12/21-10-1987-“”The adornment of Brahmin life – ‘purity'”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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आज सर्व चैतन्य अविनाशी दीपकों के मालिक दीपराज अपने सभी दीपरानियों से मिलने आये हैं क्योंकि आप सभी संगमयुग की रानियां हो, एक दीपराज से लव लगाने वाली हो। दीपक की विशेषता दीपक के लौ पर होती है। आप सभी दीपरानियां दीपकों के राजा से लगन लगाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो वा सभी सच्ची सीतायें एक राम बाप के सदा साथ रहने वाली हो। इसलिए दीपकों के मालिक दीपराजा के साथ-साथ आप दीपकों का भी माला के रूप में गायन हो रहा है। लेकिन दीपमाला के पहले, एक दीपराज बड़े दीपक में जगाते हैं। एक दीपक से आप अनेक दीपक जगमगाते हो। तो यह आप सभी का यादगार आज दिन तक भी मनाया जा रहा है।

दीपमाला को देख क्या दिल में आता है? यह उमंग आता है कि मुझ दीपक का यह यादगार है? सिर्फ चमक देख खुश होते हो या अपना यादगार समझ खुशी होती है? अपने को उसमें देखते हो? जानते हो कि मैं भी दीपक इस माला में हूँ? जानते हो, यह दीपमाला, माला के रूप में क्यों दिखाते हैं? दीप दिवस नहीं कहते, दीपमाला दिवस कहते हैं क्योंकि आप सभी विशेष आत्माओं के संगठन का यह यादगार है। माला तब सजती है जब अनेक दीपक संगिठत रूप में हों। अगर एक वा दो दीपक जगा दें तो माला नहीं कहेंगे। तो दीपमाला अविनाशी, अनेक जगे हुए दीपकों का यादगार है। तो अपना दिन मना रहे हो। एक तरफ चैतन्य दीपक के रूप में जगमगाते हुए विश्व को दिव्य रोशनी दे रहे हो, दूसरी तरफ अपना यादगार भी देख रहे हो। देख-देख हर्षित होते हो ना? यह दीपकों के रूप में क्यों दिखाया है? क्योंकि आप चमकती हुई आत्मायें दीपक की लौ मिसल दिखाई देती, इसलिए चमकती हुई आत्मायें, दिव्य ज्योति का यादगार रूप हैं। एक तरफ निराकारी आत्मा के रूप का यादगार रूप है, दूसरी तरफ आप ही के भविष्य साकार दिव्य स्वरूप लक्ष्मी के रूप में यादगार है। यही दीपमाला देव-पद प्राप्त करती है। इसलिए निराकार और साकार दोनों रूपों का साथ-साथ यादगार है।

