AV-05/20-02-1987-सच्चे रूहानी आशिक की निशानियां
“सच्चे रूहानी आशिक की निशानियां”
आज रूहानी माशूक अपने रूहानी आशिक आत्माओं से मिलने के लिए आये हैं। सारे कल्प में इस समय ही रूहानी माशूक और आशिकों का मिलन होता है। बापदादा अपने हर एक आशिक आत्मा को देख हर्षित होते हैं – कैसे रूहानी आकर्षण से आकर्षित हो अपने सच्चे माशूक को जान लिया, पा लिया है! खोये हुए आशिक को देख माशूक भी खुश होते हैं कि फिर से अपने यथार्थ ठिकाने पर पहुँच गये। ऐसा सर्व प्राप्ति कराने वाला माशूक और कोई मिल नहीं सकता। रूहानी माशूक सदा अपने आशिकों से मिलने के लिए कहाँ आते हैं? जैसा श्रेष्ठ माशूक और आशिक हैं, ऐसे ही श्रेष्ठ स्थान पर मिलने के लिए आते हैं। यह कौनसा स्थान है जहाँ मिलन मना रहे हो? इसी स्थान को जो भी कहो, सर्व नाम इस स्थान को दे सकते हैं। वैसे मिलने के स्थान जो अति प्रिय लगते हैं वह कौन-से होते हैं? मिलन या फूलों के बगीचे में होता है वा सागर के किनारे पर मिलना होता है, जिसको आप लोग बीच (समुद्र का किनारा) कहते हो। तो अब कहाँ बैठे हो? ज्ञान सागर के किनारे रूहानी मिलन के स्थान पर बैठे हो। रूहानी वा गॉडली गार्डन (अल्लाह का बगीचा) है। और तो अनेक प्रकार के बगीचे देखे हैं लेकिन ऐसा बगीचा जहाँ हरेक एक दो से ज्यादा खिले हुए फूल है, एक-एक श्रेष्ठ सुन्दरता से अपनी खुशबू दे रहे हैं – ऐसा बगीचा है। इसी बीच पर बापदादा वा माशूक मिलने आते हैं। वह अनेक बीच देखीं, लेकिन ऐसी बीच कब देखी जहाँ ज्ञान सागर की स्नेह की लहरें, शक्ति की लहरें, भिन्न-भिन्न लहरें लहराए सदा के लिए रिफ्रेश कर देती हैं? यह स्थान पसन्द है ना? स्वच्छता भी है और रमणीकता भी है। सुन्दरता भी है। इतनी ही प्राप्तियां भी हैं। ऐसा मनोरंजन का विशेष स्थान आप आशिकों के लिए माशूक ने बनाया है जहाँ आने से मुहब्बत की लकीर के अन्दर पहुँचते ही अनेक प्रकार की मेहनत से छूट जाते। सबसे बड़ी मेहनत – नेचुरल याद की, वह सहज अनुभव करते हो और कौनसी मेहनत से छूटते हो? लौकिक जॉब (नौकरी) से भी छूट जाते हो। भोजन बनाने से भी छूट जाते हो। सब बना बनाया मिलता है ना। याद भी स्वत: अनुभव होती। ज्ञान रत्नों की झोली भी भरती रहती। ऐसे स्थान पर जहाँ मेहनत से छूट जाते हो और मुहब्बत में लीन हो जाते हो।
वैसे भी स्नेह की निशानी विशेष यही गाई जाती कि दो, दो न रहें लेकिन दो मिलकर एक हो जाएं। इसको ही समा जाना कहते हैं। भक्तों ने इसी स्नेह की स्थिति को समा जाना वा लीन होना कह दिया है। वो लोग लीन होने का अर्थ नहीं समझते। लव में लीन होना – यह स्थिति है लेकिन स्थिति के बदले उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त करना समझ लिया है। समा जाना अर्थात् समान बन जाना। जब बाप के वा रूहानी माशूक के मिलन में मगन हो जाते हो तो बाप समान बनने अथवा समा जाने अर्थात् समान बनने का अनुभव करते हो। इसी स्थिति को भक्तों ने समा जाना कहा है। लीन भी होते हो, समा भी जाते हो। लेकिन यह मिलन के मुहब्बत के स्थिति की अनुभूति है। समझा? इसलिए बापदादा अपने आशिकों को देख रहे हैं।
सच्चे आशिक अर्थात् सदा आशिक, नेचुरल (स्वत:) आशिक। सच्चे आशिक की विशेषतायें जानते भी हो। फिर भी उसकी मुख्य निशानियां हैं:-
