AV-14/29-10-1987-“तन, मन, धन और सम्बन्ध की शक्ति”
“तन, मन, धन और सम्बन्ध की शक्ति”
आज सर्वशक्तिवान बाप अपने शक्तिशाली बच्चों को देख रहे हैं। हर एक ब्राह्मण आत्मा शक्तिशाली बनी है लेकिन नम्बरवार है। सर्व शक्तियां बाप का वर्सा और वरदाता का वरदान हैं। बाप और वरदाता – इन डबल सम्बन्ध से हरेक बच्चे को यह श्रेष्ठ प्राप्ति जन्म से ही होती है। जन्म से ही बाप सर्व शक्तियों का अर्थात् जन्म-सिद्ध अधिकार का अधिकारी बना देता है, साथ-साथ वरदाता के नाते से जन्म होते ही मास्टर सर्वशक्तिवान बनाए ‘सर्व शक्ति भव’ का वरदान दे देते हैं। सभी बच्चों को एक द्वारा एक जैसा ही डबल अधिकार मिलता है लेकिन धारण करने की शक्ति नम्बरवार बना देती है। बाप सभी को सदा और सर्व शक्तिशाली बनाते हैं लेकिन बच्चे यथा-शक्ति बन जाते हैं। वैसे लौकिक जीवन में वा अलौकिक जीवन में सफलता का आधार शक्तियां ही हैं। जितनी शक्तियां, उतनी सफलता। मुख्य शक्तियां हैं – तन की, मन की, धन की और सम्बन्ध की। चारों ही आवश्यक हैं। अगर चार में से एक भी शक्ति कम है तो जीवन में सदा व सर्व सफलता नहीं होती। अलौकिक जीवन में भी चारों ही शक्तियां आवश्यक है।
इस अलौकिक जीवन में आत्मा और प्रकृति दोनों की तन्दरूस्ती आवश्यक है। जब आत्मा स्वस्थ है तो तन का हिसाब-किताब वा तन का रोग सूली से कांटा बनने के कारण, स्व-स्थिति के कारण स्वस्थ अनुभव करता है। उनके मुख पर, चेहरे पर बीमारी के कष्ट के चिन्ह नहीं रहते। मुख पर कभी बीमारी का वर्णन नही होता, कर्मभोग के वर्णन के बदले कर्मयोग की स्थिति का वर्णन करते हैं क्योंकि बीमारी का वर्णन भी बीमारी की वृद्धि करने का कारण बन जाता है। वह कभी भी बीमारी के कष्ट का अनुभव नहीं करेगा, न दूसरे को कष्ट सुनाकर कष्ट की लहर फैलायेगा। और ही परिवर्तन की शक्ति से कष्ट को सन्तुष्टता में परिवर्तन कर सन्तुष्ट रह औरों में भी सन्तुष्टता की लहर फैलायेगा अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान बन शक्तियों के वरदान में से समय प्रमाण सहन शक्ति, समाने की शक्ति प्रयोग करेगा और समय पर शक्तियों का वरदान वा वर्सा कार्य में लाना – यही उसके लिए वरदान अर्थात् दुआ दवाई का काम कर देती है क्योंकि सर्वशक्तिवान बाप द्वारा जो सर्वशक्तियां प्राप्त हैं वह जैसी परिस्थिति, जैसा समय और जिस विधि से आप कार्य में लगाने चाहो, वैसे ही रूप से यह शक्तियां आपकी सहयोगी बन सकती हैं। इन शक्तियों को वा प्रभु-वरदान को जिस रूप में चाहे वह रूप धारण कर सकती है। अभी-अभी शीतलता के रूप में, अभी-अभी जलाने के रूप में। पानी की शीतलता का भी अनुभव करा सकते तो आग के जलाने का भी अनुभव करा सकते; दवाई का भी काम कर सकता और शक्तिशाली बनाने का माजून का भी काम कर सकता। सिर्फ समय पर कार्य में लगाने की अथॉरिटी बनो। यह सर्वशक्तियां आप मास्टर सर्वशक्तिवान की सेवाधारी हैं। जब जिसको आर्डर करो, वह ‘हाजिर हजूर’ कह सहयोगी बनेगी लेकिन सेवा लेने वाले भी इतने चतुर-सुजान चाहिए। तो तन की शक्ति आत्मिक शक्ति के आधार पर सदा अनुभव कर सकते हो अर्थात् सदा स्वस्थ रहने का अनुभव कर सकते हो।
