08/03-02-1988-“The Two Auspicious Hopes of the Mother and Father, Brahma, for Their Brahmin Children”

AV-08/03-02-1988-“ब्रह्मा मात-पिता की अपने ब्राह्मण बच्चों के प्रति दो शुभ आशाएं”

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“ब्रह्मा मात-पिता की अपने ब्राह्मण बच्चों के प्रति दो शुभ आशाएं”

आज विश्व की सर्व आत्माओं की सर्व आशायें पूर्ण करने वाले बापदादा अपनी शुभ आशाओं के रूहानी दीपकों को देख रहे थे। जैसे बाप सर्व की शुभ आशायें पूर्ण करने वाले हैं, तो बच्चे भी बाप की शुभ आशायें पूर्ण करने वाले हैं। बाप बच्चों की आशायें पूर्ण करते, बच्चे बाप की करते। बाप की बच्चों प्रति शुभ आशायें कौनसी हैं, वह जानते हो ना? हर एक ब्राह्मण आत्मा बाप की आशाओं के दीपक हैं। दीपक अर्थात् सदा जागती ज्योत। सदा जगा हुआ दीपक प्यारा लगता है। अगर बार-बार टिमटिमाता दीपक हो तो कैसा लगेगा? बाप की सर्व आशाओं को पूर्ण करने वाले अर्थात् सदा जगमगाते हुए दीपकों को बापदादा भी देख हर्षित होते हैं।

आज बापदादा आपस में रूहरिहान कर रहे थे। बापदादा के सामने सदा कौन रहते हैं? बच्चे रहते हैं ना। तो रूहरिहान भी बच्चों की ही करेंगे ना। शिव बाप ब्रह्मा से पूछ रहे थे कि बच्चों के प्रति अब तक कोई शुभ आशायें हैं? तो ब्रह्मा ने बोला कि बच्चे नम्बरवार अपनी शक्ति प्रमाण, स्नेह प्रमाण, अटेन्शन प्रमाण सदा बाप की शुभ आशाओं को पूर्ण करने में लगे हुए जरूर हैं, हर एक की दिल में उमंग-उत्साह जरूर है – जबकि बाप ने हमारी सर्व आशायें पूर्ण की हैं तो हम भी बाप की सर्व आशायें पूर्ण करके ही दिखायें। लेकिन करके दिखाने में नम्बरवार बन जाते हैं। सोचना और करके दिखाना – इसमें अन्तर पड़ जाता है। कोई-कोई बच्चे ऐसे भी हैं जो सोचना और करके दिखाना इसमें समान हैं। लेकिन सभी ऐसे नहीं हैं। जिस समय बाप के स्नेह और बाप द्वारा प्राप्तियों को स्मृति में लाते हैं कि बाप ने क्या बनाया और क्या दिया, तो स्नेह स्वरूप होने के कारण बहुत उमंग-उत्साह में उड़ते हैं कि बाप ने जो कहा है वह मैं ही करके दिखाऊंगा। लेकिन जब सेवा के वा संगठन के सम्पर्क में आते हैं अर्थात् प्रैक्टिकल करने के लिए कर्म में आना पड़ता है तो कहाँ संकल्प और कर्म समान हो जाता है अर्थात् वही उमंग-उत्साह रहता है और कभी कर्म में आने समय संगठन के संस्कार व माया वा प्रकृति द्वारा आये हुए सरकमस्टांस रूपी पेपर कहाँ मुश्किल अनुभव कराते हैं। इसलिए स्नेह से जो उमंग-उत्साह का संकल्प रहा, वह सरकमस्टांस कारण, संस्कार कारण करने में अन्तर डाल देता है। फिर सोचते हैं – अगर यह नहीं होता तो बहुत अच्छा होता। “अगर” और “मगर” के चक्कर में आ जाते हैं। होना तो यह चाहिए लेकिन ऐसा हुआ, इसलिए यह हुआ – इस अगर, मगर के चक्कर में आ जाते हैं। इसलिए उमंग-उत्साह का संकल्प और प्रैक्टिकल कर्म में अन्तर हो जाता है।