1\. एक माशूक द्वारा सर्व सम्बन्धों की समय प्रमाण अनुभूति करना। माशूक एक है लेकिन एक के साथ सर्व सम्बन्ध हैं। जो सम्बन्ध चाहें और जिस समय जिस सम्बन्ध की आवश्यकता है, उस समय उस सम्बन्ध के रूप से प्रीति की रीति द्वारा अनुभव कर सकते हो। तो पहली निशानी है – सर्व सम्बन्धों की अनुभूति। ‘सर्व’ शब्द को अण्डरलाइन करना। सिर्फ सम्बन्ध नहीं। कई ऐसे नटखट आशिक भी हैं जो समझते हैं सम्बन्ध तो जुट गया है। लेकिन सर्व सम्बन्ध जुटे हैं? और दूसरी बात – समय पर सम्बन्ध की अनुभूति होती है? नॉलेज के आधार पर सम्बन्ध है वा दिल की अनुभूति से सम्बन्ध है? बापदादा सच्ची दिल पर राज़ी है। सिर्फ तीव्र दिमाग वालों पर राज़ी नहीं, लेकिन दिलाराम दिल पर राज़ी है। इसलिए दिल का अनुभव दिल जाने, दिलाराम जाने। समाने का स्थान दिल कहा जाता है, दिमाग नहीं। नॉलेज को समाने का स्थान दिमाग है, लेकिन माशूक को समाने का स्थान दिल है। माशूक आशिकों की बातें ही सुनायेंगे ना। कोई-कोई आशिक दिमाग ज्यादा चलाते लेकिन दिल से दिमाग की मेहनत आधी हो जाती है। जो दिल से सेवा करते वा याद करते, उन्हों की मेहनत कम और सन्तुष्टता ज्यादा होती और जो दिल के स्नेह से नहीं याद करते, सिर्फ नॉलेज के आधार पर दिमाग से याद करते वा सेवा करते, उन्हों को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती, सन्तुष्टता कम होती। चाहे सफलता भी हो जाए, तो भी दिल की सन्तुष्टता कम होगी। यही सोचते रहेंगे – हुआ तो अच्छा, लेकिन फिर, फिर भी… करते रहेंगे और दिल वाले सदा सन्तुष्टता के गीत गाते रहेंगे। दिल की सन्तुष्टता के गीत, मुख की सन्तुष्टता के गीत नहीं। सच्चे आशिक दिल से सर्व सम्बन्धों की समय प्रमाण अनुभूति करते हैं।
दूसरी निशानी – सच्चे आशिक हर परिस्थिति में, हर कर्म में सदा प्राप्ति की खुशी में होंगे। एक है अनुभूति, दूसरी है उससे प्राप्ति। कई अनुभूति भी करते हैं कि हाँ, मेरा बाप भी है, साजन भी है। बच्चा भी है लेकिन प्राप्ति जितनी चाहते उतनी नहीं होती है। बाप है, लेकिन वर्से के प्राप्ति की खुशी नहीं रहती। अनुभूति के साथ सर्व सम्बन्धों द्वारा प्राप्ति का भी अनुभव हो। जैसे बाप के सम्बन्ध द्वारा सदा वर्से के प्राप्ति की महसूसता हो, भरपूरता हो। सतगुरू द्वारा सदा वरदानों से सम्पन्न स्थिति का वा सदा सम्पन्न स्वरूप का अनुभव हो। तो प्राप्ति का अनुभव भी आवश्यक है। वह है सम्बन्धों का अनुभव, यह है प्राप्तियों का अनुभव। कईयों को सर्व प्राप्तियों का अनुभव नहीं होता। मास्टर सर्वशक्तिवान है लेकिन समय पर शक्तियों की प्राप्ति नहीं होती। प्राप्ति की अनुभूति नहीं तो प्राप्ति में भी कमी है। तो अनुभूति के साथ प्राप्ति स्वरूप भी बनें – यह है सच्चे आशिक की निशानी।
तीसरी निशानी – जिस आशिक को अनुभूति है, प्राप्ति भी है वह सदा तृप्त रहेंगे, किसी भी बात में अप्राप्त आत्मा नहीं लगेगी। तो ‘तृप्ति’ – यह आशिक की विशेषता है। जहाँ प्राप्ति है, वहाँ तृप्ति जरूर है। अगर तृप्त नहीं तो अवश्य प्राप्ति में कमी है और प्राप्ति नहीं तो सर्व सम्बन्धों की अनुभूति में कमी है। तो 3 निशानियां है – अनुभूति, प्राप्ति और तृप्ति। सदा तृप्त आत्मा। जैसा भी समय हो, जैसा भी वायुमण्डल हो, जैसे भी सेवा के साधन हों, जैसे भी सेवा के संगठन के साथी हों लेकिन हर हाल में, हर चाल में तृप्त हों। ऐसे सच्चे आशिक हो ना? तृप्त आत्मा में कोई हद की इच्छा नहीं होगी। वैसे देखो तो तृप्त आत्मा बहुत मैनारिटी (थोड़ी) रहती है। कोई न कोई बात में चाहे मान की, चाहे शान की भूख होती है। भूख वाला कभी तृप्त नहीं होता। जिसका सदा पेट भरा हुआ होता, वह तृप्त होता है। तो जैसे शरीर के भोजन की भूख है, वैसे मन की भूख है – शान, मान, सैलवेशन, साधन। यह मन की भूख है। तो जैसे शरीर की तृप्ति वाले सदा सन्तुष्ट होंगे, वैसे मन की तृप्ति वाले सदा सन्तुष्ट होंगे। सन्तुष्टता तृप्ति की निशानी है। अगर तृप्त आत्मा