यह अलौकिक ब्राह्मण जीवन है ही सदा स्वस्थ जीवन। वरदाता से ‘सदा स्वस्थ भव’ का वरदान मिला हुआ है। बापदादा देखते हैं कि प्राप्त हुए वरदानों को कई बच्चे समय पर कार्य में लगाकर लाभ नहीं ले सकते हैं वा यह कहें कि शक्तियों अर्थात् सेवाधारियों से अपनी विशालता और विशाल बुद्धि द्वारा सेवा नहीं ले पाते हैं। ‘मास्टर सर्वशक्तिवान’ – यह स्थिति कोई कम नहीं है! यह श्रेष्ठ स्थिति भी है, साथ-साथ डायरेक्ट परमात्मा द्वारा ‘परम टाइटल’ भी है। टाइटल का नशा कितना रखते हैं! टाइटल कितने कार्य सफल कर देता है! तो यह परमात्म-टाइटल है, इसमें कितनी खुशी और शक्ति भरी हुई है! अगर इसी एक टाइटल की स्थिति रूपी सीट पर सेट रहो तो यह सर्वशक्तियाँ सेवा के लिए सदा हाजिर अनुभव होंगी, आपके आर्डर की इन्तजार में होगी। तो वरदान को वा वर्से को कार्य में लगाओ। अगर मास्टर सर्वशक्तिवान के स्वमान में स्थित नहीं होते तो शक्तियों को आर्डर में चलाने के बजाए बार-बार बाप को अर्जी डालते रहते कि यह शक्ति दे दो, यह हमारा कार्य करा दो, यह हो जाए, ऐसा हो जाए। तो अर्जी डालने वाले कभी भी सदा राज़ी नहीं रह सकते हैं। एक बात पूरी होगी, दूसरी शुरू हो जायेगी। इसलिए मालिक बन, योगयुक्त बन युक्तियुक्त सेवा सेवाधारियों से लो तो सदा स्वस्थ का स्वत: ही अनुभव करेंगे। इसको कहते हैं तन के शक्ति की प्राप्ति।
ऐसे ही मन की शक्ति अर्थात् श्रेष्ठ संकल्प शक्ति। मास्टर सर्वशक्तिवान के हर संकल्प में इतनी शक्ति है जो जिस समय जो चाहे वह कर सकता है और करा भी सकता है क्योंकि उनके संकल्प सदा शुभ, श्रेष्ठ और कल्याणकारी होंगे। तो जहाँ श्रेष्ठ कल्याण का संकल्प है, वह सिद्ध जरूर होता है और मास्टर सर्वशक्तिवान होने के कारण मन कभी मालिक को धोखा नहीं दे सकता है, दु:ख नहीं अनुभव करा सकता है। मन एकाग्र अर्थात् एक ठिकाने पर स्थित रहता है, भटकता नहीं है। जहाँ चाहो, जब चाहो मन को वहाँ स्थित कर सकते हो। कभी मन उदास नहीं हो सकता है, क्योंकि वह सेवाधारी दास बन जाता है। यह है मन की शक्ति जो अलौकिक जीवन में वर्से वा वरदान में प्राप्त हैं।
इसी प्रकार तीसरी है धन की शक्ति अर्थात् ज्ञान-धन की शक्ति। ज्ञान-धन स्थूल धन की प्राप्ति स्वत: ही कराता है। जहाँ ज्ञान धन है, वहाँ प्रकृति स्वत: ही दासी बन जाती है। यह स्थूल धन प्रकृति के साधन के लिए है। ज्ञान-धन से प्रकृति के सर्व साधन स्वत: प्राप्त होते हैं। इसलिए ज्ञान-धन सब धन का राजा है। जहाँ राजा है, वहाँ सर्व पदार्थ स्वत: ही प्राप्त होते हैं, मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर कोई भी लौकिक पदार्थ प्राप्त करने में मेहनत करनी पड़ती है तो इसका कारण ज्ञान-धन की कमी है। वास्तव में, ज्ञान-धन पद्मापद्मपति बनाने वाला है। परमार्थ व्यवहार को स्वत: ही सिद्ध करता है। तो परमात्म-धन वाले परमार्थी बन जाते हैं। संकल्प करने की भी आवश्यकता नहीं, स्वत: ही सर्व आवश्यकतायें पूर्ण होती रहती। धन की इतनी शक्ति है जो अनेक जन्म यह ज्ञान-धन राजाओं का भी राजा बना देता है। तो धन की भी शक्ति सहज प्राप्त हो जाती है।