तो ब्रह्मा बाप बच्चों के प्रति विशेष दो आशायें सुना रहे थे क्योंकि ब्रह्मा बाप को साथ ले भी जाना है और साथ रहना भी है। शिव बाप तो साथ ले जाने वाला है, राज्य में वा सारे कल्प में साथ नहीं रहना है। वह सदा साथ रहने वाला है और वह साक्षी हो देखने वाला है। अन्तर है ना। ब्रह्मा बाप को बच्चों के प्रति सदा ही समान बनाने की शुभ आशायें इमर्ज रहती हैं। वैसे बापदादा दोनों जिम्मेवार हैं लेकिन फिर भी रचता साकार में ब्रह्मा है इसलिए साकार रचता को साकार रचना के लिए स्वत: ही स्नेह रहता है। पहले भी सुनाया था ना – बच्चे, माँ-बाप – दोनों के होते हैं लेकिन फिर भी माँ का विशेष स्नेह बच्चों से रहता है क्योंकि पालना के निमित्त माँ बनती है। बाप-समान बनाने वाली निमित्त माँ होती है। इसलिए माँ की ममता गाई हुई है। यह शुद्ध ममता है, मोह वाली नहीं, विकार वाली नहीं। जहाँ मोह होता है, वहाँ परेशान होते हैं और जहाँ रूहानी ममता कहो, स्नेह कहो – वह होगा तो माँ को बच्चों के प्रति शान होता है, परेशान नहीं होती। तो ब्रह्मा माँ कहो, बाप कहो – दोनों रूप से बच्चों के प्रति कौनसी विशेष आशायें रखते हैं? एक बाप प्रति आशा है और दूसरी ब्राह्मण परिवार के प्रति शुभ आशा है। बाप प्रति शुभ आशा है कि जैसे बापदादा साक्षी भी है और साथी भी हैं, ऐसे बापदादा समान साक्षी और साथी, समय प्रमाण दोनों ही पार्ट सदा बजाने वाले महान आत्मा बनें। तो बाप प्रति शुभ आशा हुई – बापदादा समान साक्षी, साथी बनना।

एक बात में बापदादा दोनों बच्चों से पूर्ण संतुष्ट हैं, वह क्या? हर बच्चे का बापदादा से स्नेह अच्छा है, बापदादा से स्नेह कभी टूटता नहीं है और स्नेह के कारण ही चाहे शक्तिशाली बन, चाहे यथाशक्ति बन चल रहे हैं। ब्राह्मण आत्मा रूपी मोती बन स्नेह के धागे में पिरोये हुए जरूर हैं। स्नेह का धागा मजबूत है, उससे टूट नहीं सकते हैं। स्नेह की माला तो लम्बी है, विजय माला छोटी है। बापदादा के स्नेह के ऊपर समर्पित भी हैं। कोई कितना भी बाप के स्नेह से जुदा करने चाहे, तो ऐसे स्नेह में फिदा हैं जो जुदा हो ही नहीं सकते। सभी को दिल के स्नेह से “मेरा बाबा” शब्द निकलता है। तो स्नेह की माला में तो सन्तुष्ट हैं लेकिन बाप समान शक्तिशाली, अगर-मगर के चक्कर से न्यारे – इसमें सदा शक्तिशाली के बजाए यथाशक्ति हैं। बापदादा इसमें बाप समान सदा शक्तिशाली बनाने की सब बच्चों में शुभ आशा रखते हैं। जहाँ साक्षी बनना है, वहाँ कभी साथी बन जाते हैं और जहाँ साथी बनना है, वहाँ साक्षी बन जाते हैं। समय प्रमाण दोनों रीति निभाना – इसको कहते हैं बाप समान बनना। स्नेह की माला तो तैयार है लेकिन विजय माला इतनी लम्बी तैयार हो जाए – बापदादा यही शुभ आशा रखते हैं। 108 तो क्या, बापदादा खुली छुट्टी देते हैं जितने विजयी बनने चाहो उतनी बड़ी विजय माला बन सकती है। 108 की हद में भी नहीं आओ। हैं ही 108 नम्बर, हम तो उसमें आ नहीं सकते – ऐसी कोई बात नहीं है। बनो।

विजयी बनने के लिए एक बैलेन्स की आवश्यकता है। याद और सेवा का बैलेन्स तो सदा सुनते रहते हैं लेकिन याद और सेवा का बैलेन्स चाहते हुए भी रहता क्यों नहीं है? समझते हुए भी कर्म में क्यों नहीं आता है? उसके लिए एक और बैलेन्स की आवश्यकता है, वही बैलेन्स ब्रह्मा बाप की दूसरी आशा है। एक आशा तो बाप प्रति हुई – समान बनने की। दूसरी आशा परिवार प्रति, वह है हर ब्राह्मण आत्मा प्रति सदा शुभ भावना शुभ कामना कर्म में रहे, सिर्फ संकल्प तक वा चाहना तक नहीं। चाहते तो हैं। कई कहते हैं चाहना तो यही है कि शुभ भावना रखें लेकिन कर्म में बदल जाता है। इसका विस्तार पहले भी सुनाया है। परिवार प्रति सदा शुभ भावना शुभ कामना क्यों नहीं रहती, इसका कारण? जैसे बाप से दिल का स्नेह, जिगर का स्नेह है और दिल के जिगर के स्नेह की निशानी है कि अटूट है। बाप प्रति कोई कितना भी आपको मिसअण्डरस्टैंड (गलतफहमी) करे वा कोई भी आपको कैसी भी बातें आकर सुनाए वा कभी साकार में स्वयं बाप भी कोई बच्चों को आगे बढ़ने के लिए कोई इशारा वा शिक्षा दे लेकिन जहाँ स्नेह होता है वहाँ शिक्षा वा कोई भी परिवर्तन का इशारा मिसअन्डरस्टैण्डिंग पैदा नहीं करेगा। सदैव यही भावना रहती व रही है कि बाबा जो कहता है उसमें कल्याण है। कभी स्नेह की कमी नहीं हुई, और ही अपने को बाप के दिल के समीप समझते रहे कि यह अपनापन का स्नेह है। इसको कहते हैं दिल का जिगरी स्नेह जो भावना को परिवर्तन कर देता है। बाप के प्रति स्नेह की निशानी – सदा ही बाप ने कहा और “हाँ जी” किया, ऐसे ब्राह्मण परिवार के प्रति सदा ही ऐसा दिल का स्नेह हो, भावना परिवर्तन की विधि हो, तब बाप और परिवार में स्नेह का बैलेन्स, याद और सेवा का बैलेन्स स्वत: ही प्रैक्टिकल में दिखाई देगा। तो बाप के स्नेह का पलड़ा भारी है लेकिन सर्व ब्राह्मण परिवार में स्नेह का पलड़ा बदलता रहता है। कभी भारी, कभी हल्का। किसके प्रति भारी, किसके प्रति हल्का। यह बाप और बच्चों के स्नेह का बैलेन्स रहे – यही ब्रह्मा बाप की दूसरी शुभ आशा है। समझा? इसमें बाप समान बनो।

