AV-15/02-11-1987-“स्व-परिवर्तन का आधार – ‘सच्चे दिल की महसूसता’
“स्व-परिवर्तन का आधार – ‘सच्चे दिल की महसूसता’
आज विश्व-परिवर्तक, विश्व-कल्याणकारी बापदादा अपने स्नेही, सहयोगी, विश्व परिवर्तक बच्चों को देख रहे हैं। हर एक स्व-परिवर्तन द्वारा विश्व-परिवर्तन करने की सेवा में लगे हुए हैं। सभी के मन में एक ही उमंग-उत्साह है कि इस विश्व को परिवर्तन करना ही है और निश्चय भी है कि परिवर्तन होना ही है अथवा यह कहें कि परिवर्तन हुआ ही पड़ा है। सिर्फ निमित्त बापदादा के सहयोगी, सहजयोगी बन वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ बना रहे हैं।
आज बापदादा चारों ओर के निमित्त विश्व-परिवर्तक बच्चों को देखते हुए एक विशेष बात देख रहे थे – हैं सभी एक ही कार्य के निमित्त, लक्ष्य भी सभी का स्व-परिवर्तन और विश्व-परिवर्तन ही है लेकिन स्व-परिवर्तन वा विश्व-परिवर्तन में निमित्त होते हुए भी नम्बरवार क्यों? कोई बच्चे स्व-परिवर्तन बहुत सहज और शीघ्र कर लेते और कोई अभी-अभी परिवर्तन का संकल्प करेंगे लेकिन स्वयं के संस्कार वा माया और प्रकृति द्वारा आने वाली परिस्थितियाँ वा ब्राह्मण परिवार द्वारा चुक्तू होने वाले हिसाब-किताब श्रेष्ठ परिवर्तन के उमंग को कमजोर कर देते हैं और कई बच्चे परिवर्तन करने की हिम्मत में कमजोर हैं। जहाँ हिम्मत नहीं, वहाँ उमंग-उत्साह नहीं। और स्व-परिवर्तन के बिना विश्व-परिवर्तन के कार्य में दिल-पसन्द सफलता नहीं होती क्योंकि यह अलौकिक ईश्वरीय सेवा एक ही समय पर तीन प्रकार के सेवा की सिद्धि है, वह तीन प्रकार की सेवा साथ-साथ कौनसी है? एक – वृत्ति, दूसरा – वायब्रेशन, तीसरा – वाणी। तीनों ही शक्तिशाली निमित्त, निर्मान और नि:स्वार्थ इस आधार से हैं, तब दिल-पसन्द सफलता होती है। नहीं तो सेवा होती है, अपने को वा दूसरों को थोड़े समय के लिए सेवा की सफलता से खुश तो कर लेते हैं लेकिन दिल-पसन्द सफलता जो बापदादा कहते हैं, वह नहीं होती है। बापदादा भी बच्चों की खुशी में खुश हो जाते हैं लेकिन दिलाराम की दिल पर यथा-शक्ति रिजल्ट नोट जरूर होती रहती। ‘शाबास, शाबाश!’ जरूर कहेंगे क्योंकि बाप की हर बच्चे के ऊपर सदा वरदान की दृष्टि और वृत्ति रहती है कि यह बच्चे आज नहीं तो कल सिद्धि-स्वरूप बनने ही हैं। लेकिन वरदाता के साथ-साथ शिक्षक भी है, इसलिए आगे के लिए अटेन्शन भी दिलाते हैं।
तो आज बापदादा विश्व-परिवर्तन के कार्य की और विश्व-परिवर्तक बच्चों की रिजल्ट को देख रहे थे। वृद्धि हो रही है, आवाज़ चारों ओर फैल रहा है, प्रत्यक्षता का पर्दा खुलने का भी आरम्भ हो गया है। चारों ओर की आत्माओं में अभी इच्छा उत्पन्न हो रही है कि नजदीक जाकर देखें। सुनी-सुनाई बातें अभी देखने के परिवर्तन में बदल रही हैं। यह सब परिवर्तन हो रहा है। फिर भी ड्रामा अनुसार अभी तक बाप और कुछ निमित्त बनी हुई श्रेष्ठ आत्माओं के शक्तिशाली प्रभाव का परिणाम यह दिखाई दे रहा है। अगर मैजारिटी इस विधि से सिद्धि को प्राप्त करें तो बहुत जल्दी सर्व ब्राह्मण सिद्धि-स्वरूप में प्रत्यक्ष हो जायेंगे। बापदादा देख रहे थे – दिलपसन्द, लोकपसन्द, बाप-पसन्द सफलता का आधार ‘स्व परिवर्तन’ की अभी कमी है और ‘स्व-परिवर्तन’ की कमी क्यों हैं? उसका मूल आधार एक विशेष शक्ति की कमी है। वह विशेष शक्ति है – महसूसता की शक्ति।
कोई भी परिवर्तन का सहज आधार महसूसता-शक्ति है। जब तक महसूसता-शक्ति नहीं आती, तब तक अनुभूति नहीं होती और जब तक अनुभूति नहीं तब तक ब्राह्मण जीवन की विशेषता का फाउण्डेशन मजबूत नहीं। आदि से अपने ब्राह्मण जीवन को सामने लाओ।