इसी प्रकार – सम्बन्ध की शक्ति। सम्बन्ध की शक्ति के प्राप्ति की शुभ इच्छा इसलिए होती है क्योंकि सम्बन्ध में स्नेह और सहयोग की प्राप्ति होती है। इस अलौकिक जीवन में सम्बन्ध की शक्ति डबल रूप में प्राप्त होती है। जानते हो, डबल सम्बन्ध की शक्ति कैसे प्राप्त होती है? एक – बाप द्वारा सर्व सम्बन्ध, दूसरा – दैवी परिवार द्वारा सम्बन्ध। तो डबल सम्बन्ध हो गया ना – बाप से भी और आपस में भी। तो सम्बन्ध द्वारा सदा नि:स्वार्थ स्नेह, अविनाशी स्नेह और अविनाशी सहयोग सदा ही प्राप्त होता रहता है। तो सम्बन्ध की भी शक्ति है ना। वैसे भी बाप, बच्चे को क्यों चाहता है अथवा बच्चा, बाप को क्यों चाहता है? सहयोग के लिए, समय पर सहयोग मिले। तो इस अलौकिक जीवन में चारों शक्तियों की प्राप्ति वरदान रूप में, वर्से के रूप में है। जहाँ चारों प्रकार की शक्तियां प्राप्त हैं, उसकी हर समय की स्थिति कैसी होगी? सदा मास्टर सर्वशक्तिवान। इसी स्थिति की सीट पर सदा स्थित हो? इसी को ही दूसरे शब्दों में स्व के राजे वा राजयोगी कहा जाता है। राजाओं के भण्डार सदा भरपूर रहते हैं। तो राजयोगी अर्थात् सदा शक्तियों के भण्डार भरपूर रहते, समझा? इसको कहा जाता है श्रेष्ठ ब्राह्मण अलौकिक जीवन। सदा मालिक बन सर्व शक्तियों को कार्य में लगाओ। यथाशक्ति के बजाए सदा शक्तिशाली बनो। अर्जी करने वाले नहीं, सदा राज़ी रहने वाले बनो। अच्छा।
मधुबन आने का चांस तो सभी को मिल रहा है ना। इस प्राप्त हुए भाग्य को सदा साथ रखो। भाग्यविधाता को साथ रखना अर्थात् भाग्य को साथ रखना है। तीन ज़ोन के आये हैं। अलग-अलग स्थान की 3 नदियां आकर इकट्ठी हुई – इसको त्रिवेणी का संगम कहते हैं। बापदादा तो वरदाता बन सबको वरदान देते हैं। वरदानों को कार्य में लगाना, वह हर एक के ऊपर है। अच्छा।
चारों ओर के सर्व वर्से और वरदानों के अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व मास्टर सर्वशक्तिवान श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व सदा सन्तुष्टता की लहर फैलाने वाले सन्तुष्ट आत्माओं को, सदा परमार्थ द्वारा व्यवहार में सिद्धि प्राप्त करने वाली महान् आत्माओं को बापदादा का स्नेह और शक्ति सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।
अध्याय: तन, मन, धन और सम्बन्ध की शक्ति
(अव्यक्त बापदादा मुरली आधारित आध्यात्मिक विवेचना)
1️⃣ सर्वशक्तिवान बाप का दिव्य वर्सा
आज सर्वशक्तिवान बाप अपने शक्तिशाली बच्चों को देख रहे हैं।
हर ब्राह्मण आत्मा शक्तियों से सम्पन्न है, परन्तु धारण करने की क्षमता नम्बरवार है।
बाप से मिलता है —
वर्सा (अधिकार)
वरदान (सर्व शक्ति भव)
हर आत्मा जन्म से ही मास्टर सर्वशक्तिवान है।
उदाहरण:
जैसे किसी राजकुमार को जन्म लेते ही राज्य का अधिकार मिल जाता है, वैसे ही आत्मा को जन्म-सिद्ध सर्वशक्तियों का अधिकार मिल जाता है।