स्नेह ऐसी श्रेष्ठता है जिसमें आपने किया या दूसरे ने किया, इसमें दोनों में समान खुशी का अनुभव हो। जैसे बापदादा स्थापना के कार्य अर्थ निमित्त बने लेकिन जब बच्चों को सेवा में साथी बनाया, अगर प्रैक्टिकल में बाप से भी बच्चे ज्यादा सेवा करते हैं, करते रहे हैं तो बापदादा सदा बच्चों को सेवा में आगे बढ़ते, स्नेह के कारण खुश रहें। यह संकल्प कभी भी दिल के स्नेह में उत्पन्न नहीं हो सकता कि बच्चे क्यों सेवा में आगे जायें, निमित्त तो मैं हूँ, मैंने ही इनको निमित्त बनाया। कभी स्वप्न-मात्र भी यह भावना उत्पन्न नहीं हुई। इसको कहा जाता है सच्चा स्नेह, नि:स्वार्थ स्नेह, रूहानी स्नेह। सदा बच्चों को आगे निमित्त बनाने में हर्षित रहे। बच्चों ने किया या बाप ने किया, मैं-पन नहीं रहा। मेरा काम है, मेरी ड्यूटी है, मेरा अधिकार है, मेरी बुद्धि है, मेरा प्लैन है – नहीं। स्नेह यह मेरापन मिटा देता है। आपने किया सो मैंने किया, मैंने किया सो आपने किया – यह शुभ भावना वा शुभ कामना, इसको कहा जाता है दिल का स्नेह। स्नेह में कभी अपना या पराया नहीं लगता। स्नेह में कभी स्नेह का बोल कैसा भी साधारण, हुज्जत का बोल हो लेकिन फील नहीं होगा। फीलिंग नहीं आयेगी इसने यह क्यों कहा। स्नेही, स्नेही आत्मा के प्रति अनुमान पैदा नहीं करेगा – ऐसा होगा, यह होगा! सदा स्नेही के प्रति फेथ होने के कारण उसका हल्का बोल भी ऐसे लगेगा कि इसने अवश्य कोई मतलब से कहा है। बेमतलब, व्यर्थ नहीं लगेगा। जहाँ स्नेह होगा, वहाँ फेथ जरूर होगा। स्नेह नहीं तो फेथ भी नहीं होगा। तो ब्राह्मण परिवार के प्रति स्नेह वा फेथ होना – इसको कहते हैं ब्रह्मा बाप की दूसरी आशा पूर्ण करना। जैसे बाप के प्रति स्नेह के लिए बापदादा ने सर्टीफिकेट दिया, ऐसे ब्राह्मण परिवार के प्रति जो स्नेह की परिभाषा सुनाई, उस विधि से प्रत्यक्ष कर्म में आना – यह भी सर्टीफिकेट लेना है। यह बैलेन्स चाहिए। जितना बाप से उतना बच्चों से – यह बैलेन्स न होने के कारण सेवा में जब आगे बढ़ते हो तो खुद ही कहते हो – सेवा में माया आती है। और कभी वायुमण्डल को देख इतना भी कहते हो कि ऐसी सेवा से तो याद में रहना ही अच्छा है, सबसे सेवा छुड़ाके भट्ठी में बिठा दो। आप लोगों के पास यह संकल्प होते हैं समय प्रमाण।

