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छठा विषय – रोज मुरली क्यों?
मुरली क्लास का रहस्य क्यों कहा जाता है?
यह आत्मा की रोज की डोज है। इसलिए आपको रोज मुरली पढ़ने और मुरली सुनने के लिए आना है।
यह ऐसा क्यों कहा जाता है?
बीके स्टूडेंट्स के लिए यह क्यों जरूरी है?
रोज मुरली क्यों?
बीके लाइफ की सबसे जरूरी क्लास।
मुरली आत्मा की पावर है, शक्ति है।
डिस्क्लेमर
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की साकार मुरलियों, आध्यात्मिक शिक्षाओं और अध्ययन अनुभव पर आधारित है। इसका उद्देश्य मुरली क्लास के आध्यात्मिक महत्व को समझाना है, ना कि किसी पर इसे अनिवार्य रूप से अपनाने का दबाव बनाना। दर्शक इसे ज्ञानवर्धन और आत्मचिंतन के दृष्टिकोण से देखें।
मुरली क्लास का रहस्य
मुरली क्लास का क्या रहस्य है?
क्यों जरूरी है बीके स्टूडेंट्स के लिए?
यह एक सामान्य प्रश्न है।
बहुत लोग पूछते हैं कि बीके छात्र रोज मुरली क्यों पढ़ते हैं?
क्या यह अनिवार्य है?
क्या यह प्रवचन है?
क्या यह धार्मिक प्रवचन है?
कुछ लोग कहते हैं –
एक ही बात रोजाना सुनने की क्या जरूरत है?
आज हम मुरली क्लास के रहस्य को गहराई से समझेंगे।
क्योंकि बीके जीवन को समझना है तो मुरली को समझना अनिवार्य है। बिना मुरली को समझे ब्रह्मा कुमारी के जीवन को पूरी तरह समझना संभव नहीं।
मुरली शब्द का अर्थ क्या है?
मुरली शब्द का अर्थ क्या है?
मुरली का अर्थ है – बाबा की श्रीमत, बाबा का डायरेक्शन।
बाबा हमें बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।
मुरली का अर्थ बांसुरी भी होता है।
जैसे बांसुरी से मधुर ध्वनि निकलती है, वैसे ही मुरली से आत्मा को ज्ञान की मधुर ध्वनि मिलती है।
परमात्मा के मुख से जो वचन बोले जाते हैं, उन्हें मुरली कहा जाता है।
हमारे शरीर में फेफड़ों से लेकर मुख तक जो नली है, उसी से आवाज निकलती है। उसी प्रकार बांसुरी में भी हवा से ध्वनि बनती है।
जब हवा बांसुरी से गुजरती है और बीच में छेदों के कारण रुकावटें बनती हैं, तो संगीत उत्पन्न होता है। उसी प्रकार हमारे मुख से शब्द निकलते हैं और उनमें भाव जुड़ते हैं।
शब्दों में जितना ज्ञान, सच्चाई और प्यार होगा, उतना ही उनका प्रभाव होगा।
परमात्मा कहते हैं –
मैं ब्रह्मा बाबा के मुख से जो ज्ञान सुनाता हूं, वही मेरी मुरली है।
ब्रह्मा बाबा सुनाते हैं तो वह ब्रह्मा बाबा की मुरली है।
आप जो सुनाते हैं वह आपकी मुरली है।
इसको आकाशवाणी भी कहा जाता है।
लेकिन मुरली का अर्थ केवल बांसुरी नहीं है।
यह कृष्ण की बांसुरी नहीं है।
यह परमात्मा द्वारा दिया गया ज्ञान है।
यह आत्मा के लिए दैनिक मार्गदर्शन है।
मुरली प्रवचन नहीं – पढ़ाई है
साकार मुरली 12 जनवरी 1970 में बाबा ने कहा –
यह पढ़ाई है।
मुरली प्रवचन नहीं है।
यह आध्यात्मिक पाठशाला की डेली क्लास है।
क्योंकि हर विद्यार्थी को रोज पढ़ना होता है।
साकार मुरली 9 मार्च 1970 में कहा गया –
तुम स्टूडेंट हो। स्टूडेंट लाइफ श्रेष्ठ है।
यदि बीके छात्र स्वयं को स्टूडेंट मानते हैं, तो मुरली उनकी डेली लेसन है।
उदाहरण
यदि मेडिकल स्टूडेंट रोज पढ़ाई ना करे तो वह डॉक्टर नहीं बन सकता।
उसी प्रकार आत्मा यदि रोज अध्ययन ना करे तो परिवर्तन अधूरा रहेगा।
मुरली क्लास में क्या होता है?