2️⃣ सफलता का आधार — चार मुख्य शक्तियाँ
चाहे लौकिक जीवन हो या अलौकिक —
सफलता शक्तियों पर आधारित है।
मुख्य चार शक्तियाँ:
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तन की शक्ति
-
मन की शक्ति
-
धन की शक्ति
-
सम्बन्ध की शक्ति
चारों में से एक भी कमी हो तो पूर्ण सफलता संभव नहीं।
3️⃣ तन की शक्ति — आत्मिक स्थिति से स्वास्थ्य
अलौकिक जीवन में आत्मा और प्रकृति दोनों की तन्दरूस्ती आवश्यक है।
जब आत्मा स्व-स्थिति में है:
✔ रोग का प्रभाव कम अनुभव होता है
✔ चेहरा कष्ट का नहीं, शक्ति का दर्पण बनता है
✔ बीमारी का वर्णन नहीं, कर्मयोग की स्थिति व्यक्त होती है
उदाहरण:
जैसे सकारात्मक सोच शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, वैसे ही आत्मिक शक्ति तन को स्वस्थ अनुभव कराती है।
शक्तियों का सही समय पर प्रयोग ही दुआ और दवाई बन जाता है।
4️⃣ मास्टर सर्वशक्तिवान — शक्तियों के मालिक बनो
सर्वशक्तियाँ आपकी सेवाधारी हैं।
आप मालिक बनकर आदेश दें —
वे “हाज़िर हज़ूर” होकर सहयोग करती हैं।
अगर मालिकपन भूल जाते हैं तो:
बार-बार प्रार्थना
अर्जी
असन्तुष्टि
संदेश:
अर्जी करने वाले नहीं — राज़ी रहने वाले बनो।
5️⃣ मन की शक्ति — श्रेष्ठ संकल्प शक्ति
मास्टर सर्वशक्तिवान का मन:
✔ एकाग्र
✔ स्थिर
✔ मालिक के अधीन
✔ शुभ, श्रेष्ठ, कल्याणकारी संकल्पों से भरपूर
ऐसा मन:
भटकता नहीं
धोखा नहीं देता
दुःख अनुभव नहीं कराता
उदाहरण:
जैसे प्रशिक्षित घोड़ा सारथी के संकेत से चलता है, वैसे ही मन मालिक आत्मा के आदेश से चलता है।
6️⃣ धन की शक्ति — ज्ञान-धन सब धन का राजा
तीसरी शक्ति है ज्ञान-धन।
ज्ञान-धन से:
✔ स्थूल धन स्वतः आता है
✔ प्रकृति दासी बनती है
✔ साधन सहज मिलते हैं
✔ परमार्थ और व्यवहार स्वतः सिद्ध होते हैं
उदाहरण:
जैसे राजा के पास सम्पत्ति स्वतः होती है, उसे कमाने का संघर्ष नहीं करना पड़ता।
ज्ञान-धन = पद्मापद्मपति बनाने वाला धन
7️⃣ सम्बन्ध की शक्ति — डबल स्नेह और सहयोग
अलौकिक जीवन में सम्बन्ध डबल हैं:
1️⃣ परमात्मा बाप से सर्व सम्बन्ध
2️⃣ दैवी परिवार से आत्मिक सम्बन्ध
सम्बन्ध से मिलता है:
नि:स्वार्थ स्नेह
अविनाशी सहयोग
उदाहरण:
जैसे परिवार संकट में साथ देता है, वैसे ही दैवी परिवार आत्मिक सहयोग देता है।
8️⃣ चारों शक्तियों से जीवन की स्थिति
जब चारों शक्तियाँ प्राप्त हों:
स्थिति — मास्टर सर्वशक्तिवान
स्वमान — स्व का राजा
जीवन — राजयोगी
राजयोगी के भण्डार:
✔ शक्तियों से भरपूर
✔ सदा सम्पन्न
✔ सदा सन्तुष्ट
9️⃣ मधुबन का भाग्य और त्रिवेणी संगम
मधुबन आने का अवसर — महान भाग्य।
भाग्यविधाता को साथ रखना = भाग्य को साथ रखना
तीन ज़ोन का मिलन —
✨ त्रिवेणी संगम जैसा पावन मिलन
🧘 मुरली नोट्स
📅 तिथि: 05 जनवरी 1986
(अव्यक्त बापदादा मुरली संदर्भ)
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सर्व शक्तियाँ बाप का वर्सा और वरदान हैं
-
जन्म से आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान है