तो डबल रूप का यादगार दीपमाला है। लक्ष्मी का यादगार डबल रूप में एक तरफ धन-देवी अर्थात् दाता का रूप संगमयुग का यादगार है जो सदैव धन देते रहते हैं। यह संगमयुग पर अविनाशी धन-देवी के रूप में चित्र दिखाया जाता है। सतयुग में तो कोई लेने वाला ही नहीं होगा तो देंगे किसको? यह संगमयुग के श्रेष्ठ कर्तव्य की निशानी है। और दूसरी तरफ ताजपोशी दिवस के रूप में मनाया जाता है। ताजपोशी भविष्य की निशानी है और धन-देवी संगमयुग के दाता रूप की निशानी है। दोनों ही युग को मिला दिया है क्योंकि संगमयुग छोटा-सा युग है। लेकिन जितना छोटा है उतना महान है। सर्व महान कर्तव्य, महान स्थिति, महान प्राप्ति, महान अनुभव इस छोटे से युग में होते हैं। बहुत प्राप्तियां, बहुत अनुभव होते और संगमयुग के बाद सतयुग जल्दी आता है, इसलिए संगमयुग और सतयुग के चित्र और चरित्र मिला दिये हैं। चित्र सतयुग का, चरित्र संगम का दे देते हैं। इसी प्रकार यह दीपमाला भी डबल रूप, डबल समय का यादगार हो गया है। जो दीपमाला में विधि रखते हैं, वह भिन्न-भिन्न विधियां भी मिक्स कर दी हैं। एक तरफ अपने पुराने खाते समाप्त कर नया बनाते हैं, दूसरी तरफ दीपमाला में नये वस्त्र भी विधिपूर्वक पहनते हैं। तो पुराना हिसाब-किताब चुक्तू करना और नया खाता आरम्भ करना – यह संगमयुग का यादगार है। पुराना सब भूल जाते हो, नया जन्म, नया सम्बन्ध, नया कर्म – सब परिवर्तन करते हो। नया वस्त्र अर्थात् नया शरीर सतयुग की निशानी है। संगमयुग पर नया शरीर नहीं मिलता है, पुराने वस्त्र में ही रहते हो। तो दोनों ही समय की विधियों को मिक्स कर दिया है। गोल्डन वस्त्र अर्थात् सतोप्रधान शरीर भविष्य में धारण करेंगे। अभी तो चत्ती वाले शरीर हैं। ऑपरेशन से सिलाई करते हैं ना। बड़े-बड़े ऑपरेशन में एक तरफ का मांस निकाल दूसरी तरफ लगाते हैं, तो चत्ती लगाई ना। पुराने की निशानी है सिलाई होना। तो यह हैं चत्ती वाले वस्त्र और भविष्य में गोल्डन नया वस्त्र मिलेगा। तो आपके नये वस्त्र धारण करने का यादगार है। देव-आत्मा बन नया वस्त्र अर्थात् नया शरीर, सुनहरी अर्थात् सोने तुल्य। आज की दुनिया में तो लोग बन नहीं सकते। इसलिए यादगार रूप में स्थूल नये वस्त्र पहन खुश हो जाते हैं। वह एक दिन के लिए खुशी मनायेंगे, करके 3 दिन भी मनावें लेकिन आप तो अविनाशी मनाते हो ना। ऐसा मनाते हो जो यह संगमयुग का मनाना अनेक जन्म मनाते ही रहेंगे। सदा ही जगमगाते दीपक जगते ही रहेंगे। पहले फिर भी विधिपूर्वक दीपक जगाते थे जिससे सदा दीपक जगता रहे, बुझे नहीं यह ध्यान रखते थे। घृत डालते थे, विधिपूर्वक आह्वान के अभ्यास में रहते थे। अभी तो दीपक के बजाए बल्ब जगा देते हैं। दीपमाला नहीं बनाते, अब तो मनोरंजन हो गया है। वह आह्वान की विधि अथवा साधना समाप्त हो गई है। स्नेह समाप्त हो अभी सिर्फ स्वार्थ रह गया है। धन बढ़ जाए इसी स्वार्थ से करते। भावना से नहीं, कामना से करते हैं। पहले फिर भी भावना थी, अभी तो वह भावना, कामना के रूप में बदल गई है। रहस्य समाप्त हो गया और रीति-रस्म रह गई है। इसलिए यथार्थ दाता रूपधारी लक्ष्मी किसी के पास आती नहीं। धन भी आता है तो काला धन आता है। दैवी-धन नहीं आता, आसुरी धन आता है। लेकिन आप सभी यथार्थ विधि से अपने दैवी पन का आह्वान करते स्वयं देवता या देवी बन जाते हो। तो दीपमाला मनाने आये हो ना।

बॉम्बे को चांस मिला है। बापदादा बॉम्बे को वैसे ही नरदेसावर कहते हैं। दीपावली भी धन-देवी की यादगार है ना। मनाना किसको कहा जाता, क्या करेंगे? सिर्फ मोमबत्ती जलायेंगे, केक काटेंगे, रास करेंगे, गीत गायेंगे? यह तो ब्राह्मण जीवन का अधिकार है – सदा नाचना-गाना, सदा ज्योत से ज्योत जगाना। लेकिन संगमयुग का मनाना अर्थात् बाप समान बनना। तब तो माला के समीप आयेंगे ना। यह भी संगमयुग के सुहेज (मनोरंजन) हैं। खूब मनाओ लेकिन बाप से मिलन मनाते हुए सुहेज मनाओ। सिर्फ मनोरंजन के रूप में नहीं लेकिन मनमनाभव हो मनोरंजन मनाओ। क्योंकि आप अलौकिक हो ना? तो अलौकिक विधि से अलौकिकता का मनोरंजन अविनाशी हो जाता है। आप सबने तो संगमयुगी दीपमाला की विधि – पुराना खाता खत्म करना, हर संकल्प, हर घड़ी, हर कर्म, हर बोल नया अर्थात् अलौकिक हो यह विधि अपना ली है ना? जरा भी पुराना खाता रहा हुआ ना हो। कभी-कभी जब कमजोरी आ जाती है तो क्या कहते हो? चाहते तो नहीं है लेकिन पुराने संस्कार हैं, पुराना स्वभाव अथवा आदत है, धीरे-धीरे खत्म हो जायेंगे – ऐसे कहते हैं ना? तो पुराना खाता फिर कहाँ से आया? अभी तक सम्भाल करके रखा है क्या? गठरी बांधकर रखी होगी तो चोर लगेगा। पुराना खाता है ही रावण का खाता। नया खाता है ब्रह्मा बाप का वा ब्राह्मणों का खाता। अगर थोड़ा भी पुराना खाता रहा हुआ है तो वह रावण की अपनी चीज़ है। अपनी चीज़ को अधिकार से लेंगे। इसलिए माया रावण चक्र लगाती है। चीज़ ही नहीं होगी तो रावण आयेगा भी नहीं।