पहला परिवर्तन – मैं आत्मा हूँ, बाप मेरा है – यह परिवर्तन किस आधार से हुआ? जब महसूस करते हो कि ‘हाँ, मैं आत्मा हूँ, यही मेरा बाप है।’ तो महसूसता अनुभव कराती है, तब ही परिवर्तन होता है। जब तक महसूस नहीं करते, तब तक साधारण गति से चलते हैं और जिस घड़ी महसूसता की शक्ति अनुभवी बनाती है तो तीव्र पुरूषार्थी बन जाते हैं। ऐसे जो भी परिवर्तन की विशेष बातें है – चाहे रचयिता के बारे में, चाहे रचना के बारे में, जब तक हर बात को महसूस नहीं करते कि हाँ, यह वही समय है, वही योग है, मैं भी वही श्रेष्ठ आत्मा हूँ तब तक उमंग-उत्साह की चाल नहीं रहती। कोई के वायुमण्डल के प्रभाव से थोड़े समय के लिए परिवर्तन होगा लेकिन सदाकाल का नहीं होगा। महसूसता की शक्ति सदाकाल का सहज परिवर्तन कर लेगी।
इसी प्रकार स्व-परिवर्तन में भी जब तक महसूसता की शक्ति नहीं, तब तक सदाकाल का श्रेष्ठ परिवर्तन नहीं हो सकता है। इसमें विशेष दो बातों की महसूसता चाहिए। एक – अपनी कमज़ोरी की महसूसता। दूसरा – जो परिस्थिति वा व्यक्ति निमित्त बनते हैं, उनकी इच्छा और उनके मन की भावना वा व्यक्ति की कमजोरी या परवश के स्थिति की महसूसता। परिस्थिति के पेपर के कारण को जान स्वयं को पास होने के श्रेष्ठ स्वरूप की महसूसता में हो कि मैं श्रेष्ठ हूँ, स्वस्थिति श्रेष्ठ है, परिस्थिति पेपर है। यह महसूसता सहज परिवर्तन करा लेगी और पास कर लेंगे। दूसरे की इच्छा वा दूसरे के स्व-उन्नति की भी महसूसता अपने स्व-उन्नति का आधार है। तो स्व-परिवर्तन महसूसता की शक्ति बिना नहीं हो सकता। इसमें भी एक है सच्चे दिल की महसूसता, दूसरी चतुराई की महसूसता भी है क्योंकि नॉलेजफुल बहुत बन गये हैं। तो समय देख अपना काम सिद्ध करने के लिए, अपना नाम अच्छा करने के लिए उस समय महसूस भी कर लेंगे लेकिन उस महसूसता में शक्ति नहीं होती जो परिवर्तन कर लेंवे। तो दिल की महसूसता दिलाराम की आशीर्वाद प्राप्त कराती है और चतुराई वाली महसूसता थोड़े समय के लिए दूसरे को भी खुश कर लेते, अपने को भी खुश कर देते।
तीसरे प्रकार की महसूसता – मन मानता है कि यह ठीक नहीं है, विवेक आवाज देता है कि यह यथार्थ नहीं है लेकिन बाहर के रूप से अपने को महारथी सिद्ध करने के लिए, अपने नाम को किसी भी प्रकार से परिवार के बीच कमजोर या कम न करने के कारण विवेक का खून करते रहते हैं। यह विवेक का खून करना भी पाप है। जैसे आपघात महापाप है, वैसे यह भी पाप के खाते में जमा होता है। इसलिए बापदादा मुस्कराते रहते हैं और उनके मन के डॉयलाग भी सुनते रहते हैं। बहुत सुन्दर डायलाग होते हैं। मूल बात – ऐसी महसूसता वाले यह समझते हैं कि किसको क्या पता पड़ता है, ऐसे ही चलता है… लेकिन बाप को पता हर पत्ते का है। सिर्फ मुख से सुनने से पता नहीं पड़ता, लेकिन पता होते भी बाप अन्जान बन भोलेपन में भोलानाथ के रूप से बच्चों को चलाते हैं। जबकि जानते हैं, फिर भोला क्यों बनते? क्योंकि रहमदिल बाप है और पाप में पाप न बढ़ते जायें, यह रहम करता है। समझा? ऐसे बच्चे चतुरसुजान बाप से भी अथवा निमित्त आत्माओं से भी बहुत चतुर बन सामने आते हैं। इसलिए बाप रहमदिल, भोलानाथ बन जाते हैं।
बापदादा के पास हर बच्चे के कर्म का, मन के संकल्पों का खाता हर समय का स्पष्ट रहता है। दिलों को जानने की आवश्यकता नहीं है लेकिन हर बच्चे के दिल की हर धड़कन का चित्र स्पष्ट ही है। इसलिए कहते हैं कि मैं हर एक के दिल को नहीं जानता क्योंकि जानने की आवश्यकता ही नहीं, स्पष्ट है ही। हर घड़ी के दिल की धड़कन वा मन के संकल्प का चार्ट बापदादा के सामने है। बता भी सकते हैं, ऐसे नहीं कि नहीं बता सकते हैं। तिथि, स्थान, समय और क्या-क्या किया – सब बता सकते हैं। लेकिन जानते हुए भी अन्जान रहते हैं। तो आज सारा चार्ट देखा।