वास्तव में सेवा मायाजीत बनाने वाली है, माया लाने वाली नहीं है। लेकिन सेवा में माया क्यों आती है? इसका मूल कारण दिल का स्नेह नहीं है, परिवार के प्रमाण स्नेह है। लेकिन दिल का स्नेह त्याग की भावना उत्पन्न करता है। वह न होने के कारण कभी-कभी सेवा माया-रूप बन जाती है और ऐसी सेवा को सेवा के खाते में जमा नहीं कर सकते – चाहे कोई 50-60 सेन्टर्स खोलने के भी निमित्त बन जाए! लेकिन सेवा के खाते में या बापदादा की दिल में सेवा का जमा खाता उतना ही होता है जो माया से मुक्त हो, योगयुक्त हो करते हो। किसके पास दो सेन्टर हैं, देखने में दो सेन्टर की इन्चार्ज आती है, और कोई 50 सेन्टर्स की इन्चार्ज दिखाई देती है, लेकिन अगर दो सेवाकेन्द्र भी निर्विघ्न हैं, माया से, हलचल से, स्वभाव-संस्कार के टक्कर से मुक्त हैं तो दो सेन्टर वाले का भी 50 सेवाकेन्द्र वाले से ज्यादा सेवा का खाता जमा है। इसमें खुश नहीं हो जाओ कि मेरे 30 सेन्टर्स हैं, 40 सेन्टर्स हैं। लेकिन माया से मुक्त कितने सेन्टर्स हैं? सेन्टर भी बढ़ाते जाओ, माया भी बढ़ाते जाओ – ऐसी सेवा बाप के रजिस्टर में जमा नहीं होती है। आप सोचेंगे – हम तो बहुत सेवा कर रहे हैं, दिन-रात नींद भी नहीं करते, खाना भी एक बार बनाके रात को खा लेते – इतना बिजी रहते! लेकिन सेवा के साथ-साथ माया में भी बिजी तो नहीं रहते? यह क्यों हुआ, यह कैसे हुआ, इसने क्यों किया, मैंने क्यों नहीं किया, मेरा हक, तेरा हक लेकिन बाप का हक कहाँ गया? समझा? सेवा अर्थात् जिसमें स्व के और सर्व के सहयोग वा सन्तुष्टता का फल प्रत्यक्ष दिखाई दे। अगर सर्व की शुभ भावना-शुभ कामना का सहयोग वा सन्तुष्टता प्रत्यक्ष फल के रूप में नहीं प्राप्त होती है तो चेक करो – क्या कारण है, फल क्यों नहीं मिला? और विधि को चेक करके चेन्ज करो।

ऐसी सच्ची सेवा बढ़ाना ही सेवा बढ़ाना है। सिर्फ अपनी दिल खुश नहीं करो कि मैं बहुत अच्छी सेवा कर रही हूँ। लेकिन बाप की दिल खुश करो और ब्राह्मण परिवार के दिल की दुआयें लो। इसको कहा जाता सच्ची सेवा। दिखावे की सेवा तो बहुत बड़ी है लेकिन जहाँ दिल की सेवा होगी, वहाँ दिल के स्नेह की सेवा जरूर होगी। इसको कहते है परिवार के प्रति ब्रह्मा बाप की आशा पूर्ण करना। यह थी आज की रूहरिहान। बाकी और आगे सुनायेंगे। आज भारतवासी बच्चों की इस सीजन का लास्ट चांस है। इसलिए बापदादा क्या चाहते हैं वह सुनाया। एक सर्टीफिकेट पास का लिया है, अभी दूसरा सर्टीफिकेट लेना है। अच्छा! अभी बाप की आशाओं का दीपक सदा जगमगाते रहना। अच्छा!

चारों ओर के सर्व ब्राह्मण कुल दीपक, सदा बापदादा की शुभ आशायें पूर्ण करने वाले, सदा बाप और परिवार के दिल के स्नेह का बैलेंस रखने वाले, सदा दिल की सेवा से सेवा का खाता ज्यादा जमा करने वाले, ऐसे बाप की शुभ आशाओं के दीपकों को, सच्ची दिल से सेवा करने वाले सेवाधारियों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से मुलाकात:-

1\. सदा अपने को कल्प पहले वाले विजयी पाण्डव समझते हो? जब भी पाण्डवों के यादगार चित्र देखते हो तो ऐसे लगता है कि यह हमारा यादगार है? तो पाण्डव अर्थात् सदा मजबूत रहने वाले। इसलिए, पाण्डवों के शरीर लम्बे चौड़े दिखाते हैं, कभी कमजोर नहीं दिखाते। आत्मा बहादुर हैं, शक्तिशाली हैं, उसके बदले में शरीर शक्तिशाली दिखाये हैं। पाण्डवों की विजय प्रसिद्ध है। कौरव अक्षौणी होते भी हार गये और पाण्डव पाँच होते भी जीत गये। क्यों विजयी बनें? क्योंकि पाण्डवों के साथ बाप है, पाण्डव शक्तिशाली हैं, आध्यात्मिक शक्ति है। इसलिए, अक्षौणी कौरवों की शक्ति उनके आगे कुछ भी नहीं है! ऐसे हो ना? कोई भी सामने आए, माया किस भी रूप में आये, तो भी वह हार खाकर जाए, जीत न सके। इसको कहते हैं विजयी पाण्डव। मातायें भी पाण्डव सेना में हो ना। या घर में रहने वाली हो? जो कमजोर होता है वह घर में छिपता है, बहादुर मैदान में आता है। तो कहाँ रहती हो, मैदान में या घर में? तो सदा इस नशे में आगे बढ़ते रहो कि हम पाण्डव सेना के विजयी पाण्डव हैं।