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सफलता का आधार — चार शक्तियाँ
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तन की शक्ति आत्मिक स्थिति से आती है
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मन की शक्ति श्रेष्ठ संकल्पों से सिद्ध होती है
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ज्ञान-धन सब धन का राजा है
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सम्बन्ध की शक्ति डबल स्नेह और सहयोग देती है
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अर्जी करने वाले नहीं, राज़ी रहने वाले बनो
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मालिक बन शक्तियों को कार्य में लगाओ
-
यही श्रेष्ठ ब्राह्मण अलौकिक जीवन है
समापन संदेश
सदा अपने स्वमान की सीट पर स्थित रहें —
मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ।
तन स्वस्थ
मन स्थिर
ज्ञान से सम्पन्न
सम्बन्धों से समर्थ
इसी में सम्पूर्ण सफलता है।
बापदादा का स्नेह, शक्ति और यादप्यार।
प्रश्न 1: सर्वशक्तिवान बाप अपने बच्चों को किस रूप में देखते हैं?
उत्तर:
बाप अपने हर ब्राह्मण बच्चे को शक्तिशाली देखते हैं। सभी आत्माएँ सर्वशक्तियों से सम्पन्न हैं, परन्तु उन्हें धारण करने की क्षमता नम्बरवार है।
प्रश्न 2: बाप से बच्चों को कौन-सी दो दिव्य प्राप्तियाँ मिलती हैं?
उत्तर:
वर्सा — जन्मसिद्ध अधिकार
वरदान — “सर्व शक्ति भव”
इन दोनों के कारण हर आत्मा जन्म से ही मास्टर सर्वशक्तिवान है।
प्रश्न 3: आत्मा के मास्टर सर्वशक्तिवान होने को किस उदाहरण से समझाया गया है?
उत्तर:
जैसे राजकुमार को जन्म लेते ही राज्य का अधिकार मिल जाता है, वैसे ही आत्मा को जन्म से सर्वशक्तियों का अधिकार मिल जाता है।
प्रश्न 4: जीवन की सफलता किस आधार पर टिकी है?
उत्तर:
लौकिक और अलौकिक — दोनों जीवनों में सफलता शक्तियों पर आधारित है।
प्रश्न 5: सफलता की चार मुख्य शक्तियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
1️⃣ तन की शक्ति
2️⃣ मन की शक्ति
3️⃣ धन की शक्ति
4️⃣ सम्बन्ध की शक्ति
इनमें से एक भी कम हो तो पूर्ण सफलता संभव नहीं।
प्रश्न 6: तन की शक्ति का मुख्य आधार क्या है?
उत्तर:
आत्मिक स्थिति ही तन की शक्ति का आधार है।
प्रश्न 7: आत्मिक स्थिति मजबूत होने पर तन में क्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तर:
✔ रोग का प्रभाव कम अनुभव होता है
✔ चेहरा कष्ट का नहीं, शक्ति का दर्पण बनता है
✔ बीमारी की चर्चा नहीं, कर्मयोग की स्थिति व्यक्त होती है
प्रश्न 8: तन की शक्ति को किस उदाहरण से स्पष्ट किया गया है?
उत्तर:
जैसे सकारात्मक सोच शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, वैसे ही आत्मिक शक्ति तन को स्वस्थ अनुभव कराती है।
प्रश्न 9: शक्तियों का सही समय पर प्रयोग क्या बन जाता है?
उत्तर:
दुआ और दवाई — दोनों का कार्य करता है।
प्रश्न 10: सर्वशक्तियों के साथ हमारा सम्बन्ध कैसा है?