स्व-परिवर्तन तीव्रगति से न होने के कारण ‘सच्चे दिल के महसूसता’ की कमी है। महसूसता की शक्ति बहुत मीठे अनुभव करा सकती है। यह तो समझते हो ना। कभी अपने को बाप के नूरे रत्न आत्मा अर्थात् नयनों में समाई हुई श्रेष्ठ बिन्दु महसूस करो। नयनों में तो बिन्दु ही समा सकता है, शरीर तो नहीं समा सकेगा। कभी अपने को मस्तक पर चमकने वाली मस्तक-मणि, चमकता हुआ सितारा महसूस करो, कभी अपने को ब्रह्मा बाप के सहयोगी, राइट हैण्ड साकार ब्राह्मण रूप में ब्रह्मा की भुजायें अनुभव करो, महसूस करो। कभी अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप महसूस करो। ऐसे महसूसता शक्ति से बहुत अनोखे, अलौकिक अनुभव करो। सिर्फ नॉलेज की रीति वर्णन नहीं करो, महसूस करो। इस महसूसता-शक्ति को बढ़ाओ तो दूसरे तरफ की कमजोरी की महसूसता स्वत: ही स्पष्ट होगी। शक्तिशाली दर्पण के बीच छोटा-सा दाग भी स्पष्ट दिखाई देगा और परिवर्तन कर लेंगे। तो समझा, स्व परिवर्तन का आधार महसूसता शक्ति है। शक्ति को कार्य में लगाओ, सिर्फ गिनती करके खुश न हो – हाँ, यह भी शक्ति है, यह भी शक्ति है। लेकिन स्व प्रति, सर्व प्रति, सेवा प्रति सदा हर कार्य में लगाओ। समझा? कई बच्चे कहते कि बाप यही काम करते रहते हैं क्या? लेकिन बाप क्या करे, साथ तो ले ही जाना है। जब साथ ले जाना है तो साथी भी ऐसे ही चाहिए ना। इसलिए देखते रहते हैं और समाचार सुनाते रहते कि साथी समान बन जाएं। पीछे-पीछे आने वालों की तो बात ही नहीं है, वह तो ढेर के ढेर होंगे। लेकिन साथी तो समान चाहिए ना। आप साथी हो या बाराती हो? बारात तो बहुत बड़ी होगी, इसलिए शिव की बारात मशहूर है। बारात तो वैराइटी होगी लेकिन साथी तो ऐसे चाहिए ना। अच्छा।
यह ईस्टर्न ज़ोन है। ईस्टर्न ज़ोन क्या कर रहा है? प्रत्यक्षता का सूर्य कहाँ से उदय करेंगे? बाप में प्रत्यक्षता हुई, वह बात तो अब पुरानी हो गई। लेकिन अब क्या करेंगे? पुरानी गद्दी है – यह तो नशा अच्छा है लेकिन अब क्या करेंगे? अभी कोई नवीनता का सूर्य उदय करो जो सब के मुख से निकले कि यह ईस्टर्न ज़ोन से नवीनता का सूर्य प्रकट हुआ! जो कार्य अभी तक किसी ने न किया हो, वह अब करके दिखाओ। फंक्शन, सेमीनार किये, आई. पी. (विशिष्ट व्यक्ति) की सेवा की, अखबारों में डाला – यह तो सभी करते लेकिन नवीनता की कुछ झलक दिखाओ। समझा।
बाप का घर सो अपना घर है। आराम से सब पहुँच गये हैं। दिल का आराम स्थूल आराम भी दिला देता है। दिल का आराम नहीं तो आराम के साधन होते भी बेआराम होते। दिल का आराम है अर्थात् दिल में सदा राम साथ में है, इसलिए कोई भी परिस्थिति में आराम अनुभव करते हो। आराम है ना, कि आना- जाना बेआराम लगता है? फिर भी मीठे ड्रामा की भावी समझो। मेला तो मना रहे हो ना। बाप से मिलना, परिवार से मिलना – यह मेला मनाने की भी मीठी भावी है। अच्छा।
सर्वशक्तिशाली श्रेष्ठ आत्माओं को, हर शक्ति को समय पर कार्य में लाने वाले सर्व तीव्र पुरूषार्थी बच्चों को, सदा स्व-परिवर्तन द्वारा सेवा में दिलपसन्द सफलता पाने वाले दिलखुश बच्चों को, सदा दिलाराम बाप के आगे सच्ची दिल से स्पष्ट रहने वाले सफलता-स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को दिलाराम बापदादा का दिल से यादप्यार और नमस्ते।
