“नया वर्ष – बाप समान बनने का वर्ष”
आज त्रिमूर्ति बाप तीन संगम देख रहे हैं। एक है बाप और बच्चों का संगम, दूसरा है यह युग संगम, तीसरा है आज वर्ष का संगम। तीनों ही संगम अपनी-अपनी विशेषता का है। हर एक संगम, परिवर्तन होने की प्रेरणा देने वाला है। संगमयुग विश्व-परिवर्तन की प्रेरणा देता है। बाप और बच्चों का संगम सर्व श्रेष्ठ भाग्य एवं श्रेष्ठ प्राप्तियों की अनुभूति कराने वाला है। वर्ष का संगम नवीनता की प्रेरणा देने वाला है। तीनों ही संगम अपने-अपने अर्थ से महत्व रखते हैं। आज सभी देश-विदेश के बच्चे विशेष पुरानी दुनिया का नया वर्ष मनाने के लिए आये हैं। बापदादा सभी साकार रूपधारी वा आकार रूपधारी बुद्धि के विमान से पहुँचे हुए बच्चों को देख रहे हैं और नये वर्ष मनाने की डायमण्ड तुल्य मुबारक दे रहे हैं क्योंकि सब बच्चे हीरे तुल्य जीवन बना रहे हैं। डबल हीरो बने हो? एक तो बाप के अमूल्य रत्न हो, हीरो डायमण्ड हो। दूसरा हीरो पार्ट बजाने वाले हीरो हो। इसलिए बापदादा हर सेकेण्ड, हर संकल्प, हर जन्म की अविनाशी मुबारक दे रहे हैं। आप श्रेष्ठ आत्माओं का सिर्फ आज का दिन मुबारक वाला नहीं। लेकिन हर समय श्रेष्ठ भाग्य, श्रेष्ठ प्राप्ति के कारण बाप को भी हर समय आप मुबारक देते हो और बाप बच्चों को मुबारक देते सदा उड़ती कला में ले जा रहे हैं। इस नये वर्ष में यही विशेष नवीनता जीवन में अनुभव करते रहो – जो हर सेकेण्ड और संकल्प में बाप को तो सदा मुबारक देते हो लेकिन आपस में भी हर ब्राह्मण आत्मा वा कोई भी अन्जान, अज्ञानी आत्मा भी सम्बन्ध वा सम्पर्क में आये तो बाप समान हर समय, हर आत्मा के प्रति दिल के खुशी की मुबारक वा बधाई निकलती रहे। कोई कैसा भी हो लेकिन आपके खुशी की बधाई उनको भी खुशी की प्राप्ति का अनुभव कराये। बधाई देना – यह खुशी की लेन-देन करना है। कभी भी किसी को बधाई देते तो वह खुशी की बधाई है। दु:ख के समय बधाई नहीं कहेंगे। तो हर एक आत्मा को देख खुश होना वा खुशी देना – यही दिल की मुबारक वा बधाई है। दूसरी आत्मा भले आपसे कैसा भी व्यवहार करे लेकिन आप बापदादा की हर समय बधाई लेने वाली श्रेष्ठ आत्मायें सदा हरेक को खुशी दो। वह कांटा दे, आप बदले में रूहानी गुलाब दो। वह दु:ख दे, आप सुखदाता के बच्चे सुख दो। जैसे से वैसे नहीं बन जाओ, अज्ञानी से अज्ञानी नहीं बन सकते। संस्कारों के वा स्वभाव के वशीभूत आत्मा से आप भी ‘वशीभूत’ नहीं बन सकते।
आप श्रेष्ठ आत्माओं के हर संकल्प में सर्व के कल्याण की, श्रेष्ठ परिवर्तन की, ‘वशीभूत’ से स्वतन्त्र बनाने की दिल की दुआयें वा खुशी की मुबारक सदा नेचुरल रूप में दिखाई दे क्योंकि आप सभी दाता अर्थात् देवता हो, देने वाले हो। तो इस नये वर्ष में विशेष खुशियों की मुबारकें देते रहो। ऐसे नहीं कि सिर्फ आज के दिन वा कल के दिन चलते-फिरते मुबारक हो, मुबारक हो – यह कहके नया वर्ष आरम्भ नहीं करना। कहना भले, दिल से कहना। लेकिन सारा वर्ष कहना, सिर्फ दो दिन नहीं कहना। किसी को भी अगर दिल से मुबारक देते हो तो वह आत्मा दिल की मुबारक ले दिलखुश हो जाए। तो हर समय दिलखुश मिठाई बांटते रहना। सिर्फ एक दिन नहीं मिठाई खाना वा खिलाना। कल के दिन मुख की मिठाइयाँ जितनी