नहीं होंगे, चाहे शरीर की भूख, चाहे मन की भूख होगी तो जितना भी मिलेगा, मिलेगा भी ज्यादा लेकिन तृप्त आत्मा न होने कारण सदा ही अतृप्त रहेंगे। असन्तुष्टता रहती है। जो रॉयल होते हैं, वह थोड़े में तृप्त होते हैं। रॉयल आत्माओं की निशानी – सदा ही भरपूर होंगे, एक रोटी में भी तृप्त तो 36 प्रकार के भोजन में भी तृप्त होंगे। और जो अतृप्त होंगे, वह 36 प्रकार के भोजन मिलते भी तृप्त नहीं होंगे क्योंकि मन की भूख है। सच्चे आशिक की निशानी – सदा तृप्त आत्मा होंगे। तो तीनों ही निशानियां चेक करो। सदैव यह सोचो – ‘हम किसके आशिक हैं! जो सदा सम्पन्न है, ऐसे माशूक के आशिक हैं!’ तो सन्तुष्टता कभी नहीं छोड़ो। सेवा छोड़ दो लेकिन सन्तुष्टता नहीं छोड़ो। जो सेवा असन्तुष्ट बनावे वो सेवा, सेवा नहीं। सेवा का अर्थ ही है मेवा देने वाली सेवा। तो सच्चे आशिक सर्व हद की चाहना से परे, सदा ही सम्पन्न और समान होंगे।
आज आशिकों की कहानियां सुना रहे हैं। नाज़, नखरे भी बहुत करते हैं। माशूक भी देख-देख मुस्कराते रहते। नाज़, नखरे भल करो लेकिन माशूक को माशूक समझ उसके सामने करो, दूसरे के सामने नहीं। भिन्न-भिन्न हद के स्वभाव, संस्कार के नखरे और नाज़ करते हैं। जहाँ मेरा स्वभाव, मेरे संस्कार शब्द आता है, वहाँ भी नाज़, नखरे शुरू हो जाते हैं। बाप का स्वभाव सो मेरा स्वभाव हो। मेरा स्वभाव बाप के स्वभाव से भिन्न हो नहीं सकता। वह माया का स्वभाव है, पराया स्वभाव है। उसको मेरा कैसे कहेंगे? माया पराई है, अपनी नहीं है। बाप अपना है। मेरा स्वभाव अर्थात् बाप का स्वभाव। माया के स्वभाव को मेरा कहना भी रांग है। ‘मेरा’ शब्द ही फेरे में लाता है अर्थात् चक्र में लाता है। आशिक माशूक के आगे ऐसे नाज़-नखरे भी दिखाते हैं। जो बाप का सो मेरा। हर बात में भक्ति में भी यही कहते हैं – जो तेरा सो मेरा, और मेरा कुछ नहीं। लेकिन जो तेरा सो मेरा। जो बाप का संकल्प, वह मेरा संकल्प। सेवा के पार्ट बजाने के बाप के संस्कार-स्वभाव, वह मेरे। तो इससे क्या होगा? हद का मेरा, तेरा हो जायेगा। तेरा सो मेरा, अलग मेरा नहीं है। जो भी बाप से भिन्न है, वह मेरा है ही नहीं, वह माया का फेरा है। इसलिए इस हद के नाज़-नखरे से निकल रूहानी नाज़ – मैं तेरी और तू मेरा, भिन्न-भिन्न सम्बन्ध की अनुभूति के रूहानी नखरे भल करो। परन्तु यह नहीं करो। सम्बन्ध निभाने में भी रूहानी नखरे कर सकते हो। मुहब्बत की प्रीत के नखरे अच्छे होते हैं। कब सखा के सम्बन्ध से मुहब्बत के नखरे का अनुभव करो। वह नखरा नहीं लेकिन निरालापन है। स्नेह के नखरे प्यारे होते हैं। जैसे छोटे बच्चे बहुत स्नेही और प्युअर (पवित्र) होने कारण उनके नखरे सबको अच्छे लगते हैं। शुद्धता और पवित्रता होती है बच्चों में। और बड़ा कोई नखरा करे तो वह बुरा माना जाता। तो बाप से भिन्न-भिन्न सम्बन्ध के, स्नेह के, पवित्रता के नाज़-नखरे भल करो, अगर करना ही है तो।
‘सदा हाथ और साथ’ ही सच्चे आशिक माशूक की निशानी है। साथ और हाथ नहीं छूटे। सदा बुद्धि का साथ हो और बाप के हर कार्य में सहयोग का हाथ हो। एक दो के सहयोग की निशानी हाथ में हाथ मिलाके दिखाते हैं ना। तो सदा बाप के सहयोगी बनना – यह है सदा हाथ में हाथ और सदा बुद्धि से साथ रहना। मन की लगन, बुद्धि का साथ। इस स्थिति में रहना अर्थात् सच्चे आशिक और माशूक के पोज़ में रहना। समझा? वायदा ही यह है कि सदा साथ रहेंगे। कभी-कभी साथ निभायेंगे – यह वायदा नहीं है। मन का लगाव कभी माशूक से हो और कभी न हो तो वह सदा साथ तो नहीं हुआ ना। इसलिए इसी सच्चे आशिकपन के पोजीशन में रहो। दृष्टि में भी माशूक, वृत्ति में भी माशूक, सृष्टि ही माशूक।