विदाई के समय – मुख्य भाई-बहिनों के साथ:- बापदादा सभी बच्चों को समान बनाने की शुभ भावना से उड़ाने चाहते हैं। निमित्त बने हुए सेवाधारी बाप-समान बनने ही हैं, कैसे भी बाप को बनाना ही है क्योंकि ऐसे-वैसे को तो साथ ले ही नहीं जायेंगे। बाप का भी तो शान है ना। बाप सम्पन्न हो और साथी लंगड़ा या लूला हो तो सजेगा नहीं। लूले-लंगड़े बाराती होंगे, साथी नहीं। इसलिए शिव की बरात सदा लूली-लंगड़ी दिखाई गई है क्योंकि कुछ कमजोर आत्मायें धर्मराजपुरी में पास होने लायक बनेंगी।
सर्व के सहयोग से सुखमय संसार कार्यक्रम के बारे में :- यह तो विषय ऐसी है जो स्वयं सभी सहयोग देने की ऑफर करेंगे। सहयोग से फिर सम्बन्ध में भी आयेंगे। इसलिए आपे ही ऑफर होगी। सिर्फ शुभभावना, शुभकामना सम्पन्न सेवा में सेवाधारी आगे बढ़ें। शुभभावना का फल प्राप्त नहीं हो – यह हो ही नहीं सकता। सेवाधारियों के शुभभावना, शुभकामना की धरनी सहज फल देने के निमित्त बनेगी। फल तैयार है, सिर्फ धरनी तैयार होने की थोड़ी-सी देरी है। फल तो फटाफट निकलेंगे लेकिन उसके लिए योग्य धरनी चाहिए। अभी वह धरनी तैयार हो रही है।
वैसे सेवा तो सभी की करनी आवश्यक है लेकिन फिर भी जो विशेष सत्तायें हैं, उनमें से समीप नहीं आये हैं। चाहे राज्य सत्ता वालों की सेवा हुई है या धर्म सत्ता वालों की हुई है, लेकिन सहयोगी बनकर के सामने आयें, समय पर सहयोगी बनें – उसकी आवश्यकता है। उसके लिए तो शक्तिशाली बाण लगाना पड़ेगा। देखा जाता है कि शक्तिशाली बाण वही होता है जिसमें सर्व आत्माओं के सहयोग की भावना हो, खुशी की भावना हो, सद्भावना हो। इससे हर कार्य सहज सफल होता है। अभी जो सेवा करते हो वह अलग-अलग करते हो। लेकिन जैसे पहले जमाने में कोई कार्य करने के लिए जाते थे तो सारे परिवार की आशीर्वाद लेकर के जाते थे। वह आशीर्वाद ही सहज बना देती है। तो वर्तमान सेवा में यह एडीशन (अभीवृद्धि) चाहिए। तो कोई भी कार्य शुरु करने के पहले सभी शुभ भावनायें, शुभ कामनायें लो, सर्व के सन्तुष्टता का बल भरो, तब शक्तिशाली फल निकलेगा।
अभी इतनी मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। सब खोखले हुए पड़े हैं। मेहनत करने की जरूरत नहीं। फूंक दो और उड़कर यहाँ आ जायें – ऐसे खोखले हैं। और आजकल तो सब समझ रहे हैं कि और कोई पॉवर चाहिए जो कन्ट्रोल कर सके – चाहे राज्य को, चाहे धर्म को। अन्दर से ढूंढ रहे हैं। सिर्फ ब्राह्मण आत्माओं की सेवा की विधि में अन्तर चाहिए, वही मन्त्र बन जायेगा। अभी तो मन्त्र चलाओ और सिद्धि हो। 50 वर्ष मेहनत की। यह सब भी होना ही था, अनुभवी बन गये। अभी हर कार्य में यही लक्ष्य रखो कि ‘सर्व के सहयोग से सफलता’ – ब्राह्मणों के लिए यह टॉपिक है। बाकी दुनिया वालों के लिए टॉपिक है – ‘सर्व के सहयोग से सुखमय संसार’। अच्छा।
अब तो आप सबके सिद्धि का प्रत्यक्ष रूप दिखाई देगा। कोई बिगड़ा हुआ कार्य भी आपकी दृष्टि से, आपके सहयोग से सहज हल होगा जिसके कारण भक्ति में धन्य-धन्य करके पुकारोंगे। यह सब सिद्धियां भी आपके सामने प्रत्यक्ष रूप में आयेंगी। कोई सिद्धि के रीति से आप लोग नहीं कहेंगे कि हाँ यह हो जायेगा, लेकिन आपका डायरेक्शन स्वत: सिद्धि प्राप्त कराता रहेगा। तब तो प्रजा जल्दी-जल्दी बनेगी, सब तरफ से निकल कर आपकी तरफ आयेंगे। यह सिद्धि का पार्ट अभी चलेगा। लेकिन पहले इतने शक्तिशाली बनो जो सिद्धि को स्वीकार न करो, तब यह प्रत्यक्षता होगी। नहीं तो, सिद्धि देने वाले ही सिद्धि में फंस जायें तो फिर क्या करेंगे? तो यह सब बातें यहाँ से ही शुरु होनी हैं। बाप का जो गायन है कि वह सर्जन भी है, इंजीनियर भी है, वकील भी है, जज भी है – इसका प्रैक्टिकल सब अनुभव करेंगे, तब सब तरफ से बुद्धि हटकर एक तरफ जायेगी। अभी