चाहिए उतनी खाना, सभी को बहुत-बहुत मिठाई खिलाना। लेकिन ऐसे ही सदा हर एक को दिल से दिलखुश मिठाई खिलाते रहो तो कितनी खुशी होगी! आजकल की दुनिया में तो फिर भी मुख की मिठाई खाने में डर भी है लेकिन यह दिलखुश मिठाई जितनी चाहिए खा सकते हो, खिला सकते हो, इसमें बीमारी नहीं होगी क्योंकि बापदादा बच्चों को समान बनाते हैं। तो विशेष इस वर्ष में बाप समान बनने की – यही विशेषता विश्व के आगे, ब्राह्मण परिवार के आगे दिखाओ। जैसे हर एक आत्मा “बाबा” कहते मधुरता वा खुशी का अनुभव करती है। ‘वाह बाबा’ कहने से मुख मीठा होता है क्योंकि प्राप्ति होती है। ऐसे हर ब्राह्मण आत्मा कोई भी ब्राह्मण का नाम लेते ही खुश हो जाए क्योंकि बाप समान आप सभी भी एक दो को बाप द्वारा प्राप्त हुई विशेषता द्वारा आपस में लेन-देन करते हो, आपस में एक दो के सहयोगी साथी बन उन्नति को प्राप्त कराते हो। जीवन साथी नहीं बनना, लेकिन कार्य के साथी भले बनो। हर एक आत्मा अपनी प्राप्त विशेषताओं से आपस में खुशी की लेन-देन करते भी हो और आगे भी सदा करते रहना। जैसे बाप को याद करते ही खुशी में नाचते हैं, वैसे हर एक ब्राह्मण आत्मा को हर ब्राह्मण याद करते रूहानी खुशी का अनुभव करे, हद की खुशी का नहीं। हर समय बाप की सर्व प्राप्तियों का साकार निमित्त रूप अनुभव करे। इसको कहते हैं हर संकल्प वा हर समय एक दो को मुबारक देना। सबका लक्ष्य तो एक ही है कि बाप समान बनना ही है क्योंकि समान के बिना तो न बाप के साथ स्वीट होम में जायेंगे और न ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में आयेंगे। जो बापदादा के साथ अपने घर में जायेंगे वही ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में उतरेंगे। ऊपर से नीचे आयेंगे ना। सिर्फ साथ जायेंगे नहीं लेकिन साथ आयेंगे भी। पूज्य भी ब्रह्मा के साथ बनेंगे और पुजारी भी ब्रह्मा बाप के साथ बनेंगे। तो अनेक जन्मों का साथ है। लेकिन उसका आधार इस समय समान बन साथ चलने का है।
इस वर्ष की विशेषता देखो – नम्बर भी 8, 8 हैं। आठ का कितना महत्व है! अगर अपना पूज्य रूप देखो तो अष्ट भुजाधारी, अष्ट शक्तियाँ उसी की ही यादगार है – अष्ट रत्न, अष्ट राजधानियाँ – अष्ट का भिन्न-भिन्न रूप से गायन है। इसलिए यह वर्ष विशेष बाप समान बनने का दृढ़ संकल्प का वर्ष मनाओ। जो भी कर्म करो बाप समान करो। संकल्प करो, बोल बोलो, सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ, बाप समान। ब्रह्मा बाप समान बनना तो सहज है ना क्योंकि साकार है। 84 जन्म लेने वाली आत्मा है। पूज्य अथवा पुजारी सभी की अनुभवी आत्मा है। पुरानी दुनिया के, पुराने संस्कारों के, पुराने हिसाब-किताब के, संगठन में चलने और चलाने – सब बातों के अनुभवी है। तो अनुभवी को फॉलो करना मुश्किल नहीं होता है। और बाप तो कहते हैं कि ब्रह्मा बाप के हर कदम के ऊपर कदम रखो। कोई नया मार्ग नहीं निकालना है, सिर्फ हर कदम पर कदम रखना है। ब्रह्मा को कॉपी करो। इतनी अक्ल तो है ना। सिर्फ मिलाते जाओ क्योंकि, बापदादा – दोनों ही आपके साथ चलने के लिए रुके हुए हैं। निराकार बाप परमधाम निवासी हैं लेकिन संगमयुग पर साकार द्वारा पार्ट तो बजाना पड़ता है ना। इसलिए आपके इस कल्प का पार्ट समाप्त होने के साथ बाप, दादा – दोनों का भी पार्ट इस कल्प का समाप्त होगा। फिर कल्प रिपीट होगा। इसलिए निराकार बाप भी आप बच्चों के पार्ट के साथ बंधा हुआ है। शुद्ध बन्धन है। लेकिन पार्ट का बन्धन तो है ना। स्नेह का बन्धन, सेवा का बन्धन… लेकिन मीठा बन्धन है। कर्मभोग वाला बन्धन नहीं है।