तो यह माशूक और आशिकों की महफिल है। बगीचा भी है तो सागर का किनारा भी है। यह वन्डरफुल ऐसी प्राइवेट बीच (सागर का किनारा) है जो हजारों के बीच (मध्य) भी प्राइवेट है। हर एक अनुभव करते – मेरे साथ माशूक का पर्सनल प्यार है। हरेक को पर्सनल प्यार की फीलिंग प्राप्त होना – यही वन्डरफुल माशूक और आशिक हैं। है एक माशूक लेकिन है सबका। सभी का अधिकार सबसे ज्यादा है। हरेक का अधिकार है। अधिकार में नम्बर नहीं हैं, अधिकार प्राप्त करने में नम्बर हो जाते हैं। सदा यह स्मृति रखो कि ‘गॉडली गार्डन में हाथ और साथ दे चल रहे हैं या बैठे हैं। रूहानी बीच पर हाथ और साथ दे मौज मना रहे हैं।’ तो सदा ही मनोरंजन में रहेंगे, सदा खुश रहेंगे, सदा सम्पन्न रहेंगे। अच्छा।
यह डबल विदेशी भी डबल लकी हैं। अच्छा है जो अब तक पहुँच गये। आगे चल क्या परिवर्तन होता है, वह तो ड्रामा। लेकिन डबल लकी हो जो समय प्रमाण पहुँच गये हो। अच्छा।
सदा अविनाशी आशिक बन रूहानी माशूक से प्रीति की रीति निभाने वाले, सदा स्वयं को सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अनुभव करने वाले, सदा हर स्थिति वा परिस्थिति में तृप्त रहने वाले, सदा सन्तुष्टता के खजाने से भरपूर बन औरों को भी भरपूर करने वाले, ऐसे सदा के साथ और हाथ मिलाने वाले सच्चे आशिकों को रूहानी माशूक का दिल से यादप्यार और नमस्ते।
पर्सनल मुलाकात – पार्टियों से
आस्ट्रेलिया पार्टी से:- आस्ट्रेलिया निवासी हो या वतन निवासी हो? कौन सा देश अच्छा लगता है? सदा वतनवासी बन जैसे बाप सेवा के लिए नीचे आते हैं, इसी रीति से बच्चे भी वतन से सेवा के प्रति नीचे आये हैं – ऐसे अनुभव कर सेवा करते चलो तो सदा ही न्यारे और बाप समान विश्व के प्यारे बन जायेंगे। ऊपर से नीचे आना माना अवतार बन अवतरित होकर सेवा करना। ऐसी सेवा करते हो? क्योंकि वर्तमान समय ऐसे अवतारों की ही आवश्यकता है। सभी चाहते हैं कि अवतार आयें और हमको साथ ले जायें। जो भी प्रार्थना करते हैं, उसमें क्या कहते हैं? क्राइस्ट को भी यही कहते हैं – आओ और साथ ले जाओ। तो सच्चे अवतार आप हो जो साथ ले जायेंगे मुक्तिधाम में। ऐसे अवतार बन सदा सेवा में आगे बढ़ते रहो। चलते-फिरते आप लोगों से ही साक्षात्कार हो कि अवतार जा रहे हैं, अवतार बोल रहे हैं। तो उन्हों की इच्छा पूर्ण हो जायेगी और खुश हो जायेंगे। ऐसी सेवा में लगे हुए हो? क्योंकि विश्व इस समय दु:ख और अशान्ति से थका हुआ अनुभव कर रही है। तो ऐसी थकी हुई आत्माओं को सुख और शान्ति की चैन दिलाने वाली आत्मायें आप हो। सदा यही लक्ष्य रखो कि सभी को कुछ न कुछ बाप के खजानों से प्राप्ति जरूर करायें।
अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको आदि पार्टियों से:- 1\. सभी सदा एकरस स्थिति में स्थित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना। अनुभवी आत्मायें बन गई ना। सब दुनिया के रस अनुभव कर लिए। अब इस ईश्वरीय रस का अनुभव किया, तो वह रस क्या लगते हैं? फीके लगते हैं ना। जब है ही एक रस मीठा तो एक ही तरफ अटेन्शन जायेगा ना। एक तरफ मन लग ही जाता है, मेहनत नहीं लगती। बाप का स्नेह, बाप की मदद, बाप का साथ, बाप द्वारा सर्व प्राप्तियां सहज बना देती हैं। हरेक इसी अनुभव से आगे बढ़ रहे हो, यह देख बाप भी हर्षित होते हैं। जितना भी देश से दूर स्थान पर हो, उतना ही दिल में नजदीक हो। बापदादा सेकेण्ड में सभी बच्चों को आह्वान कर इमर्ज कर लेते हैं, भल वह कितना भी दूर हो। आपको भी अनुभव होता है ना – बाप अमृतवेले कैसे मिलन मनाते हैं! अच्छा!
