27/27-12-1987-Signs of the Victorious, Resolute Intellect”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“निश्चय बुद्धि विजयी रत्नों की निशानियाँ”

आज बापदादा अपने चारों ओर के निश्चयबुद्धि विजयी बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे के निश्चय की निशानियाँ देख रहे हैं। निश्चय की विशेष निशानियाँ (1) जैसा निश्चय वैसा कर्म, वाणी में हर समय चेहरे पर रूहानी नशा दिखाई देगा। (2) हर कर्म, संकल्प में विजय सहज प्रत्यक्षफल के रूप में अनुभव होगी। मेहनत के रूप में नहीं, लेकिन प्रत्यक्षफल वा अधिकार के रूप में विजय अनुभव होगी। (3) अपने श्रेष्ठ भाग्य, श्रेष्ठ जीवन वा बाप और परिवार के सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा एक परसेन्ट भी संशय संकल्पमात्र भी नहीं होगा। (4) क्वेश्चन मार्क समाप्त, हर बात में बिन्दु बन बिन्दु लगाने वाले होंगे। (5) निश्चयबुद्धि हर समय अपने को बेफिकर बादशाह सहज स्वत: अनुभव करेंगे अर्थात् बार-बार स्मृति लाने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। मैं बादशाह हूँ, यह कहने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी लेकिन सदा स्थिति के श्रेष्ठ आसन वा सिंहासन पर स्थित हैं ही। जैसे लौकिक जीवन में कोई भी परिस्थिति प्रमाण स्थिति बनती है। चाहे दु:ख की, चाहे सुख की, उस स्थिति की अनुभूति में स्वत: ही रहते हैं, बार-बार मेहनत नहीं करते – मैं सुखी हूँ वा मैं दु:खी हूँ। बेफिकर बादशाह की स्थिति का अनुभव स्वत: सहज होता है। अज्ञानी जीवन में परिस्थितियों प्रमाण स्थिति बनती है लेकिन शक्तिशाली अलौकिक ब्राह्मण जीवन में परिस्थिति प्रमाण स्थिति नहीं बनती लेकिन बेफिकर बादशाह की स्थिति वा श्रेष्ठ स्थिति बापदादा द्वारा प्राप्त हुई नॉलेज की लाइट-माइट द्वारा, याद की शक्ति द्वारा जिसको कहेंगे ज्ञान और योग की शक्तियों का वर्सा बाप द्वारा मिलता है। तो ब्राह्मण जीवन में बाप के वर्से द्वारा वा सतगुरू के वरदान द्वारा वा भाग्यविधाता द्वारा प्राप्त हुए श्रेष्ठ भाग्य द्वारा स्थिति प्राप्त होती है। अगर परिस्थिति के आधार पर स्थिति है तो शक्तिशाली कौन हुआ? परिस्थिति पॉवरफुल हो जायेगी ना। और परिस्थिति के आधार पर स्थिति बनाने वाला कभी भी अचल, अडोल नहीं रह सकता। जैसे अज्ञानी जीवन में अभी-अभी देखो बहुत खुशी में नाच रहे हैं और अभी-अभी उल्टे सोये हुए हैं। तो अलौकिक जीवन में ऐसी हलचल वाली स्थिति नहीं होती। परिस्थिति के आधार पर नहीं लेकिन अपने वर्से और वरदान के आधार पर वा अपनी श्रेष्ठ स्थिति के आधार पर परिस्थिति को परिवर्तन करने वाला होगा। तो निश्चय बुद्धि इस कारण सदा बेफिकर बादशाह है क्योंकि फिकर होता है कोई अप्राप्ति वा कमी होने के कारण। अगर सर्व प्राप्तिस्वरूप है, मास्टर सर्वशक्तिवान है तो फिकर किस बात का रहा?

(6) निश्चयबुद्धि अर्थात् सदा बाप पर बलिहार जाने वाले। बलिहार अर्थात् सर्वन्श समर्पित। सर्व वंश सहित समर्पित। चाहे देह भान में लाने वाले विकारों का वंश, चाहे देह के सम्बन्ध का वंश, चाहे देह के विनाशी पदार्थों की इच्छाओं का वंश। सर्व वंश में यह सब आ जाता है। सर्वन्श समर्पित वा सर्वन्श त्यागी एक ही बात है। समर्पित होना इसको नहीं कहा जाता कि मधुबन में बैठ गये वा सेवाकेन्द्रों पर बैठ गये। यह भी एक सीढ़ी है जो सेवा अर्थ अपने को अर्पण करते हैं लेकिन ‘सर्वन्श अर्पित’ – यह सीढ़ी की मंजिल है। एक सीढ़ी चढ़ गये लेकिन मंजिल पर पहुँचने वाले निश्चय बुद्धि की निशानी है – तीनों ही वंश सहित अर्पित। तीनों ही बातें स्पष्ट जान गये ना। वंश तब समाप्त होता है जब स्वप्न वा संकल्प में भी अंश मात्र नहीं। अगर अंश है तो वंश पैदा हो ही जायेगा। इसलिए सर्वन्श त्यागी की परिभाषा अति गुह्य है। यह भी कभी सुनायेंगे।