मुरली क्लास में पाँच मुख्य बातें होती हैं:
मुरली वाचन – मुरली पढ़कर सुनाई जाती है।
समझना और समझाना – मुरली का अर्थ समझाया जाता है।
चिंतन – उस ज्ञान पर मनन किया जाता है।
आत्म समीक्षा – अपने जीवन में उसे कैसे लागू करना है, यह सोचा जाता है।
अनुभव साझा करना – धारणाओं से मिले अनुभव दूसरों के साथ साझा किए जाते हैं।
इस प्रकार मुरली केवल सुनने की चीज नहीं है, बल्कि यह एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक अध्ययन प्रक्रिया है।
मुरली क्यों रोज जरूरी है?
क्योंकि –
मन रोज प्रभावित होता है
कर्म रोज होते हैं
वातावरण रोज बदलता है
संस्कार रोज सक्रिय होते हैं
इसलिए आत्मा को रोज ज्ञान की आवश्यकता होती है।
साकार मुरली 4 मार्च 1970 में कहा गया –
रोज-रोज पढ़ना है।
उदाहरण
जैसे शरीर को रोज भोजन चाहिए,
वैसे आत्मा को रोज ज्ञान चाहिए।
यदि आत्मा को ज्ञान नहीं मिलेगा तो वह कमजोर हो जाएगी।
मुरली और आत्म परिवर्तन
मुरली का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है।
मुरली का उद्देश्य है – जीवन में परिवर्तन लाना।
साकार मुरली 23 अक्टूबर 1969 में कहा गया –
पहले अपने को बदलो।
मुरली एक दर्पण की तरह है।
जैसे डॉक्टर रिपोर्ट दिखाता है और हम सुधार ना करें तो बीमारी बढ़ती है।
वैसे ही मुरली हमारी कमियों को दिखाती है।
यदि हम उन्हें सुधारें नहीं तो परिवर्तन संभव नहीं।
मुरली और परमात्मा से संबंध
मुरली केवल शब्द नहीं है।
यह परमात्मा के साथ संवाद है।
साकार मुरली 18 मार्च 1970 में कहा गया –
तुम्हारा टीचर एक है – शिव बाबा।
जब छात्र रोज अपने टीचर को सुनता है, तभी संबंध मजबूत होता है।
क्या केवल पढ़ लेना पर्याप्त है?
नहीं।
मुरली को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है।
उसके पाँच चरण हैं:
पढ़ना
समझना
मनन करना
जीवन में धारण करना
अनुभव साझा करना
साकार मुरली 2 जुलाई 1970 –
धारणाओं से परिवर्तन होगा।
मुरली और संगम युग
बीके ज्ञान के अनुसार यह विशेष समय की पढ़ाई है।
साकार मुरली 23 अक्टूबर 1969 –
यह संगम युग की पढ़ाई है।
संगम युग को डायमंड एज कहा जाता है।
यह वह समय है जब आत्माएँ पुनः डायमंड बनती हैं।
रिपीटेशन क्यों जरूरी है?
लोग पूछते हैं –
एक ही बात बार-बार क्यों?
क्योंकि रिपीटेशन ट्रांसफॉर्मेशन का आधार है।
जैसे जिम में एक एक्सरसाइज रोज करने से मसल मजबूत होते हैं।
वैसे ही ज्ञान की पुनरावृत्ति से संस्कार बदलते हैं।
यदि मुरली ना पढ़ें तो क्या होगा?
कोई सजा नहीं है।
लेकिन –
क्लैरिटी कम हो जाएगी
शक्ति कम हो जाएगी
दिशा स्पष्ट नहीं रहेगी
साकार मुरली 10 फरवरी 1970 –
जितनी याद उतनी शक्ति।
मुरली क्लास का गहरा रहस्य
मुरली आत्मा का GPS है।
जैसे GPS हमें रास्ता दिखाता है, वैसे ही मुरली जीवन की दिशा दिखाती है।
मुरली है –
जीवन का ब्लूप्रिंट
चेतावनी प्रणाली
प्रेरणा स्रोत
परिवर्तन की विधि
निष्कर्ष – मुरली क्यों जरूरी है?
एक वाक्य में –
मुरली बीके स्टूडेंट की डेली डोज है।
यह आत्मा की आध्यात्मिक इम्यूनिटी है।
यह परमात्मा का सीधा मार्गदर्शन है।
यह आत्म परिवर्तन का उपकरण है।
साकार मुरली 12 जनवरी 1970 –
यह पढ़ाई है।
पावरफुल क्लोजिंग
मुरली क्लास कोई अनिवार्य रस्म नहीं है।
यह आत्मा का दैनिक पोषण है।
जिस दिन आत्मा पढ़ाई बंद करती है, उसी दिन उसका विकास रुक जाता है।
इसलिए कहा जाता है —
मुरली केवल क्लास नहीं, जीवन की दिशा है।Z