तो नया वर्ष सदा मुबारक का वर्ष है। नया वर्ष सदा बाप समान बनने का वर्ष है। नया वर्ष ब्रह्मा बाप को फॉलो करने का वर्ष है। नया वर्ष बाप के साथ स्वीट होम और स्वीट राजधानी में साथ रहने के वरदान प्राप्त करने का वर्ष है क्योंकि अभी से सदा साथ रहेंगे। अभी का साथ रहना सदा साथ रहने का वरदान है। नहीं तो बाराती बनेंगे और नजदीक वाले सम्बन्धी के बजाए दूर के सम्बन्धी बनेंगे। कभी-कभी मिलेंगे। कभी-कभी वाले तो नहीं हो ना? पहले जन्म में पहले राज्य का सुख और पहले नम्बर के राज्य अधिकारी विश्व महाराजा-विश्व महारानी के रॉयल सम्बन्ध, उसकी झलक और फलक न्यारी होगी! अगर दूसरे नम्बर विश्व महाराजा-महारानी की रॉयल फैमिली में भी आ जाओ तो उसमें भी अन्तर है। एक जन्म का फर्क भी पड़ जायेगा। इसको भी साथ नहीं कहेंगे। कोई भी नई चीज़ एक बार भी यूज़ कर लो तो उसको यूज़ किया हुआ कहेंगे ना। नया तो नहीं कहेंगे। साथ चलना है, साथ आना है, साथ में पहले जन्म का राज्य रॉयल फैमिली बन करना है – इसको कहते हैं समान बनना। तो क्या करना है, समान बनना है वा बाराती बनना है?
बापदादा अज्ञानी और ज्ञानियों का एक अन्तर देख रहा था। एक दृश्य के रूप में देख रहा था। बाप के बच्चे क्या हैं और अज्ञानी क्या हैं? आज की दुनिया में विकारी आत्मायें क्या बन गई हैं? जैसे आजकल कोई भी बड़ी फैक्ट्रीज वा जहाँ भी आग जलती है तो आग का धुआं निकालने के लिये चिमनी बनाते हैं ना। उससे सदैव धुआं निकलता है और सदैव काली दिखाई देगी। तो आज का मानव विकारी होने के कारण, किसी न किसी विकार वश होने के कारण संकल्प में, बोल में ईर्ष्या, घृणा या कोई न कोई विकार का धुआं निकालता रहता है। आंखों से भी विकारों का धुआं निकलता रहता और ज्ञानी बच्चों के हर बोल वा संकल्प से, फरिश्तापन से दुआयें निकलती हैं। उसका है विकारों की आग का धुआं और ज्ञानी तू आत्माओं के फरिश्ते रूप से सदा दुआयें निकलती। कभी भी संकल्प में भी किसी विकार के वश, विकार की अग्नि का धुआं नहीं निकलना चाहिए, सदा दुआयें निकलें। तो चेक करो – कभी दुआओं के बदले धुआं तो नहीं निकलता? फरिश्ता है ही दुआओं का स्वरूप। जब कोई भी ऐसा संकल्प आये या बोल निकले तो यह दृश्य सामने लाना – मैं क्या बन गया, फरिश्ते से बदल तो नहीं गया? व्यर्थ संकल्पों का भी धुआं है। वह जलती हुई आग का धुआं है, वह आधी आग का धुआं है। पूरी आग नहीं जलती है तो भी धुआं निकलता है ना। तो ऐसे फरिश्ता रूप हो जो सदा दुआयें निकलती रहे। इसको कहते हैं मास्टर दयालू, कृपालू, मर्सीफुल। तो अभी यह पार्ट बजाओ। अपने ऊपर भी कृपा करो तो दूसरे पर भी कृपा करो। जो देखा, जो सुना – वर्णन नहीं करो, सोचो नहीं। व्यर्थ को न सोचना, न देखना – यह है अपने ऊपर कृपा करना और जिसने किया वा कहा उसके प्रति भी सदा रहम करो, कृपा करो अर्थात् जो व्यर्थ सुना, देखा उस आत्मा के प्रति भी शुभ भावना शुभ कामना की कृपा करो। और कोई कृपा नहीं वा कोई हाथ से वरदान नहीं देंगे लेकिन मन पर नहीं रखना – यह है उस आत्मा के प्रति कृपा करना। अगर कोई भी व्यर्थ बात देखी हुई वा सुनी हुई वर्णन करते हो अर्थात् व्यर्थ बीज का वृक्ष बढ़ाते हो, वायुमण्डल में फैलाते हो – यह वृक्ष बन जाता है क्योंकि एक जो भी बुरा देखता वा सुनता है तो अपने एक मन में नहीं रख सकता, दूसरे को जरूर सुनायेगा, वर्णन जरूर करेगा। और एक का एक होता है तो क्या हो जायेगा? एक से अनेकता में आ जाते हैं। और जब एक से एक, एक से एक माला बन जाती है तो जो करने वाला होता है वह और ही व्यर्थ को स्पष्ट करने के लिए जिद्द में आ जाता है। तो वायुमण्डल में क्या फैला? व्यर्थ। यह धुआं फैला ना। यह दुआ हुई या धुआं? इसलिए व्यर्थ देखते हुए, सुनते हुए स्नेह से, शुभ भावना से समा लो। विस्तार नहीं करो। इसको कहते हैं दूसरे के ऊपर कृपा करना अर्थात् दुआ करना। तो तैयारी करो समान बन साथ चलने और साथ रहने की। ऐसे तो नहीं समझते हो कि अभी यहाँ ही रहना ठीक है, साथ चलने की तैयारी अभी नहीं करें, थोड़ा और रूकें? रुकने चाहते हो? रुकना भी हो तो बाप समान बन करके रुको। ऐसे ही नहीं रुको, लेकिन समान बनके रुको। फिर भले रुको, छुट्टी है। आप तो एवररेडी हो ना? सेवा रुकाती है वा ड्रामा रूकाता है, वह और बात है लेकिन अपने कारण से रुकने वाले नहीं बनो। कर्मबन्धन वश रुकने वाले नहीं। कर्मों के हिसाब-किताब का चौपड़ा साफ और स्पष्ट होना चाहिए। समझा। अच्छा!
चारों ओर के सर्व बच्चों को नये वर्ष की महानता से महान बनने की मुबारक सदा साथ रहे। सर्व हिम्मत वाले, फॉलो फादर करने वाले, सदा एक दो में दिलखुश मिठाई खिलाने वाले, सदा फरिश्ता बन दुआयें देने वाले, ऐसे बाप समान दयालू, कृपालू बच्चों को समान बनने की मुबारक साथ-साथ बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
डबल विदेशी भाई-बहिनों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:- सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? श्रेष्ठ आत्माओं का हर संकल्प वा बोल वा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ होता है। तो हर कर्म श्रेष्ठ बन गया है ना? जो जैसा होता है वैसा ही उसका कार्य होता है। तो श्रेष्ठ आत्माओं का कर्म भी श्रेष्ठ ही होगा ना। जैसी स्मृति होती है वैसी स्थिति स्वत: होती है। तो श्रेष्ठ स्थिति नेचुरल स्थिति है क्योंकि हो ही विशेष आत्मायें। ऊंचे ते ऊंचे बाप के बन गये तो जैसा बाप वैसे बच्चे हुए ना। बच्चों के लिए सदा कहा जाता है सन शोज़ फादर। तो ऐसे हो? आप सबके दिल में कौन समाया है? जो दिल में होगा वही बुद्धि में होगा, बोल में होगा, संकल्प में भी वही होगा। आप लोग कार्ड भी हार्ट का ले आते हो ना। गिफ्ट भी हार्ट की भेजते हो। तो यह अपनी स्थिति का चित्र भेजते हो ना। तो जो बाप की दिल पर सदा रहता है वह सदा ही जो बोलेगा, जो करेगा वह स्वत: ही बाप समान होगा। बाप समान बनना मुश्किल नहीं है ना? सिर्फ डॉट (बिन्दी) याद रखो तो मुश्किल ‘नॉट’ हो जायेगी। डॉट को भूलते हो तो नॉट नहीं होता। कितना सहज है डॉट बनाना वा डॉट