तो आपके पीछे भीड़ लगने वाली है। बापदादा तो यह दृश्य देखते हैं और कभी-कभी अब के दृश्य देखते हैं – बहुत फर्क लगता है। आप हो कौन, वह बाप जानता है! बहुत-बहुत वण्डरफुल पार्ट होने हैं, जो ख्याल-ख्वाब में भी नहीं है। सिर्फ थोड़ा रुका हुआ है बस। जैसे पर्दा कभी-कभी थोड़ा अटक जाता है ना। झण्डा भी लहराते हो तो कभी अटक जाता है। ऐसे अभी थोड़ा-थोड़ा अटक रहा है। आप जो हैं, जैसे हो – बहुत महान हो। जब आपकी विशेषता प्रत्यक्ष होगी तब तो इष्ट बनेंगे। आखिर तो भक्त माला भी पत्यक्ष होगी ना। लेकिन पहले ठाकुर सजकर तैयार हों तब तो भक्त आयें ना। अच्छा
पार्टियों से मुलाकात:-
आप सभी श्रेष्ठ आत्मायें सबकी प्यास बुझाने वाले हो ना? वह है स्थूल जल और आपके पास है – ‘ज्ञान अमृत’। जल अल्पकाल की प्यास बुझाए तृप्त आत्मा बना देता है। तो सर्व आत्माओं को अमृत द्वारा तृप्त करने के निमित्त बने हुए हो ना। यह उमंग सदा रहता है? क्योंकि प्यास बुझाना – यह महान पुण्य है। प्यासे की प्यास बुझाने वाले को पुण्य आत्मा कहते हैं। आप भी महान पुण्य आत्मा बन सभी की प्यास बुझाने वाले हो। जैसे प्यार से मनुष्य तड़पते हैं, अगर पानी न मिले तो प्यास से तड़पेंगे ना। ऐसे, ज्ञान-अमृत न मिलने से आत्मायें दु:ख अशान्ति में तड़प रही हैं। तो उनको ज्ञान अमृत देकर प्यास बुझाने वाली पुण्य आत्मायें हो। तो पुण्य का खाता अनेक जन्मों के लिए जमा कर रहे हो ना? एक जन्म में ही अनेक जन्मों का खाता, अनेक जन्मों के लिए जमा कर रहे हो ना? एक जन्म में ही अनेक जन्मों का खाता जमा होता है। तो आपने इतना जमा कर लिया है ना? इतने मालामाल बन गये जो औरों को भी बांट सकते हो! अपने लिए भी जमा किया और दूसरों को भी देने वाले दाता बने। तो सदा यह चेक करो कि सारे दिन में पुण्यात्मा बने, पुण्य का कार्य किया या सिर्फ अपने लिए ही खाया-पिया मौज किया? जमा करने वाले को समझदार कहा जाता है, जो कमाये और खाये उसको समझदार नहीं कहेंगे। जैसे भोजन खाने के लिए फुर्सत निकालते हो क्योंकि आवश्यक है, ऐसे यह पुण्य का कार्य करना भी आवश्यक है। तो सदा ही पुण्य आत्मा हो, कभी-कभी की नहीं। चांस मिले तो करें, नहीं। चांस लेना है। समय मिलेगा नहीं, समय निकालना है। तब जमा कर सकेंगे। इस समय जितना भी भाग्य की लकीर खींचने चाहो, उतना खींच सकते हो क्योंकि बाप भाग्य-विधाता और वरदाता है। श्रेष्ठ नॉलेज की कलम बाप ने अपने बच्चों को दे दी है। इस कलम से जितनी लम्बी लकीर खींचनी चाहो, खींच सकते हो।
अध्याय: स्व-परिवर्तन का आधार — ‘सच्चे दिल की महसूसता’
मुरली संदर्भ
अव्यक्त बापदादा मुरली
तिथि: ____ (उचित तिथि भरें)
1️⃣ विश्व-परिवर्तन का लक्ष्य, फिर भी नम्बरवार क्यों?
आज बापदादा विश्व-परिवर्तक बच्चों को देख रहे हैं।
सभी के मन में एक उमंग है:
“विश्व परिवर्तन करना ही है — और होकर रहेगा।”
फिर भी परिणाम नम्बरवार क्यों?
कारण:
-
कोई सहज परिवर्तन कर लेते हैं
-
कोई संकल्प करते हैं, पर संस्कार रोक देते हैं
-
माया और परिस्थितियाँ हिम्मत कम कर देती हैं
-
ब्राह्मण परिवार के हिसाब-किताब उमंग घटा देते हैं
जहाँ हिम्मत नहीं — वहाँ उमंग नहीं
जहाँ उमंग नहीं — वहाँ तेज परिवर्तन नहीं
2️⃣ सच्ची सेवा की पहचान: दिल-पसन्द सफलता
ईश्वरीय सेवा केवल कार्य नहीं है — यह तीन स्तरों पर होती है:
🕊 तीन प्रकार की सेवा
-
वृत्ति – मन की स्थिति
-
वायब्रेशन – आंतरिक तरंगें
-
वाणी – बोले गए शब्द
यदि सेवा में ये तीनों हों:
✔ नि:स्वार्थ भाव
✔ निर्माण भाव
✔ शक्तिशाली संकल्प
तभी मिलती है दिल-पसन्द सफलता।
वरना क्या होता है?