2\. बाप की याद से खुशियों के झूलों में झूलने वाले हो ना। क्योंकि इस संगमयुग में जो खुशियों की खान मिलती है, वह और किसी युग में प्राप्त नहीं हो सकती। इस समय बाप और बच्चों का मिलन है, वर्सा है, वरदान है। बाप के रूप में वर्सा देते, सतगुरु के रूप में वरदान देते हैं। तो दोनों अनुभव हैं ना? दोनों ही प्राप्तियां सहज अनुभव कराने वाली हैं। वर्सा या वरदान – दोनों में मेहनत नहीं। इसलिए टाइटल ही है सहजयोगी। क्योंकि आलमाइटी अथॉरिर्टी बाप बन जाए, सतगुरु बन जाये… तो सहज नहीं होगा? यही अन्तर परम-आत्मा और आत्माओं का है। कोई महान आत्मा भी हो लेकिन प्राप्ति कराने के लिए कुछ-न-कुछ मेहनत जरूर देगी। 63 जन्म के अनुभवी हो ना। इसलिए बापदादा बच्चों की मेहनत देख नहीं सकते। जब बाप से थोड़ा भी संकल्प में भी किनारा करते हो तब मेहनत करते हो। उसी सेकेण्ड को साथी बना दो तो सेकेण्ड में मुश्किल सहज अनुभव हो जायेगा। क्योंकि बापदादा आये ही हैं बच्चों की थकावट उतारने। 63 जन्म ढूँढा, भटके, अब बापदादा मन की भी थकावट, तन की भी थकावट और धन के उलझन के कारण भी जो थकावट थी, वह उतार रहे हैं – नयनों पर बिठाकर ले जाते हैं। तो इतने हल्के बने हो जो नयनों पर बिठाकर ले जायें? लाइट (हल्के) हो ना? जब बाप बोझ उठाने के लिए तैयार है तो आप बोझ क्यों उठाते हो? बाप से स्नेह की निशानी है – सदा हल्के बन बाप की नजरों में समा जाओ। इतने लाइट जो नज़रों में समा जायें! इस समय लाइट बनो तो 21 जन्म गैरन्टी है – कभी भी किसी भी प्रकार का बोझ आ नहीं सकता। अच्छा!
19 तारीख सतगुरुवार प्रात: 6.30 बजे बापदादा ने क्लास में यादप्यार दी और विदाई ली
सभी देश-विदेश के चारों तरफ सेवा में रहने वाले सेवाधारी बच्चों को सतगुरुवार के वरदानी दिवस पर वरदाता और विधाता बाप की यादप्यार, गुडमॉर्निंग, गोल्डन मॉर्निंग। सतगुरु के इस शुभ दिवस पर सदा यह महामन्त्र याद रहे कि महानता प्राप्त करना अर्थात् निर्मानता धारण करना ही सर्व महान है। ‘पहले आप’ करना ही सर्व से स्वमान प्राप्त करने का आधार है। “सतगुरुवार” के दिवस सतगुरु से महान बनने का यह मन्त्र वरदान रूप में सदा साथ रखना और वरदानों से पहले, उड़ते मंजिल पर पहुंचना। मेहनत तब करते हैं जबकि वरदानों को कार्य में नहीं लगाते। अगर वरदानों से पलते रहें, वरदानों को कार्य में लगाते रहें तो मेहनत समाप्त हो जायेगी। सदा सफलता, सदा सहज सन्तुष्टता का अनुभव करते और कराते रहेंगे। वरदानों से उड़ते चलो, वरदानों की पालना दो और वरदाता, विधाता से जो प्राप्ति की है, उसका प्रत्यक्षफल दिखाओ। यही सतगुरु की श्रेष्ठ मत है वा श्रेष्ठ वरदान है।
सच्चे रूहानी आशिक की निशानियां”
1. रूहानी माशूक और आशिकों का दिव्य मिलन
आज रूहानी माशूक अपने रूहानी आशिक आत्माओं से मिलने आए हैं।
सारे कल्प में यह अद्वितीय समय है जब आत्मा और परमात्मा का सच्चा मिलन होता है।
बापदादा हर आशिक आत्मा को देखकर हर्षित होते हैं—
जो आत्माएँ रूहानी आकर्षण से खिंचकर अपने सच्चे माशूक को पहचान लेती हैं, पा लेती हैं।
उदाहरण:
जैसे कोई बिछड़ा हुआ प्रिय अपना घर वापस पा ले — वैसी ही आत्मा की स्थिति होती है जब वह परमात्मा को पहचान लेती है।
2. मिलन का श्रेष्ठ स्थान – ज्ञान सागर का किनारा
रूहानी माशूक साधारण स्थान पर नहीं मिलते।
यह मिलन होता है—
-
ज्ञान सागर के किनारे
-
गॉडली गार्डन (ईश्वरीय बगीचे) में
-
जहाँ हर आत्मा खिला हुआ फूल है
-
जहाँ स्नेह और शक्ति की लहरें आत्मा को रिफ्रेश कर देती हैं
आध्यात्मिक अनुभव:
यह स्थान बाहरी नहीं, बल्कि चेतना की स्थिति है —
जहाँ पहुँचते ही आत्मा मेहनत से मुक्त और मुहब्बत में लीन हो जाती है।
3. स्नेह की सच्ची परिभाषा – “दो से एक होना”