लगाना। सारा ज्ञान इसी एक ‘डॉट’ शब्द में समाया हुआ है। आप भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और जो बीत गया उसे भी बिन्दी लगा दो, बस। छोटा बच्चा भी लिखने जब शुरू करता है तो पहले जब पेन्सिल कागज पर रखता है तो क्या बन जाता? डॉट बनेगा ना? तो यह भी बच्चों का खेल है। यह पूरा ही ज्ञान की पढ़ाई खेल-खेल में है। मुश्किल काम नहीं दिया है। इसलिए काम भी सहज है और हो भी सहजयोगी। बोर्ड में भी लिखते हो “सहज राजयोग”। तो ऐसा सहज अनुभव करना, इसे ही ज्ञान कहा जाता है। जो नॉलेजफुल हैं वह स्वत: ही पॉवरफुल भी होंगे क्योंकि नॉलेज को लाइट और माइट कहा जाता है। तो नॉलेजफुल आत्मायें सहज ही पॉवरफुल होने के कारण हर बात में सहज आगे बढ़ती हैं। तो यह सारा ग्रुप सहजयोगियों का ग्रुप है ना। ऐसे ही सहजयोगी रहना। अच्छा।
नये वर्ष के शुभारम्भ में बापदादा ने 12 बजे सभी बच्चों को बधाई दी:-
(दादियों ने बापदादा को गले लगाया) सदा स्नेह की भाकी में रहने वाली, सदा बाप की श्रीमत की पालना में पलने वाली हो। सदा ही बाप के सहयोग की छत्रछाया में रहने वाली छत्रधारी आत्मायें हो। तो सभी बच्चों को नये वर्ष की पहली घड़ी की मुबारक।
विश्व आध्यात्मिक सहयोग बैंक का उद्घाटन बापदादा ने मोमबत्ती जला कर किया
सभी सेवाधारी सेवा के उमंग-उत्साह से सेवा की इस विधि को आरम्भ कर रहे हैं। जहाँ सदा संगठन की, स्नेह की अंगुली है वहाँ कार्य सफल हुआ ही पड़ा है। यह संगठन रूप में सेवा को आगे बढ़ाने की निमित्त विधि है। तो सभी को सेवा का उमंग है ना? सभी सहयोग लेने के पहले सर्व ब्राह्मणों का सहयोग है ही है। इसलिए जहाँ सर्व ब्राह्मणों का सहयोग है, वहाँ विश्व की आत्माओं का कल्याण हुआ ही पड़ा है। तो यह भी अच्छी एक विधि निकाली है। कितना बड़ा कार्य रचा है। बहुत बड़ा कार्य है। बड़ी दिल से इस रचे हुए कार्य को स्नेह सहयोग से आगे बढ़ाते चलो। सफलता तो अधिकार में है ही। अच्छा!
विदाई के समय दादियों से मुलाकात:- संगमयुग छोटा-सा युग है, बहुत समय 1250 वर्ष भी चलता तो भी थक जाते ना? इसलिए छोटा-सा युग है। अच्छा! आप दोनों (दादी, दादी जानकी) किससे भरपूर हो? (आपके वरदानों से) बाप के वरदानों से हैं ही लेकिन आज सुनाया कि जैसे बाप का नाम लेते ही मुँह मीठा हो जाता है, ऐसे आप निमित्त आत्माओं का भी बाप-समान पार्ट चल रहा है। बाप ने समानता का वरदान दे दिया है। “समान भव” का वरदान मिला हुआ है, इसलिए ना चाहते भी आप लोगों से बाप की अनुभूति होती है। इसको ही कहते हैं – बाप समान बनने वाले एग्जाम्पल। समझा। इस समय शोकेश के पहले नम्बर के शोपीस हो। आपको देख करके और कोई बात याद आयेगी? बाप याद आयेगा, बाप के चरित्र याद आयेंगे। इसको कहते हैं – आप में बाप है, बाप में आप हैं। इसी को ही लोगों ने कह दिया है कि बाप मेरे में है, अन्दर बैठा है। लेकिन समानता के कारण समान बन जाते हैं ना, इसलिए कहते हैं कि बाप बैठा है। तो आप लोगों का स्लोगन है – आप बाप में, बाप आप में। आप और बाप अलग हो ही नहीं सकते। जैसे बाप और दादा जुड़वे हो गये हैं ना। तो आप लोग क्या हो? जुड़वें हो या अलग हो? सेकेण्ड भी अलग नहीं हो सकते। इसको कहते हैं – बाप समान। अच्छा!