जैसे किसी का उधार कर्ज होता है तो क्या करते हैं? बार-बार चक्र लगाते रहेंगे, छोड़ेगा नहीं। कितना भी टालने की कोशिश करो लेकिन कर्जदार अपना कर्ज जरूर चुकायेगा। अगर कोई भी पुराने खाते में पुराना संस्कार अभी समाप्त नहीं किये हैं तो यह रावण का कर्जा है। इस कर्ज को मर्ज कहा जाता है। कहते हैं कर्ज़ जैसा कोई मर्ज़ नहीं है। तो यह रावण का कर्ज़ा – पुराने संकल्प, संस्कार-स्वभाव, पुरानी चाल-चलन – यह कर्ज़ा कमजोर बना देता है। कमजोरी ही मर्ज़ अर्थात् बीमारी बन जाती है। इसलिए इस कर्ज़ को एक सेकेण्ड में ‘यह पुराना, पराया है’ – इस एक दृढ़ संकल्प से समाप्त करो। इसको जलाओ। आतिशबाजी जालते हैं ना। आजकल आतिशबाजी में बॉम्ब बनाते हैं ना। तो आप दृढ़ संकल्प की तीली से आत्मिक बॉम्ब की आतिशबाजी जलाओ जिससे यह सब पुराना समाप्त हो जाये। वह लोग गंवायेंगे और आप कमायेंगे। वह आतिशबाजी में पैसा गंवाते हैं, आप आतिशबाजी पर कमायेंगे। कमाई करने की बाज़ी आती है ना? वह आतिशबाजी है और आपकी उड़ती कला की बाज़ी है। इसमें आप विजयी हो रहे हो। तो डबल फायदा लो। जलाओ भी, कमाओ भी – यह विधि अपनाओ। समझा!

विधि से सिद्धि मिलती है ना। एक यह विधि है, दूसरी विधि – दीपमाला में कोने-कोने में सफाई करते हैं। चारों कोनों में सफाई करते हैं, दो वा तीन कोने में नहीं करते। क्योंकि स्वच्छता महानता है। देव-पद का आह्वान करने के लिए चार कोने की स्वच्छता क्या है? वो स्थूल चार कोनों की सफाई करते, आपकी स्वच्छता कौन-सी हैं? ‘पवित्रता’। चारों प्रकार की स्व्च्छता (पवित्रता) हो। उस दिन सुनाया था ना। इसी विधि से दैवी-पद की प्राप्ति करते हो। अगर एक भी प्रकार की स्वच्छता नहीं है तो श्रेष्ठ दैवी-पद की प्राप्ति भी नहीं होती अर्थात् जो ऊंचे ते ऊंच बनने की इच्छा रखते हो, वह पूर्ण नहीं हो सकती। तो चारों ही प्रकार की स्वच्छता – यह है दूसरी विधि। इस विधि को अपनाया है? सुनाया ना मनाना अर्थात् बाप समान बनना। ब्रह्मा बाप को देखा, पुराना खाता खत्म किया ना, चारों प्रकार की स्वच्छता हर कर्म में देखी ना। ब्रह्मा ने सबूत बन करके दिखाया, इसलिए नम्बरवन सपूत बने और नम्बरवन पद की प्राप्ति की। तो फॉलो फादर है ना। ब्रह्मा बाप ने सेकेण्ड में संकल्प किया, पुराना खाता खत्म। उसके लिए दीपमाला पर यह विधि अपनाई जाती है। दीपमाला के दिवस पुराना खाता खत्म किया, समर्पित हुए, पुराना सब स्वाहा किया? दृढ़ संकल्प की तीली से आतिशबाजी कौन-सी जलाई? उड़ती कला की बाज़ी लगाई? इसलिए यह इस दिन का यादगार चला आ रहा है। इन विधियों को अपनाना अर्थात् दिवाली मनाना।

तो दीवाली मनाई या मनाने वालों का देखकर खुश हुए? मनाना अर्थात् बनना। ब्रह्मा बाप समान बनना – यही दीवाली मनाना हुआ। देखो – एक तरफ बारूद जलाना, दूसरे तरफ दीपक जगाना, तीसरे तरफ मनाना, मिठाई खाना, नये वस्त्र पहनना और चौथे तरफ सफाई करना। तो जलाना भी है, मनाना भी है और सफाई भी करना है। चारों तरफ करना है। करना अर्थात् कर्म में करना। चारों प्रकार की दीपमाला हो गई ना। ऐसे नहीं – करना आता, मनाना आता लेकिन जलाना नहीं आता, सफाई करना नहीं आता। नहीं। चारों ही बातों में बाप समान बनना है। समझा, दीपावली का अर्थ क्या है? बेहद के राजाओं के राजा की रानियां हो। सतयुग में तो होंगी देव-रानी, लेकिन सभी परमात्म-रानियां हो। इसलिए पटरानियां दिखाई हैं। सिर्फ कृष्ण छोटे बच्चे को रानियां दिखा दी हैं। कृष्ण को बच्चे रूप में दिखाते, फिर रानियां भी दिखाते, मिक्स कर दिया है। यह राजाओं का राजा बनाने वाले की सब रानियां हैं। रानियां भी हो, सीतायें भी हो, यही जादू है। अभी-अभी कहते भाई-भाई हो, तो जरूर अपने को भाई ही कहेंगे। फिर दूसरे तरफ कहते सब सीतायें हो, राम कोई नहीं। यही जादू है। इसमें ही मजा है। अभी-अभी भाई-बहन बन जाओ, अभी-अभी सीता बन जाओ, अभी फरिश्ता बन जाओ। यह रूहानी जादू बहुत रमणीक है। जादू से घबराते तो नहीं हो ना। स्वयं ही जादूगर बन गये।

दीपावली अथवा दीपमाला की अविनाशी मुबारक है। वह तो एक दिन के लिए कहते – हैप्पी दीवाली और बापदादा कहते अविनाशी होली, हैपी, हेल्दी दीपावली। सब चाहिए ना। हैं ही सदा जगे हुए दीपक। सदा मुख मीठा रहता। सबसे बड़े ते बड़ी मिठाई मिलती जिससे सदा मुख मीठा रहता। वह कौन सी मिठाई है? ‘बाबा’ यही दिलखुश मिठाई है। यह मिठाई तो सदा खाते रहते। सहज मिठाई है, बनाने में मुश्किल नहीं। मिठाई भी खाई मिलन भी मनाया। देश-विदेश के बच्चे आज आकारी फरिश्ते रूप में मधुबन में पहुंचे हुए हैं। सभी का मन यहाँ है और तन सेवा में है। बापदादा सिर्फ इस सभा को नहीं देख रहे हैं लेकिन चारों ओर के फरिश्ते रूपधारी बच्चों से भी मिलन मना रहे हैं। सभी उमंग-उत्साह में खूब मना रहे हैं। सभी के मन में एक ही याद समाई हुई है। सभी के मुख में यही अविनाशी मिठाई है। दीपकों की माला कितनी बड़ी है! चारों ओर के जगमगाते हुए दीपक माला के रूप में बाप के सामने हैं और हर एक दीप को देख बापदादा हर्षा रहे हैं और मुबारक दे रहे हैं। समझा!

चारों ओर के दीपरानियों को, चारों ओर के जगमगाते हुए विश्व में अविनाशी प्रकाश देने वाले विशेष आत्माओं को, चारों ओर के बापदादा समान बनने वाले अर्थात् सभी दीपमाला मनाने वाले महान आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और बहुत-बहुत मुबारक हो।

मधुबन निवासी भाई-बहनों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:- पाण्डवों की विशेषता क्या हैं? पाण्डव यज्ञ सेवा के सहयोगी हैं। यज्ञ सेवा के सहयोगी सो सदा सहयोग लेने के पात्र। जो जितनी सच्ची दिल से, स्नेह से सहयोग देता है, उतना पद्म गुणा बाप से सहयोग लेने का अधिकारी बनता है। बाप पूरा ही सहयोग का हिसाब चुक्तू करते हैं। बड़े कार्य को भी सहज करने का चित्र पर्वत का दिखाते हैं। (पर्वत को अंगुली दी) तो पाण्डव विशेष सेवा के सहयोगी बन कोई भी कार्य सहज कर लेते हैं। जिस कार्य को लोग मुश्किल समझते हैं, वह सहज ही खेल के समान कर लेते हो ना? सेवा नहीं समझते, ड्यूटी नहीं समझते लेकिन रुहानी खेल अनुभव करते हो। खेल के लिए किसको भी बुलाओ तो ना नहीं करेगा और कभी थकेगा भी नहीं। तो आप सभी भी यज्ञ-सेवा में थकते नहीं हो ना। रूहानी खेल है, इसलिए थकावट भी नहीं होती है। और ना करने चाहो तो भी नहीं कर सकते हो क्योंकि ईश्वरीय बंधन में बंधे हुए हो। यह बंधन ही नज़दीक सम्बन्ध में लाने वाला है। जितनी जो सेवा करता है उतना सेवा का फल – समीप सम्बन्ध में आता है। यहाँ के सेवाधारी वहाँ के राज्य फैमिली (परिवार) के अधिकारी बनेंगे। यहाँ जितनी हार्ड (सख्त) सेवा करते, उतना वहाँ आराम से सिंहासन पर बैठेंगे। यहाँ जो आराम करते हैं, वह वहाँ काम करेंगे, हिसाब है ना। एक-एक सेकेण्ड का, एक-एक काम का हिसाब-किताब बाप के पास है। इसलिए एक-एक सेकेण्ड का हिसाब कर चुक्तू भी करता है। गिनती करके हिसाब देता है, ऐसे नहीं देता। लेकिन पद्मगुणा देता है। तो आज के सेवाधारी कल के राज-अधिकारी बनते हैं और आज के राज्य करने वाले कल के सेवा करने वाले बनते हैं। सेवा-भाव सदा ऊंचा उठाता है। नाम सेवा है, लेकिन सेवा वाला खाता सदैव मेवा है! तो मेवा खाने वाले सेवाधारी हैं, वैसे सेवाधारी नहीं। एक दो, पद्म लो। तो पाण्डवों का गायन है! सेवा करने में बहुत मजबूत रहे हैं, इसलिए वह मजबूत शरीर दिखाते हैं। लेकिन है मजबूत दिल वाले, मजबूत मन वाले। वह मन व दिल कैसे दिखायें, इसलिए शरीर दिखा दिया है। खुशी की खुराक बहुत खाते हैं, इसलिए मोटे दिखाते हैं।