(7) निश्चयबुद्धि सदा बेफिकर, निश्चिन्त होगा। हर बात में विजय प्राप्त होने के नशे में निश्चित अनुभव करेगा। तो निश्चय, निश्चिन्त और निश्चित – यह हर समय अनुभव करायेगा।

(8) वह सदा स्वयं भी नशे में रहेंगे और उनके नशे को देख दूसरों को भी यह रूहानी नशा अनुभव होगा। औरों को भी रूहानी नशे में बाप की मदद से स्वयं की स्थिति से अनुभव करायेगा।

निश्चयबुद्धि की वा रूहानी नशे में रहने वाले के जीवन की विशेषतायें क्या होंगी? पहली बात – जितना ही श्रेष्ठ नशा उतना ही निमित्त भाव हर जीवन के चरित्र में होगा। निमित्त भाव की विशेषता के कारण निर्मान बुद्धि। बुद्धि पर ध्यान देना – जितनी निर्मान बुद्धि होगी उतनी निर्माण, नव निर्माण कहते हो ना। तो नव निर्माण करने वाली बुद्धि होगी। तो निर्माण भी होंगे, निर्मान भी होंगे। जहाँ यह विशेषतायें हैं उसको ही कहा जाता है निश्चयबुद्धि विजयी। निमित्त, निर्मान और निर्माण। निश्चयबुद्धि की भाषा क्या होगी? निश्चयबुद्धि की भाषा में सदा मधुरता तो कॉमन बात है लेकिन उदारता होगी। उदारता का अर्थ है सर्व आत्माओं के प्रति आगे बढ़ाने की उदारता होगी। ‘पहले आप’, ‘मैं-मैं’ नहीं। उदारता अर्थात् दूसरे को आगे रखना। जैसे ब्रह्मा बाप ने सदैव पहले जगत अम्बा वा बच्चों को रखा – मेरे से भी तीखी जगदम्बा है, मेरे से भी तीखे यह बच्चे हैं। यह उदारता की भाषा है। और जहाँ उदारता है, स्वयं के प्रति आगे रहने की इच्छा नहीं है, वहाँ ड्रामा अनुसार स्वत: ही मनइच्छित फल प्राप्त हो ही जाता है। जितना स्वयं इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति में रहते, उतना बाप और परिवार अच्छा, योग्य समझ उसको ही पहले रखते हैं। तो पहले आप मन से कहने वाले पीछे रह नहीं सकते। वह मन से पहले आप कहता तो सर्व द्वारा पहले आप हो ही जाता है। लेकिन इच्छा वाला नहीं। तो निश्चयबुद्धि की भाषा सदा उदारता वाली भाषा, सन्तुष्टता की भाषा, सर्व के कल्याण की भाषा। ऐसी भाषा वाले को कहेंगे निश्चयबुद्धि विजयी। निश्चयबुद्धि तो सभी हो ना? क्योंकि निश्चय ही फाउण्डेशन है।