भक्ति में कहा जाता है — लीन हो जाना, समा जाना
लेकिन इसका अर्थ अस्तित्व मिटाना नहीं है।
सच्चा अर्थ:
समा जाना = समान बन जाना
जब आत्मा परमात्म प्रेम में मग्न होती है, तो वह बाप समान गुणों को धारण करती है।
उदाहरण:
जैसे लोहे को अग्नि में रखने से वह अग्नि जैसा तपने लगता है।
4. सच्चे रूहानी आशिक की तीन मुख्य निशानियां
🔹 निशानी 1: सर्व सम्बन्धों की अनुभूति
माशूक एक है, लेकिन सम्बन्ध अनेक हैं—
-
पिता
-
सतगुरु
-
सखा
-
साथी
-
शिक्षक
मुख्य बात:
✔ सिर्फ सम्बन्ध जानना नहीं
✔ समय पर सम्बन्ध का अनुभव होना
दिल बनाम दिमाग
| दिमाग से | दिल से |
|---|---|
| नॉलेज आधारित | अनुभव आधारित |
| मेहनत ज्यादा | सहजता ज्यादा |
| सन्तुष्टि कम | सन्तुष्टि भरपूर |
उदाहरण:
माँ को “माँ” कहना और माँ के स्नेह को महसूस करना — दोनों अलग हैं।
🔹 निशानी 2: प्राप्ति की अनुभूति
संबन्धों के साथ प्राप्ति भी होनी चाहिए।
| सम्बन्ध | प्राप्ति |
|---|---|
| पिता | वर्सा |
| सतगुरु | वरदान |
| सर्वशक्तिवान | समय पर शक्ति |
समस्या:
कई आत्माएँ सम्बन्ध तो मानती हैं, पर प्राप्ति की खुशी अनुभव नहीं करतीं।
उदाहरण:
बैंक अकाउंट में धन है, पर उपयोग करना न आता हो।
🔹 निशानी 3: सदा तृप्त आत्मा
जहाँ प्राप्ति है, वहाँ तृप्ति है।
जहाँ तृप्ति नहीं — वहाँ प्राप्ति अधूरी है।
तृप्त आत्मा की पहचान:
-
परिस्थिति कैसी भी हो — सन्तुष्ट
-
साधन कम हों — फिर भी खुश
-
मान-शान की भूख नहीं
उदाहरण:
✔ रॉयल आत्मा — एक रोटी में भी तृप्त
✘ अतृप्त आत्मा — 36 व्यंजन में भी असन्तुष्ट
मन की भूख:
-
मान
-
शान
-
साधन
-
प्रशंसा
सार सूत्र
अनुभूति + प्राप्ति = तृप्ति
5. सेवा से पहले सन्तुष्टता
“सेवा छोड़ दो, सन्तुष्टता नहीं छोड़ो।”
जो सेवा असन्तुष्ट बनाए — वह सेवा नहीं।
सेवा = मेवा देने वाली स्थिति
6. रूहानी नाज़-नखरे
✔ स्नेह के नखरे — प्यारे
✘ अहंकार के नखरे — बोझ
गलती कहाँ होती है?
“मेरा स्वभाव, मेरे संस्कार”
सही दृष्टिकोण:
जो बाप का, वही मेरा।
7. सच्चे आशिक की स्थायी स्थिति
“सदा हाथ और साथ”
-
बुद्धि से साथ
-
कर्म से सहयोग
-
मन से लगन
स्थिति:
दृष्टि में माशूक
वृत्ति में माशूक
सृष्टि में माशूक
8. रूहानी महफ़िल का अनुभव
यह मिलन—
-
बगीचा भी है
-
सागर किनारा भी है
-
भीड़ में भी निजी अनुभव
हर आत्मा अनुभव करती है—
“मुझे परमात्मा का पर्सनल प्यार मिल रहा है।”
9. विशेष मुलाकात संदेश
🇦🇺 ऑस्ट्रेलिया पार्टी के लिए संदेश
-
स्वयं को वतनवासी समझो
-
सेवा हेतु अवतरित आत्मा बनो
-
विश्व को शान्ति देने वाले बनो
सच्चे अवतार = जो मुक्तिधाम ले जाने वाले
अमेरिका • ब्राज़ील • मैक्सिको पार्टियों हेतु संदेश
🔸 एकरस स्थिति
दुनिया के रस फीके लगते हैं जब ईश्वरीय रस मिल जाता है।
🔸 सहजयोगी जीवन
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बाप का साथ
-
बाप की मदद
-
बाप की प्राप्तियाँ
→ मेहनत समाप्त
🔸 हल्के बनो
बोझ बाप को सौंप दो
लाइट बनो — 21 जन्म गारंटी
मुरली सन्दर्भ
अव्यक्त बापदादा मुरली
🗓 19 तारीख, सतगुरुवार, प्रातः 6:30 बजे
बापदादा ने क्लास में यादप्यार दी और विदाई ली।
सतगुरुवार वरदानी सन्देश
महामंत्र:
महानता = निर्मानता
“पहले आप” = सच्चा स्वमान
✔ वरदानों से चलो
✔ मेहनत से नहीं, प्राप्ति से उड़ो
✔ सदा सहज सन्तुष्टता में रहो
अंतिम शुभकामना
सदा अविनाशी आशिक बन—
-
सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न
-
हर परिस्थिति में तृप्त
-
सन्तुष्टता से भरपूर
-
सदा हाथ और साथ निभाने वाले
ऐसे सच्चे रूहानी आशिकों को
रूहानी माशूक का दिल से यादप्यार और नमस्ते।
प्रश्न 1: रूहानी माशूक और आशिकों का दिव्य मिलन कब होता है?