बहनों से:- मधुबन निवासी हर कर्म बाप के साथ करने वाले हो ना? ऐसा श्रेष्ठ भाग्य और किसी का होगा जो हर कर्म मधुबन में मधुबन के बाप के साथ हो? मधुबन में चारों ओर बाप ही बाप है ना। तो मधुबन निवासियों की विशेषता है – सदा हर कर्म बाप के साथ अनुभव करने वाले। जो हर कर्म बाप के साथ करने वाले हैं, उनका हर कर्म श्रेष्ठ होगा ना। तो श्रेष्ठ कर्म करने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। सदा इसी अनुभव में चलने वाले को ही मधुबन निवासी कहते हैं। जिस समय यह अनुभव नहीं होता तो मधुबन निवासी नहीं हुए। उस समय मधुबन में रहते भी मधुबन निवासी नहीं हैं और जो दूर रहते भी हर कर्म बाप के साथ करते, वह दूर रहते भी मधुबन निवासी हैं। मधुबन वाले हर चरित्र में साथ चलने वाले हैं। भागवत मधुबन का यादगार है, मधुबन में बाप के साथ हर चरित्र चलने वालों की कहानी है। ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को देख सब खुश होते हैं।

दीपावली मुबारक – विदाई के समय:- बापदादा बच्चों की मौज में मौज मनाते हैं। इसलिए मोमबत्ती जलाओ या केक काटो, जो करना हो वह करो। ब्राह्मणों जैसा उत्सव तो देवतायें भी नहीं मना सकेंगे, क्योंकि बाप के साथ मनाते हो। वह तो आत्मायें, आत्माओं के साथ मनायेंगी। तो क्यों नहीं मौज मनाओ! सिर्फ मूंझ के मौज़ नहीं मनाओ, बिना मूंझने के मौज़ मनाओ। यह सब रचना है ही मौज़ के लिए। खाओ-पियो मौज़ करो। मौज़ों के लिए ही आये हो। पैदा ही मौज़ों से हुए हो। ज्ञान सुना और पैदा हो गये। तो मौज़-मौज़ से पैदा हुए और मौज़ों के लिए ही पैदा हुए। जायेंगे भी मौज़-मौज़ से, बाप के साथ जायेंगे। इसलिए बापदादा खुश होते हैं जब बच्चे मनाते हैं। मनुष्यों ने तो मौज़ की रचना में भी मूंझ पैदा कर दी है। यह प्रकृति मौज़ मनाने के लिए है लेकिन मनुष्यात्माओं के वायब्रेशन्स वायुमण्डल को खराब करते हैं। वायुमण्डल का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है। और प्रकृति भी मुंझाने का काम करती है। बारिश ने भी प्रोग्राम को मुंझा दिया ना। लेकिन मूंझे नहीं, मौज़ में रहे। मिलन की मौज़ मनाई ना। प्रकृति अपने जिद्द पर है, आप मनाने की जिद्द पर हो। आप मना रहे हो, वह मुंझा रही है। मुंझाने दो लेकिन आप हटने वाले हो क्या? नहीं। अंगद हो। पानी नहीं है, प्रेम का पानी तो है। इसलिए प्रकृति भी देख रही है कि यह प्रभु के बच्चे भी कम नहीं हैं।

दीपराज और दीपरानियों की कहानी

(अव्यक्त मुरली पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या)

मुरली सन्दर्भ: अव्यक्त बापदादा – दीपावली मिलन सन्देश (मधुबन)
(तिथि: 29 अक्टूबर 1983 – दीपावली विशेष अव्यक्त मुरली संदर्भ)