2\. अपने को बेहद के निमित्त सेवाधारी समझते हो? बेहद के सेवाधारी अर्थात् किसी भी मैं-पन के व मेरे पन की हद में आने वाले नहीं। बेहद में न मैं है, न मेरा है। सब बाप का है, मैं भी बाप का तो सेवा भी बाप की। इसको कहते हैं बेहद सेवा। ऐसे बेहद के सेवाधारी हो या हद में आ जाते हो? बेहद के सेवाधारी बेहद का राज्य प्राप्त करते हैं। सदा बेहद बाप, बेहद सेवा और बेहद राज्य-भाग्य – यही स्मृति में रखो तो बेहद की खुशी रहेगी। हद में खुशी गायब हो जाती है, बेहद में सदा खुशी रहेगी। अच्छा!

विदाई के समय:-

अभी तो सेवा के प्लैन बहुत अच्छे बनाये हैं। सेवा भी वास्तव में उन्नति का साधन है। अगर सेवा को सेवा की रीति से करें तो सेवा लिफ्ट देती है, आगे बढ़ाने की। सिर्फ प्लेन बुद्धि बनकर प्लैन बनायें, जरा भी कुछ यहाँ-वहाँ का मिक्स न हो। जैसे कोई बढ़िया चीज़ बना कर रखो और यहाँ-वहाँ की हवा से कुछ किचड़ा पड़ जाए तो क्या हो जाएगा? तो सम्भाल कर रखते हैं ना। तो यहाँ-वहाँ का कुछ भी मिक्स नहीं हो जाए। ऐसे सेवा के प्लैन अच्छे बनाते हैं। सेवा में मेहनत, मेहनत नहीं लगती, खुशी होती है। क्योंकि लगन से करते हैं, उमंग-उत्साह भी अच्छा रखते हैं। बापदादा सेवा का उमंग देखकर के खुश भी होते हैं। सिर्फ मिक्स न हो तो जितने समय में सेवा हुई है, उससे 4 गुणा हो सकती है। प्लेन बुद्धि फास्ट गति की सेवा को प्रत्यक्ष दिखाएगी। अभी फिर भी सोचना पड़ता है ना कि यह करें, यहाँ करें, यह तो नहीं होगा, वह तो नहीं होगा? लेकिन सब एक बुद्धि हो जाएं – जिसने किया वह अच्छा, जो किया वह अच्छा। यह पाठ पक्का हो जाए तो तीव्र गति की सेवा आरम्भ हो जाए। वैसे पहले से सेवा की गति तीव्र हो रही है, बढ़ रही है, सफलता भी मिल रही है। लेकिन अभी के हिसाब से, विश्व की आत्माओं को सन्देश देने के हिसाब से तो अभी कोने तक पहुँचे हैं। कहाँ साढ़े पाँच सौ करोड़ आत्मायें और कहाँ सन्देश पहुँचा होगा तो एक करोड़, दो करोड़ तक! बाकी कितने पड़े हैं? हाँ, यह राजधानी के नजदीक वाले पहुँच गये हैं लेकिन चाहिए तो सब। वर्सा तो सबको देना है चाहे मुक्ति दो, चाहे जीवनमुक्ति दो। लेकिन देना तो सबको है, एक भी बाप का बच्चा वंचित रह नहीं जाए। कैसे भी बाप के वर्से के अधिकारी तो बनना ही है, चाहे किसी भी विधि से सन्देश सुनें। इसके लिए चाहिए ‘तीव्रगति’। यह भी समय आ रहा है, होती जाएगी।