लेकिन जब परिस्थितियों का, माया का, संस्कारों का, भिन्न-भिन्न स्वभावों का तूफान आता है तब मालूम पड़ता है निश्चय का फाउण्डेशन कितना मजबूत है। जैसे इस पुरानी दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रकार के तूफान आते हैं ना। कभी वायु का, कभी समुद्र का… ऐसे यहाँ भी भिन्न-भिन्न प्रकार के तूफान आते हैं। तूफान क्या करता है? पहले उड़ाता है फिर फेंकता है। तो यह तूफान भी पहले तो अपनी तरफ मौज में उड़ाते हैं। अल्पकाल के नशे में ऊंचे ले जाते हैं क्योंकि माया भी जान गई है कि बिना प्राप्ति यह मेरी तरफ होने वाले नहीं है। तो पहले आर्टीफीशल प्राप्ति में ऊपर उड़ाती है। फिर नीचे गिरती कला में ले आती है। चतुर है। तो निश्चयबुद्धि की नज़र त्रिनेत्री होती है, तीसरे नेत्र से तीनों कालों को देख लेते हें, इसलिए कभी धोखा नहीं खा सकते। तो निश्चय की परख तूफान के समय होती है। जैसे तूफान बड़े-बड़े पुराने वृक्ष के फाउण्डेशन को उखाड़ लेते हैं। तो यह माया के तूफान भी निश्चय के फाउण्डेशन को उखेड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन रिजल्ट में उखड़ते कम हैं, हिलते ज्यादा हैं। हिलने से भी फाउण्डेशन कच्चा हो जाता है। तो ऐसे समय पर अपने निश्चय के फाउण्डेशन को चेक करो। वैसे कोई से भी पूछेंगे – निश्चय पक्का है? तो क्या कहेंगे? बहुत अच्छा भाषण करेंगे। अच्छा भी है निश्चय में रहना। लेकिन समय पर अगर निश्चय हिलता भी है तो निश्चय का हिलना अर्थात् जन्म-जन्म की प्रालब्ध से हिलना। इसलिए तूफानों के समय चेक करो – कोई हद का मान-शान न दे वा व्यर्थ संकल्पों के रूप में माया का तूफान आये, जो चाहना रखते हो वह चाहना अर्थात् इच्छा पूर्ण न हो, ऐसे टाइम पर जो निश्चय है कि मैं समर्थ बाप की समर्थ आत्मा हूँ – वह याद रहता है वा व्यर्थ समर्थ के ऊपर विजयी हो जाता है? अगर व्यर्थ विजय प्राप्त कर लेता है तो निश्चय का फाउण्डेशन हिलेगा ना। समर्थ के बजाए अपने को कमजोर आत्मा अनुभव करेगा। दिलशिकस्त हो जायेंगे। इसलिए कहते हैं कि तूफान के समय चेक करो। हद का मान-शान, मैं-पन रूहानी शान से नीचे ले आता है। हद की कोई भी इच्छा, इच्छा मात्रम् अविद्या के निश्चय से नीचे ले आती है। तो निश्चय का अर्थ यह नहीं है कि मैं शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ। लेकिन कौनसी आत्मा हूँ! वह नशा, वह स्वमान समय पर अनुभव हो, इसको कहते हैं निश्चयबुद्धि विजयी। कोई पेपर है ही नहीं और कहे – मैं तो पास विद् ऑनर हो गया, तो कोई उसको मानेगा? सर्टीफिकेट चाहिए ना। कितना भी कोई पास हो जाए, डिग्री ले लेवे लेकिन जब तक सर्टीफिकेट नहीं मिलता है तो वैल्यू नहीं होती। पेपर के समय पेपर दे पास हो सर्टीफिकेट ले – बाप से, परिवार से, तब उसको कहेंगे निश्चयबुद्धि विजयी। समझा? तो फाउण्डेशन को भी चेक करते रहो। निश्चयबुद्धि की विशेषता सुनी ना। जैसा समय वैसे रूहानी नशा जीवन में दिखाई दे। सिर्फ अपना मन खुश न हो लेकिन लोग भी खुश हों। सभी अनुभव करें कि हाँ यह नशे में रहने वाली आत्मा है। सिर्फ मनपसन्द नहीं लेकिन लोकपसन्द, बाप पसन्द। इसको कहते हैं विजयी। अच्छा!

सर्व निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों को, सर्व निश्चिन्त, बेफिकर बच्चों को, सर्व निश्चित विजय के नशे में रहने वाले रूहानी आत्माओं को, सर्व तूफानों को पार कर तोहफा अनुभव करने वाले विशेष आत्माओं को, सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले निश्चयबुद्धि बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