1️⃣ दीपराज और दीपरानियाँ – संगमयुग का दिव्य मिलन

आज चैतन्य अविनाशी दीपकों के मालिक – दीपराज अपनी दीपरानियों से मिलने आए हैं।

यह कोई साधारण कथा नहीं है, बल्कि संगमयुग की आध्यात्मिक वास्तविकता है।

  • दीपराज – परमपिता परमात्मा

  • दीपरानियाँ – संगमयुग की ब्राह्मण आत्माएँ

आप सभी संगमयुग की रानियाँ हैं, जो एक दीपराज अर्थात् परमात्मा से प्रेम जोड़ने वाली आत्माएँ हैं।

जैसे दीपक की सुंदरता उसकी लौ में होती है, वैसे ही आत्मा की सुंदरता योग की ज्योति में होती है।

मुरली पॉइंट:
“आप सभी चमकती हुई आत्माएँ दीपक की लौ समान दिव्य ज्योति का रूप हो।”


2️⃣ दीपमाला का वास्तविक अर्थ

लोग कहते हैं दीपावली, लेकिन शास्त्रों में इसे दीपमाला कहा गया है।

क्यों?

क्योंकि यह एक दीपक का उत्सव नहीं, बल्कि अनेक जागृत आत्माओं के संगठन का उत्सव है।

यदि एक या दो दीपक जलें तो माला नहीं बनती।
जब अनेक दीपक संगठित होकर जलते हैं, तब दीपमाला बनती है।

इसीलिए दीपमाला जागृत आत्माओं की माला का प्रतीक है।

उदाहरण

जैसे एक दीपक से अनेक दीपक जलते हैं,
वैसे ही एक परमात्मा से अनेक आत्माएँ जागृत होती हैं

मुरली पॉइंट:
“एक दीपक से अनेक दीपक जगमगाते हैं – यही संगमयुग का यादगार है।”


3️⃣ दीपमाला – निराकार और साकार दोनों का स्मृति चिन्ह

दीपमाला का रहस्य डबल रूप का है।

1️⃣ निराकार रूप

दीपक की लौ आत्मा की ज्योति का प्रतीक है।

2️⃣ साकार रूप

भविष्य में वही आत्मा देवी लक्ष्मी के दिव्य स्वरूप में प्रकट होगी।

इसलिए दीपमाला में आत्मा और देवता दोनों का यादगार है।

मुरली पॉइंट:
“दीपमाला निराकार आत्मा और साकार देव रूप दोनों का स्मृति चिन्ह है।”


4️⃣ लक्ष्मी का डबल रूप

दीपावली पर लक्ष्मी पूजन क्यों किया जाता है?

क्योंकि लक्ष्मी का भी डबल अर्थ है।

संगमयुग

लक्ष्मी का अर्थ है दाता रूप
जो ज्ञान, शक्ति और गुणों का धन देती है।

सतयुग

वही लक्ष्मी राज्य की रानी बनती है।

इसलिए दीपावली में

  • धन की देवी

  • ताजपोशी (राज्याभिषेक)

दोनों का स्मरण किया जाता है।


5️⃣ पुराना खाता खत्म करना – दीपावली का आध्यात्मिक अर्थ

दीपावली पर लोग नया खाता खोलते हैं

लेकिन इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

यह संकेत है:

  • पुराने संस्कार समाप्त करना

  • पुरानी आदतें छोड़ना

  • नया जीवन शुरू करना

मुरली पॉइंट:
“पुराना खाता रावण का है, नया खाता ब्रह्मा बाप का है।”


उदाहरण

यदि किसी के ऊपर कर्ज हो
तो कर्ज देने वाला बार-बार याद दिलाता है।

उसी प्रकार पुराने संस्कार भी कर्ज की तरह हैं

जब तक समाप्त नहीं करेंगे
माया बार-बार आएगी।


6️⃣ आत्मिक आतिशबाजी – दृढ़ संकल्प की शक्ति

दुनिया दीपावली पर पटाखे जलाती है

लेकिन आध्यात्मिक दीपावली में
दृढ़ संकल्प की आतिशबाजी जलानी होती है।

जब आत्मा संकल्प करे:

“यह पुराना संस्कार मेरा नहीं, यह पराया है।”

तो वह उसी क्षण समाप्त हो सकता है।

मुरली पॉइंट:
“दृढ़ संकल्प की तीली से पुराने संस्कारों की आतिशबाजी जलाओ।”


7️⃣ चार प्रकार की सफाई

दीपावली पर घर के चारों कोनों की सफाई की जाती है।

लेकिन आत्मा की सफाई क्या है?

