह मजबूत बन जाती है।
यही सम्बन्ध की शक्ति है।
चारों शक्तियों का संतुलन
यदि चारों में से एक भी शक्ति कम हो जाए तो जीवन में पूर्ण सफलता नहीं मिलती।
चारों शक्तियों का संतुलन ही ब्राह्मण जीवन को सफल बनाता है —
-
तन की शक्ति
-
मन की शक्ति
-
ज्ञान-धन की शक्ति
-
सम्बन्ध की शक्ति
जिस आत्मा के पास ये चारों शक्तियाँ हैं, वह मास्टर सर्वशक्तिवान बन जाती है।
मास्टर सर्वशक्तिवान की स्थिति
जब आत्मा अपने स्वमान में स्थित रहती है तो सभी शक्तियाँ उसके आदेश में कार्य करती हैं।
लेकिन यदि आत्मा स्वमान भूल जाती है तो वह बार-बार परमात्मा से अर्जी करती रहती है —
“यह करा दो”
“यह दे दो”
“यह समस्या हल कर दो”
मालिक बनने वाली आत्मा अर्जी नहीं करती,
वह शक्तियों को आदेश देती है।
🪶 मुरली संदेश
परमात्मा का संदेश है —
अर्जी करने वाले नहीं,
सदा राज़ी रहने वाले बनो।
जो आत्मा शक्तियों को समय पर प्रयोग करती है वही सच्चा राजयोगी बनती है।
राजयोगी की पहचान
राजयोगी वह है —
जिसके भंडार सदा भरपूर रहते हैं।
जैसे राजा के भंडार कभी खाली नहीं होते,
वैसे ही राजयोगी के पास शक्तियों का भंडार सदा भरा रहता है।
यही श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन है।
अंतिम आत्म चिंतन
अब प्रश्न यह है —
क्या हम अपनी शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं?
या केवल उन्हें जानते हैं?
क्या हम —
-
यथाशक्ति जी रहे हैं
या -
सदा शक्तिशाली बन रहे हैं?
अंतिम संदेश
चारों शक्तियों को जीवन में धारण करें —
-
तन की शक्ति
-
मन की शक्ति
-
ज्ञान-धन की शक्ति
-
सम्बन्ध की शक्ति
तब आत्मा स्वाभाविक रूप से मास्टर सर्वशक्तिवान बन जाती है।
इसलिए —
अर्जी करने वाले नहीं,
सदा राज़ी रहने वाले बनो।
प्रश्न 1: ब्राह्मण जीवन में चार मुख्य शक्तियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर: ब्राह्मण जीवन में चार मुख्य शक्तियाँ हैं —
1️⃣ तन की शक्ति
2️⃣ मन की शक्ति
3️⃣ ज्ञान-धन की शक्ति
4️⃣ सम्बन्ध की शक्ति
इन चारों शक्तियों का संतुलन ही आत्मा को मास्टर सर्वशक्तिवान बनाता है।
प्रश्न 2: तन की शक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: तन की शक्ति केवल शारीरिक बल नहीं है। यह आत्मिक शक्ति से समर्थ शरीर है। जब आत्मा शक्तिशाली होती है तो शरीर भी हल्का और स्वस्थ अनुभव करता है।
प्रश्न 3: बीमारी के समय आत्मिक शक्ति कैसे काम करती है?
उत्तर: जो व्यक्ति बार-बार बीमारी की चर्चा करता है, वह कष्ट बढ़ाता है। लेकिन जो आत्मा योग की स्थिति में रहती है, वह बीमारी को भी हल्का अनुभव करती है और शांति की शक्ति फैलाती है।
प्रश्न 4: मन की शक्ति क्या है?
उत्तर: मन की शक्ति संकल्प शक्ति है। जब आत्मा शक्तिशाली होती है तो उसके संकल्प शुभ, श्रेष्ठ और कल्याणकारी होते हैं।
प्रश्न 5: शक्तिशाली मन की पहचान क्या है?
उत्तर: शक्तिशाली मन कभी यह नहीं सोचता कि कार्य कठिन है। वह कहता है —
“परमात्म सहयोग से यह कार्य अवश्य सफल होगा।”
प्रश्न 6: ब्राह्मण जीवन में धन की शक्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर: यहाँ धन का अर्थ केवल पैसे से नहीं है। सबसे बड़ा धन है ज्ञान-धन। ज्ञान-धन से आत्मा समृद्ध, संतुष्ट और शक्तिशाली बनती है।
प्रश्न 7: ज्ञान-धन को श्रेष्ठ धन क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि ज्ञान-धन आत्मा को विवेक, शांति और संतोष देता है। मुरली में इसे सब धन का राजा कहा गया है।
प्रश्न 8: सम्बन्ध की शक्ति क्या है?
उत्तर: सम्बन्ध की शक्ति दो प्रकार से प्राप्त होती है —
1️⃣ परमात्मा से सम्बन्ध
2️⃣ दैवी परिवार से सम्बन्ध
इन दोनों से आत्मा को प्रेम, सहयोग और शक्ति प्राप्त होती है।
प्रश्न 9: सम्बन्ध की शक्ति आत्मा को कैसे मजबूत बनाती है?
उत्तर: जब आत्मा अकेली महसूस करती है तो वह कमजोर हो जाती है। लेकिन जब वह परमात्मा और दैवी परिवार से जुड़ी रहती है तो उसे निरंतर शक्ति और सहयोग मिलता है।
प्रश्न 10: मास्टर सर्वशक्तिवान बनने की स्थिति क्या है?
उत्तर: जब आत्मा अपने स्वमान में स्थित रहती है और चारों शक्तियों — तन, मन, ज्ञान-धन और सम्बन्ध — को संतुलित रूप से प्रयोग करती है, तब वह मास्टर सर्वशक्तिवान बन जाती है।
प्रश्न 11: अर्जी करने वाली आत्मा और मालिक आत्मा में क्या अंतर है?
उत्तर:
-
अर्जी करने वाली आत्मा बार-बार परमात्मा से मांगती रहती है।
-
मालिक आत्मा शक्तियों को आदेश देती है और उन्हें सही समय पर प्रयोग करती है।
प्रश्न 12: राजयोगी की पहचान क्या है?
उत्तर: राजयोगी वह है जिसके पास शक्तियों का भंडार सदा भरा रहता है। जैसे राजा के भंडार कभी खाली नहीं होते, वैसे ही राजयोगी आत्मा शक्तियों से भरपूर रहती है।
डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति Brahma Kumaris की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, परंपरा या आस्था का विरोध करना नहीं है।
यह विषय आत्मा की शक्ति, राजयोग, ब्राह्मण जीवन की चार मुख्य शक्तियों — तन, मन, धन और सम्बन्ध — की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है।
दर्शक इसे श्रद्धा, विवेक और मनन की भावना से सुनें।
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