उत्तर:
सारे कल्प में यही संगमयुग वह अद्वितीय समय है जब आत्मा और परमात्मा का सच्चा मिलन होता है। रूहानी माशूक स्वयं आकर अपनी आशिक आत्माओं से मिलते हैं।
प्रश्न 2: बापदादा आशिक आत्माओं को देखकर हर्षित क्यों होते हैं?
उत्तर:
क्योंकि आत्माएँ रूहानी आकर्षण से खिंचकर अपने सच्चे माशूक को पहचान लेती हैं और पा लेती हैं। खोई हुई आत्माएँ अपने यथार्थ ठिकाने पर लौट आती हैं।
उदाहरण:
जैसे कोई बिछड़ा हुआ प्रिय अपना घर वापस पा ले।
प्रश्न 3: रूहानी मिलन का श्रेष्ठ स्थान कौन-सा है?
उत्तर:
यह मिलन किसी साधारण स्थान पर नहीं, बल्कि —
-
ज्ञान सागर के किनारे
-
ईश्वरीय बगीचे (गॉडली गार्डन) में
होता है, जहाँ हर आत्मा खिला हुआ फूल है और स्नेह-शक्ति की लहरें आत्मा को रिफ्रेश करती हैं।
प्रश्न 4: क्या यह मिलन स्थान कोई भौतिक जगह है?
उत्तर:
नहीं। यह बाहरी स्थान नहीं, बल्कि चेतना की श्रेष्ठ स्थिति है जहाँ आत्मा मेहनत से मुक्त होकर मुहब्बत में लीन हो जाती है।
प्रश्न 5: “समा जाना” का सच्चा आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
समा जाना का अर्थ अस्तित्व मिटाना नहीं, बल्कि समान बन जाना है — परमात्म प्रेम में मग्न होकर बाप समान गुण धारण करना।
उदाहरण:
जैसे लोहा अग्नि में रहकर अग्नि समान तपने लगता है।
सच्चे रूहानी आशिक की मुख्य निशानियां
प्रश्न 6: सच्चे रूहानी आशिक की पहली निशानी क्या है?
उत्तर:
एक माशूक से सर्व सम्बन्धों की समय प्रमाण अनुभूति।
प्रश्न 7: माशूक से कौन-कौन से सम्बन्ध अनुभव किए जा सकते हैं?
उत्तर:
-
पिता
-
सतगुरु
-
सखा
-
साथी
-
शिक्षक
प्रश्न 8: सच्चे आशिक में सम्बन्ध अनुभव की मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर:
✔ सिर्फ सम्बन्ध जानना नहीं
✔ समय पर सम्बन्ध का जीवंत अनुभव होना
प्रश्न 9: दिल से याद और दिमाग से याद में क्या अंतर है?
| दिमाग से | दिल से |
|---|---|
| नॉलेज आधारित | अनुभव आधारित |
| मेहनत ज्यादा | सहजता ज्यादा |
| सन्तुष्टि कम | सन्तुष्टि भरपूर |
प्रश्न 10: इसे सरल उदाहरण से कैसे समझें?
उत्तर:
माँ को “माँ” कहना अलग बात है, और माँ के स्नेह को महसूस करना अलग।
प्रश्न 11: सच्चे आशिक की दूसरी निशानी क्या है?
उत्तर:
प्राप्ति की अनुभूति — सम्बन्धों के साथ उनसे मिलने वाली प्राप्तियों का अनुभव।
प्रश्न 12: किस सम्बन्ध से कौन-सी प्राप्ति होती है?
| सम्बन्ध | प्राप्ति |
|---|---|
| पिता | वर्सा |
| सतगुरु | वरदान |
| सर्वशक्तिवान | समय पर शक्ति |
प्रश्न 13: कई आत्माओं को प्राप्ति की खुशी क्यों नहीं होती?
उत्तर:
वे सम्बन्ध तो मानती हैं, पर प्राप्तियों का अनुभव नहीं करतीं।
उदाहरण:
बैंक खाते में धन हो, पर उपयोग करना न आता हो।
प्रश्न 14: सच्चे आशिक की तीसरी निशानी क्या है?
उत्तर:
सदा तृप्त आत्मा — हर स्थिति में सन्तुष्ट रहना।
प्रश्न 15: तृप्त आत्मा की पहचान क्या है?