अब तो घर जाना है? (कब जाना है?) समय कभी भी बता के नहीं आयेगा, अचानक ही आयेगा। जब समझेंगे समीप हैं तो नहीं आयेगा। जब समझने से थोड़े अलबेले होंगे तो अचानक आयेगा। आने की निशानी अलबेलेपन वाले अलबेलेपन में आयेंगे, नहीं तो नम्बर कैसे बनेंगे? फिर तो सब कहें – हम भी अष्ट हैं, हम भी पास हैं। लेकिन थोड़ा बहुत अचानक होने से ही नम्बर होंगे। बाकी जो महारथी हैं उन्हों को टचिंग आयेगी। लेकिन बाप नहीं बतायेगा। टचिंग ऐसे ही आयेगी जैसे बाप ने सुनाया। लेकिन बाप कभी एनाउन्स नहीं करेंगे। एक सेकेण्ड पहले भी नहीं कहेंगे कि एक सेकेण्ड बाद क्या होना है। यह भी नहीं कहेंगे। नम्बर बनने हैं, इसलिए यह हिसाब रखा हुआ है।
“नया वर्ष — बाप समान बनने का वर्ष”
मुरली संदर्भ
प्रवचनकर्ता: अव्यक्त बापदादा
तिथि: ________
अवसर: नववर्ष संगम मिलन
1️⃣ तीन संगमों का दिव्य रहस्य
आज त्रिमूर्ति बाप तीन विशेष संगम देख रहे हैं:
(1) बाप और बच्चों का संगम
यह संगम श्रेष्ठ भाग्य और श्रेष्ठ प्राप्तियों का अनुभव कराता है।
उदाहरण:
जैसे बच्चा लंबे समय बाद पिता से मिले तो सुरक्षा, प्रेम और अधिकार का अनुभव करता है — वैसे ही आत्मा जब बाप से मिलती है तो आत्मिक सम्पदा मिलती है।
(2) युग संगम
यह संगम विश्व परिवर्तन की प्रेरणा देता है।
मुरली नोट:
संगमयुग = परिवर्तन का स्वर्णिम अवसर
उदाहरण:
जैसे रात और दिन के बीच का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है, वैसे ही कलियुग और सतयुग के बीच संगमयुग।
(3) वर्ष संगम
नवीनता और नये संकल्पों की प्रेरणा देता है।
संदेश:
नया वर्ष = नया जीवन दृष्टिकोण
2️⃣ “डबल हीरो” आत्माओं की पहचान
बापदादा बच्चों को कहते हैं —
आप डबल हीरो हो:
-
बाप के अमूल्य रत्न (हीरे तुल्य जीवन)
-
श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले विश्व नाटक के हीरो
मुरली नोट:
हर सेकण्ड, हर संकल्प, हर जन्म — मुबारक है।
3️⃣ मुबारक देने की रूहानी कला
सच्ची मुबारक क्या है?
दिल से निकली खुशी जो दूसरी आत्मा को भी खुशी का अनुभव कराए।
उदाहरण:
-
कोई कांटा दे → आप रूहानी गुलाब दो
-
कोई दुःख दे → आप सुखदाता के बच्चे बन सुख दो
मुरली सूत्र:
“बधाई देना = खुशी की लेन-देन करना”
4️⃣ दिलखुश मिठाई बनाम मुख की मिठाई
| मुख की मिठाई | दिलखुश मिठाई |
|---|---|
| एक दिन की | सदा की |
| शरीर को स्वाद | आत्मा को प्रसाद |
| बीमारी का डर | असीम खुशी |
संदेश:
हर आत्मा को दिल से खुशी देना ही सच्चा उत्सव है।
5️⃣ बाप समान बनने की साधना
क्या करें?
-
हर संकल्प → बाप समान
-
हर बोल → मधुर
-
हर कर्म → श्रेष्ठ
-
हर संबंध → सहयोगी
मुरली नोट:
“ब्रह्मा बाप के हर कदम पर कदम रखो”
उदाहरण:
कॉपी करना मुश्किल नहीं — नया रास्ता नहीं बनाना, फॉलो करना है।
6️⃣ “साथ चलना” बनाम “बाराती बनना”
| समान बनना | बाराती बनना |
|---|---|
| साथ घर जाना | दूर से देखना |
| पहले जन्म का राज्य | बाद का नम्बर |
| रॉयल फैमिली | सामान्य प्रजा |
प्रश्न चिंतन:
आपको क्या बनना है — समान या बाराती?