चार प्रकार की पवित्रता

1️⃣ मन की पवित्रता
2️⃣ वचन की पवित्रता
3️⃣ कर्म की पवित्रता
4️⃣ संबंधों की पवित्रता

जब ये चारों स्वच्छ होते हैं
तब आत्मा देव पद की अधिकारी बनती है


8️⃣ ब्रह्मा बाप – दीपावली का सच्चा उदाहरण

ब्रह्मा बाप ने एक सेकण्ड में संकल्प किया:

“पुराना खाता समाप्त।”

और उसी क्षण सब समर्पित कर दिया।

इसलिए वे बने:

  • नम्बर वन सपूत

  • नम्बर वन देव पद के अधिकारी

मुरली पॉइंट:
“फॉलो फादर – यही दीपावली मनाने की सच्ची विधि है।”


9️⃣ सेवा करने वाले पाण्डव

बापदादा ने पाण्डवों की विशेषता भी बताई।

जो यज्ञ सेवा में सहयोग देते हैं
वे पद्मगुणा फल के अधिकारी बनते हैं।

सेवा को ड्यूटी नहीं,
रूहानी खेल समझकर करना चाहिए।

मुरली पॉइंट:
“सेवा वाला खाता सदैव मेवा का खाता होता है।”


🔟 मधुबन निवासियों की विशेषता

मधुबन निवासी वह हैं
जो हर कर्म बाप के साथ करते हैं

यदि कोई दूर रहकर भी हर कर्म बाप के साथ करे
तो वह भी मधुबन निवासी है।

और यदि मधुबन में रहकर भी यह अनुभव न हो
तो वह सच्चा मधुबन निवासी नहीं।


 अविनाशी दीपावली का संदेश

बापदादा कहते हैं:

मनुष्य कहते हैं Happy Diwali
लेकिन बापदादा कहते हैं:

अविनाशी हैप्पी और हेल्दी दीपावली

क्योंकि आप सभी:

  • सदा जगे हुए दीपक हो

  • सदा मुख मीठा रखने वाली आत्माएँ हो

सबसे बड़ी मिठाई है:

“बाबा”

यह ऐसी मिठाई है
जो आत्मा को सदा खुश रखती है।


 निष्कर्ष

दीपावली का वास्तविक अर्थ है:

  • पुराना जलाना

  • नया बनना

  • आत्मा को जगाना

  • बाप समान बनना

जब आत्मा स्वयं दीपक बनकर
दुनिया को प्रकाश देती है
तभी सच्ची दीपमाला बनती है।

1️⃣ प्रश्न: दीपराज और दीपरानियाँ किसे कहा गया है?

उत्तर:
दीपराज परमपिता परमात्मा को कहा गया है, जो सभी चैतन्य दीपकों के मालिक हैं।
दीपरानियाँ संगमयुग की ब्राह्मण आत्माएँ हैं, जो परमात्मा से सच्चा प्रेम जोड़कर योग की ज्योति से जगमगाती हैं।


2️⃣ प्रश्न: आत्मा की सुंदरता किसमें होती है?

उत्तर:
जैसे दीपक की सुंदरता उसकी लौ में होती है, उसी प्रकार आत्मा की सुंदरता उसकी योग की ज्योति में होती है।
जब आत्मा परमात्मा की याद में रहती है, तब वह चमकती हुई दिव्य ज्योति बन जाती है।

📌 मुरली पॉइंट:
“आप सभी चमकती हुई आत्माएँ दीपक की लौ समान दिव्य ज्योति का रूप हो।”


3️⃣ प्रश्न: दीपावली को दीपमाला क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
क्योंकि यह केवल एक दीपक का उत्सव नहीं है।
यह अनेक जागृत आत्माओं के संगठन का प्रतीक है।

जब अनेक दीपक मिलकर जलते हैं, तब दीपमाला बनती है।
इसी प्रकार संगमयुग में अनेक आत्माएँ जागकर दिव्य ज्योति बनती हैं।


4️⃣ प्रश्न: दीपमाला किस बात का प्रतीक है?

उत्तर:
दीपमाला जागृत आत्माओं की माला का प्रतीक है।

जैसे एक दीपक से अनेक दीपक जलते हैं, वैसे ही एक परमात्मा से अनेक आत्माएँ जागृत होती हैं।

मुरली पॉइंट:
“एक दीपक से अनेक दीपक जगमगाते हैं – यही संगमयुग का यादगार है।”


5️⃣ प्रश्न: दीपमाला का डबल रूप का रहस्य क्या है?

उत्तर:
दीपमाला दो रूपों का स्मृति चिन्ह है:

1️⃣ निराकार रूप – दीपक की लौ आत्मा की ज्योति का प्रतीक है।
2️⃣ साकार रूप – वही आत्मा भविष्य में देवी-देवता के दिव्य स्वरूप में प्रकट होती है।

इसलिए दीपमाला आत्मा और देवता दोनों का यादगार है।


6️⃣ प्रश्न: दीपावली पर लक्ष्मी पूजन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर:
लक्ष्मी का भी डबल अर्थ है।

संगमयुग में:
लक्ष्मी दाता रूप है जो ज्ञान, शक्ति और गुणों का धन देती है।

सतयुग में:
वही लक्ष्मी राज्य की रानी बनती है।

इसलिए दीपावली में धन और राज्य दोनों का स्मरण किया जाता है।


7️⃣ प्रश्न: दीपावली पर नया खाता खोलने का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर:
नया खाता खोलने का अर्थ है:

  • पुराने संस्कार समाप्त करना

  • पुरानी आदतें छोड़ना

  • नया जीवन आरम्भ करना

मुरली पॉइंट:
“पुराना खाता रावण का है, नया खाता ब्रह्मा बाप का है।”


8️⃣ प्रश्न: पुराने संस्कारों को कर्ज क्यों कहा गया है?