विदेशी भाई बहिनों से बापदादा की मुलाकात:- अपने को समीप रत्न अनुभव करते हो? समीप रत्न की निशानी क्या है? वह सदा, सहज और स्वत: ज्ञानी तू आत्मा, योगी तू आत्मा, गुणमूर्त सेवाधारी अनुभव करेंगे। समीप रत्न के हर कदम में यह चार ही विशेषतायें सहज अनुभव होंगी, एक भी कम नहीं होगी। ज्ञान में कम हो, योग में तेज हो या दिव्यगुणों की धारणा में कमजोर हो, वह सबमें सदा ही सहज अनुभव करेगा। समीप रत्न किसी भी बात में मेहनत नहीं अनुभव करेंगे लेकिन सहज सफलता अनुभव करेंगे। क्योंकि बापदादा बच्चों को संगमयुग पर मेहनत से ही छुड़ाते हैं। 63 जन्म मेहनत की है ना। चाहे शरीर की मेहनत की, चाहे मन की मेहनत की। बाप को प्राप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न साधन अपनाते रहे। तो यह मन की मेहनत की। और धन की भी देखो, जो सर्विस करते हो, जिसको बापदादा नौकरी कहते, उसमें भी देखो कितनी मेहनत करते हो! उसमें भी तो मेहनत लगती है ना। और अभी आधाकल्प के लिए यह नौकरी नहीं करेंगे, इससे भी छूट जायेंगे। न लौकिक नौकरी करेंगे, न भक्ति करेंगे – दोनों से मुक्ति मिल जायेगी। अभी भी देखो, चाहे लौकिक कार्य करते भी हो लेकिन ब्राह्मण जीवन में आने से लौकिक कार्य करते हुए भी अन्तर लगता है ना। अभी यह लौकिक कार्य करते भी डबल लाइट रहते हो, क्यों? क्योंकि लौकिक कार्य करते भी यह खुशी रहती है कि यह कार्य अलौकिक सेवा के निमित्त कर रहे हैं। अपने मन की तो इच्छायें नहीं हैं ना। तो जहाँ इच्छा होती है वहाँ मेहनत लगती है। अभी निमित्त मात्र करते हो क्योंकि मालूम है कि तन, मन, धन तीनों लगाने से एक का पद्मगुणा अविनाशी बैंक में जमा हो रहा है। फिर जमा किया हुआ खाते रहना। पुरूषार्थ से – योग लगाने का, ज्ञान सुनने-सुनाने का, इस मेहनत से भी छूट जायेंगे। कभी-कभी क्लासेज सुनकर थक जाते हैं ना। वहाँ तो लौकिक राजनीतिक पढ़ाई भी जो होगी ना, वह भी खेल-खेल में होगी, इतने किताब नहीं याद करने पड़ेंगे। सब मेहनत से छूट जायेंगे। कइयों को पढ़ाई का भी बोझ होता है। संगमयुग पर मेहनत से छूटने के संस्कार भरते हो। चाहे माया के तूफान आते भी हैं, लेकिन यह माया से विजय प्राप्त करना भी एक खेल समझते हो, मेहनत नहीं। खेल में भी क्या होता है? जीत प्राप्त करना होता है ना। तो माया से भी विजय प्राप्त करने का खेल करते हो। खेल लगता है या बड़ी बात लगती है? जब मास्टर सर्वशक्तिवान स्टेज पर स्थित होते हो तो खेल लगेगा। और ही चैलेन्ज करते हो कि आधाकल्प के लिए विदाई लेकर जाओ। तो विदाई समारोह मनाने आती है, लड़ने नहीं आती है। विजयी रत्न हर समय, हर कार्य में विजयी हैं। विजयी हो ना? (हाँ जी) तो वहाँ जाकर भी ‘हाँ जी करना’। फिर भी अच्छे बहादुर हो गये हैं। पहले थोड़े जल्दी घबरा जाते थे, अभी बहादुर हो गये हैं। अभी अनुभवी हो गये हैं। तो अनुभव की अथॉरिटी वाले हो गये, परखने की भी शक्ति आ गई है, इसलिए घबराते नहीं हैं। अनेक बार के विजयी थे, हैं और रहेंगे – यही स्मृति सदा रखना। अच्छा!

विदाई के समय दादियों से:- (दादी जानकी बम्बई से 3-4 दिन का चक्र लगाकर आई है) अभी से ही चक्रवर्ती बन गई। अच्छा है, यहाँ भी सेवा है, वहाँ भी सेवा की। यहाँ रहते भी सेवा करते और जहाँ जाते वहाँ भी सेवा हो जाती। सेवा का ठेका बहुत बड़ा लिया है। बड़े ठेकेदार हो ना। छोटे-छोटे ठेकेदार तो बहुत हैं लेकिन बड़े ठेकेदार को बड़ा काम करना पड़ता है। (बाबा आज मुरली सुनते बहुत मजा आया) है ही मजा। अच्छा है, आप लोग कैच करके औरों को क्लीयर कर सकते हो। सभी तो एक जैसे कैच कर नहीं सकते। जैसे जगदम्बा मुरली सुनकर क्लीयर करके, सहज करके सभी को धारण कराती रही, ऐसे अभी आप निमित्त हो। कई नये-नये तो समझ भी नहीं सकते हैं। लेकिन बापदादा सिर्फ सामने वालों को नहीं देखते। जो बैठे हैं सभा में, उन्हें ही नहीं देखते, सभी को सामने रखते हैं। फिर भी सामने अनन्य होते हैं तो उन्हों के प्रति निकलता है। आप लोग तो पढ़कर भी कैच कर सकते हो। अच्छा!

पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-

1\. स्वयं को स्वराज्य अधिकारी, राजयोगी श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? स्वराज्य मिला है वा मिलना है? स्वराज्य अधिकारी अर्थात् राजयोगी आत्मा सदा ही स्वराज्य की अधिकारी होने के कारण शक्तिशाली है। राजा अर्थात् शक्तिशाली। अगर राजा हो और निर्बल हो, तो शक्तिहीन को राजा कौन मानेगा? प्रजा उनके राजा हो और निर्बल हो, तो शक्तिहीन को राजा कौन मानेगा? प्रजा उनके ऊपर और ही राज्य करेगी। तो स्वराज्य अधिकारी अर्थात् सदा शक्तिशाली आत्मा ही कर्मेन्द्रियों पर अर्थात् अपने कर्मचारियों के ऊपर राज्य कर सकती है, जैसे चाहे चला सकती हैं। नहीं तो प्रजा, राजा को चलायेगी। प्रजा, राजा को चलाये तो प्रजा ही राजा हो गई ना। नियम प्रमाण राजा, प्रजा को चलाता है। अगर प्रजा का राज्य है तो राजा नहीं कहेंगे, प्रजा का प्रजा पर राज्य कहेंगे। किन्तु बाप आकर राजयोगी बनाता है, प्रजा का प्रजा पर राज्य नहीं सिखाता है। तो सभी राज्य अधिकारी हो ना? कभी अधीन, कभी अधिकारी ऐसे तो नहीं? सदा अधिकारी, एक भी कर्मेन्द्रिय धोखा न दे। इसको कहते हैं – ‘राजयोगी व राज्य अधिकारी’। तो सदा इस स्वमान में स्थित रहो कि हम अधिकारी हैं, अधीन होने वाले नहीं? यह है ईश्वरीय नशा। यह नशा सदा रहता है या कभी-कभी? कभी है, कभी नहीं – ऐसा न हो। क्योंकि अभी के संस्कार अनेक जन्म चलेंगे। अगर अभी के संस्कार सदा के नहीं है, कभी-कभी के हैं, तो अनेक जन्म में भी कभी-कभी राज्य अधिकारी बनेंगे। सदा राज्य अधिकारी अर्थात् रॉयल फैमिली के नजदीक रहने वाले। तो संस्कार भरने का समय अभी है, जैसा भरेंगे वैसा चलता रहेगा। तो अटेन्शन किस समय देना होता? जब रिकार्ड भरते व टेप भरते हैं। तो अटेन्शन भरने के समय देते हैं। चलने के समय तो चलता ही रहेगा लेकिन भरने के समय जैसा भरेंगे वैसे चलता रहेगा। तो भरने का समय अभी है। अभी नहीं तो कभी नहीं। फिर अटेन्शन देना चाहो तो भी नहीं दे सकेंगे क्योंकि भरने का समय समाप्त हो जायेगा। फिर जो भरा वह चलता रहेगा। अच्छा!

2\. सदा अपने को स्वदर्शन चक्रधारी आत्मायें अनुभव हो? स्वदर्शन चक्रधारी अर्थात् जहाँ स्वदर्शन चक्र है वहाँ अनेक माया के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। तो माया के अनेक चक्करों से बचने वाले अर्थात् स्वदर्शन चक्रधारी। जहाँ माया के चक्कर हैं वहाँ स्वदर्शन चक्र नहीं। क्योंकि स्वदर्शन चक्र शक्तिशाली है, इस शक्तिशाली चक्र के आगे माया स्वत: ही भाग जाती है तो ऐसे बने हो? स्वप्न में भी माया के चक्कर वार न करे। पहले भी सुनाया है कि जो बाप के गले का हार है, वह कभी माया से हार खा नहीं सकते। अगर माया से हार खाते हैं, तो बाप के गले का हार नहीं बन सकते। तो गले का हार हो या हार खाने वाले हो? बाप ने सभी बच्चों को महावीर विजयी बनाया, एक भी कमजोर नहीं। तो महावीर की निशानी है यह स्वदर्शन चक्र। सदा स्वदर्शन चक्र चलता रहे तो स्वत: सहज विजयी रहेंगे। यह बाप की विशेषता है जो सभी को चक्रधारी बनाते हैं, सभी को श्रेष्ठ भाग्यवान बनाते हैं। बाप किसी को भी कम नहीं बनाते। बाप एक जैसा सभी को मालामाल बनाते हैं। बाप एक ही समय सभी को सब खजाने देता है, अलग नहीं देता। लेकिन नम्बर क्यों बनते हैं? लेने वाले नम्बरवार बन जाते हैं। देने वाला नम्बरवार नहीं बनाता। सब बाप के स्नेही सहयोगी तो हो ही। लेकिन शक्तिशाली बनने में अन्तर पड़ जाता है। बापदादा तो सबको महावीर रूप में देखता है। अच्छा! सदा बाप की दिल में रहने वाले और सदा बाप को दिल पर बिठाने वाले। सदा बाप की दिल में रहने वाले ही निरन्तर योगी हैं।