7️⃣ अष्ट का आध्यात्मिक महत्व
इस वर्ष की विशेषता: डबल 8
अष्ट की स्मृतियाँ:
-
अष्ट शक्तियाँ
-
अष्ट रत्न
-
अष्ट भुजाधारी स्वरूप
-
अष्ट राजधानियाँ
संकल्प:
यह वर्ष दृढ़ता से बाप समान बनने का वर्ष।
8️⃣ धुआँ और दुआएँ — आत्मा की पहचान
अज्ञानी आत्माएँ
विकारों की आग से धुआँ:
-
ईर्ष्या
-
घृणा
-
क्रोध
-
व्यर्थ संकल्प
ज्ञानी आत्माएँ
फरिश्ता स्वरूप से दुआएँ:
-
शुभ भावना
-
शुभ कामना
-
रहम
-
कृपा
स्वचेक प्रश्न:
मैं दुआ दे रहा हूँ या धुआँ फैला रहा हूँ?
9️⃣ कृपालु बनने की असली साधना
अपने ऊपर कृपा:
-
व्यर्थ न देखना
-
व्यर्थ न सुनना
-
व्यर्थ न सोचना
दूसरों पर कृपा:
-
बातों को मन पर न रखना
-
व्यर्थ का वर्णन न करना
-
शुभ भावना से समाना
मुरली सूत्र:
“व्यर्थ बीज का विस्तार मत करो”
🔟 सहजयोग का रहस्य — “डॉट”
-
मैं आत्मा = बिन्दी
-
बाप = बिन्दी
-
बीती बातें = बिन्दी
डॉट याद → मुश्किल NOT
ज्ञान सार:
पूरा राजयोग एक “बिन्दी” में समाया है।
11️⃣ सेवा और संगठन की शक्ति
विश्व आध्यात्मिक सहयोग की भावना:
जहाँ
-
संगठन
-
स्नेह
-
सहयोग
होता है — वहाँ सफलता निश्चित है।
मुरली संदेश:
“सफलता अधिकार है”
12️⃣ समानता का जीवंत उदाहरण
निमित्त आत्माएँ = बाप का जीवंत स्वरूप
अनुभव:
उन्हें देखकर बाप याद आता है।
स्लोगन:
“आप बाप में — बाप आप में”
अंतिम संकल्प
नया वर्ष =
-
सदा मुबारक देने का वर्ष
-
सदा बाप समान बनने का वर्ष
-
सदा साथ चलने का वर्ष
-
सदा फरिश्ता बन दुआएँ देने का वर्ष
समापन आशीर्वाद
चारों ओर के सर्व बच्चों को —
महानता से महान बनने की मुबारक।
सदा दिलखुश मिठाई बाँटने वाले,
सदा दुआओं के फरिश्ते,
ऐसे बाप समान आत्माओं को —
यादप्यार और नमस्ते।
प्रश्न 1: आज बापदादा कौन-से तीन संगम देख रहे हैं?
उत्तर:
1️⃣ बाप और बच्चों का संगम
2️⃣ युग संगम
3️⃣ वर्ष संगम
तीनों संगम परिवर्तन की प्रेरणा देने वाले हैं —
युग संगम विश्व परिवर्तन का,
बाप-बच्चों का संगम श्रेष्ठ भाग्य का,
और वर्ष संगम नवीनता का संदेश देता है।
प्रश्न 2: बाप और बच्चों का संगम विशेष क्यों है?
उत्तर:
यह संगम श्रेष्ठ भाग्य और सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों का अनुभव कराने वाला है। आत्मा को बाप से सीधा आध्यात्मिक खजाना मिलता है।
प्रश्न 3: वर्ष संगम हमें क्या प्रेरणा देता है?
उत्तर:
नवीनता की प्रेरणा —
नया वर्ष सिर्फ तारीख बदलना नहीं, बल्कि जीवन दृष्टिकोण बदलना है।
प्रश्न 4: बापदादा बच्चों को “डबल हीरो” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि बच्चे दो प्रकार से हीरो हैं:
बाप के अमूल्य रत्न — हीरे तुल्य जीवन वाले
विश्व नाटक में श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले हीरो
प्रश्न 5: सच्ची मुबारक क्या है?