-
कार्य तो होता है
-
लोग खुश भी होते हैं
-
स्वयं भी संतोष मिलता है
पर…
बापदादा के दिल में अंकित सफलता नहीं मिलती
3️⃣ स्व-परिवर्तन की कमी का मूल कारण
बापदादा ने देखा:
स्व-परिवर्तन की कमी का मूल कारण है —
“महसूसता शक्ति की कमी”
4️⃣ महसूसता शक्ति क्या है?
🔹 ज्ञान सुनना ≠ महसूस करना
जब तक बात दिल को छूती नहीं
तब तक जीवन नहीं बदलता
पहला आध्यात्मिक परिवर्तन कैसे हुआ?
“मैं आत्मा हूँ — बाप मेरा है”
यह केवल ज्ञान से नहीं हुआ
यह हुआ महसूसता से
उदाहरण:
-
पहले: पूजा करते थे
-
बाद में: आत्मा-चेतना अनुभव हुई
➡ जीवन बदल गया
5️⃣ महसूसता बनाती है तीव्र पुरुषार्थी
| बिना महसूसता | महसूसता के साथ |
|---|---|
| साधारण गति | तीव्र पुरुषार्थ |
| कभी उमंग, कभी गिरावट | स्थायी उत्साह |
| वातावरण पर निर्भर | स्व-शक्ति पर आधारित |
6️⃣ स्थायी परिवर्तन के लिए दो जरूरी महसूसताएँ
① अपनी कमजोरी की महसूसता
“हाँ, यह संस्कार मेरी उन्नति रोक रहा है”
② दूसरों की स्थिति की महसूसता
-
वह ऐसा क्यों बोल रहा है?
-
उसकी परिस्थिति क्या है?
-
उसकी भी मजबूरी हो सकती है
परिणाम:
-
प्रतिक्रिया नहीं
-
करुणा
-
समाधान शक्ति
7️⃣ महसूसता के तीन प्रकार
1️⃣ सच्चे दिल की महसूसता
-
दिल से पश्चाताप
-
दिल से परिवर्तन
-
दिलाराम की आशीर्वाद प्राप्त
2️⃣ चतुराई की महसूसता
-
समय देखकर भाव दिखाना
-
नाम कमाना
-
थोड़ी देर का प्रभाव
यह परिवर्तन नहीं — प्रदर्शन है
3️⃣ विवेक का दमन
मन कहता है — गलत है
विवेक कहता है — रुक जाओ
लेकिन…
-
नाम खराब न हो
-
इमेज न गिरे
इसलिए विवेक को दबा देना
बापदादा कहते हैं:
विवेक का खून भी पाप है
8️⃣ बापदादा का दिव्य दृष्टिकोण
-
हर आत्मा के कर्मों का खाता स्पष्ट
-
मन के संकल्पों का चार्ट सामने
-
तिथि, समय, स्थान — सब ज्ञात
फिर भी…
बाप अन्जान बनते हैं
क्योंकि वह रहमदिल हैं
9️⃣ स्व-परिवर्तन तेज क्यों नहीं?
कारण स्पष्ट है:
ज्ञान है
सेवा है
प्रयास हैलेकिन…
✅ सच्चे दिल की महसूसता नहीं
🔟 महसूसता शक्ति बढ़ाने के अभ्यास
दिव्य अनुभव साधनाएँ
🔹 अपने को बाप की आँखों का नूरा रत्न अनुभव करो
🔹 मस्तक पर चमकती मणि अनुभव करो
🔹 ब्रह्मा बाप की भुजा बन सेवा करते अनुभव करो
🔹 अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप महसूस करो
केवल वर्णन नहीं — अनुभव करो
1️⃣1️⃣ शक्तिशाली महसूसता का प्रभाव
जैसे:
साफ दर्पण में छोटा दाग भी दिखता है
वैसे:
-
आत्मा की कमजोरी स्पष्ट दिखेगी
-
परिवर्तन सहज होगा
1️⃣2️⃣ साथी बनना है या बाराती?
बाप साथ किसे ले जायेंगे?
कमजोर
लंगड़े पुरुषार्थ वाले
✅ बाप समान
✅ सम्पूर्ण
✅ शक्तिशाली
बारात बड़ी होगी
पर साथी समान होंगे
1️⃣3️⃣ सेवा में नई दिशा
अब केवल कार्यक्रम नहीं —
नवीनता का सूर्य उदय करो
-
जो किसी ने न किया हो
-
ऐसा आध्यात्मिक प्रयोग करो
-
जिससे विश्व बोले — यही दिव्य शक्ति है
1️⃣4️⃣ दिल का आराम क्या है?