उत्तर:
-
परिस्थिति कैसी भी हो — सन्तुष्ट
-
साधन कम हों — फिर भी खुश
-
मान-शान की भूख नहीं
प्रश्न 16: तृप्त और अतृप्त आत्मा का उदाहरण?
उत्तर:
✔ रॉयल आत्मा — एक रोटी में भी तृप्त
✘ अतृप्त आत्मा — 36 व्यंजन में भी असन्तुष्ट
प्रश्न 17: मन की भूख किन बातों की होती है?
उत्तर:
-
मान
-
शान
-
साधन
-
प्रशंसा
प्रश्न 18: तृप्ति का सार सूत्र क्या है?
उत्तर:
अनुभूति + प्राप्ति = तृप्ति
सेवा और सन्तुष्टता
प्रश्न 19: सेवा से भी अधिक महत्वपूर्ण क्या है?
उत्तर:
सन्तुष्टता।
“सेवा छोड़ दो, सन्तुष्टता नहीं छोड़ो।”
प्रश्न 20: कौन-सी सेवा सच्ची सेवा नहीं है?
उत्तर:
जो सेवा असन्तुष्ट बनाए।
प्रश्न 21: सेवा का सच्चा अर्थ क्या है?
उत्तर:
मेवा देने वाली स्थिति।
रूहानी नाज़-नखरे
प्रश्न 22: कौन-से नखरे अच्छे हैं और कौन-से नहीं?
उत्तर:
✔ स्नेह के नखरे — प्यारे
✘ अहंकार के नखरे — बोझ
प्रश्न 23: नखरों में सबसे बड़ी गलती क्या है?
उत्तर:
“मेरा स्वभाव, मेरे संस्कार” कहना।
प्रश्न 24: सही दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर:
जो बाप का, वही मेरा।
सच्चे आशिक की स्थायी स्थिति
प्रश्न 25: “सदा हाथ और साथ” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
-
बुद्धि से साथ
-
कर्म से सहयोग
-
मन से लगन
प्रश्न 26: सच्चे आशिक की चेतना कैसी होती है?
उत्तर:
-
दृष्टि में माशूक
-
वृत्ति में माशूक
-
सृष्टि में माशूक
रूहानी महफ़िल
प्रश्न 27: रूहानी मिलन का अनुभव कैसा होता है?
उत्तर:
-
बगीचे जैसा
-
सागर किनारे जैसा
-
भीड़ में भी निजी अनुभव
प्रश्न 28: हर आत्मा क्या विशेष अनुभव करती है?
उत्तर:
“मुझे परमात्मा का पर्सनल प्यार मिल रहा है।”
विशेष मुलाकात संदेश
प्रश्न 29: ऑस्ट्रेलिया पार्टी को क्या संदेश दिया गया?
उत्तर:
-
स्वयं को वतनवासी समझो
-
अवतरित आत्मा बन सेवा करो
-
विश्व को शान्ति देने वाले बनो
सच्चे अवतार वही जो मुक्तिधाम ले जाने वाले।
प्रश्न 30: विदेशी पार्टियों के लिए “एकरस स्थिति” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ईश्वरीय रस मिलने पर दुनिया के रस फीके लगने लगते हैं।
प्रश्न 31: सहजयोगी जीवन कैसे बनता है?
उत्तर:
-
बाप का साथ
-
बाप की मदद
-
बाप से सर्व प्राप्तियाँ
→ मेहनत समाप्त
प्रश्न 32: “हल्के बनो” का क्या आध्यात्मिक अर्थ है?
उत्तर:
बोझ बाप को सौंप दो, स्वयं लाइट बनो — तब जीवन सहज हो जाता है।
मुरली सन्दर्भ
प्रश्न 33: यह ज्ञान किस मुरली सन्दर्भ से है?
उत्तर:
अव्यक्त बापदादा मुरली
🗓 19 तारीख, सतगुरुवार, प्रातः 6:30 बजे
बापदादा ने क्लास में यादप्यार दी और विदाई ली।
सतगुरुवार वरदानी सन्देश
प्रश्न 34: महानता का सच्चा आधार क्या है?
उत्तर:
महानता = निर्मानता
प्रश्न 35: “पहले आप” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
यही सच्चा स्वमान है।
प्रश्न 36: मेहनत से मुक्त कैसे रहें?
उत्तर:
वरदानों को जीवन में कार्यरूप में लगाकर।
अंतिम शुभकामना
प्रश्न 37: सच्चे रूहानी आशिक का अंतिम लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
-
सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न रहना
-
हर परिस्थिति में तृप्त रहना
-
सन्तुष्टता से भरपूर रहना
-
सदा हाथ और साथ निभाना
ऐसे सच्चे आशिकों को रूहानी माशूक का दिल से यादप्यार और नमस्ते।
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं मुरली ज्ञान पर आधारित है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक समझ और आत्मिक उन्नति के लिए प्रेरणा देना है। प्रस्तुत विचार श्रद्धा और साधना के दृष्टिकोण से साझा किए गए हैं।
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