3\. सदा अपने को ‘राजऋषि’ समझते हो? एक तरफ है राज्य, दूसरे तरफ है वैराग – दोनों का बैलेन्स हो। बेहद का वैराग, वैराग नहीं लेकिन प्राप्ति स्वरूप बना देता है। क्योंकि पुरानी दुनिया से वैराग लाते हो और नई दुनिया के मालिक बन जाते हो। तो नाम वैराग है लेकिन मिलती प्राप्ति है। छोड़ने में ही लेना है। एक देते हो और पदम लेते हो! तो बेहद का वैराग राज्य भाग्य दिलाने वाला है। एक जन्म के लिए वैराग अनेक जन्मों के लिए सदा श्रेष्ठ भाग्य। ऐसे राजऋषि हो? राजऋषि कुमार और कुमारियों का ही गायन है। ऐसी राजऋषि आत्माओं को विश्व की आत्मायें दिल से प्यार करती हैं। चैतन्य से भी ज्यादा आपके जड़ चित्रों को प्यार से याद करते हैं। क्योंकि त्याग का भाग्य प्राप्त हुआ है। तो ऐसे राजऋषि आत्मायें हैं – इस नशे में सदा रहो।

निश्चय बुद्धि विजयी रत्नों की निशानियाँ

(अव्यक्त बापदादा दिव्य मुरली — तारीख: 18 जनवरी 1985)

आज बापदादा अपने चारों ओर निश्चयबुद्धि विजयी बच्चों को देख रहे हैं। निश्चय केवल विचार नहीं — यह जीवन की स्थिति है, आत्मा का आत्मविश्वास है और परमात्मा पर अटूट भरोसा है।


1️⃣ जैसा निश्चय वैसा कर्म

निशानी:
निश्चयबुद्धि आत्मा के कर्म, वाणी और चेहरे पर रूहानी नशा झलकता है।

उदाहरण:
जैसे कोई विद्यार्थी पूरी तैयारी के साथ परीक्षा देता है, उसके चेहरे पर डर नहीं — आत्मविश्वास होता है।
वैसे ही निश्चयबुद्धि आत्मा हर परिस्थिति में स्थिर रहती है।

मुरली नोट:

निश्चय अंदर हो तो प्रमाण बाहर दिखाई देता है।


2️⃣ मेहनत नहीं — अधिकार की विजय

निशानी:
विजय संघर्ष से नहीं, स्वाभाविक अधिकार के रूप में अनुभव होती है।

उदाहरण:
राजकुमार सिंहासन पर बैठने के लिए संघर्ष नहीं करता — वह उसका अधिकार है।

आध्यात्मिक अर्थ:
राजयोगी आत्मा विजय को “मेहनत” नहीं मानती — वह अपने ईश्वरीय अधिकार का अनुभव करती है।


3️⃣ संशय रहित श्रेष्ठ भाग्य

निशानी:
भाग्य, जीवन, बाप और परिवार — किसी भी विषय में संशय नहीं।

उदाहरण:
जिसे पता है कि सूर्य उगेगा ही — वह संशय नहीं करता।


4️⃣ क्वेश्चन मार्क समाप्त — बिन्दु लगाने वाले

निशानी:
हर व्यर्थ प्रश्न पर पूर्ण विराम।

उदाहरण:
“क्यों हुआ?” की जगह — “ड्रामा” समझकर बिन्दु।


5️⃣ बेफिकर बादशाह की स्थिति

निशानी:
स्वत: निश्चिन्तता। बार-बार याद करने की मेहनत नहीं।

उदाहरण:
कोई व्यक्ति अमीर हो — उसे बार-बार खुद को अमीर साबित नहीं करना पड़ता।

मुरली सार:

परिस्थिति आधारित स्थिति = कमजोरी
वर्सा आधारित स्थिति = शक्ति


6️⃣ सर्व वंश सहित समर्पण

निशानी:
सिर्फ सेवा नहीं — संपूर्ण समर्पण।

तीन वंश त्याग:
• विकारों का वंश
• देह सम्बन्धों का वंश
• भौतिक इच्छाओं का वंश

गूढ़ बिंदु:
अंश भी है तो वंश बनेगा।


7️⃣ निश्चय – निश्चिन्त – निश्चित

तीनों अवस्थाएँ सदा अनुभव।


8️⃣ रूहानी नशे का प्रभाव

स्वयं नशे में रहेंगे
दूसरों को भी अनुभव कराएंगे


 निश्चयबुद्धि जीवन की विशेषताएँ

🔹 निमित्त भाव

“मैं” नहीं — “बाप निमित्त बना रहा है”

🔹 निर्मान बुद्धि

जितना नम्र उतना निर्माणकारी

🔹 निर्माण शक्ति

नव निर्माण करने वाली सोच


 निश्चयबुद्धि की भाषा

✔ मधुरता
✔ उदारता
✔ “पहले आप”
✔ सर्व कल्याण भावना

उदाहरण:
ब्रह्मा बाबा सदैव बच्चों को आगे रखते थे।


 निश्चय की परख — तूफानों के समय

माया के तूफान कैसे आते हैं?

पहले आकर्षण से उड़ाते हैं
फिर गिरावट में ले आते हैं

निश्चयबुद्धि क्या करती है?