उत्तर:
दिल से निकली खुशी जो दूसरी आत्मा को भी खुशी का अनुभव कराए।
मुबारक देना = खुशी की लेन-देन करना।
प्रश्न 6: अगर कोई बुरा व्यवहार करे तो श्रेष्ठ आत्मा क्या करे?
उत्तर:
वह कांटा दे → आप रूहानी गुलाब दो
वह दुःख दे → आप सुखदाता बन सुख दो
श्रेष्ठ आत्मा “जैसे को तैसा” नहीं बनती।
प्रश्न 7: “दिलखुश मिठाई” क्या है?
उत्तर:
आत्मिक खुशी बाँटना ही दिलखुश मिठाई है।
यह मुख की मिठाई से श्रेष्ठ है — इसमें बीमारी नहीं, सिर्फ खुशी है।
प्रश्न 8: नया वर्ष केवल दो दिन की शुभकामनाओं तक सीमित क्यों नहीं होना चाहिए?
उत्तर:
क्योंकि सच्ची मुबारक दिल से होती है और पूरे वर्ष चलनी चाहिए।
सिर्फ शब्द नहीं — स्वभाव बनना चाहिए।
प्रश्न 9: बाप समान बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
हर संकल्प, हर बोल, हर कर्म में बाप जैसी श्रेष्ठता लाना।
संबंधों में सहयोगी बनना, प्रतिस्पर्धी नहीं।
प्रश्न 10: ब्रह्मा बाप को फॉलो करना सहज क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि वे अनुभवी आत्मा हैं।
मार्ग नया नहीं बनाना —
सिर्फ “हर कदम पर कदम” मिलाना है।
प्रश्न 11: “साथ चलना” और “बाराती बनना” में क्या अंतर है?
उत्तर:
| साथ चलना | बाराती बनना |
|---|---|
| बाप के साथ घर जाना | दूर से देखना |
| पहले जन्म का राज्य | बाद का नम्बर |
| रॉयल परिवार | सामान्य प्रजा |
प्रश्न 12: इस वर्ष में “8” अंक का क्या महत्व बताया गया है?
उत्तर:
अष्ट शक्तियाँ, अष्ट रत्न, अष्ट भुजाधारी स्वरूप, अष्ट राजधानियाँ —
“अष्ट” पूर्णता और शक्ति का प्रतीक है।
प्रश्न 13: अज्ञानी और ज्ञानी आत्माओं में क्या अंतर है?
उत्तर:
अज्ञानी — विकारों का धुआँ फैलाते हैं
ज्ञानी — फरिश्ता बन दुआएँ फैलाते हैं
प्रश्न 14: “धुआँ” और “दुआ” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
धुआँ = विकार, व्यर्थ संकल्प, नकारात्मकता
दुआ = शुभ भावना, कृपा, कल्याण भावना
प्रश्न 15: अपने ऊपर और दूसरों पर कृपा कैसे करें?
उत्तर:
✅ व्यर्थ न देखना
✅ व्यर्थ न सुनना
✅ व्यर्थ न सोचना
✅ किसी की गलती मन पर न रखना
प्रश्न 16: “डॉट” (बिन्दी) का राजयोग में क्या महत्व है?
उत्तर:
• मैं आत्मा = बिन्दी
• बाप = बिन्दी
• बीती बातें = बिन्दी
“डॉट याद → मुश्किल NOT”
प्रश्न 17: बाप समान बनने का मुख्य लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
बाप के साथ स्वीट होम जाना
ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में आना
अनेक जन्मों का साथ प्राप्त करना
प्रश्न 18: सेवा में संगठन का क्या महत्व है?
उत्तर:
जहाँ संगठन और स्नेह है, वहाँ सफलता निश्चित है।
सामूहिक सहयोग से विश्व कल्याण संभव है।
प्रश्न 19: “आप बाप में, बाप आप में” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
समानता की ऐसी स्थिति जहाँ आत्मा में बाप के गुण झलकें।
आपको देखकर बाप याद आए।
प्रश्न 20: समय कब आएगा — क्या इसकी सूचना मिलेगी?
उत्तर:
समय अचानक आएगा।
बाप पूर्व सूचना नहीं देंगे।
सदैव एवररेडी रहना ही श्रेष्ठता है।
Disclaimer
यह वीडियो/लेख आध्यात्मिक अध्ययन एवं व्यक्तिगत आत्मचिंतन के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत विचार ब्रह्माकुमारीज़ की मुरली शिक्षाओं पर आधारित हैं। श्रोताओं से निवेदन है कि इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सुनें व अपने विवेक से ग्रहण करें।
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