उत्तर:
सर्वशक्तियाँ हमारी सेवाधारी हैं और हम उनके मालिक हैं।
प्रश्न 11: मालिक बनकर शक्तियों का प्रयोग कैसे होता है?
उत्तर:
जब हम आदेश देते हैं, शक्तियाँ “हाज़िर हज़ूर” होकर सहयोग करती हैं।
प्रश्न 12: मालिकपन भूल जाने पर क्या होता है?
उत्तर:
बार-बार प्रार्थना
अर्जी
असन्तुष्टि
प्रश्न 13: बापदादा का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर:
अर्जी करने वाले नहीं — सदा राज़ी रहने वाले बनो।
प्रश्न 14: मन की शक्ति किसे कहा गया है?
उत्तर:
श्रेष्ठ संकल्प शक्ति को मन की शक्ति कहा गया है।
प्रश्न 15: मास्टर सर्वशक्तिवान का मन कैसा होता है?
उत्तर:
✔ एकाग्र
✔ स्थिर
✔ मालिक के अधीन
✔ शुभ और कल्याणकारी संकल्पों से भरपूर
प्रश्न 16: शक्तिशाली मन के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
मन भटकता नहीं
धोखा नहीं देता
दुःख अनुभव नहीं कराता
प्रश्न 17: मन की शक्ति का उदाहरण क्या है?
उत्तर:
जैसे प्रशिक्षित घोड़ा सारथी के संकेत से चलता है, वैसे ही मन आत्मा के आदेश से चलता है।
प्रश्न 18: धन की शक्ति किसे कहा गया है?
उत्तर:
ज्ञान-धन को धन की शक्ति कहा गया है।
प्रश्न 19: ज्ञान-धन से क्या-क्या प्राप्त होता है?
उत्तर:
✔ स्थूल धन स्वतः आता है
✔ प्रकृति दासी बनती है
✔ साधन सहज मिलते हैं
✔ परमार्थ और व्यवहार स्वतः सिद्ध होते हैं
प्रश्न 20: ज्ञान-धन को किस उदाहरण से समझाया गया है?
उत्तर:
जैसे राजा के पास सम्पत्ति स्वतः होती है, उसे कमाने का संघर्ष नहीं करना पड़ता।
प्रश्न 21: ज्ञान-धन की विशेषता क्या है?
उत्तर:
यह पद्मापद्मपति बनाने वाला धन है — सब धन का राजा।
प्रश्न 22: सम्बन्ध की शक्ति किस प्रकार प्राप्त होती है?
उत्तर:
डबल सम्बन्ध से:
1️⃣ परमात्मा बाप से सर्व सम्बन्ध
2️⃣ दैवी परिवार से आत्मिक सम्बन्ध
प्रश्न 23: सम्बन्ध की शक्ति से क्या प्राप्त होता है?
उत्तर:
नि:स्वार्थ स्नेह
अविनाशी सहयोग
प्रश्न 24: सम्बन्ध की शक्ति का उदाहरण क्या है?
उत्तर:
जैसे परिवार संकट में साथ देता है, वैसे ही दैवी परिवार आत्मिक सहयोग देता है।
प्रश्न 25: चारों शक्तियाँ प्राप्त होने पर जीवन की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
स्थिति — मास्टर सर्वशक्तिवान
स्वमान — स्व का राजा
जीवन — राजयोगी
प्रश्न 26: राजयोगी की पहचान क्या है?
उत्तर:
✔ शक्तियों के भण्डार भरपूर
✔ सदा सम्पन्न
✔ सदा सन्तुष्ट
प्रश्न 27: मधुबन आने का अवसर क्यों विशेष है?
उत्तर:
यह महान भाग्य की प्राप्ति है।
प्रश्न 28: भाग्यविधाता को साथ रखना क्या है?
उत्तर:
भाग्य को सदा साथ रखना।
प्रश्न 29: तीन ज़ोन के मिलन को किससे तुलना की गई है?
उत्तर:
त्रिवेणी संगम के पावन मिलन से।
Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक ज्ञान और मुरली शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक जागरूकता, आत्म-विकास और सकारात्मक जीवन मूल्यों को प्रेरित करना है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, आर्थिक या कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है। दर्शक अपने विवेक का प्रयोग करें।
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