साधन ≠ आराम
दिल में राम = सच्चा आराम
परिस्थिति कैसी भी हो
अंदर शांति स्थिर
1️⃣5️⃣ सर्व सहयोग से सफलता
ब्राह्मणों का टॉपिक:
सर्व के सहयोग से सफलता
दुनिया का टॉपिक:
सर्व के सहयोग से सुखमय संसार
1️⃣6️⃣ सेवा में नई वृद्धि (एडिशन)
पहले:
परिवार की आशीर्वाद लेकर कार्य
अब:
सर्व ब्राह्मणों की शुभभावना लेकर सेवा
➡ कार्य स्वतः सफल
1️⃣7️⃣ सिद्धियों का समय
-
आपकी दृष्टि से कार्य सिद्ध होंगे
-
डायरेक्शन से समाधान होंगे
-
भीड़ पीछे चलेगी
पर सावधानी:
सिद्धि में फँसना नहीं
सिद्धि के स्वामी बनना है
1️⃣8️⃣ महान पुण्य आत्मा कौन?
जैसे:
पानी प्यास बुझाता है
वैसे:
ज्ञान-अमृत आत्मा की प्यास बुझाता है
जो ज्ञान बाँटते हैं:
✅ वही पुण्य आत्मा
✅ वही भाग्यवान
✅ वही सच्चे दाता
अंतिम संदेश
स्व-परिवर्तन का आधार है — महसूसता शक्ति
महसूसता का आधार है — सच्चा दिल
सच्चे दिल का फल है — दिलाराम की आशीर्वाद
बापदादा का यादप्यार
सर्व शक्तिशाली
तीव्र पुरुषार्थी
दिल-पसन्द सेवाधारी
सच्चे दिल वाले बच्चों को
दिलाराम बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
1️⃣ प्रश्न: विश्व-परिवर्तन का लक्ष्य सबका एक है, फिर भी परिणाम नम्बरवार क्यों आते हैं?
उत्तर:
क्योंकि सभी की आंतरिक स्थिति समान नहीं है।
-
कुछ आत्माएँ सहज और शीघ्र स्व-परिवर्तन कर लेती हैं
-
कुछ संकल्प तो करते हैं, लेकिन संस्कार बाधा बन जाते हैं
-
माया और परिस्थितियाँ हिम्मत कम कर देती हैं
-
ब्राह्मण परिवार के हिसाब-किताब उमंग घटा देते हैं
जहाँ हिम्मत नहीं, वहाँ उमंग नहीं
जहाँ उमंग नहीं, वहाँ तेज परिवर्तन नहीं
2️⃣ प्रश्न: सच्ची ईश्वरीय सेवा की पहचान क्या है?
उत्तर:
ईश्वरीय सेवा केवल बाहरी कार्य नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर होती है:
🕊 तीन प्रकार की सेवा:
-
वृत्ति — मन की पवित्र स्थिति
-
वायब्रेशन — आत्मा की शक्तिशाली तरंगें
-
वाणी — मधुर और सत्य शब्द
जब सेवा में ये तीनों हों:
✔ नि:स्वार्थ भाव
✔ निर्माण भाव
✔ शक्तिशाली संकल्प
तभी मिलती है दिल-पसन्द सफलता।
अन्यथा:
कार्य होता है, लोग खुश होते हैं, स्वयं भी संतोष मिलता है
पर बापदादा के दिल में सच्ची सफलता अंकित नहीं होती।
3️⃣ प्रश्न: स्व-परिवर्तन में कमी का मूल कारण क्या है?
उत्तर:
बापदादा के अनुसार:
स्व-परिवर्तन की कमी का मूल कारण है —
महसूसता शक्ति की कमी
4️⃣ प्रश्न: महसूसता शक्ति क्या है?
उत्तर:
ज्ञान सुनना और ज्ञान को महसूस करना अलग बातें हैं।
जब तक बात दिल को स्पर्श नहीं करती, जीवन नहीं बदलता।
पहला आध्यात्मिक परिवर्तन —
“मैं आत्मा हूँ, बाप मेरा है” —
यह केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि महसूसता से हुआ।
उदाहरण:
-
पहले: पूजा-पाठ करते थे
-
बाद में: आत्म-चेतना का अनुभव हुआ
➡ जीवन की दिशा बदल गई
5️⃣ प्रश्न: महसूसता शक्ति पुरुषार्थ को कैसे बदलती है?
उत्तर:
| बिना महसूसता | महसूसता के साथ |
|---|---|
| साधारण गति | तीव्र पुरुषार्थ |
| उमंग में उतार-चढ़ाव | स्थायी उत्साह |
| वातावरण पर निर्भर | स्व-शक्ति पर आधारित |
6️⃣ प्रश्न: स्थायी स्व-परिवर्तन के लिए किन महसूसताओं की आवश्यकता है?
उत्तर: दो विशेष महसूसताएँ आवश्यक हैं:
① अपनी कमजोरी की महसूसता
“यह संस्कार मेरी उन्नति में बाधा है।”
② दूसरों की स्थिति की महसूसता
-
वह ऐसा क्यों बोल रहा है?
-
उसकी परिस्थिति क्या है?
-
उसकी भी कोई मजबूरी हो सकती है
परिणाम:
-
प्रतिक्रिया समाप्त
-
करुणा जागृत
-
समाधान शक्ति विकसित
7️⃣ प्रश्न: महसूसता के कितने प्रकार हैं?