अभी धीरे-धीरे सभी धर्म वाले अपनी बातों में मोल्ड हो रहे हैं। पहले कट्टर रहते थे, अभी मोल्ड हो रहे हैं। चाहे क्रिश्चियन हैं, चाहे मुस्लिम हैं लेकिन भारत की फिलासॉफी (दर्शन) को अन्दर से रिगार्ड देते हैं क्योंकि भारत की फिलासॉफी में सब प्रकार की रमणीकता है। ऐसे और धर्मों में नहीं है। कहानियों की रीति से, ड्रामा की रीति से जो भारत की फिलासॉफी की प्रसिद्ध करते हैं, वैसे और धर्मों में कहाँ भी नहीं है। इसलिए, अन्दर ही अन्दर जो एकदम कट्टर रहे हैं, वह अन्दर समझते हैं कि भारत की फिलासॉफी, उसमें भी आदि सनातन फिलासॉफी कम नहीं है। वह भी दिन आ जायेंगे जो सब कहेंगे कि अगर फिलासॉफी है तो आदि सनातन धर्म की है। हिन्दू शब्द से बिगड़ते हैं लेकिन आदि सनातन धर्म को रिगार्ड देंगे। गॉड एक है तो धर्म भी एक है, हम सबका धर्म भी एक है – यह धीरे-धीरे आत्मा के धर्म की तरफ आकर्षित होते जायेंगे। अच्छा!

प्रश्न:- सहजयोगी सदा रहें, उसकी सहज विधि कौन सी है?

उत्तर:- बाप ही संसार है – इस स्मृति में रहो तो सहजयोगी बन जायेंगे। क्योंकि सारा दिन संसार में ही बुद्धि जाती है। जब बाप ही संसार है तो बुद्धि कहाँ जायेगी? संसार में ही जाएगी ना, जंगल में तो नहीं जाएगी। तो जब बाप ही संसार हो गया तो सहजयोगी बन जायेंगे। नहीं तो मेहनत करनी पडेगी – यहाँ से बुद्धि हटाओ, वहाँ से जुड़ाओ। सदा बाप के स्नेह में समाए रहो तो वह भूल नहीं सकता।

अध्याय: ब्रह्मा मात-पिता की अपने ब्राह्मण बच्चों के प्रति दो शुभ आशाएँ

मुरली संदर्भ: (सीजन एंड अव्यक्त मुरली – वर्ष अनुसार, अंतिम सत्र)


 भूमिका: बापदादा की दृष्टि में ब्राह्मण आत्माएँ – “जगमगाते दीपक”

बापदादा आज अपने ब्राह्मण बच्चों को “शुभ आशाओं के दीपक” के रूप में देख रहे थे।
दीपक का अर्थ है — सदा जागती हुई ज्योति

उदाहरण:

एक दीपक जो लगातार जलता है — वह स्थिर, आकर्षक और उपयोगी होता है

  • लेकिन जो दीपक बार-बार टिमटिमाता है — वह अस्थिरता दर्शाता है

मुरली पॉइंट:

“सदा जगमगाते दीपक ही बाप की आशाओं को पूर्ण करते हैं।”


 संकल्प और कर्म का अंतर – आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती

हर ब्राह्मण आत्मा के अंदर उमंग-उत्साह होता है:
 “जो बाप ने कहा है, मैं करके दिखाऊँगा”

लेकिन…

 संकल्प vs कर्म

संकल्प कर्म
उच्च सोच प्रैक्टिकल में गिरावट
उमंग-उत्साह परिस्थितियों में कमजोर
“मैं करूँगा” “अगर ये नहीं होता…”

उदाहरण:

  • मेडिटेशन में संकल्प: “मैं शांत आत्मा हूँ”
  • ऑफिस/घर में: गुस्सा आ जाता है

मुरली पॉइंट:

“अगर-मगर के चक्कर में संकल्प और कर्म में अंतर आ जाता है।”


 पहली शुभ आशा: “बाप समान साक्षी और साथी बनना”

 इसका अर्थ क्या है?

बापदादा चाहते हैं कि बच्चे भी:
✔️ साक्षी (Observer) बनें
✔️ साथी (Helper) बनें
✔️ समय अनुसार दोनों रोल निभाएँ


 उदाहरण से समझें

 स्थिति 1:

कोई आपकी आलोचना करे
 साक्षी बनना = अंदर शांत रहना

🔹 स्थिति 2:

कोई दुखी है
 साथी बनना = उसे सहारा देना

गलती क्या होती है?

  • जहाँ साक्षी बनना चाहिए → वहाँ हम भावुक हो जाते हैं
  • जहाँ साथी बनना चाहिए → वहाँ हम दूर हो जाते हैं

मुरली पॉइंट:

“समय प्रमाण साक्षी और साथी दोनों पार्ट निभाना ही बाप समान बनना है।”


 स्नेह की माला vs विजय माला

  • स्नेह की माला → सभी जुड़े हुए हैं
  • विजय माला → बहुत छोटी है (कम विजयी आत्माएँ)

क्यों?
क्योंकि स्नेह तो है, लेकिन शक्ति में कमी है

मुरली पॉइंट:

“स्नेह का धागा मजबूत है, लेकिन शक्तिशाली बनना बाकी है।”


 दूसरी शुभ आशा: “ब्राह्मण परिवार के प्रति सदा शुभ भावना और शुभ कामना”

 सिर्फ संकल्प नहीं, कर्म में भी स्नेह चाहिए

बहुत बच्चे कहते हैं:
 “हम सबके लिए अच्छा सोचते हैं”

लेकिन…

कर्म में क्या होता है?