✔ त्रिनेत्री दृष्टि
✔ तीनों कालों की समझ
✔ धोखा नहीं


 फाउण्डेशन चेक

निश्चय हिलना = प्रालब्ध हिलना

चेक करने के क्षण:
• मान-शान न मिले
• इच्छा पूरी न हो
• व्यर्थ संकल्प उठें


 सर्टीफिकेट वाली विजय

पेपर पास करना जरूरी है
केवल दावा नहीं — प्रमाण चाहिए


 निश्चयबुद्धि विजयी आत्मा की पहचान

✔ मनपसंद नहीं — लोकपसंद
✔ बापपसंद जीवन
✔ अचल • अडोल • एकरस स्थिति


 विदेशी बच्चों से मुलाकात — समीप रत्न की पहचान

(अव्यक्त मुरली संदर्भ)

चार सहज विशेषताएँ:
ज्ञान • योग • गुण • सेवा

✔ मेहनत नहीं — सहज सफलता
✔ जीवन = खेल
✔ माया पर विजय = खेल भावना


 दादियों से संवाद — सेवा का ठेका

वरिष्ठ आत्माएँ ज्ञान को सहज बनाकर धारण कराती हैं।


 स्वराज्य अधिकारी की स्थिति

राजयोगी = कर्मेन्द्रियों पर राज्य

✔ अधीन नहीं
✔ सदा अधिकारी
✔ संस्कार अभी भरने का समय


 स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा

स्वदर्शन चक्र = माया से रक्षा कवच

✔ बाप के गले का हार
✔ माया से हार नहीं


 राजऋषि स्थिति

राज्य + वैराग = संतुलन

✔ छोड़ो एक — पाओ पदम
✔ त्याग = भाग्य


 धारणा बिंदु

• परिस्थिति नहीं — स्थिति शक्तिशाली
• इच्छा नहीं — ईश्वरीय नशा
• अंश त्याग = वंश समाप्त


 समापन संदेश

सर्व निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

प्रश्न 1: निश्चयबुद्धि का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
निश्चय केवल एक विचार नहीं है। यह जीवन की स्थायी स्थिति है — आत्मा का आत्मविश्वास और परमात्मा पर अटूट भरोसा।


प्रश्न 2: “जैसा निश्चय वैसा कर्म” — इसकी क्या निशानी है?

उत्तर:
निश्चयबुद्धि आत्मा के कर्म, वाणी और चेहरे पर रूहानी नशा झलकता है। अंदर दृढ़ विश्वास हो तो उसका प्रमाण बाहर व्यवहार में दिखता है।


प्रश्न 3: निश्चयबुद्धि आत्मा हर परिस्थिति में स्थिर कैसे रहती है?

उत्तर:
जैसे पूरी तैयारी वाला विद्यार्थी परीक्षा में निडर रहता है, वैसे ही निश्चयबुद्धि आत्मा आत्मविश्वास के कारण परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।


प्रश्न 4: “मेहनत नहीं — अधिकार की विजय” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर:
राजयोगी आत्मा विजय को संघर्ष नहीं मानती। वह उसे अपने ईश्वरीय अधिकार के रूप में अनुभव करती है।


प्रश्न 5: निश्चयबुद्धि आत्मा संशय से मुक्त क्यों रहती है?

उत्तर:
उसे अपने भाग्य, जीवन, परमात्मा और ईश्वरीय परिवार पर पूर्ण विश्वास होता है। इसलिए उसके मन में कोई शंका नहीं रहती।


प्रश्न 6: “क्वेश्चन मार्क समाप्त — बिन्दु लगाने वाले” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
निश्चयबुद्धि आत्मा व्यर्थ प्रश्नों में उलझती नहीं। हर घटना को विश्व-नाटक समझकर पूर्ण विराम लगा देती है।


प्रश्न 7: बेफिकर बादशाह की स्थिति क्या होती है?

उत्तर:
ऐसी आत्मा स्वाभाविक रूप से निश्चिन्त रहती है। उसे बार-बार याद करने की मेहनत नहीं करनी पड़ती।


प्रश्न 8: परिस्थिति आधारित स्थिति और वर्सा आधारित स्थिति में क्या अंतर है?

उत्तर:
परिस्थिति आधारित स्थिति कमजोर होती है।
वर्सा आधारित स्थिति शक्तिशाली और अडोल होती है।


प्रश्न 9: “सर्व वंश सहित समर्पण” से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:
सिर्फ सेवा नहीं, बल्कि संपूर्ण समर्पण। विकार, देह संबंध और भौतिक इच्छाओं के वंश का त्याग।


प्रश्न 10: “अंश भी है तो वंश बनेगा” — इसका गूढ़ संदेश क्या है?