उत्तर:
जैसे कर्ज देने वाला बार-बार अपना पैसा मांगता है, वैसे ही पुराने संस्कार बार-बार सामने आ जाते हैं।

जब तक उन्हें समाप्त नहीं किया जाता, तब तक माया बार-बार आत्मा को परेशान करती है।


9️⃣ प्रश्न: आत्मिक आतिशबाजी का क्या अर्थ है?

उत्तर:
आत्मिक आतिशबाजी का अर्थ है दृढ़ संकल्प की शक्ति से पुराने संस्कारों को समाप्त करना।

जब आत्मा यह संकल्प करे:

“यह पुराना संस्कार मेरा नहीं है, यह पराया है।”

तो वह उसी क्षण समाप्त हो सकता है।

मुरली पॉइंट:
“दृढ़ संकल्प की तीली से पुराने संस्कारों की आतिशबाजी जलाओ।”


🔟 प्रश्न: दीपावली की चार प्रकार की आध्यात्मिक सफाई कौन-सी हैं?

उत्तर:
दीपावली पर घर के चारों कोनों की सफाई की जाती है, लेकिन आत्मा की सफाई चार प्रकार की होती है:

1️⃣ मन की पवित्रता
2️⃣ वचन की पवित्रता
3️⃣ कर्म की पवित्रता
4️⃣ संबंधों की पवित्रता

इन चारों प्रकार की पवित्रता से आत्मा देव पद की अधिकारी बनती है।


1️⃣1️⃣ प्रश्न: दीपावली मनाने का सच्चा उदाहरण किसने दिया?

उत्तर:
ब्रह्मा बाप ने एक सेकण्ड में संकल्प करके पुराना खाता समाप्त कर दिया और सब कुछ समर्पित कर दिया।

इसीलिए वे बने:

  • नम्बर वन सपूत

  • नम्बर वन देव पद के अधिकारी

मुरली पॉइंट:
“फॉलो फादर – यही दीपावली मनाने की सच्ची विधि है।”


1️⃣2️⃣ प्रश्न: पाण्डवों की विशेषता क्या बताई गई है?

उत्तर:
जो आत्माएँ यज्ञ सेवा में सहयोग देती हैं, वे पद्मगुणा फल की अधिकारी बनती हैं।

सेवा को बोझ या ड्यूटी नहीं समझना चाहिए, बल्कि रूहानी खेल समझकर करना चाहिए।

मुरली पॉइंट:
“सेवा वाला खाता सदैव मेवा का खाता होता है।”


1️⃣3️⃣ प्रश्न: सच्चा मधुबन निवासी किसे कहा जाता है?

उत्तर:
जो आत्मा हर कर्म बाप के साथ करने का अनुभव करती है, वही सच्चा मधुबन निवासी है।

यदि कोई दूर रहकर भी यह अनुभव करे तो वह भी मधुबन निवासी है।


1️⃣4️⃣ प्रश्न: बापदादा दीपावली के लिए क्या संदेश देते हैं?

उत्तर:
मनुष्य कहते हैं Happy Diwali,
लेकिन बापदादा कहते हैं:

अविनाशी हैप्पी और हेल्दी दीपावली

क्योंकि ब्राह्मण आत्माएँ सदा जगे हुए दीपक हैं।


1️⃣5️⃣ प्रश्न: आत्मा की सबसे बड़ी मिठाई कौन-सी है?

उत्तर:
आत्मा की सबसे बड़ी मिठाई है:

“बाबा”

परमात्मा की याद आत्मा को सदा खुश और मीठा बना देती है।


 अंतिम प्रश्न: सच्ची दीपावली क्या है?

उत्तर:
सच्ची दीपावली का अर्थ है:

  • पुराने संस्कारों को जलाना

  • नया जीवन अपनाना

  • आत्मा को जगाना

  • परमात्मा समान बनना

जब आत्मा स्वयं दीपक बनकर दुनिया को दिव्य प्रकाश देती है, तब सच्ची दीपमाला बनती है।

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज की अव्यक्त मुरली शिक्षाओं और आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक चिंतन और आत्मिक जागृति को बढ़ावा देना है। इसमें व्यक्त विचार आध्यात्मिक अध्ययन और अनुभव पर आधारित हैं। दर्शकों से निवेदन है कि इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझें।

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