  • तुलना
  • शिकायत
  • ईगो (“मैंने किया”)

 सच्चा स्नेह कैसा होता है?

✔️ जहाँ “मैं” और “मेरा” समाप्त हो जाए
✔️ जहाँ दूसरों की सफलता में खुशी हो
✔️ जहाँ कोई भी बात फीलिंग न बनाए


 उदाहरण: बापदादा का स्नेह

  • बच्चों ने ज्यादा सेवा की → बापदादा खुश हुए
  • कभी यह नहीं सोचा → “मैं ही निमित्त हूँ”

 यही है नि:स्वार्थ स्नेह

मुरली पॉइंट:

“आपने किया सो मैंने किया — यह भावना ही सच्चा स्नेह है।”


 बैलेन्स क्यों जरूरी है?

🔹 बैलेन्स 1:

याद + सेवा

🔹 बैलेन्स 2 (मुख्य):

बाप का स्नेह = परिवार का स्नेह

समस्या कहाँ है?

  • बाप से स्नेह → 100%
  • परिवार से स्नेह → बदलता रहता है

मुरली पॉइंट:

“जितना बाप से, उतना बच्चों से — यही बैलेन्स चाहिए।”


 सेवा में माया क्यों आती है?

मुख्य कारण:

 “दिल का स्नेह नहीं, सिर्फ औपचारिक स्नेह”


 उदाहरण:

🔹 व्यक्ति A:

  • 2 सेंटर संभालता है
  • लेकिन शांति, प्रेम, एकता है

🔹 व्यक्ति B:

  • 50 सेंटर संभालता है
  • लेकिन अंदर टकराव, ईगो, तनाव

कौन श्रेष्ठ?
 A (क्योंकि माया मुक्त सेवा)

मुरली पॉइंट:

“माया से मुक्त, योगयुक्त सेवा ही बाप के रजिस्टर में जमा होती है।”


 सच्ची सेवा की पहचान

✔️ सभी संतुष्ट हों
✔️ दुआएँ मिलें
✔️ दिल से सेवा हो

 दिखावे की सेवा → कोई लाभ नहीं


 तीव्रगति सेवा का रहस्य

 एकता + प्लेन बुद्धि = तेज सेवा

 उदाहरण:

  • “जिसने किया, वह अच्छा”
  • “जो हुआ, वह अच्छा”

 इससे निर्णय तेजी से होते हैं
 सेवा 4 गुना बढ़ सकती है


 प्रश्न-उत्तर (मुरली सार)

 सहज योगी कैसे बनें?

उत्तर:
“बाप ही संसार है” — इस स्मृति में रहो

 उदाहरण:

  • मन बार-बार दुनिया में जाता है
  • अगर “बाप = संसार” समझ लिया
     तो मन अपने आप योग में रहेगा

 अंतिम सार (Takeaways)

✔️ सदा जगमगाते दीपक बनो
✔️ संकल्प और कर्म को समान बनाओ
✔️ साक्षी + साथी दोनों बनो
✔️ बाप और परिवार में स्नेह का बैलेन्स रखो
✔️ सेवा को माया-मुक्त बनाओ


 बापदादा का संदेश

“स्नेह की माला तैयार है, अब विजय माला भी लम्बी बनाओ।”


 समापन शुभकामनाएँ

चारों ओर के सभी ब्राह्मण कुल दीपकों को —
 सदा बाप की आशाओं को पूर्ण करने वाले
 स्नेह और सेवा में बैलेन्स रखने वाले
 दिल से सेवा करने वाले

 ऐसे श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते

प्रश्न 1: बापदादा ब्राह्मण आत्माओं को “जगमगाते दीपक” क्यों कहते हैं?उत्तर:

क्योंकि हर ब्राह्मण आत्मा बाप की शुभ आशाओं को पूर्ण करने वाली ज्योति है।
दीपक का अर्थ है — सदा जागती हुई, स्थिर और प्रकाश देने वाली आत्मा

 जो आत्मा सदा जागरूक रहती है, वही बाप की आशाओं को पूरा कर सकती है।मुरली पॉइंट:
“सदा जगमगाते दीपक ही बाप की आशाओं को पूर्ण करते हैं।”


 प्रश्न 2: संकल्प और कर्म में अंतर क्यों आ जाता है?

उत्तर:

क्योंकि आत्मा संकल्प तो ऊँचे करती है, लेकिन परिस्थितियाँ, संस्कार और माया प्रैक्टिकल में बाधा डाल देते हैं।

 “अगर-मगर” के कारण शक्ति कम हो जाती है।

उदाहरण:

  • सोच: “मैं शांत आत्मा हूँ”
  • कर्म: छोटी बात पर गुस्सा

मुरली पॉइंट:
“अगर-मगर के चक्कर में संकल्प और कर्म में अंतर आ जाता है।”


 प्रश्न 3: पहली शुभ आशा क्या है?