उत्तर: तीन प्रकार की महसूसता होती है:
1️⃣ सच्चे दिल की महसूसता
-
दिल से पश्चाताप
-
दिल से परिवर्तन
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दिलाराम की आशीर्वाद प्राप्त
2️⃣ चतुराई की महसूसता
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समय देखकर भाव दिखाना
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नाम और प्रशंसा पाना
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अल्पकालिक प्रभाव
यह वास्तविक परिवर्तन नहीं, केवल प्रदर्शन है।
3️⃣ विवेक का दमन
विवेक रोकता है, पर इमेज बचाने के लिए उसे दबा देना।
बापदादा कहते हैं — विवेक का खून करना भी पाप है।
8️⃣ प्रश्न: बापदादा बच्चों को कैसे देखते हैं?
उत्तर:
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हर आत्मा के कर्मों का खाता स्पष्ट है
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मन के संकल्पों का चार्ट सामने है
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तिथि, समय, स्थान सब ज्ञात है
फिर भी बाप अन्जान बनते हैं क्योंकि वे रहमदिल हैं।
9️⃣ प्रश्न: स्व-परिवर्तन तेज गति से क्यों नहीं हो पा रहा?
उत्तर:
ज्ञान है
सेवा है
प्रयास है
लेकिन…
सच्चे दिल की महसूसता नहीं है।
🔟 प्रश्न: महसूसता शक्ति कैसे बढ़ाएँ?
उत्तर: दिव्य अनुभव का अभ्यास करें:
🔹 स्वयं को बाप की आँखों का नूरा रत्न अनुभव करें
🔹 मस्तक पर चमकती दिव्य मणि अनुभव करें
🔹 ब्रह्मा बाप की भुजा बन सेवा करते अनुभव करें
🔹 स्वयं को अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप में देखें
केवल वर्णन नहीं — गहरा अनुभव करें।
1️⃣1️⃣ प्रश्न: शक्तिशाली महसूसता का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
जैसे साफ दर्पण में छोटा दाग भी दिखता है,
वैसे ही आत्मा की सूक्ष्म कमजोरी स्पष्ट दिखाई देती है।
➡ परिवर्तन सहज और स्थायी हो जाता है।
1️⃣2️⃣ प्रश्न: बाप के साथी कौन बनेंगे — साथी या बाराती?
उत्तर:
कमजोर पुरुषार्थ वाले — बाराती
✅ बाप समान, शक्तिशाली, सम्पूर्ण — साथी
बारात बड़ी होगी, पर साथी समान होंगे।
1️⃣3️⃣ प्रश्न: सेवा में अब क्या नवीनता चाहिए?
उत्तर:
केवल कार्यक्रम नहीं — नवीनता का सूर्य उदय करो।
ऐसा आध्यात्मिक प्रयोग करो जो पहले कभी न हुआ हो,
जिससे विश्व अनुभव करे — यही दिव्य शक्ति है।
1️⃣4️⃣ प्रश्न: सच्चा आराम क्या है?
उत्तर:
साधन होना आराम नहीं है।
दिल में राम होना ही सच्चा आराम है।
परिस्थिति कैसी भी हो,
अंदर शांति और स्थिरता बनी रहे — यही आराम है।
1️⃣5️⃣ प्रश्न: सफलता का मुख्य सूत्र क्या है?
उत्तर:
ब्राह्मणों का विषय:
➡ सर्व के सहयोग से सफलता
दुनिया का विषय:
➡ सर्व के सहयोग से सुखमय संसार
1️⃣6️⃣ प्रश्न: सेवा में कौन-सी नई वृद्धि आवश्यक है?
उत्तर:
पहले: परिवार की आशीर्वाद लेकर कार्य
अब: सर्व ब्राह्मणों की शुभभावना लेकर सेवा
➡ कार्य स्वतः सफल होता है।
1️⃣7️⃣ प्रश्न: सिद्धियों के समय में क्या सावधानी रखनी है?
उत्तर:
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दृष्टि से कार्य सिद्ध होंगे
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डायरेक्शन से समाधान होंगे
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लोग आकर्षित होंगे
⚠ सावधानी:
सिद्धियों में फँसना नहीं
सिद्धियों के स्वामी बनना है
1️⃣8️⃣ प्रश्न: महान पुण्य आत्मा किसे कहा जाता है?
उत्तर:
जैसे जल प्यास बुझाता है,
वैसे ज्ञान-अमृत आत्मा की प्यास बुझाता है।
जो ज्ञान बाँटते हैं:
✅ वही पुण्य आत्मा
✅ वही भाग्यवान
✅ वही सच्चे दाता
अंतिम संदेश
स्व-परिवर्तन का आधार — महसूसता शक्ति
महसूसता का आधार — सच्चा दिल
सच्चे दिल का फल — दिलाराम की आशीर्वाद
बापदादा का यादप्यार
सर्व शक्तिशाली, तीव्र पुरुषार्थी, दिल-पसन्द सेवाधारी,
सच्चे दिल वाले बच्चों को दिलाराम बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
Disclaimer (डिस्क्लेमर)
यह वीडियो ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं मुरली बिंदुओं पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है। इसका उद्देश्य आत्म-जागृति, स्व-परिवर्तन और सकारात्मक जीवन मूल्यों को प्रोत्साहित करना है। इसे धार्मिक विवाद या किसी मत के खंडन के रूप में न लें।
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