उत्तर:
यदि किसी विकार या आसक्ति का थोड़ा भी अंश है, तो वह भविष्य में फिर बढ़ सकता है। पूर्ण त्याग आवश्यक है।


प्रश्न 11: निश्चय–निश्चिन्त–निश्चित तीनों अवस्थाएँ क्या हैं?

उत्तर:
निश्चय = दृढ़ विश्वास
निश्चिन्त = चिंता रहित स्थिति
निश्चित = लक्ष्य की स्पष्टता
तीनों का संयुक्त अनुभव ही विजयी अवस्था है।


प्रश्न 12: रूहानी नशे का प्रभाव क्या होता है?

उत्तर:
स्वयं आत्मा दिव्य आनंद में रहती है और दूसरों को भी उस अनुभूति का अनुभव कराती है।


प्रश्न 13: निश्चयबुद्धि जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:
• निमित्त भाव — “मैं नहीं, बाप करा रहा है”
• निर्माण बुद्धि — नम्रता से सृजन
• निर्माण शक्ति — नव निर्माणकारी सोच


प्रश्न 14: निश्चयबुद्धि आत्मा की भाषा कैसी होती है?

उत्तर:
मधुर, उदार, विनम्र और सर्व कल्याण भावना से भरपूर। “पहले आप” की संस्कृति।


प्रश्न 15: इसका श्रेष्ठ उदाहरण कौन हैं?

उत्तर:
ब्रह्मा बाबा — जो सदैव स्वयं पीछे और बच्चों को आगे रखते थे।


प्रश्न 16: निश्चय की परख कब होती है?

उत्तर:
माया के तूफानों के समय, जब आकर्षण और गिरावट की परिस्थितियाँ सामने आती हैं।


प्रश्न 17: निश्चयबुद्धि आत्मा माया से कैसे बचती है?

उत्तर:
• त्रिनेत्री दृष्टि
• तीनों कालों की समझ
• हर परिस्थिति में सजगता


प्रश्न 18: “निश्चय हिलना = प्रालब्ध हिलना” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
विश्वास डगमगाने से भाग्य की स्थिरता भी प्रभावित होती है।


प्रश्न 19: निश्चय की परीक्षा किन क्षणों में होती है?

उत्तर:
• मान-सम्मान न मिले
• इच्छाएँ पूरी न हों
• व्यर्थ संकल्प उठें


प्रश्न 20: सच्ची विजय का प्रमाण क्या है?

उत्तर:
सिर्फ दावा नहीं — परीक्षा पास करना। प्रमाण सहित सफलता ही वास्तविक विजय है।


प्रश्न 21: निश्चयबुद्धि विजयी आत्मा की पहचान क्या है?

उत्तर:
• मनपसंद नहीं — लोकपसंद
• बापपसंद जीवन
• अचल, अडोल, एकरस स्थिति


प्रश्न 22: सहज सफल आत्माओं की चार विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:
ज्ञान • योग • गुण • सेवा


प्रश्न 23: सहज सफलता का रहस्य क्या है?

उत्तर:
जीवन को खेल समझकर चलना और माया पर विजय को भी खेल भावना से लेना।


प्रश्न 24: वरिष्ठ आत्माओं की विशेष भूमिका क्या है?

उत्तर:
वे ज्ञान को सहज बनाकर जीवन में धारण कराने की सेवा करती हैं।


प्रश्न 25: स्वराज्य अधिकारी की स्थिति क्या होती है?

उत्तर:
राजयोगी आत्मा अपनी कर्मेन्द्रियों पर राज्य करती है — वह अधीन नहीं, सदा अधिकारी रहती है।


प्रश्न 26: स्वदर्शन चक्रधारी आत्मा कौन है?

उत्तर:
जो आत्मा स्व-स्थिति में स्थित रहकर माया से स्वयं की रक्षा करती है।


प्रश्न 27: स्वदर्शन चक्र का लाभ क्या है?

उत्तर:
यह माया से रक्षा कवच है — ऐसी आत्मा कभी हारती नहीं।


प्रश्न 28: राजऋषि स्थिति क्या है?

उत्तर:
राज्य और वैराग्य का संतुलन। त्याग के साथ श्रेष्ठ अधिकार।


प्रश्न 29: “छोड़ो एक — पाओ पदम” का क्या संकेत है?

उत्तर:
थोड़ा त्याग करने से अनेक गुना भाग्य प्राप्त होता है।


प्रश्न 30: मुख्य धारणा बिंदु क्या हैं?

उत्तर:
• परिस्थिति नहीं — स्थिति शक्तिशाली
• इच्छा नहीं — ईश्वरीय नशा
• अंश त्याग = वंश समाप्त

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्मा कुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार ईश्वरीय ज्ञान, राजयोग साधना और अव्यक्त मुरली के संदर्भ में हैं। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक जागृति और आत्म-उन्नति है, न कि किसी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष की आलोचना।

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