उत्तर:

बाप समान साक्षी और साथी बनना।

 अर्थात्:
✔️ परिस्थिति में साक्षी रहना
✔️ जरूरत के समय साथी बनना
✔️ समय अनुसार दोनों रोल निभाना

मुरली पॉइंट:
“समय प्रमाण साक्षी और साथी दोनों पार्ट निभाना ही बाप समान बनना है।”


 प्रश्न 4: साक्षी और साथी बनने में गलती कहाँ होती है?

उत्तर:

हम समय अनुसार रोल नहीं निभाते।

जहाँ साक्षी बनना चाहिए → वहाँ भावुक हो जाते हैं

  • जहाँ साथी बनना चाहिए → वहाँ दूरी बना लेते हैं

 यही असंतुलन हमें बाप समान बनने से रोकता है।


प्रश्न 5: स्नेह की माला और विजय माला में क्या अंतर है?

उत्तर:

✔️ स्नेह की माला: सभी आत्माएँ बाप से जुड़ी हैं
विजय माला: बहुत कम आत्माएँ विजयी बनती हैं

 कारण:
स्नेह है, लेकिन शक्ति और स्थिरता की कमी है

🔸 मुरली पॉइंट:
“स्नेह का धागा मजबूत है, लेकिन शक्तिशाली बनना बाकी है।”


 प्रश्न 6: दूसरी शुभ आशा क्या है?

उत्तर:

ब्राह्मण परिवार के प्रति सदा शुभ भावना और शुभ कामना रखना — और उसे कर्म में लाना।

 सिर्फ सोचने से नहीं, बल्कि व्यवहार में भी स्नेह दिखना चाहिए।


 प्रश्न 7: सच्चा स्नेह किसे कहते हैं?

उत्तर:

जहाँ “मैं” और “मेरा” समाप्त हो जाए, वही सच्चा स्नेह है।

 उसकी विशेषताएँ:
✔️ दूसरों की सफलता में खुशी
✔️ कोई फीलिंग नहीं
✔️ कोई तुलना नहीं

🔸 मुरली पॉइंट:
“आपने किया सो मैंने किया — यही सच्चा स्नेह है।”


 प्रश्न 8: बाप और परिवार के स्नेह में बैलेन्स क्यों जरूरी है?

उत्तर:

क्योंकि आध्यात्मिक उन्नति तभी संभव है जब:
जितना बाप से स्नेह, उतना ही परिवार से भी हो

असंतुलन होने पर:

  • सेवा में समस्या आती है
  • मन में अशांति आती है

मुरली पॉइंट:
“जितना बाप से, उतना बच्चों से — यही बैलेन्स चाहिए।”


 प्रश्न 9: सेवा में माया क्यों आती है?

उत्तर:

क्योंकि सेवा में दिल का स्नेह नहीं होता, केवल औपचारिकता होती है।

 जहाँ सच्चा स्नेह नहीं, वहाँ:

  • ईगो
  • तुलना
  • टकराव

आ जाते हैं।


 प्रश्न 10: सच्ची सेवा किसे कहा जाता है?

उत्तर:

वह सेवा जिसमें:
✔️ सभी संतुष्ट हों
✔️ दुआएँ मिलें
✔️ माया न हो
✔️ योगयुक्त हो

मुरली पॉइंट:
“माया से मुक्त, योगयुक्त सेवा ही जमा होती है।”


 प्रश्न 11: ज्यादा सेंटर चलाने वाला ही श्रेष्ठ सेवाधारी है?

उत्तर:

नहीं।

 अगर कम सेवा में भी शांति और एकता है, तो वह ज्यादा श्रेष्ठ है।

उदाहरण:

  • 2 सेंटर (शांति) → श्रेष्ठ
  • 50 सेंटर (टकराव) → कम जमा

 प्रश्न 12: तीव्रगति सेवा का रहस्य क्या है?

उत्तर:

एकता + प्लेन बुद्धि

✔️ “जिसने किया, वह अच्छा”
✔️ “जो हुआ, वह अच्छा”

 इससे सेवा तेज और सफल होती है।


 प्रश्न 13: सहज योगी बनने की सरल विधि क्या है?

उत्तर:

 “बाप ही संसार है” — इस स्मृति में रहना

 जब मन बार-बार संसार में जाता है, तो यदि बाप को ही संसार मान लिया —
तो मन अपने आप योग में टिक जाएगा।

Disclaimer (डिस्क्लेमर)

यह वीडियो/सामग्री ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक मुरली ज्ञान पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति और सकारात्मक जीवन मूल्यों को साझा करना है। यह किसी भी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं है। दर्शक इसे अपने विवेक और समझ के अनुसार ग्रहण करें।

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